क्यों बढ़ रहा है भूखमरी का अनुपात

क्यों बढ़ रहा है भूखमरी का अनुपात

संदर्भ

वर्ष 2003 और 2014 के बीच, लगभग एक दशक तक दुनिया भर में अल्पपोषित लोगों की संख्या में लगातार गिरावट (संख्या के संदर्भ में 961.5 मिलियन से 783.7 मिलियन और कुल आबादी के संदर्भ में 15.1% से 10.7%) देखने को मिली, लेकिन पिछले तीन वर्षों के दौरान यह परिदृश्य पूरी तरह से उलट गया है।

वैश्विक स्थिति

  • संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के मुताबिक, 2014 में भूख से पीड़ित लोगों की संख्या 783.7 थी, जो 2015 में 784.4 मिलियन, 2016 में 804.2 मिलियन और 2017 में 820.8 मिलियन हो गई।
  • विश्व की जनसंख्या में अल्पपोषित लोगों का हिस्सा 2014 के 10.7% से बढ़कर 10.9% हो गया है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO)

  • संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ तंत्र की सबसे बड़ी विशेषज्ञता प्राप्त एजेंसियों में से एक है जिसकी स्‍थापना वर्ष 1945 में कृषि उत्‍पादकता और ग्रामीण आबादी के जीवन निर्वाह की स्‍थिति में सुधार करते हुए पोषण तथा जीवन स्‍तर को उन्‍नत बनाने के उद्देश्य के साथ की गई थी।
  • इसका सीधा-सीधा अर्थ यह है कि लोगों द्वारा उपभोग किया जाने वाला भोजन सामान्य, सक्रिय और स्वस्थ जीवन जीने हेतु न्यूनतम आहार ऊर्जा की आवश्यकता प्रदान करने के लिये पर्याप्त नहीं है।

     कुपोषण क्या है?

  • कुपोषण (Malnutrition) वह अवस्था है जिसमें पौष्टिक पदार्थ और भोजन अव्यवस्थित रूप से लेने के कारण शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल पाता है और यह एक गंभीर स्थिति है।
  • कुपोषण तब भी होता है जब किसी व्यक्ति के आहार में पोषक तत्त्वों की सही मात्रा नहीं होती है।
  • दरअसल, हम स्वस्थ रहने के लिये भोजन के ज़रिये ऊर्जा और पोषक तत्त्व प्राप्त करते हैं, लेकिन यदि भोजन में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन और खनिजों सहित पर्याप्त पोषक तत्त्व नहीं मिलते हैं तो हम कुपोषण के शिकार हो सकते हैं।

    कुपोषण का प्रभाव 

  • शरीर को आवश्यक संतुलित आहार लंबे समय तक नहीं मिलने से बच्चों और महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे वे आसानी से कई तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।
  • बच्चों और स्त्रियों के अधिकांश रोगों की जड़ में कुपोषण ही है। स्त्रियों में रक्ताल्पता या घेंघा रोग अथवा बच्चों में सूखा रोग या रतौंधी और यहाँ तक कि अंधापन भी कुपोषण का ही दुष्परिणाम है। कुपोषण बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करता है।
  • यह जन्म के बाद या उससे भी पहले शुरू हो जाता है और 6 महीने से 3 वर्ष की आयु वाले बच्चों में तीव्रता से बढ़ता है।  सबसे भयंकर परिणाम इसके द्वारा होने वाला आर्थिक नुकसान है।
  • कुपोषण के कारण मानव उत्पादकता 10-15 प्रतिशत तक कम हो जाती है जो सकल घरेलू उत्पाद को 5-10 प्रतिशत तक कम कर सकता है।
  • ज़्यादा दिलचस्प बात यह है कि भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में बढ़ोतरी संबंधी यह जानकारी ऐसे समय पर सामने आई है जब 2014 के बाद से अंतर्राष्ट्रीय पटल पर कृषि-उत्पादों के मूल्यों में कमी आई है।
  • 2014 में 201.8 के औसत के मुकाबले संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के खाद्य मूल्य सूचकांक (आधार वर्ष: 2002-2004 = 100) में अगले तीन वर्षों तक 164, 5 और 174.6 तक गिरावट दर्ज़ की गई। ग्राफ का अवलोकन करें….
  • वैश्विक स्तर पर भूख और खाद्य पदार्थों के मूल्य के मध्य ग्राफ

क्या है भारत का रुझान

  • भारत में अल्पपोषण और खाद्य पदार्थों की कीमतों के बीच तालमेल की कमी तक देखी जा सकती है।
  • औद्योगिक श्रमिकों के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर वार्षिक खाद्य मुद्रास्फीति (औसतन तीन साल) 2001 से 2005 के दौरान 1.6% से 3.4% तक थी। यह एक ऐसी अवधि थी जब देश में अल्पपोषित लोगों की अनुमानित आबादी 191.2 मिलियन से बढ़कर 256.5 मिलियन हो गई।
  • इसके बाद, 2009-10 आते-आते खाद्य मुद्रास्फीति दो अंकों तक बढ़ गई जो विश्वव्यापी मूल्य वृद्धि के अनुरूप थी, लेकिन दशक के अंत में भारत में भूख से प्रभावित लोगों की संख्या वास्तव में घटकर 214.4 मिलियन हो गई। ग्राफ का अवलोकन करें…
  • भारत के संदर्भ में भूख और खाद्य पदार्थों के मूल्य के मध्य ग्राफ
  • हालाँकि, खाद्य मुद्रास्फीति 2014 तक दो अंकों के स्तर पर बनी रही (भारत का ग्राफ देखें), लेकिन फिर भी इसमें अल्पपोषित लोगों की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई।
  • 2014 के पश्चात् के आँकड़ों पर एक नज़र डालें तो पता चलता है कि वैश्विक रुझानों के विपरीत भारत के अल्पपोषित लोगों की संख्या में पिछले तीन वर्षों के दौरान गिरावट आई है। यद्यपि 2017 तक खाद्य मुद्रास्फीति में 4% की कमी के मुकाबले अल्पपोषित लोगों की संख्या में कमी बहुत कम है। भारत का ग्राफ देखें….

  • अब सवाल यह उठता है कि ऐसी विरोधाभाषी गतिविधियों को किस प्रकार से समझा जाए? क्या 2014 के बाद खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट या मुद्रास्फीति में सुगमता नहीं आनी चाहिये, आखिरकार इससे न केवल भोजन किफायती दरों पर उपलब्ध हो पाया है बल्कि भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में भी कमी आई है?

संघर्ष और जलवायु

  • रोम में FAO के सहायक महानिदेशक कोस्टास जी. स्टैमौलिस (Kostas G Stamoulis) वैश्विक अल्पपोषण की वापसी के पीछे तीन कारकों का होना बताते हैं।
  • पहला, दुनिया भर में व्याप्त विभिन्न समस्याओं एवं विवादों के परिणामस्वरूप उपजती आबादी के विस्थापन और खाद्य असुरक्षा की समस्या। विश्व के 821 मिलियन अल्पपोषित लोगों में से लगभग 500 मिलियन लोग पश्चिम एशिया, उत्तरी और उत्तरी उप-सहारा अफ्रीका, मध्य अमेरिका एवं पूर्वी यूरोप जैसे संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में रहते हैं। खासकर 2010 के बाद, राज्य और संगठित सशस्त्र समूहों के बीच हिंसक संघर्ष नाटकीय रूप से बढ़ गए हैं।
  • दूसरा, जलवायु में भारी विविधता (तापमान तथा वर्षा) और बदलाव (सूखा, बाढ़, भयानक लू एवं तूफ़ान) का आना।
  • 2015-16 का अल नीनो पिछले 100 वर्षों के इतिहास में सबसे प्रभावकारी घटनाओं में से एक थी। एक जानकारी के अनुसार, वैश्विक औसत तापमान के आधार पर 2016 को सबसे गर्म और 2015 को दूसरे सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज़ किया गया। पृथ्वी ग्रह पर छः सबसे अधिक गर्म वर्ष 2010 के बाद से रहे हैं।
  • लेकिन संघर्ष और जलवायु जैसे कारकों के प्रभाव, यदि कोई हों, तो मुख्य रूप से कृषि उत्पादन और आपूर्ति पर परिलक्षित होंगे, जिसकी वज़ह से वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होगी। इसके बजाए, हमें यह देखने को मिलता है कि दुनिया भर में गेहूँ, मकई, चावल, सोयाबीन, ताड़ के तेल, चीनी, कपास, दूध और लगभग हर दूसरी कृषि-संबंधी वस्तुएँ काफी मात्रा में उपलब्ध हैं। यदि इनके आवंटन एवं प्राप्ति के स्रोत संबंधी समस्याओं का निपटारा कर लिया जाए, तो संभवतः इस जटिल समस्या का समाधान खोजा जा सकता है। भारत और वैश्विक स्तर पर पिछले चार वर्षों की कहानी, किसानों की निराशाजनक आय प्राप्ति के रूप में रही है, स्पष्ट रूप से इसका परिणाम भुखमरी और अल्पपोषण जैसे कारकों के रूप में सामने आता है, जोकि एक गंभीर समस्या है।

आर्थिक मंदी

  • महानिदेशक कोस्टास जी स्टैमौलिस द्वारा निर्दिष्ट तीसरा कारक आर्थिक मंदी है।
  • अल्पपोषित लोगों की बढ़ती संख्या सामान्य आर्थिक मंदी और वस्तुओं (चाहे कृषि, तेल या धातु) की गिरती कीमतों से जुड़ी हुई है। जिसके परिणामस्वरूप वस्तु निर्यात करने वाले देशों के राजस्व और विदेशी मुद्रा आय में कमी आती है और अंततः सरकारों के पास कल्याणकारी कार्यक्रमों पर खर्च करने के लिये पैसे नहीं बचते हैं।
  • यह कृषि-वस्तुओं की अत्यधिक आपूर्ति तथा शांतिपूर्ण माहौल के बीच भी, भूख से पीड़ित लोगों की संख्या में बढ़ोतरी के संदर्भ में एक व्यावहारिक कारण प्रतीत होता है।
  • वाशिंगटन स्थित इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI) में पर्यावरण और उत्पादन प्रौद्योगिकी प्रभाग के निदेशक चैनिंग अर्न्त (Channing Arndt) भी इस स्पष्टीकरण के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हैं।

चैनिंग के अनुसार, वर्ष 2008-09 की तरह (ग्राफ देखें) खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी विक्रेताओं को छोड़कर सभी के लिये नुकसानदेह लेकिन, अच्छी खबर यह है कि उच्च कीमतें उत्पादन को प्रोत्साहित कर सकती हैं, जिससे कृषि आय में वृद्धि होने कि संभावना बनती है और परिणामस्वरूप अकुशल कृषि श्रमिकों की मांग में भी वृद्धि होती है। कुल ग्रामीण मज़दूरी में भी इज़ाफा होगा जिसके परिणामस्वरूप क्रय शक्ति में वृद्धि होगी। स्पष्ट रूप से बढ़ी हुई क्रय शक्ति जहाँ एक ओर भुखमरी की समस्या से निजत दिलाने में सहायक सिद्ध होगी, वहीं दूसरी ओर बेहतर जीवन स्तर एवं स्वास्थ्य संबंधी सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में भी कारगर होगी।