धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े कुछ प्रश्न

 

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात सरकार को निर्देश दिया है कि वह 2002 के दंगों में क्षतिग्रस्त हुए धार्मिक स्थलों की मरम्मत कराए या जिन्होंने मरम्मत करवा ली है, उन्हें हर्जाना दे।

गौरतलब है कि गुजरात के दंगों में लगभग 567 धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुँचाया गया था। इसके एवज में वहाँ के उच्च न्यायालय ने सरकार को इस नुकसान की भरपाई करने का आदेश दिया था। गुजरात सरकार ने इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में यह कहते हुए अपील की थी कि अनुच्छेद 226 के अनुसार उच्च न्यायालय के रिट अधिकार क्षेत्र में ऐसा निर्देश संभव नहीं है, क्योंकि संविधान के 44वें संशोधन में सम्पत्ति को मौलिक नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार माना गया है। साथ ही राज्य सरकार ने यह भी दावा किया कि अनुच्छेद 27 के मद्देनजर राज्य सरकार को धार्मिक उद्देश्य के लिए धन खर्च करने का अधिकार नहीं है।

इस मुद्दे पर प्रतिवादी ने दलील दी थी कि कमजोर वर्ग के धार्मिक संस्थानों की हानि केवल धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से ही नहीं, बल्कि समानता एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से भी जुड़ी है। राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य की है और अगर राज्य इसमें असफल रहा है, तो उसे उसकी भरपाई इस रूप में करनी चाहिए।

गुजरात सरकार के इस मामले के कारण संविधान एवं राज्य एवं केन्द्र सरकार से जुड़े अनेक सवाल उठ खड़े होते हैं।

  • अनुच्छेद 290 ए के अंतर्गत केरल सरकार, ट्रावनकोर देवास्वम निधि को प्रतिवर्ष5 लाख रुपए की राशि देती है।
  • तमिलनाडु भी ‘राज्य के हिन्दू मंदिरों’ के रखरखाव के लिए प्रतिवर्ष एक बड़ी राशि देता है।
  • भारत सरकार ने अमरनाथ यात्रा मार्ग के लिए 10 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद हज यात्रा पर दी जाने वाली छूट वापस नहीं ली गई है।
  • मध्यप्रदेश सरकार वरिष्ठ नागरिकों के लिए अजमेर एवं अन्य धार्मिक स्थलों की यात्राओं का आयोजन करती है।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं, जहाँ केन्द्र एवं राज्य सरकारें अनेक धार्मिक कार्यों के लिए छोटी-मोटी या बड़ी राशि खर्च करती हैं।

गुजरात सरकार के विरुद्ध दिए गए उच्चतम न्यायालय के फैसले से संविधान के अनुच्छेद 27 से जुड़े सवाल खड़े होते हैं कि क्या न्यायालय का यह फैसला इसके विरुद्ध है? क्या न्यायालय को रिट-न्याय में केवल तभी राहत देनी चाहिए, जब किसी व्यक्ति का अनुच्छेद 21 से जुड़ा जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही मामला हो या फिर राज्य सरकार को धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकार के हनन के लिए भी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है?

ये सभी प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं। भविष्य में उच्चतम न्यायालय के निर्णयों में शायद इनका समाधान मिल सके।

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