कौशल विकास का आधार सुदृढ़ करना आवश्यक-‘द हिन्दू’

 

 

वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम के 130 देशों में भारत की स्थिति 103वें स्थान पर है। भारत की यह पिछड़ी स्थिति हमारे यहाँ के कौशल विकास को स्पष्ट चुनौती देती दिखाई दे रही है। सरकारी समीक्षा रिपोर्ट  के अनुसार 40 लाख कर्मचारी ऐसे हैं, जिन्हें कुशल बनाने, पुनः निपुण बनाने या उनमें कुशलता के स्तर को बढ़ाने की आवश्यकता है। जबकि सरकारी आँकड़े यह भी बताते हैं कि प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख लोगों को प्रशिक्षित किया जाता है।

नीति निर्माता चिन्तित हैं कि इतने लोगों को प्रतिवर्ष प्रशिक्षण देने के बावजूद देश को कौशल सम्पन्न बनाने में हम इतना पिछड़ क्यों रहे हैं? अब हमें यह देखने की आवश्यकता है कि सीमित समय और सीमित संसाधनों में ही कैसी कौशल विकास नीति कार्यान्वित करें, जिसका प्रभाव सामने दिखाई दे सके?

किसी भी राज्य के पास सभी छेत्रों में संसाधनों की भरमार नहीं होती। अतः अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रों; जैसे शिक्षा, बाल-विवाह, कृषि, आपदा-प्रबंधन आदि को आधार बनाकर काम किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। उदाहरण के लिए आंध्रप्रदेश राज्य को लें, तो देखते हैं कि –

  • यहाँ के लघु एवं मझोले उद्योगों को ऋण सहायता देने से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और विकास भी होगा।
  • राज्य में व्यावसायिक शिक्षा के साथ प्रशिक्षु कार्यक्रमों को चलाने की आवश्यकता समझी गई है। इसमें नियोक्ता को धन मुहैया कराने से अंतिम रूप से सरकार को लाभ पहुँचेगा।
  • वर्तमान में चल रहे व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम का विस्तार करके भी कौशल विकास को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। भारत के प्रत्येक राज्य की जनसांख्यिकी एवं आर्थिक पक्ष भिन्न हैं। अतः आंध्रप्रदेश की ही तर्ज पर प्रत्येक राज्य के लिए अलग कौशल विकास निवेश कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए। तभी उसका सही प्रतिफल मिल सकेगा।

‘द हिन्दू’ में प्रकाशित बियॉर्न लॉम्बोर्ग एवं सलीमा रिजवी के लेख पर आधारित।