जलमार्गों के संघर्ष में एशिया-पेसिफिक बना इंडो-पेसिफिक

सैयद अता हसनैन , ( लेफ्टि.जन. (रिटायर्ड) कश्मीर में 15वीं कोर के पूर्व कमांडर )

हाल ही में एशिया-पेसिफिक क्षेत्र का नाम इंडो-पेसिफिक करने के बाद से दुनिया का फोकस महासागरों और इससे जुड़े मसलों पर बढ़ता जा रहा है। मुख्यत: हिंद महासागर खासतौर पर फारस की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य तक की सी लैन्स ऑफ कम्युनिकेशन्स (एसएलओसी) पर प्रभाव हासिल करने के पावर प्ले के कारण मालदीव और श्रीलंका की घटनाएं क्षेत्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहीं। एसएलओसी का अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में और हमारे लिए इतना महत्व क्यों है?

भारतीय उपमहाद्वीप के पास हिंद महासागर के क्षेत्र से दुनिया का सबसे सघन जल यातायात होता है। चीन को खाड़ी से होने वाली ऊर्जा की 80 फीसदी आपूर्ति इसी मार्ग से होती है, जिसने इसे मैन्युफैक्चरिंग का सरताज बना रखा है। लगभग इसी प्रतिशत में यहां से चीनी प्रोडक्ट कंटेनरों में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेजे जाते हैं। इस तरह चीन की पूरी अार्थिक तरक्की इस मार्ग पर आवाजाही पर निर्भर है। फारस की खाड़ी से मलक्का तक केवल एक अमेरिकी ठिकाना है, जो अमेरिका व सहयोगी देशों को एसएलओसी पर कुछ प्रभुत्व देता है। भारत के नौसैन्य संसाधान अमेरिका को कुछ आश्वस्त जरूर करते हैं। चीन को लंबे समय से इसका डर रहा है। ट्रेड वॉर एक बात है पर इसकी आर्थिक शक्ति को टिकाने वाले जहाजों को खतरा अमेरिका के साथ रणनीतिक होड़ बढ़ने के साथ वास्तविक होता जाएगा। इसीलिए उसने एसएलओसी के पास के देशों में प्रभाव पाने के लिए ‘बेल्ट एंड रोड’ योजना बनाई।

पश्चिमी हिंद महासागर में डिजिबाउती में पहले ही चीनी ठिकाना है लेकिन, मलक्का जलडमरूमध्य के समीप स्थित अंडमान-निकोबार के पास इसकी मौजूदगी चीन को चिंतित करती है। वहां भारत का नवोदित संयुक्त कमान थिएटर भी है, जिसके मजबूत होने के साथ चीनी जहाजों को खतरा बढ़ जाएगा। हम युद्ध की बात नहीं कर रहे हैं पर आपातकालीन परिस्थितियों में क्षमताओं की बात कर रहे हैं। मलक्का के उस तरफ जाते ही आपके सामने पेसिफीक (प्रशांत) क्षेत्र आ जाता है। यहां जलमार्गों पर आसियान देशों का प्रभाव है। चीन ने बाहुबल से दक्षिण चीन सागर पर दबदबा जमा लिया है ताकि बाहरी नेविगेशन को कुछ नियंत्रित किया जा सके। इसमें इसने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को भी ठुकरा दिया। नियम आधारित परस्पर अस्तित्व व महासागरीय अावाजाही की स्वतंत्रता के खिलाफ इसने अहंकारी रवैया अपनाया है।

इन्हीं कारणों से अमेरिका ने हिंद और प्रशांत महासागरों से जुड़े क्षेत्रों पर रणनीतिक सहयोग के माध्यम से ध्यान देने की जरूरत महसूस की। भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति इसमें मददगार है और भारत को अमेरिका के लिए रणनीतिक असेट बनाती है। चीन की नौसैन्य शक्ति बढ़ने के साथ अमेरिका और इसके सहयोगियों के साथ उसके दुर्घटनावश होने वाले टकराव की आशंका बढ़ जाएगी। भारत अमेरिका का गठबंधन सहयोगी नहीं है पर दोनों राष्ट्रों के बीच रणनीतिक भागीदारी को चीन उदारता से नहीं लेगा।