बजट से सम्बंधित पूरी जानकारी || FOR UPSC/IAS/PCS

  1. बजटिंग: अर्थ और महत्व
  • बजट, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की अनुमानित आय और व्यय का विवरण है। यह संसाधनों की उपलब्धता का अनुमान लगाने तथा तत्पश्चात् उन्हें पूर्व निर्धारित प्राथमिकता के अनुसार किसी संगठन की विभिन्न गतिविधियों के लिए आवंटित करने की प्रक्रिया है। इसके साथ ही यह जनता की आवश्यकताओं और उद्देश्यों के साथ दुर्लभ संसाधनों को संतुलित करने का प्रयासभी है।
  • किन्तु बजट केवल देश का आर्थिक लेखा-जोखा ही नहीं है। बजट, धन की प्राप्ति और उसके व्यय काही विवरण नहीं बल्कि इससे कही अधिक व्यापक अवधारणा है। बजट वरीयताओं, नीतियों और सिद्धांतों का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं में संसाधनों का आवंटन है तथा इन प्राथमिकताओं में निष्पक्षता या सामाजिक न्याय के मुद्दे भी सम्मिलित हैं। बजट किसी देश द्वारा उसके उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु चुने गए दिशा एवं मार्ग को इंगित करता है।

अपनी वित्तीय भूमिका के अतिरिक्त, वजट द्वारा या बजट के माध्यम से किए जाने वाले अन्य कार्य निम्नलिखित हैं:

  • बजट नियंत्रण के साधन के रूप में कार्य करता है। बजट विभिन्न विभागों की प्रगति का मूल्यांकन करने के लिए मापदंड के रूप में कार्य करता है। यदि कोई विभाग अपने बजटीय प्रस्तावों के संबंध में लक्ष्य से दूर है तो उसे सूचित किया जा सकता है एवं सुधारात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
  • बजटेरी प्रक्रिया में सरकार के सभी विभाग सम्मिलित होते हैं। विभिन्न विभागों के बीच होने वाले संघर्ष का समाधान किया जाना आवश्यक है। इस प्रकार बजटीय योजना और इसका कार्यान्वयन, विभिन्न विभागों को एक साथ लाने तथा उनके बीच समन्वय स्थापित करने में सहायता करता है।
  • अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन न करने वाले विभागों का आवंटन कम करके दंडात्मक कार्रवाई के साधन के रूप में भी बजट का उपयोग किया जा सकता है। इसलिए, बजट विभिन्न विभागों के कामकाज में दक्षता बनाए रखने में भी सहायक होता है।
  • बजट एक प्रशासक द्वारा इच्छित परिवर्तन करने और इस परिवर्तन को संस्थागत बनाने में भी सहायक हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि सरकार अपने कर्मचारियों की उत्पादकता में सुधार लाना चाहती है तो वह बजट के माध्यम से कार्य निष्पादन से संबंधित बोनस जैसे प्रोत्साहन लागू कर सकती है।
  • बजट, संसाधनों के पुनर्वितरण हेतु भी मंच उपलब्ध कराता है। यह पुनर्वितरण समृद्ध मे निर्धन कीऔर या विभिन्न क्षेत्रों के मध्य, विभिन्न पीढ़ियों के मध्य, श्रमिकों और गैर-श्रमिकों के मध्य हो सकता है।
  • यह धन की सार्वजनिक जवाबदेही के उद्देश्य की पूर्ति करता है।

संक्षेप में, यह संसाधनों को जुटाने की मांग करने वाली निरंतर बढ़ती सरकारी गतिविधियों हेतु एक नियोजित पद्धति है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान सरकारी कार्यों के संबंध में जनता की परिवर्तित होती राय के अनुक्रिया स्वरूप बजेटरी प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तनों से शासन के लिए बजट की महत्ता को भली-भांति समझा जा सकता है।

व्यापारिक और सरकारी बजट में अत्यधिक अंतर होता हैं। दोनों के मध्य अंतर को निम्न का सारणीबद्ध किया गया है:

 

सरकारी बजट व्यापारिक बजट
यह लगभग सभी सरकारी संस्थाओं के लिए कानूनी रूप में बाध्यकारी है। यह कानूनी रूप में बाध्यकारी नहीं है।
विनियोजित राशि इसकी सीमा होती है और किसी भी परिवर्तन के लिए औपचारिक अनुमोदन की आवश्यकता होती है तथा दी गई व्यवस्था के अंतर्गत इसे प्राप्त करना कठिन होता है। यह बजट इच्छानुसार हो सकता है और इस बजट को बीच में भी छोड़ा जा सकता है।
इसका उद्देश्य कल्याणकारी होता है। यह प्राय: लाभोन्मुख होता है।

 

  1. भारतीय संघ का बजट

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 112 बजट को ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ के रूप में संदर्भित करता है। बजट शब्द का प्रयोग संविधान में कहीं नहीं किया गया है। संघीय बजट के दो उद्देश्य है:

  • संघ सरकार की गतिविधियों का वित्तपोषण करना।
  • रोजगार, संधारणीय आर्थिक विकास और कीमतों के स्तर में स्थिरता जैसे समष्टिगत आर्थिकउद्देश्यों को प्राप्त करना, जो राजकोषीय नीति का एक भाग है।

 

2.1. संस्थाएँ एवं कानून 

  • विविध उत्तरदायित्वों को पूरा करने हेतु अपने सीमित संसाधन, वित्तीय नियोजन और ‘प्रतिनिधित्व के बिना कर नहीं’ जैसे लोकतांत्रिक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, सरकार को प्रतिवर्ष संसद के समक्ष वित्तीय विवरण प्रस्तुत करना होता है। सरकार अपनी इच्छानुसार कर आरोपित करने, ऋण लेने और धन व्यय करने के लिए स्वतंत्र नहीं होती है। व्यय की प्रत्येक मद सुविचारित होती है एवं एक विशिष्ट अवधि के लिए कुल परिव्यय निकाला जाता है। इसके अतिरिक्त, इन सभी वित्तीय प्रस्तावों के पीछे स्पष्ट रूप से अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से आम-जन की स्वीकृति होनी चाहिए।
  • इसलिए प्रतिवर्ष भारत सरकार का बजट संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किया जाता है। बजट में सरकार का वित्तीय विवरण सम्मिलित होता है। इस वित्तीय विवरण में एक वित्तीय वर्ष की अनुमानित प्राप्तियां और व्यय होते हैं। वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत प्रति वर्ष 1 अप्रैल से नया वित्तीय वर्ष आरंभ होता है। दूसरे शब्दों में, बजट आने वाले वर्ष के दौरान किस मद में कितना धन व्यय करना है, किसके द्वारा इसमें कितना योगदान दिया जाएगा और धन कहां से एकत्रित किया जाएगा, प्रस्ताव में इन सभी बातों का विवरण होता है।
  • बजट, आगामी वर्ष का अनुमान प्रस्तुत करता है और संसद को इस पर चर्चा करने तथा उसकी आलोचना करने में सक्षम बनाता है। साथ ही, सरकार को उसकी वित्तीय एवं आर्थिक नीति, कार्यक्रमों की समीक्षा और व्याख्या करने का अवसर भी प्रदान करता है। इसका महत्व केवल वित्त तक ही सीमित नहीं है क्योंकि बजट, सरकार के विचारों को भी प्रतिविंवित करता है एवं भविष्य की नीतियों का संकेत देता है।
  • भारत द्वारा अनुसरण की जाने वाली वित्तीय प्रक्रिया के आवश्यक अभिलक्षणों का संविधान में उल्लेख किया गया है। संविधान में वित्तीय विषयों में संघ स्तर पर लोकसभा और राज्य स्तर पर विधान सभा की सर्वोच्चता सुनिश्चित की गई है। संविधान प्रावधान करता है कि विधि के प्राधिकार के बिना, करों का अधिरोपण नहीं किया जा सकता एवं न ही उन्हें एकत्रित किया जा सकता है (अनुच्छेद 265) तथा राष्ट्रपति, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करेगा (अनुच्छेद 112)।
  • संविधान का अनुच्छेद 112 (केंद्र सरकार के लिए) तथा अनुच्छेद 202 (राज्य सरकार के लिए) संबंधित विधान सभा के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करने का प्रावधान करता है।
  • 1921 के पश्चात से संघ सरकार के बजट दो प्रकार के थे- रेलवे बजट और सामान्य बजट। 2017- 2018 के बजट में इस विभाजन को पुन: समाप्त कर रेलवे बजट का सामान्य बजट में विलय कर दिया गया है। सामान्य बजट, केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

किसी भी बजट में निम्नलिखित तीन प्रकार की सूचनाएं होती हैं:

  • पिछले वर्ष की प्राप्तियों और व्यय के वास्तविक आंकड़े
  • चालू वर्ष का बजट और संशोधित आंकड़े
  • आगामी वर्ष के लिए बजट अनुमान
  • उदाहरणार्थ इस वर्ष वित्त मंत्री द्वारा वर्ष 2018-2019 के लिए बजट प्रस्तुत किया गया। इस बजट के लिए पिछला वर्ष 2016-17 (वास्तविक आंकड़ें) है और चालू वर्ष 2017-18 (संशोधित बजट अनुमान) है तथा 2018-2019 (बजट अनुमान) प्रस्तुत किये गए है।
  • प्राप्तियों और संवितरण को सरकारी खातों के अंतर्गत तीन भागों में दर्शाया जाता है.(i) संचित निधि (ii) आकस्मिकता निधि और (iii) लोक लेखा। अनुमानित प्राप्तियां, अनिवार्य रूप से इन्हीं तीन निधियों में जमा की जाती है तथा इनमें से ही व्यय हेत निकाली जाती हैं।

 

संचित निधि 

  • ऐसी निधि, जिसमें भारत सरकार की सभी प्राप्तियां जमा की जाती हैं एवं सभी भुगताननिकाले  जाते हैं, अर्थात्,
  • भारत सरकार द्वारा प्राप्त सभी राजस्व
  • ट्रेजरी बिल्स जारी करके सरकार द्वारा एकत्रित किये गए सभी ऋण (ऋण या अग्रिमों के रूप में)।
  • भारत की संचित निधि से ऋणों के पुनर्भुगतान से सरकार को प्राप्त समग्र धन।
  • भारत सरकार की ओर से विधिक रूप से अधिकृत सभी भुगतान इस निधि से किए जाते हैं। उदाहरण के लिए-ऋणों का पुनर्भुगतान, राज्य सरकारों को ऋण प्रदान करना आदि। संसदीय कानून के अतिरिक्त इस निधि से कोई धन विनियोजित (जारी या आहरित) नहीं किया जा सकता है। विधि द्वारा किए गए विनियोग के अधीन ही धन आहरित किया जा सकता है। संवैधानिक प्रावधानों के कारण, बजट में व्यय निम्न प्रकार सम्मिलित होते हैं:
  • संविधान द्वारा भारत की संचित निधि पर भारित एवं निर्धारित व्यय की मदों को पूरा करनेके लिए आवश्यक राशियां।
  • भारत की संचित निधि से किए जाने हेतु प्रस्तावित अन्य व्यय को पूरा करने के लिए आवश्यकराशियां।
  • पहली श्रेणी में निहित व्यय पर दोनों सदनों में चर्चा की जा सकती है, परन्तु किसी भी सदन में इसे मतदान के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, यह बजट का गैर-मतदान योग्य भाग है। भारत की संचित निधि पर भारित व्यय में सम्मिलित हैं:
  • राष्ट्रपति की परिलब्धियां और भत्ते तथा उसके कार्यालय के अन्य व्यय
  • राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) और उपसभापति तथा लोकसभा के अध्यक्ष औरउपाध्यक्ष के वेतन एवं भत्ते
  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को देय वेतन, भत्ते एवं पेंशन।
  • उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पेंशन।
  • भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के वेतन, भत्ते और पेंशन।
  • संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन, भत्ते तथा पेंशन।
  • सर्वोच्च न्यायालय, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा संघ लोक सेवा आयोग केकार्यालयों में सेवारत व्यक्तियों के वेतन, भत्ते और पेंशन सहित प्रशासनिक व्यय
  • ब्याज, ऋण शोधन निधि प्रभार और शोधन प्रभार, ऋण लेने और ऋण सेवा एवं ऋण शोधन से संबंधित अन्य व्यय सहित वे ऋण भार जिनका उत्तरदायित्व भारत सरकार पर है।
  • किसी भी न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण का कोई निर्णय, डिक्री या पंचाट के अनुसार आवश्यकता पूर्ति हेतु कोई राशि।
  • संविधान, संसद या कानून द्वारा घोषित कोई भी अन्य भारित व्यय।
  • दुसरी श्रेणी में आने वाला व्यय लोकसभा के समक्ष अनुदान मांग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। तथा सदन में उस पर मतदान किया जाता है। लोकसभा को ऐसी कोई भी मांग को स्वीकार या अस्वीकार करने या उसमें निर्दिष्ट मांग को कम करने का अधिकार प्राप्त है। राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा के बिना ऐसी किसी भी मांग हेतु प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है। चूंकि यह मांगें सरकार के कार्यक्रमों और नीतियों के लिए आवश्यक होती हैं, इसलिए यदि किसी भी मांग को मतों द्वाराअस्वीकार कर दिया जाता है, तो यह सरकार की पराजय के समान होता है।

 

भारत का लोक लेखा 

  • भारत सरकार द्वारा अथवा उसकी ओर से प्राप्त अन्य सभी सार्वजनिक धनराशियां (भारत की संचित निधि में जाने वाली धनराशियों के अतिरिक्त) भारत के लोक लेखा में जमा की जाती हैं।
  • इसमें सरकार की देख-रेख में रखी गई भविष्य निधि, लघु बचत जमा जैसी सभी धनराशियां तथा सड़क विकास, प्राथमिक शिक्षा जैसी विशिष्ट मदों पर व्यय के लिए अलग में आरक्षित सरकारीआय आरक्षित/विशेष निधियां इत्यादि सम्मिलित हैं।
  • यह लेखा कार्यपालिका-आदेश द्वारा संचालित होता है, अर्थात् इस लेखे से संसदीय विनियोग केबिना भुगतान किया जा सकता है।
  • लोक लेखा की निधियां सरकार के अंतर्गत नहीं होती हैं और अंततः इसे जमा करने वाली जनता या प्राधिकरणों को वापस किया जाना आवश्यक होता है। इसलिए इस प्रकार के भुगताना के लिए संसदीय प्राधिकरण की आवश्यकता नहीं होती है, केवल उस मामले को छोड़कर जहां संसद के अनुमोदन के पश्चात् संचित निधि से राशियां आहरित की जाती हैं और विशिष्ट मदों पर व्यय के लिए लोक लेखा में रखी जाती हैं। इस स्थिति में, विशिष्ट मद पर किए जाने वाले व्यय के लोक लेखा से आहरण हेतु विशिष्ट मद पर वास्तविक व्यय को पुन: संसद के मतदान के लिए प्रस्तुतकिया जाता है।

 

भारत की आकस्मिकता निधि

  • संविधान का अनुच्छेद 267 संसद को भारत की ‘आकस्मिकता निधि’ स्थापित करने के लिएअधिकृत करता है। इस निधि से कानून द्वारा निर्धारित राशि का समय-समय पर भुगतान किया जाता है। तदनुसार, संसद ने 1950 में भारत की आकस्मिकता निधि को अधिनियमित किया।
  • यह निधि राष्ट्रपति के नियंत्रण में तहत आती है, तथा किसी अप्रत्याशित व्यय पूरा करने के लिएइसमें से अग्रिम दिया जाता है। राष्ट्रपति की ओर से यह निधि वित्त सचिव द्वारा नियंत्रित की जाती है
  • भारत के लोक लेखा की भांति, इसे भी कार्यपालिका द्वारा संचालित किया जाता है।
  • ऐसे अप्रत्याशित व्यय के लिए कार्योत्तर संसदीय अनुमोदन प्राप्त किया जाता है और आकस्मिकता निधि की प्रतिपूर्ति करने हेतु संचित निधि से समतुल्य राशि आहरित की जाती है। वर्तमान में संसद द्वारा अधिकृत आकस्मिकता निधि का कोष 500 करोड़ रूपए है और इसे संसद द्वारा बढ़ाया जा मकता है। राष्ट्रपति की ओर से इस निधि को वित्त मंत्रालय द्वारा संचालित किया जाता है।
  • संविधान के अंतर्गत, वार्षिक वित्तीय विवरण अन्य व्यय को राजस्व खाते से किये गए व्यय से अलग करता है। इसलिए सरकार के बजट में राजस्व बजट और पूंजी बजट सम्मिलित होता है। वार्षिक वित्तीय विवरण में सम्मिलित प्राप्तियों एवं व्यय के अनुमान में व्यय, शुद्ध प्रतिदेय (रिफंड) तथा पुनर्भुगतान को घटा कर प्राप्त किया जाता है।

 

2.2. सरकारी बजट के घटक 

  • भारतीय संविधान यह प्रावधान करता है कि बजट में अन्य व्यय और राजस्व खाते से होने वाले व्यय में अंतर किया जाएगा। इसलिए, बजट में राजस्व बजट और पूंजी बजट सम्मिलित होता है।

 

2.2.1. राजस्व खाता 

राजस्व खाते में सरकार की राजस्व प्राप्तियां और इस राजस्व से किए जाने वाले व्यय सम्मिलित होते है

  • राजस्व प्राप्तियां- राजस्व प्राप्तियां वे प्राप्तियां होती हैं जिन्हें सरकार द्वारा आदाता (payee) कोपुन: भुगतान किए जाने की आवश्यकता नहीं होती है, अर्थात् ये अप्रतिदेय (non-redeemable) होती हैं। इसे सरकार द्वारा पुनः प्राप्त (reclaimed) नहीं किया जा सकता है। इसलिए राजस्व प्राप्तियां एक दिशीय लेन-देन होती है। राजस्व प्राप्तियां सरकार के लिए देयताओं का सृजन नहीं करती है। राजस्व प्राप्तियों को कर-राजस्व एवं गैर-कर राजस्व में विभाजित किया जाता है।
  • कर राजस्व कर-राजस्व, केंद्र सरकार द्वारा करों के अधिरोपण और संग्रहण से प्राप्त राजस्व है।इसमें प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष कर, दोनों सम्मिलित होते हैं।
  • प्रत्यक्ष कर व्यक्तियों और कंपनियों पर सीधे आरोपित किए जाने वाले कर, प्रत्यक्ष करकहलाते हैं, जैसे आयकर (व्यक्ति की व्यक्तिगत आय पर कर), निगम कर (कंपनियों पर कर), प्रतिभूति लेन-देन कर, जिस (वस्तु) लेन-देन कर आदि। संपत्ति कर (2015-16 के बजट में समाप्त), उपहार कर और संपदा शुल्क (अब समाप्त) जैसे अन्य प्रत्यक्ष करों का कभी भी राजस्व आय के संदर्भ में अधिक महत्व नहीं रहा है। इसलिए इन्हें कागजी कर (पेपर टैक्स) कहा जाता है।
  • अप्रत्यक्ष कर वे कर जिन्हें आरोपित किसी और व्यक्ति पर किया जाता है किन्तु इसका भुगतान किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है। उदाहरण के लिए-उत्पाद कर, उत्पादक पर लगाया जाता है किन्तु अंततः उसका भुगतान उपभोक्ता द्वारा उत्पाद के अंतिम मूल्य के साथकिया जाता है।
  • इसमें उत्पाद शुल्क (राष्ट्र सीमा में उत्पादित वस्तुओं पर लगाया जाने वाला शुल्क), सीमा शुल्क(भारत में आयातित या निर्यातित वस्तुओं पर लगाया जाने वाला कर), बिक्री कर/VAT (वस्तुओं की बिक्री पर कर, जिसे राज्य सरकारों द्वारा लगाया जाता है), केंद्रीय बिक्री कर (अंतर्राज्यीय व्यापार में वस्तुओं की बिक्री पर कर, केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाता है किन्तु राज्य द्वारा संग्रहित किया जाता है) और सेवा कर (सेवाओं पर लगाया गया कर) आदि।
  • गैर कर राजस्व इसमें मख्य रूप से सम्मिलित हैं :
  • ब्याज प्राप्तियां– यह केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों एवं अन्य सरकारी निकायों को दिए गए ऋणों से प्राप्त होने वाली ब्याज राशि है। यह गैर-कर राजस्व की सबसे बड़ी मद है।
  • सरकार द्वारा किए गए निवेश पर लाभांश तथा लाभ, लाभांश, निजी उद्यमों और अर्धसरकारी उद्यमों में सरकार द्वारा धारित शेयरों से होने वाली आय है जबकि लाभ, पूर्ण रूप से सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों से होने वाली लाभांश आय है।
  • सरकार द्वारा प्रदत्त सेवाओं के लिए शुल्क एवं अन्य प्राप्तियां।
  • विदेशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से नकद अनुदान सहायता।

वार्षिक वित्तीय विवरण में दर्शायी गई राजस्व प्राप्तियों के अनुमान में वित्त विधेयक में किए गए विभिन्न कराधान प्रस्तावों के प्रभावों का ध्यान रखा जाता है।

  • राजस्व व्यय – इसमें सरकार के ऐसे सभी व्यय सम्मिलित हैं, जिनमे किसी प्रकार की भौतिक यावित्तीय परिसंपत्तियों का सृजन नहीं होता है। यह सरकारी विभागों के सामान्य कामकाज और विभिन्न सेवाओं, अर्थात् दैनिक तथा नियमित आवश्यकताओं पर किए जाने वाले व्यय से संबंधित है जिनसे भविष्य में कोई राजस्व सृजित नहीं होता है। यह एकमार्गी भुगतान है जिसका अर्थ यह है कि यदि सरकार धन व्यय करती है तो वह उसे पुनः वसूल नहीं सकती है। 2017-2018 के बजट तक, इसमें दो घटक सम्मिलित थे:
  • योजनागत राजस्व व्यय यह केंद्रीय योजनाओं (पंचवर्षीय योजनाओं) तथा राज्य व संघ राज्य क्षेत्रकी योजनाओं के लिए केंद्रीय सहायता से संबंधित व्यय था।
  • गैर-योजनागत राजस्व व्यय – इस व्यय में सम्मिलित था:
  • बाजार ऋण या बाह्य ऋण अथवा विभिन्न अन्य आरक्षित निधियों के माध्यम से सरकार द्वारालिए गाए ऋण पर ब्याज का भुगतान
  • राज्य सरकारों और अन्य पक्षों को दिए गए अनुदान (भले ही कुछ अनुदान परिसंपत्तियों केसृजन के लिए हो सकते हैं)
  • अन्य – रक्षा सेवाएं, सब्सिडी, वेतन, पेंशन तथा विभिन्न सामाजिक सेवाएं (स्वास्थ्य, शिक्षाआदि के प्रति गैर पूंजीगत व्यय)।
  • रंगराजन समिति की अनुशंसा के आधार पर यह वर्गीकरण 2017-2018 के बजट से समाप्त करदिया गया है।

 

2.2.2. पूंजीगत खाता 

  • पूंजीगत खाता, केंद्र सरकार की परिसंपत्तियों तथा देयताओं का खाता है। इसमें पूंजीगत परिवर्तनोंको भी ध्यान में रखा जाता है। इसमें सरकार की पूंजीगत प्राप्तियां एवं पूंजीगत व्यय सम्मिलित होते हैं।
  • पूंजीगत प्राप्तियां सरकार की वे सभी प्राप्तियाँ जिनसे देयताओं का सृजन होता है या वित्तीय परिसंपत्तियां कम होती है, उन्हें पूंजीगत प्राप्तियां कहा जाता है। इन प्राप्तियों को दो श्रेणियों ऋणपूंजी प्राप्तियों तथा गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
  • ऋण पूंजी प्राप्तियां – इसमें मुख्य रूप से ऋण और अन्य देयताएं सम्मिलित हैं।
  • ऋण अथवा सार्वजनिक ऋण- भारत की संचित निधि को प्रतिभूति के रूप में रखकर प्राप्त की गयी राशि एवं उससे पुनर्भुगतान योग्य धन। इसमें सम्मिलित है:
  • देश के भीतर उधारी, अर्थात्, जनता से लिए गए ऋण (बाजार उधारी), ट्रेजरी विल्स कीबिक्री के माध्यम से RBI तथा अन्य वित्तीय संस्थानों से ऋण।
  • विदेशों से प्राप्त ऋण, अर्थात्, विदेशी सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से प्राप्त ऋण
  • अन्य देयताएं- इसे सरकार द्वारा जनता से सीधे ऋण के रूप में नहीं लिया गया है परन्तु यहसरकार के व्यय के प्रयोजन हेतु उपलब्ध है, जिसका पुनर्भुगतान करने के लिए सरकार उत्तरदायी होती है। इसमें भारत के लोक लेखा में रखा गया धन सम्मिलित है जिसमें लघु बचतें (डाकघर बचत खाता, राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र, आदि), भविष्य निधि इत्यादि शामिल है
  • गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां – इसमें केंद्र सरकार द्वारा दिए गए ऋणों की वसूली और सार्वजनिकक्षेत्र के उपक्रमों (PSU) में शेयरों की बिक्री मे प्राप्त शुद्ध प्राप्तियां सम्मिलित हैं (इमे PSU विनिवेश भी कहा जाता है)।
  • पूंजीगत व्यय: इसमें वे व्यय सम्मिलित हैं जिनसे स्थायी परिसंपत्तियों का सृजन होता है औरआवधिक आय उत्पन्न होती है। इसमें भूमि, भवन, मशीनरी, उपकरणों के अधिग्रहण पर व्यय शेयरों में निवेश, केन्द्र सरकार द्वारा राज्य/संघ राज्य सरकारें, PSU और अन्य पक्षों को दिए गए ऋण एवं अग्रिम सम्मिलित हैं।
  • बजट दस्तावेज में पूंजीगत व्यय का योजनागत और गैर-योजनागत व्यय के रूप में भी वर्गीकृत किया जाता था। केंद्रीय योजना और राज्यों/संघ शासित प्रदेशों की योजनाओं के लिए केंद्रीय सहायता से संबंधित योजनागत राजस्व व्यय की भांति योजनागन पूंजीगत व्यय को भी समाप्त कर दिया गया है। गैर-योजनागत पूंजी व्यय में सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली विभिन्न सामान्य, सामाजिक और आर्थिक सेवाएं सम्मिलित होती थी।

 

 

2.3. बजट प्रक्रिया के विभिन्न चरण 

वित्तीय रूप से बजट प्रस्तुति के समय संसद में अपनायी जाने वाली प्रक्रिया में कई चरण सम्मिलित होते हैं:

 

2.3.1. बजट की प्रस्तुति 

  • बजट को ‘बजट भाषण’ के साथ प्रस्तुत किया जाता है। बजट भाषण दो भागों में होता है: भाग A में ‘देश का सामान्य आर्थिक सर्वेक्षण’ एवं भाग B में आगामी वित्तीय वर्ष हेतु ‘कराधान प्रस्ताव’ होते हैं।

वित्तीय विधान के लिए लोकसभा में प्रक्रियात्मक नियम और कार्यवाही संचालन निम्नानुसार हैं:

  • वार्षिक वित्तीय विवरण या प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में भारत सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्ययों के विवरण (जिसे ‘बजट’ भी कहा जाता है) को राष्ट्रपति के निर्देशानुसार नियत किए गएदिन, सदन के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
  • यदि प्राक्कलन समिति द्वारा कोई सुझाव दिए गए हों तो उन पर विचार करने के पश्चात्, बजट कोवित्त मंत्री द्वारा निर्धारित रूप में सदन में प्रस्तुत किया जाता है।
  • सदन में बजट के प्रस्तुतीकरण के दिन इस पर कोई चर्चा नहीं होती है।

 

2.3.2. बजट पर आम चर्चा 

  • स्पीकर द्वारा निर्धारित दिन पर, सदन को संपूर्ण बज़ट या उसमें समाविष्ट किसी सैद्धांतिक प्रश्न पर चर्चा करने की स्वतंत्रता होती है। किन्तु कोई भी कटौती प्रस्ताव नहीं लाया जाता है और न हीबजट को सदन में मतदान हेतु प्रस्तुत किया जाता है।
  • संसद के दोनों सदनों में यह प्रक्रिया संचालित होती है और आमतौर पर यह प्रक्रिया तीन से चारदिनों तक चलती है।
  • चर्चा के अंत में प्रत्युत्तर देने का सामान्य अधिकार वित्त मंत्री को प्राप्त होता है। यदि अध्यक्ष उचित समझता है तो वह भाषणों के लिए समय-सीमा निर्धारित कर सकता है।

 

2.3.3. विभागीय समितियों द्वारा मूल्यांकन 

  • बजट पर आम चर्चा समाप्त होने के पश्चात सदन को लगभग तीन-चार सप्ताह के लिए स्थगित करदिया जाता है इस अन्तराल अवधि में संसद की 24 विभागीय स्थायी समिति, सम्बंधित मंत्रियों द्वारा की जाने वाली अनुदान मांगों पर विस्तारपूर्वक चर्चा करती हैं तथा इनसे सम्बंधित रिपोर्ट तैयार करती हैं। तदुपरांत ये रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में विचार के लिए प्रस्तुत की जाती हैं। 1993 में स्थापित (एवं 2004 में विस्तारित) यह स्थायी समिति व्यवस्था मंत्रालयों पर संसदीय वित्तीय नियंत्रण को अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत, गहन तथा व्यापक बनाती है।

 

2.3.4. अनुदान की मांग 

  • अनुदान की मांग, भारत की संचित निधि से किए जाने वाले अनुमानित व्ययों का विवरण है।संविधान के अनुच्छेद 113 के अनुसार, भारत की संचित निधि से किए जाने वाले व्यय के अनुमान वार्षिक वित्तीय विवरण में सम्मिलित होंगे जिस पर पर लोकसभा द्वारा मतदान किया जाना तथा इसके साथ ही उन्हें अनुदान मांग के रूप में प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। अनुदान मांगों को वार्षिक वित्तीय विवरण के साथ लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है।
  • सामान्यतः प्रत्येक मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित अनुदान हेतु मांग पृथक रूप में प्रस्तुत की जाती हैं।
  • प्रत्येक मांग में सर्वप्रथम प्रस्तावित समग्र अनुदान का विवरण और उसके पश्चात् मदों में विभाजितप्रत्येक अनुदान के अंतर्गत विस्तृत अनुमान का विवरण शामिल होता है। विधिवत मतदान होने के पश्चात् मांग, अनुदान बन जाती है।

इस संदर्भ में दो बिंदुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

  • पहला, अनुदान की मांगों पर मतदान करना लोकसभा का अनन्य विशेषाधिकार है, अर्थात्राज्यसभा को मांगों पर मतदान करने की कोई शक्ति नहीं दी गयी है।
  • दूसरा, मतदान, बजट के उसी भाग तक ही सीमित होता है जिन पर मतदान का प्रावधान कियागया है- भारत की संचित निधि पर भारित व्यय को मतदान के लिए प्रस्तुत नहीं किया जाता है (इस पर केवल चर्चा की जा सकती है।)
  • मांगों को प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत किया जाना आवश्यक होता है, किन्तु व्यावहारिक रूप में समयबचाने के लिए ये मांगें अध्यक्ष द्वारा संचालित और प्रस्तावित मानी जाती है।
  • इस स्थिति के दौरान संसद के सदस्य बजट के विवरणों पर चर्चा कर सकते हैं। वे अनुदान की किसी भी मांग को कम करने के लिए प्रस्ताव पारित कर सकते हैं। इस प्रकार के प्रस्तावों को ‘कटौती प्रस्ताव’ कहा जाता है।
  • मांग की मात्रा में कमी करने के लिए निम्नलिखित प्रकार से प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है:
  • मांग की राशि घटाकर 1/- रुपए कर दी जाए’, जो मांग में अंतर्निहित नीति की अस्वीकृति, को दर्शाता है। इस प्रकार के प्रस्ताव को ‘नीति अनुमोदन कटौती प्रस्ताव’ के नाम से जाना जाता है।ऐसे प्रस्ताव की सूचना देते समय सदस्य को नीति के उस भाग या उन भागों का विवरण सटीक शब्दों में प्रदर्शित करना होगा जिन्हें वह चर्चा के लिए प्रस्तावित करता है। चर्चा, विशिष्ट बिंदु या नोटिस में उल्लिखित बिन्दुओं तक ही सीमित होती है और साथ ही सदस्यों द्वारा कोई अन्य वैकल्पिक नीति भी प्रस्तुत की जा सकती है।
  • ‘मांग की राशि, निर्धारित राशि से एक सीमा तक कम की जाए’, जो संभवतः नीतिगत मितव्ययिता का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रकार की निर्दिष्ट राशि को या तो मांग में से एकमुश्त कम किया जा सकता है या मांग में किसी मद की कटौती या उसमें कमी लायी जा सकती है। इस प्रस्ताव को मितव्ययिता कटौती के नाम से जाना जाता है। नोटिस द्वारा संक्षेप में और सटीक रूपसे उस विशेष तथ्य का संकेत देना आवश्यक होता है, जिस पर चर्चा वांछित होती है तथा भाषण केवल इस चर्चा तक सीमित रहेगा कि किस प्रकार मितव्ययिता को संभव बनाया जा सकता है।
  • ‘मांग की उस राशि में से रू.100/- की कमी कर दी जाए’ जो भारत सरकार के किसी दायित्व से संबंधित होती है। इस प्रकार के प्रस्ताव को ‘सांकेतिक कटौती प्रस्ताव’ के रूप में जाना जाता है एवंउस पर चर्चा इस प्रस्ताव में निर्दिष्ट विशेष मुद्दे तक ही सीमित होती है।
  • सुविधा के लिए सामान्यतः मांग हेतु मुख्य प्रस्ताव और इससे संबंधित कटौती प्रस्तावों को सदन में एक साथ प्रस्तुत किया जाता है तथा चर्चा प्रारंभ की जाती है। इस प्रकार कटौती प्रस्ताव, अनुदानों कि मागों पर चर्चा आरम्भ करने एवं सरकार की गतिविधियों को जांच के माध्यम से उत्तरदायित्व युक्त सरकार के सिद्धांत को बनाए रखने का एक साधन है।
  • चर्चा के पश्चात्, सर्वप्रथम कटौती के प्रस्तावों का निपटान किया जाता है और उसके पश्चात्, अनुदान मांगों को सदन के समक्ष मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाता है। कटौती प्रस्ताव आम तौर पर विपक्ष के सदस्यों द्वारा लाया जाता है तथा यदि कटौती प्रस्ताव पारित हो जाता है तो यह सरकार के विरुद्ध निंदा-प्रस्ताव पर मतदान के समान होता है।
  • मांगों पर मतदान के लिए कुल 26 दिन निर्धारित किये गए हैं। अंतिम दिन अध्यक्ष सभी शेष मांगों को मतदान हेतु प्रस्तुत करता है और उनका निस्तारण करता है, चाहे उन पर सदस्यों द्वारा चर्चा की गई हो या नहीं। इस व्यवस्था को ‘गिलोटिन’ के नाम से जाना जाता है।
  • अन्य अनुदान एक वित्तीय वर्ष में आय और व्यय के साधारण अनुमानों को सम्मिलित करने वाले बजट के अतिरिक्त, संसद द्वारा असाधारण या विशेष परिस्थितियों में विभिन्न अन्य अनुदान प्रदान किए जाते हैं:
  • लेखानुदान भारत की संचित निधि से भुगतान केवल राष्ट्रपति की स्वीकृति के पश्चात्विनियोग अधिनियम के लागू हो जाने के बाद ही किये जा सकते हैं। यह एक समयसाध्य प्रक्रिया है और सामान्यतः अप्रैल के अंत तक चलती है। किन्तु सरकार को 31 मार्च (वित्तीय वर्ष के अंत) के पश्चात् अपनी सामान्य गतिविधियों को सम्पन्न करने के लिए धन की आवश्यकता होती है। इस कार्यात्मक कठिनाई को दूर करने के लिए संविधान ने वित्तीय वर्ष की किसी विशेष अवधि के लिए अनुमानित व्यय हेतु अग्रिम अनुदान देने के लिए लोकसभा को प्राधिकृत किया है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि अनुदान की मांगों पर मतदान के संपन्न होने एवं विनियोग विधेयक के अधिनियमित होने तक की अवधि में वित्त के अभाव में सरकार का कामकाज बाधित न हो। इसी प्रावधान को ‘लेखानुदान’ के नाम से जाना जाता है। इसे बजट पर आम चर्चा की समाप्ति के पश्चात् पारित किया जाता है। यह सामान्यतः कुल बजट आकलन के छठे भाग के समतुल्य राशि (मामान्यतः दो माह) के लिए प्रदान किया जाता है
  • लेखानुदान पर मतदान के प्रस्ताव में वांछित कुल आवश्यक धनराशि तथा प्रत्येक मंत्रालयएवं विभाग के लिए आवश्यक विभिन्न राशियों का उल्लेख किया जाता है।
  • अनुदान की कमी के लिए संशोधन का प्रस्ताव लाया जा सकता है।
  • प्रस्ताव या किसी भी संशोधन पर सामान्य प्रकृति की चर्चा की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, सामान्य बिन्दुओं को स्पष्ट करने के लिए जितना आवश्यक है केवल उतनी ही चर्चाकी अनुमति दी गयी है। इसमे अधिक चर्चा अनुदान के विवरणों पर नहीं की जा सकती है। अन्य संन्दर्भो में, लेखानुदान प्रस्ताव के साथ वही व्यवहार होता है जो अनुदान की माँग के साथ किया जाता है।

अनुपूरक अनुदान, अतिरिक्त अनुदान, अधिक अनुदान, प्रत्ययानुदान एवं अपवादानदान आदि

  • अनुपूरक अनुदान, अतिरिक्त अनुदान, अधिक अनुदान, प्रत्ययानुदान एवं अपवादानुदान आदि कोउसी प्रक्रिया द्वारा विनियमित किया जाता है जो अनुदान की मांगों के मामले में लागू होता है।
  • अनुपूरक अनुदान उस समय दिया जाता है, जब संसद द्वारा विनियोग अधिनियमके माध्यम से किसी विशेष सेवा हेतु वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए प्राधिकृत की गई धनराशि उस वर्ष के लिए अपर्याप्त पाई जाती है।
  • अतिरिक्त अनुदान उस समय दिया जाता है, जव चालू वित्त वर्ष के दौरान उस वर्ष के लिए बजट मेंपरिकल्पित नहीं की गई किसी नई सेवा पर अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता उत्पन्न हो जाती है।
  • अधिक अनुदान उस समय प्रदान किया जाता है, जब वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर उस वर्ष के लिए बजट में प्रदत्त अनुदान से अधिक धन व्यय हो गया हो। इस पर लोकसभा द्वारा वित्तीय वर्ष के पश्चात् मतदान किया जाता है।
  • प्रत्ययानुदान किसी सेवा हेतु अप्रत्याशित मांग को पूरा करने के लिए दिया जाता है। यह अनुदान तब दिया जाता है जव सेवा के परिमाण या अनिश्चित प्रकृति के कारण, मांग का उल्लेख आमतौर पर बजट में दिए जाने वाले विवरण के साथ किया जाना संभव न हो। अत: यह लोकसभा द्वाराकार्यपालिका को दिए गए ब्लैंक चेक की भांति है।
  • अपवादानुदान विशेष प्रयोजन के लिए दिया जाता है तथा यह किसी भी वित्तीय वर्ष की चालूसेवा से संबंधित नहीं होता है।

 

सांकेतिक अनुदान

  • जब किसी नई सेवा पर प्रस्तावित व्यय को पूरा करने के लिए निधियों को पुनर्विनियोजन केमाध्यम से उपलब्ध कराया जाता है, उस अवस्था में किसी सांकेतिक राशि के अनुदान की मांग सदन के समक्ष मतदान के लिए प्रस्तुत की जा सकती है। यदि सदन मांग को स्वीकृत करता है तो धनराशि उपलब्ध कराई जाती है।

 

2.3.5. विनियोग विधेयक 

  • संवैधानिक प्रावधान के अंतर्गत, संसद द्वारा कनून अधिनियमित किए बिना भारत की संचित निधि से कोई धन आहरित नहीं किया जा सकता। इसका अनुपालन करते हुए, लोकसभा द्वारा संचित निधि पर भारित व्यय के साथ-साथ, लोकसभा द्वारा मतदान किये जाने वाली अनुदानों की सभी मांगों को सम्मिलित करने वाले विधेयक को लोकसभा में पुर:स्थापित किया जाता है। इस विधेयक को विनियोग विधेयक के रूप में जाना जाता है। इसके नाम के अनुसार इस विधेयक का प्रयोजन सरकार को संचित निधि से किए जाने वाले व्यय का विनियोजन करने हेतु विधिकप्राधिकार प्रदान करना है।

 

विनियोग विधेयक संबंधी प्रक्रिया:

  • विनियोग विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया भी किसी अन्य विधेयक के समान होती है। आमतौर पर इसे केवल स्पीकर द्वारा आवश्यक समझे गए संशोधनों के साथ पारित कर दिया जाताहै
  • हालांकि, विनियोग विधेयक पर बहस केवल उन मामलों तक सीमित होती है जिन्हें उस समयनहीं उठाया गया हों, जब अनुदान के लिए प्रासंगिक मांगें विचाराधीन होती हैं।
  • इसमें किसी प्रकार का कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं किया जा सकता है।

लोकसभा द्वारा विधेयक पारित होने के पश्चात् लोकसभा-अध्यक्ष इसे धन विधेयक के रूप में प्रमाणित करता है और इसे राज्यसभा को संप्रेषित करता है। दूसरे सदन को विधेयक में संशोधन करने तथा विधेयक को अस्वीकार करने की शक्ति नहीं होती है, परन्तु राज्य सभा, लोक सभा को विधेयक संबंधी कोई भी परामर्श दे सकती है जिसकी प्रकृति लोक सभा पर बाध्यकारी नहीं होती। यदि राज्यमभा 14 दिन के भीतर इस पर कोई कार्रवाई नहीं करती है तो इमे पूर्ववत रूप में राज्यसभा द्वारा पारित मान लिया जाता है। इसके पश्चात् विधेयक, राष्ट्रपति के समक्ष उसकी स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है

 

2.3.6. वित्त विधेयक 

  • संसद के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण की प्रस्तुति के समय, संविधान के अनुच्छेद 110(1)(a) के प्रावधानों के आधार पर बजट में प्रस्तावित करों के अधिरोपण, उन्मूलन, छूट, परिवर्तन या विनियमन का विवरण प्रदान करने वाला एक वित्त विधेयक भी प्रस्तुत किया जाता है। वित्त विधेयक संविधान केअनुच्छेद 140 में परिभाषित एक प्रकार का धन विधेयक होता है। इसके साथ ही वित्त विधेयक में सम्मिलित प्रावधानों की व्याख्या करने वाला एक ज्ञापन भी प्रस्तुत किया जाता है।

 

वित्त विधेयक संबंधी प्रक्रिया 

  • नियमानुसार ‘वित्त विधेयक’, अगले वित्तीय वर्ष के लिए भारत सरकार के वित्तीय प्रस्तावों के क्रियान्वयन हेतु प्रत्येक वर्ष सामान्य रूप से पुरःस्थापित किया जाने वाला एक विधेयक है। इस विधेयक में किसी भी अवधि के लिए अनुपूरक वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी बनाने वाला विधेयकभी सम्मिलित होता है।
  • सदन में वित्त विधेयक पुर:स्थापित होने के पश्चात् सदन का अध्यक्ष, विधेयक पारित होने में समाविष्ट सभी चरणों या किसी एक चरण को पूरा करने के लिए दिवस आवंटित करता है। तत्पश्चात्, अध्यक्ष आवंटित दिवस को निर्दिष्ट समय पर, उस चरण से संबंधित सभी शेष मामलों के निस्तारण हेतु आवश्यक प्रत्येक प्रश्न को तत्काल प्रस्तुत करता है, जिस चरण के लिए दिवसआवंटित किया गया है।

 

  1. भारतीय बजट प्रणाली और कार्यान्वयन में कामियां
  • अवास्तविक बजट अनुमान।
  • परियोजनाओं के कार्यान्वयन में देरी।
  • वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही, विशेष रूप से अंतिम माह में व्यय होने वाले अधिकांश भाग केसाथ प्रतिकूल व्यय प्रतिरूप।
  • बहु-वर्षीय परिप्रेक्ष्य का अपर्याप्त अनुपालन तथा योजना और बजट के बीच ‘लाइन ऑफ साइट’ कीत्रुटि।
  • व्यय और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच कोई अंतर-संबंध नहीं होना।
  • तदर्थ परियोजना संबंधी घोषणाएं।
  • परिणामों के बजाय प्रक्रियाओं के अनुपालन पर अधिक बल।
  • अतार्किक योजनागत/गैर-योजनागत भेद, संसाधनों के उपयोग में अक्षमता उत्पन्न करता है।

 

4: बजट सुधार 

  • वैश्विक स्तर पर बजटीय कमियों का समाधान करने के लिए निरंतर यथासंभव प्रयास किये जा रहे हैं। इस संन्दर्भ में OECD देशों के बजट संबंधी रुझान उल्लेखनीय हैं। OECD के सदम्य देशों मेंबजटीय सुधारों के सामान्य तत्व निम्नलिखित हैं:

 

4.1. मध्यम अवधि की बजट संरचना (Medium Term Budget Frameworks) 

  • मध्यम अवधि की वजट संरचना, राजकोषीय समेकन प्राप्त करने के आधार निर्मित करती हैं। इनकेद्वारा सकल राजस्व, व्यय, घाट/अधिशेष और ऋण के स्तर जैसे उच्च स्तरीय लक्ष्यों के संदर्भ में सरकार के मध्यम अवधि के वित्तीय लथ्य स्पष्ट रूप से बताए जाने चाहिए। तत्पश्चात् इनके द्वारा और अलग-अलग मंत्रालयों और योजनाओं के लिए कठोर बजटीय प्रतिबंधों को कई वर्षों के दौरान अलग-अलग मंत्रालयों और योजनाओं के लिए कठोर बजटीय प्रतिबंधो को स्थापित कर इन उच्च स्तरीय लक्ष्यों को प्राप्त किया जाना चाहिए।

 

4.2. विवेकपूर्ण आर्थिक अनुमान (Prudent Economic Assumptions

  • बजट में अन्तर्निहित महत्वपूर्ण आर्थिक पूर्वानुमानों से विचलन, सरकार के समक्ष उपस्थित मुख्य राजकोषीय जोखिम है। वास्तव में दोषपूर्ण आर्थिक अनुमान, राजकोषीय समेकन कार्यक्रम को ‘अप्राप्य बनाने वाला’ सबसे महत्वपूर्ण एकल कारक है। अतः इन अनुमानों के निर्माण में अत्यंत सावधानी बरती जानी चाहिए तथा सभी प्रमुख आर्थिक अनुमानों को स्पष्ट रूप से प्रकट किया जाना चाहिए। इस हेतु बजट में उपयोग किए जाने वाले आर्थिक अनुमानों की अनुशंसा करने के लिए एक स्वतंत्र निकाय की स्थापना पर भी विचार किया जा सकता है। इन उपायों द्वाराअवास्तविक या आशावादी आर्थिक अनुमानों के उपयोग के विरूद्ध सुरक्षा प्राप्त की जा सकती है।

 

4.3. टॉप-डाउन बजटिंग तकनीकें (Top-Down Budgeting Techniques

  • परंपरागत रूप से बजट की प्रक्रिया बॉटम-टॉप सिद्धांत पर संचालित की जाती रही है। इसका अर्थ यह है कि सभी एजेंसियाँ और सभी मंत्रालय, वित्त मंत्रालय को वित्तपोषण हेतु अनुरोध या मांग प्रेषित करते हैं। ये मांग उस धन की तुलना में बहुत अधिक होता है जितने की प्राप्ति की आशा होती है। तत्पश्चात् वित्त मंत्रालय इन मंत्रालयों और एजेंसियों के साथ वार्तालाप कर कुछ सामान्य बिंदुओं पर सहमति प्राप्त करता है एवं बजट प्रक्रिया को पूर्ण करता है। हालांकि इस बॉटम-टॉपप्रणाली में कई दोष हैं, यथा:
  • यह एक समय-साध्य प्रक्रिया है तथा इसमें भाग लेने वाले दोनों पक्षों को यह ज्ञात होता है किप्रारंभिक मांग यथार्थवादी नहीं हैं।
  • इस प्रक्रिया में व्यय बढ़ाने के सम्बन्ध में एक अंतर्निहित पूर्वाग्रह होता है तथा सभी नए कार्यक्रमों, या वर्तमान कार्यक्रमों के विस्तार को नए मांगों द्वारा वित्त पोषित किया जाता है।साथ ही व्यय करने वाले मंत्रालयों के तहत पुन:आवंटन की कोई भी व्यवस्था तथा कोई पूर्व निर्धारित व्यय सीमा नहीं होती है।
  • इस प्रणाली में राजनीतिक प्राथमिकताएं प्रतिबिंबित करना कठिन होता है क्योंकि यहउर्ध्वगामी प्रक्रिया होती है तथा बजट इसके अंतिम चरण में प्राप्त होता है।
  • अतः सुधारों के उपरांत वर्तमान में बजट निर्माण का यह तरीका समाप्त कर दिया गया है तथा इसका स्थान बजट तैयार करने के नए टॉप-डाउन प्रणाली ने ले लिया है। राजकोषीय समेकन प्राप्त करने में यह अत्यधिक सहायक रहा है।
  • इस नई व्यवस्था के लिए सरकार का प्राथमिक कार्य व्यय के कुल स्तर तथा व्यय करने वाले मंत्रालयों में उनके विभाजन के संबंध में बाध्यकारी राजनीतिक निर्णय लेने से है। यह निर्णय मध्यम अवधि की व्यय संरचना द्वारा संभव बनाया जाता है जिसमें आधारभूत व्यय की जानकारी होती है, यथा, यह जानकारी कि यदि कोई नया नीतिगत निर्णय न लिया जाये तो बजट क्या होगा? राजनीतिक निर्णय से आशय यह है कि शिक्षा जैसे उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र पर व्यय में वृद्धि करनी है अथवा रक्षा कार्यक्रमों पर होने वाले व्यय में कमी करनी है। राजनीतिक पुन:आवंटन के इस स्तर तक केवल सर्वाधिक व्यापक और सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यक्रम ही पहुंच पाते हैं। मुख्य बात यह है कि प्रत्येक मंत्रालय की व्यय सम्बन्धी पूर्व निर्धारित सीमा होता है।

 

4.4. केन्द्रीय निविष्टियों के नियंत्रण को शिथिल बनाना (Relaxing Central Input Controls

  • यह इस साधारण धारणा पर आधारित होता है कि प्रत्येक एजेंसी के प्रमुख, उनकी एजेंसी कीगतिविधियों का संचालन करने हेतु आगतों के सर्वाधिक कुशल समूह का चयन करने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में होते हैं। ऐसे में अंतिम परिणाम यह होता है कि एजेंसी कम कीमत पर समान सेवाओं या समान कीमत परं अपेक्षाकृत अधिक सेवाओं का उत्पादन कर सकती है। यह सेवाओं पर राजकोषीय समेकन का प्रभाव कम करके राजकोषीय समेकन रणनीतियों को अधिक सुविधाजनक वनाता है।

 

केन्द्रीय निविष्टियों के नियंत्रण को शिथिल बनाने की प्रक्रिया तीन स्तरों पर कार्य करती है: 

  • सभी परिचालन लागतों (वेतन, यात्रा आपूर्ति आदि) के लिए एकल विनियोजन में विभिन्न बजटपहलुओं का एकीकरण:
  • कार्मिक प्रबंधन कार्य का विकेंद्रीकरण एवं
  • अन्य सामान्य सेवा संबंधी प्रावधानों, विशेषकर आवासों (भवनों) का विकेंद्रीकरण। इसेसार्वजनिक क्षेत्र के “विनियमन” के प्रारूप के रूप में देखा जा सकता है।

 

4.5. परिणामों पर अधिक फोकस (An Increased Focus on Results) 

  • उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि परिणामों पर अधिक फोकस, निविष्टियों के नियंत्रण को शिथिल बनाने (relaxing input controls) का प्रत्यक्ष प्रतिदान (direct quid pro quo ) है। सार्वजनिक क्षेत्र में जवाबदेहिता परंपरागत रूप से नियमों और प्रक्रियाओं के अनुपालन पर आधारित रही है। यदि नियमों का अनुपालन किया गया हो तो परिणाम के विश्लेषण की प्रवृत्ति नहीं रही। परन्तु वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र के विनियंत्रित होने के कारण प्रबंधकों को जवाबदेह बनाने के लिए एक नई परिणाम-आधारित प्रणाली की आवश्यकता है। यह मौलिक परिवर्तन है जिसके तहत प्रबंधकों को वे किस प्रकार कार्य करते है इसके स्थान पर उनके द्वारा किये गए कार्य केआधार पर जवाबदेह बनाया जायेगा।

 

4.6. बजट पारदर्शिता (Budget Transparency) 

  • बजट सरकार का प्रमुख नीति दस्तावेज है। इसके द्वारा सरकार के नीतिगत उद्देश्यों में सामंजस्यस्थापित किया जाता है तथा इन उद्देश्यों का क्रियान्वयन किया जाता है। यही कारण है कि बजट पारदर्शिता सुशासन का सार है। बजट पारदर्शिता के अंतर्गत नीति के प्रयोजनों, निर्माण एवं कार्यान्वयन में स्पष्टता सम्मिलित है तथा बजट किस सीमा तक अपने सभी या कुछ उद्देश्यों को प्राप्त करता है, वह पारदर्शिता पर ही निर्भर करता है। राजकोषीय पारदर्शिता को तीन मूलभूत तत्वों द्वारा समझा जा सकता है:
  • पहला, बजट आंकड़े जारी करना है। निर्णयकर्ताओं द्वारा विश्लेषण और निष्कर्षों के लिए प्रासंगिक राजकोपीय जानकारियों या सूचनाओं को व्यवस्थित ढंग से और समय से जारी करने को ही हम प्राय: वजट की पारदर्शिता से सम्बद्ध मानते हैं। यह अनिवार्य रूप से पूर्व अपेक्षित है, परन्तु यह पर्याप्त नहीं है।
  • दूसरा तत्व, विधायिका की एक प्रभावी भूमिका है। इसे बजट रिपोर्ट की संवीक्षा करने स्वतंत्ररूप से समीक्षा करने, वजट पर चर्चा करने तथा उसे प्रभावित करने में सक्षम होना चाहिए। इसके साथ ही इसे प्रभावी रूप मे सरकार को उत्तरदायी बनाने की स्थिति में होना चाहिए। यह क्षमता दोनों ही रूपों अर्थात् विधायिका की संवैधानिक भूमिका और विधायिका के पास उपलब्ध संसाधनों के स्तर पर होनी चाहिए।
  • तीसरा तत्व, मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से नागरिकसमाज के प्रभावी भूमिका है। नागरिक प्रत्यक्ष रूप से या मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से, बजट नीति को प्रभावित करने की स्थिति में होने चाहिए। कई अर्थों में, यह विधायिका के समान भूमिका ही है, यद्यपि यह केवल अप्रत्यक्ष रूप में है।

 

4.7. आधुनिक वित्तीय प्रबंधन व्यवहार, (Modern Financial Management Practices

  • सरकारों के वित्तीय प्रबंधन के आधुनिकीकरण ने पिछले दस वर्षों में अत्यधिक प्रगति की है।सरकार के पारदर्शी या विशुद्ध पैमाने का अर्थ यह है कि इस प्रकार के सुधारों का राजकोषीय परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। इनमें संचयों का प्रारम्भ (introduction of accruals), पूंजीगत प्रभार, अप्रयुक्त विनियोग को आगे ले जाना (कैरी-ओवर) करना आदि सम्मिलित हैं।

 

4.8. बजटीय अनुशासन (Budgetary Discipline)

  • संसद द्वारा राजकोषीय घाटे में कमी और राजस्व घाटे के उन्मूलन संबंधी लक्ष्य निर्धारित कर केंद्र तथा राज्य, दोनों ही स्तरों पर राजकोषीय अनुशासन को संस्थांगत बनाने हेतु राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबन्धन अधिनियम (FRBMA) 2003 का अधिनियमन किया गया है।यह भारत में राजकोषीय अनुशासन और राजकोषीय समेकन सुनिश्चित करने हेतु उठाए गए विधायी प्रावधानों में से एक है।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित लक्ष्यों को बाद के वर्षों में कई बार स्थगित किया गया था।हालाँकि इस अधिनियम के कुछ अन्य लक्ष्यों को कार्यान्वित किया गया है; जैसे सरकार द्वारा RBI से ऋण लेने को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना।
  • FRBM की आवश्यकता: सरकार के बढ़ते हुए ऋण के कारण सरकार की वित्तीय स्थिति को होनेवाली क्षति को देखते हुए 2003 में FRBM अधिनियम को इसलिए लागू किया गया था। सब्सिडी, वेतन, रक्षा आदि पर अत्यधिक व्यय के कारण होने वाले व्यापक राजस्व घाटे को देखते हुए सरकार को 1990 के दशक के प्रारम्भ में तथा उसके बाद भी बड़ी मात्रा में उधार लेने हेतु विवश होना पड़ा था। अपर्याप्त राजस्व होना भी सरकार द्वारा ऋण लिए जाने का कारण था।
  • अत्यधिक राशि उधार लेने के कारण अधिक ब्याज भुगतान की राशि में भी वृद्धि हुई। इस प्रकार, व्याज भुगतान सरकार की सबसे बड़ी व्यय की मद बन गया। अपने बजट में इस वित्तीय दुर्बलता को समाप्त करने हेतु, सरकार ने FRBM के रूप में नए कानून का निर्माण कर राजस्व घाटे की कटौती के कुछ महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किये।
  • FRBM क्या कहता है?: FRBM नियम द्वारा राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 2008-09 तक GDP के 3% तक सीमित किया गया। इसे केंद्र सरकार द्वारा GDP में प्रतिवर्ष 3% की कटौती के लक्ष्य मे प्राप्त किया जाना तय किया गया। इसी प्रकार, राजकोषीय घाटे को प्रति वर्ष 0.5% की दर से घटाते हुए इसे वर्ष 2008-09 तक पूरी तरह समाप्त किया जाना था। हालाँकि कालांतर में उक्त लक्ष्यो का पुनर्निर्धारण किया गया और वर्ष 2016-17 के बजट में मार्च 2018 तक 3% केराजकोषीय घाटे के लक्ष्य को प्राप्त करना निर्धारित किया गया।
  • यद्यपि, प्रथम दृष्ट्या अधिनियम का लक्ष्य घाटे में कमी करना है, परन्तु इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य राजकोषीय प्रबन्धन में अंतर-पीढ़ीगत समता प्राप्त करना भी है। इसका कारण यह है कि वर्तमान समय में ऋण की राशि बहुत अधिक है तथा इसे भावी पीढ़ियों द्वारा चुकाया जायेगा। FRBM के लक्ष्य प्राप्त होने मे अंतर-पीढ़ीगत ऋण भार में समता (समानता) सुनिश्चित होगी।
  • इसके अन्य लक्ष्यों में दीर्घकालिक समष्टिगत आर्थिक स्थिरता, राजकोषीय और मौद्रिक नीति केबीच बेहतर समन्वय तथा सरकार के राजकोषीय संचालन में पारदर्शिता सम्मिलित है।

 

  1. केन्द्रीय बजटिंग में हाल ही में किये गये परिवर्तन

 

5.1. केंद्र प्रायोजित योजनाओं (CSS) तथा इन योजनाओं पर होने वाले व्यय की तर्कसंगत व्याख्या 

  • 2016-17 के बजट में केंद्र प्रयोजित योजनाओं (CSS) के वर्गीकरण के आधार पर, केंद्र के व्यय केलिए एक नयी वर्गीकरण व्यवस्था प्रारम्भ की गयी। इसके तहत CSS के वर्गीकरण के आधार पर वर्तमान CSS की संख्या को सीमित कर दिया गया है तथा उन्हें तीन श्रेणियों- कोर ऑफ़ द कोर (core of the core) योजनाओं, कोर योजनाओं तथा वैकल्पिक योजनाओं में विभाजित किया गया।

 

कोर ऑफ़ द कोर (core of the core) योजनाएँ 

  • सामाजिक सुरक्षा तथा सामाजिक समावेशन को लक्षित करने वाली योजनाएँ ‘कोर ऑफ़ द कोर’ योजनाओं के अंतर्गत शामिल की गयी हैं। ये राष्ट्रीय विकास एजेंडे के लिए उपलब्ध धन पर सर्वप्रथम प्रभारित की जाएगी। नवीन वर्गीकरण के अंतर्गत, मनरेगा तथा अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान की योजनाओं सहित मुख्य अंब्रेला-योजनाओं को ‘कोर ऑफ़ द कोर’ योजनाओं के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • नई व्यवस्था के अनुसार, ‘कोर ऑफ़ द कोर’ योजनायें उच्चतम प्राथमिकता युक्त हैं तथा उनके व्यय के आवंटन ढांचे को बनाये रखा जायेगा। उदाहरण के लिए मनरेगा में आर्थिक व्यय का 75% केंद्र द्वारा तथा 25% राज्यों द्वारा प्रदान किया जायेगा।

 

कोर योजनाएँ (core schemes) 

  • CSS का मुख्य ध्यान उन योजनाओं पर होना चाहिए, जिसमें राष्ट्रीय विकास एजेंडा सम्मिलित हैतथा जिसके लिए केंद्र एवं राज्य एक साथ ‘टीम इण्डिया’ की भावना से कार्य करेंगे। इन योजनाओं के अंतर्गत कृषि उन्नति योजना, स्मार्ट सिटी कार्यक्रम और पुलिस बलों का आधुनिकीकरण जैसी व्यापक योजनाएं सम्मिलित हैं। प्राथमिकता में इनका दूसरा स्थान है और इनके व्यय के लिए 60:40 का फार्मूला अपनाया जाता है।

 

वैकल्पिक योजनाएँ (Optional Schemes) 

  • इनको कोई राज्य विशेष अपने सामाजिक-आर्थिक विकास पर विचार करने के पश्चात आवश्यक समझता है। इनके लिए 50:50 फार्मूला अपनाया गया है, जिसमें राज्यों को यह स्वतंत्रता होगी किउनमें निवेश किया जाये अथवा नहीं।
  • CSS को तर्कसंगत बनाने हेतु नीति आयोग द्वारा गठित मुख्यमंत्रियों की उप-समिति की अनुशंसापर यह व्यवस्था लागू की गयी थी। इसे योजनागत/गैर-योजनागत सरकारी व्यय के अंतर को समाप्त करने में पूर्व की तैयारी माना जा सकता है।
  • यह व्यवस्था सभी मंत्रालयों और विभागों के योजनागत तथा गैर-योजनागत कार्यक्रमोंको तर्कसंगत बनाने पर आधारित है। समिति द्वारा इसे कार्यक्रमों और योजनाओं के कार्यान्वयन की परिणाम आधारित प्रभावी निगरानी एवं संसाधनों का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए अपनाया गया था।
  • यह 14वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं का परिणाम था। 14वें वित्त आयोग द्वारा केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को किया जाने वाला कर प्राप्तियों का अंतरण वर्तमान के 32% से बढाकर 42% कर दिया गया। इसमें केंद्र सरकार द्वारा CSS का वित्त पोषण अपने पूर्व स्तर पर जारी रखने की क्षमता में कमी आ गई। इसके साथ ही, इसके द्वारा राज्य सरकारों को अपनी प्राथमिकता के अनुसार विकास योजनाओं के वित्तपोपण करने की स्वतंत्रता प्राप्त हुई हैं।

 

इस कदम का तर्क

  • कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, परिणामों के सम्बन्ध में मानकों की अनुपस्थिति में विशिष्ट उद्देश्यों के लिए विभिन्न अंतरण (जहाँ केन्द्रीय निधियों को एक विशेष उपयोग के लिए अंतरित किया जाता है) अर्थहीन हैं। हालांकि नयी व्यवस्था भी व्ययों को परिणामों से जोड़ने के मुद्दे को सम्बोधित नहीं करती है, अपितु यह केवल व्यय को पुनः वर्गीकृत करती है।
  • हालाँकि, इस वर्गीकरण द्वारा योजनाओं को उनके महत्त्व के अनुसार पृथक करने का प्रयास किया जा रहा है। पूर्व में राज्य सरकारें इनमें से कई इन योजनाओं के सम्बन्ध में स्वयं निर्णय ले रही थी। परन्तु केंद्र के वर्तमान दृष्टिकोण के अनुसार कुछ योजनाएं महत्त्वपूर्ण हैं जबकि अन्य के सन्दर्भ में राज्य स्वयं निर्णय ले सकते हैं। इस प्रकार, यह प्रमुख विकास मानकों पर आम सहमति सुनिश्चित करेगा और सहकारी संघवाद की भावना से राज्यों को आवश्यक लचीलापन प्रदान करेगा।
  • 2014-15 तक केन्द्रीय सहायता का लगभग 86 प्रतिशत भाग 66 CSS में से केवल 17 योजनाओं के खाते में गया था। इन योजनाओं को उनके आकार और माप के कारण ‘फ्लैगशिप योजनाओं (प्रमुख योजनाओं) के नाम से जाना जाता था। शेष 49 योजनाओं को बहुत कम बजटीय आवंटन प्राप्त हुआ। यद्यपि निम्न बजट योजनाओं के लिए भी कुछ केन्द्रीय सहायता उपलब्ध थी, इसलिए राज्यों को उन सभी को लागू करने हेतु विवश होना पड़ा, ताकि उनके लिए मिलने वाली सहायता प्राप्त हो सके। अब यह व्यवस्था समाप्त कर दी गयी है।

 

5.2. योजनागत तथा गैर-योजनागत वर्गीकरण को समाप्त करना 

  • पूर्व में विद्यमान व्यय के योजनागत एवं गैर-योजनागत वर्गीकरण को वित्त वर्ष 2017-2018 से समाप्त कर दिया गया है तथा उनका स्थान अब पूँजीगत और राजस्व व्यय वर्गीकरण ने ले लिया है। 2011 में सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली एक विशेषज्ञ समिति ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया थाकि इस अंतर को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
  • पूर्व-प्रचलित वर्गीकरण के अंतर्गत, योजना के नाम पर किये गये सभी व्ययों को योजनागत व्ययकहा जाता था जबकि अन्य व्ययों को गैर-योजनागत व्यय के अंतर्गत रखा गया था। इसके अतिरिक्त प्राय: (सदैव नहीं), योजनागत व्यय द्वारा आर्थिक विकास से सम्बन्धित कुछ भौतिक परिसम्पत्तियां सृजित की जाती थी। यही कारण था कि योजनागत व्यय को “विकास व्यय” भी कहा जाता था।

 

इस कदम के पीछे का तर्क

  • यह कदम, योजना आयोग तथा अब तक कार्यरत योजनाओं पर आधारित विकास को समाप्त कियेजाने के अनुरूप है।
  • इस वर्गीकरण ने वर्तमान योजनाओं और सेवा स्तरों के अनुरक्षण (maintenance) की उपेक्षा की है तथा नई योजनाएं/ परियोजनाएं प्रारम्भ करने की प्रवृति को जन्म दिया है।
  • इससे एक और गलत धारणा बन गयी है कि गैर-योजनागत व्यय स्वाभाविक रूप से महत्वहीन है। यह धारणा शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे उन सामाजिक क्षेत्रों में संसाधनों के आवंटन को प्रतिकुल रूप से प्रभावित करती है, जहाँ वेतन एक महत्त्वपूर्ण तत्व होता है।
  • यह किसी भी अर्थपूर्ण परिणाम आधारित बजट’ में बाधक है, क्योंकि केवल योजनागत व्यय को ही परिणामों के लिए उत्तरदायी माना जाता है, जबकि व्यावहारिक रूप में कुल व्यय पर विचारकिया जाना चाहिए।
  • सरकार की प्रकृति (कामकाज और संगठन) में बढ़ती जटिलता एवं विभिन्न मदों पर व्यय यहसुनिश्चित करता है कि योजनावद्ध अथवा गैर-योजनावद्ध वस्तुओं के अंतर्गत मदों को तर्कसंगत आधार पर पृथक नहीं किया जा सकता और इसलिए इनमें अंतर तर्कसंगत नहीं है।
  • अंतर से आशय यह है कि विद्यालय जैसी अवसंरचनाएं योजनागत व्यय के अंतर्गत आती हैं, जबकिशिक्षकों पर व्यय गैर-योजनागत व्यय के अंतर्गत होता है, इसी प्रकार अस्पताल योजनागत व्यय जबकि उसके डॉक्टर गैर-योजनागत व्यय के अंतर्गत आते हैं। इस प्रकार की असंगतता से कुप्रबन्धन और संसाधनों का अप्रभावी उपयोग होता है।

 

5.3. रेल बजट का सामान्य बजट में विलय (Merging of Railway and General Budget

  • रेल बजट और सामान्य बजट को अलग-अलग प्रस्तुत करने की 92 वर्षों से चली आ रही प्रथा कोसमाप्त कर दिया गया है। रेलवे के पुनर्गठन और सुधार पर गठित बिबेक देबरॉय समिति ने इसकी अनुशंसा की थी। इस कदम की सराहना की जा रही है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी होगा एवं इसके द्वारा रेलवे के विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

 

1921 में पृथक बजट प्रारम्भ करने का तर्क 

  • दोनों बजटों को पृथक रूप में प्रस्तुत किये जाने का प्रारंभ 1921 में एकवर्थ समिति की रिपोर्ट कीअनुशंसाओं के आधार पर किया गया था। इसका कारण यह था कि देश के सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा भाग रेलवे राजस्व पर निर्भर था, अतः रेलवे पर पृथक रूप से ध्यान केन्द्रित किये जाने की आवश्यकता का अनुभव किया गया। स्वतंत्र भारत में भी यही प्रथा जारी रही और कुछ समय के पश्चात् यह एक स्वीकृत प्रथा बन गयी। इसके निम्रलिखित लाभ थे:
  • उत्तरदायित्व: बजटीय प्रस्तावों पर मीडिया का पर्याप्त ध्यान रहता था, जिससे सरकार पर उत्तरदायित्व की विवशता रहती थी।
  • सार्वजनिक परिवहन: रेलवे एक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था रही है, इसलिए यह वांछित था कि रेलवे पर पृथक बजट द्वारा विशेष ध्यान दिया जाए।
  • स्वायत्तता: यह अपेक्षा की जाती थी कि पृथक बजट की प्रक्रिया रेलवे को एक स्वतंत्र वाणिज्यइकाई के रूप में कार्य करने हेतु आवश्यक स्वायत्तता सुनिश्चित करेगी।
  • हालाँकि, कालान्तर में, रेलवे बजट लोकलुभावनवाद का उपकरण मात्र बन गया। इसने लोकलुभावन अपव्यय एवं अक्षमता को जन्म दिया। इमलिए, रेलवे के निगमीकरण (corporatization) की एक सशक्त मांग उठी। इसके लिए पृथक बजट के न होने से इस प्रकार के परिवर्तन का आधार तैयार होता है। इसीलिए रेल बजट का सामान्य बजट में विलय कर दियागया।

 

विलय हेतु तर्क 

  • ब्रिटिश शासन के दौरान रेल बजट, वार्षिक बजट का 85% तक होता था परन्तु अब यह प्रतिशतकाफी कम हो कर मात्र 15% तक सीमित रह गया है।
  • केन्द्रीय बजट के साथ ही रेल बजट को प्रस्तुत किये जाने मे किसी नयी नीति को प्रारम्भ करने तथाउसे कार्यान्वित करने में समय की बर्बादी कम होगी।
  • पृथक रेल बजट भ्रष्टाचार, अक्षमता और लोकलुभावन उपायों का एक उपकरण मात्र बनकर रहगया था। परिणामस्वरूप, निरंतर बढ़ती परिचालन लागत के अनुरूप किरायों में वृद्धि करना रेल मंत्रियों के लिए कठिन हो गया था। यह ‘क्रास सव्सिडी’ (जहाँ यात्री यातायात को माल की ढुलाई से सब्सिडी दी जाती है) का एक प्राथमिक कारण था।
  • रेलवे, अब केंद्र सरकार को 10,000 करोड़ रूपये का वार्षिक लाभांश देने से स्वतंत्र होगी। यहवार्षिक लाभांश अब भारतीय रेलवे के विकास के लिए प्रयुक्त हो सकेगा।
  • इसमे सहक्रियाशील यातायात नीतियाँ संभव हो सकती हैं क्योंकि वित्त मंत्रालय सभी प्रकार कीपरिवहन प्रणालियों हेतु संसाधनों के आवंटन हेतु उत्तरदायी होगा।

 

इस कदम को लेकर आशंकाएँ 

  • रेलवे का संसाधन आवंटन अब वित्त मंत्रालय पर निर्भर होगा। इसलिए बजट के आकार के आधारपर रेलवे को होने वाले संसाधन आवंटन में वृद्धि या कमी हो सकती है। इसमे रेलवे के स्वतंत्र विकास में बाधा आ सकती है।
  • विलय के कारण उत्तरदायित्व में भी कमी आ सकती है क्योंकि अब मीडिया का ध्यान नही रहेगा।रेलवे में होने वाले घाटों को छिपाना आसान हो जाएगा।
  • कुछ विशेषज्ञों का यह मानना है कि विलय, रेलवे को निजीकरण और घोर पूंजीवाद के लिए खुलाछोड़ देगा।

भारतीय रेलवे में उच्चतम दर्जे का कुप्रबन्धन रहा है तथा इसका केन्द्रीय बजट में विलय करना एक ही ऐसा समाधान है जो इसमें सुधार हेतु सहायक हो सकता है। कम होते राजस्व तथा नई रेलगाड़ियों की परियोजनाएं एवं उनका ठहराव रेल मंत्रालय के लिए सदैव कठिन कार्य रहा है। इस दृष्टि से भी बजट का विलय किया जाना सही कदम है।

 

5.4. बजट की समय-पूर्व प्रस्तुति (Budget Advancement) 

  • नवीनतम बजट को फरवरी माह की अंतिम तिथि से 27 दिन पहले प्रस्तुत किया गया था। इसका उद्देश्य 1 अप्रैल को वित्तीय वर्ष प्रारम्भ होने से पहले ही बजट को संवैधानिक रूप से संसद की स्वीकृति एवं राष्ट्रपति का अनुमोदन प्राप्त करवाना तथा विभिन्न स्तरों पर सभी विभिन्न बजटधारकों को सभी प्रकार के संसाधनों का आंवटन करना है।

 

इस पहल हेतु तर्क 

  • सभी बजट प्रस्तावों सहित वित्त विधेयक को वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ होने से पूर्व पारित किया जा सकेगा। इससे सभी सरकारी विभागों, संस्थाओं को अपने आंवटन की जानकारी 1 अप्रैल से पूर्व हीहो जाएगी।
  • इससे निजी क्षेत्र को सरकारी खरीद के रुझान का पूर्वानुमान लगाने में सहायता मिलेगी और वेअपनी व्यावसायिक योजनाओं को विकसित कर सकेंगे।
  • वर्तमान स्थितियों में, अप्रैल-जून तिमाही के लिए लोकसभा लेखानुदान पारित करती है, जिसकेअंतर्गत विभागों को वर्ष भर के आवंटन का छठा भाग प्रदान किया जाता है। बजट की समयपूर्व प्रस्तुति से सरकार इस लेखानुदान प्रथा को समाप्त कर सकती है।
  • वर्तमान में, अवसंरचना परियोजनाओं में निवेश काफी हद तक वर्ष के बाद के महीनों में होता है, क्योंकि बजट जून तक ही पारित हो पाता है और उस समय तक मानसून प्रारम्भ हो जाता है। लिहाजा अवसंरचना परियोजनाओं को प्रारम्भ करना कठिन हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप प्रभावी निवेश की अवधि बहुत कम रह जाती है, जो ‘मार्च रश’ में समाप्त होती है। इस कारणसंसाधनों के उपयोग में अक्षमता और परियोजनाओं के कार्यान्वयन में अनावश्यक विलम्ब होता है।

 

इस पहल संबंधी आशंकाएँ: 

  • बजट की समयपूर्व प्रस्तुति का एक बड़ा नुकसान व्यापक राजस्व और व्यय के आंकड़ों का अभाव था। इससे पूर्व बजट बनाने का कार्य गंभीरतापूर्वक दिसम्बर से आरम्भ होता था, फरवरी के मध्य तक इसे अंतिम रूप दे दिया जाता था तथा राजस्व संग्रह व व्यय के रुझान केवल वित्तीय वर्ष के पहले नौ महीनों के लिए उपलब्ध होते थे। अर्थात् अप्रैल से दिसम्बर तक के आधार पर पूरे वर्ष केलिए अनुमान लगाया जाता था।
  • बजट की तिथियों को पीछे करना व्यावहारिक रूप से कठिनाईयों से भरा है। प्रभावी बजट योजनाआने वाले वर्ष के मानसून संबंधी पूर्वानुमानों पर निर्भर करती है। इसके कारण बजट की समयपूर्व प्रस्तुति की प्रक्रिया और भी कठिन हो जाएगी।

इन आशंकाओं के बाद भी यह बजट सुधार एक स्वागतयोग्य कदम है। हालाँकि जैसा कि सी. रंगराजन, समिति द्वारा 2011 में सुझाया गया है, इन सुधारों को और आगे ले जाने की आवश्यकता है।

 

  1. बजटिंग का विकास (Evolution of Budgeting
  • जब सरकार को अपने करदाताओं के समक्ष यह सिद्ध करना होता है कि वे अपने धन को लेकर आश्वस्त हो सकते हैं तो बजट में लागतों के नियंत्रण, वित्तीय लेखांकन तथा दक्षता सुधार पर बल दिया जाता है। बाद में मंदी के दौरान, लोगों ने अपेक्षा की कि सरकार अग्रसक्रिय रूप से उनकी समस्याओं का समाधान करेगी (जिसके लिए काफी हद तक निजी क्षेत्र को दोष दिया जाता था), अतः सार्वजनिक कार्यक्रमों की प्रभावशीलता पर वजट में अधिक ध्यान केन्द्रित किया गया। ये दोनों ध्येय हाल के वर्षों के बजटों में परिलक्षित हुए हैं।

 

6.1. लाइन आइटम बजट (The Line Item Budget

  • उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरण में, अधिकांश देशों में सरकारी बजट प्रक्रियाओं की विशेषताओं में अदक्ष लेखा प्रक्रियाएं, तदर्थवाद (adhocism), न्यून केन्द्रीय नियंत्रण तथा निम्न निगरानी व मूल्यांकन प्रक्रिया विद्यमान थी।
  • उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में, कुछ देशों में लाइन-आइटम बजट प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। लाइन-आइटम बजट से आशय ऐसे बजट से है जिसमें, “व्यक्तिगत वित्तीय विवरण की मदों (आइटमों) को लागत-केन्द्रों या विभागों में समूहित किया जाता है। यह पिछले लेखांकन या बजट अवधि के वित्तीय आंकड़ों एवं वर्तमान व भावी अवधि के लिए अनुमानित वित्तीय आंकड़ों के बीच तुलना दर्शाता है।”
  • एक लाइन-आइटम प्रणाली में बजट अवधि के लिए व्यय, विषयों या “लाइन-आइटम” के अनुसार सूचीबद्ध किये जाते हैं। इन लाइन-आइटम में एक इकाई द्वारा वेतन, यात्रा भत्तों, कार्यालय खर्च आदि की निर्धारित सीमा का विवरण दिया जाता है। इस बात का ध्यान रखा जाता है कि संस्थाएं या इकाइयां निर्धारित सीमा से अधिक खर्च नहीं करेंगी। इस निर्धारित सीमा का निर्धारण केन्द्रीय अधिकरण या वित्त मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

 

लाभ

  • लाइन आइटम बजट दृष्टिकोण को समझना और कार्यान्वित करना आसान है।
  • यह केन्द्रीयकृत नियन्त्रण और व्यय करने वाली इकाइयों के अधिकारों तथा उत्तरदायित्वों केनिर्धारण को सुसाध्य बना देता है।

 

कमियां

  • यह एकल इकाइयों (individual units) की गतिविधियों और उपलब्धियों के संबंध में पर्याप्तजानकारी उपलब्ध नहीं कराता है।
  • लाइन-आइटम बजट की कमियों को कुछ सुधारों द्वारा दूर करने का प्रयास किया गया था। निष्पादन बजटिंग इस प्रकार का पहला सुधार था।

 

6.2. निष्पादन बजट (Performance Budget

  • परम्परागत लाइन-आइटम बजट के विपरीत, निष्पादन बजट संगठन के लक्ष्य उदेश्यों को प्रदर्शित करता है तथा उनके निष्पादित लक्ष्यों की व्याख्या करता है। इन लक्ष्यों को एक रणनीति के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। इकाइयों की लागत रणनीति से जुडी होती है तदनुसार उन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आवंटन किया जाता है।
  • निष्पादन बजट यह संकेत देता है कि व्यय की गई राशि, किस प्रकार से आउटपुट दे सकती है, हालाँकि निष्पादन बजट की भी अपनी एक सीमा है इकाई की मानक लागत (विशेषकर सामाजिक कार्यक्रम में) की जानकारी प्राप्त करना सरल नहीं होता है। इसके लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।

 

6.3. आउटकम बजट (Outcome budgeting

  • यह विभिन्न मंत्रालयों के अनुमानित एवं इच्छित परिणामों (आउटकम) का संकलन है परिणामकेबल वित्तीय निवेश का भौतिक उत्पादन (physical output) ही नहीं है। आउटकम का अर्थ है सम्बन्धित वित्तीय निवेश के भौतिक उत्पादन से प्राप्त लाभ।
  • उदाहरण के लिए- भवन निर्माण, मेज और कुर्सियां आदि खरीदने के लिए धन का आवंटन करना निवेश है, जिसका आउटपुट विद्यालय का निर्माण है। यहाँ अंततः शिक्षित होने वाले छात्रों कि संख्या परिणाम (आउटकम) होगी।

 

6.4 शून्य-आधारित बजटिंग (zero-based Budgeting: ZBB) 

  • 1970 के दशक में शून्य-आधारित बजटिंग की अवधारणा को प्रस्तुत किया गया था। जैसा की नाम से विदित होता है, प्रत्येक बजट चक्र का प्रारम्भ शून्य से होता है। पूर्ववर्ती प्रणालियों में केवल आवंटन में वृद्धिशील परिवर्तन किये जाते थे। वहीं शून्य-आधारित बजट जब भी बनाया जाता है तो प्रत्येक गतिविधि का आकलन कर और किसी गतिविधि की अपरिहार्यता सुनिश्चित हो जाने के बाद ही धन आवंटित किया जाता है। ZBB का मुख्य उद्देश्य, अप्रासंगिक कार्यक्रमों/गतिविधियों को चरणबद्ध रूप से समाप्त करना है। हालाँकि, शून्य-बजट को तैयार करने में होने वाले प्रयासों और कार्मिक मुद्दों से सम्बंधित संस्थागत प्रतिरोध के कारण किसी भी सरकार ने कभी पूर्णरूपेण शून्य-आधारित बजट को कार्यान्वित नहीं किया, परन्तु शून्य-बजट के सिद्धान्तों को संशोधित रूपों में प्रायः उपयोग में लाया जाता है।

 

6.5. जेंडर बजटिंग (Center Budgeting)  

  • जेंडर बजटिंग से आशय महिलाओं के लिए पृथक बजट से नहीं है अपितु यह लैंगिक रूप सेसंवेदनशील होकर संसाधनों का आवंटन सुनिश्चित करने की रणनीति तथा समिष्टगत आर्थिक नीति के निर्माण का एक साधन है।
  • 2005-06 के बजट में बजटीय आवंटन हेतु लैंगिक-संवेदनशीलता को रेखांकित किया गया था। जेंडर बजटिंग एक प्रकार से सरकार द्वारा उल्लिखित लैंगिक प्रतिबद्धताओं को बजट प्रतिवद्धताओं में रूपांतरित करना है। इसमें महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु विशेष पहलें और उनके लिए आवंटित संसाधनों के उपयोग तथा सरकार द्वारा महिलाओं के लिए बनाई गई नीतियों एवं सार्वजनिक व्यय के प्रभावों की जाँच सम्मिलित होते हैं। 2006-07 के बजट मेंइसे और अधिक विस्तृत किया गया था।

 

इसकी आवश्यकता क्यों है

  • पुरुषों और महिलाओं की आवश्यकताओं तथा प्राथमिकताओं पर समान रूप से विचार सुनिश्चितकरना।
  • बजट की तैयारी, कार्यान्वयन, लेखा परीक्षा आदि जैसे सभी स्तरों पर लैंगिक विश्लेषण के समावेशन को प्रोत्साहित करना तथा लैंगिक समानता के उद्देश्यों पर बजट के प्रभाव का आकलन करना।
  • आर्थिक और सामजिक नीतियों के परिणामों के मध्य अंतर-सम्बन्धों में वृद्धि करना।

व्यय और लैंगिक विश्लेषण के लिए अपनाया गया ढांचा प्रायः तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

  • लिंग-विशिष्ट आवंटन वे आवंटन हैं, जो विशेष रूप से महिलाओं और बालिकाओं अथवा पुरुष याबालकों की ओर लक्षित किये जाते हैं। उदाहरण के लिए, वालिकाओं के लिए स्कूली छात्रवृत्ति या घरेलु हिंसा के मामलों में पुरुषों को परामर्श आदि। कई सरकारों ने महिलाओं के कार्यक्रमों के लिए विशेष कोष आवंटित किये हैं। महिलाओं के जीवन पर पड़ने वाले उनके प्रभावों का विश्लेषण करना महत्त्वपूर्ण है तथा साथ ही यह सुनिश्चित करना भी महत्त्वपूर्ण है कि ऐसे कार्यक्रमों ने प्रयुक्त धन का पूर्ण उपयोग हुआ है।
  • मुख्यधारा के आवंटन द्वारा उत्पन्न प्रभावों की जाँच किये जाने की आवश्यकता है। अधिकांश व्ययइसी श्रेणी में आते हैं और लिंग विश्लेषण की वास्तविक चुनौती यह जाँच करना है कि क्या आवंटन ने विभिन्न आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की महिलाओं, पुरुषों, बालिकाओं और बालकों की आवश्यकताओं को समान रूप से सम्बोधित किया है।
  • रोजगार के समान अवसर संबंधी आवंटन, सार्वजनिक सेवा में लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने हेतु किया जाने वाला आवंटन है। उदाहरण के लिए कर्मचारियों के बच्चों के लिए दिन मेंदेखभाल की सुविधा, अभिभावकीय अवकाश आदि।

 

जेंडर बजटिंग में चुनौतियों और इसे सीमित करने वाले कारक:

जेंडर बजटिंग के कार्यान्वयन और इन प्रक्रियाओं से प्राप्त विश्लेषण को स्वीकार करने में कई चुनौतियाँ हैं:

  • लिंग असंबद्ध आंकड़ों का एकत्रीकरण: कुछ लिंग-असंबद्ध आंकड़े उपलब्ध हैं, परन्तु महिलाओं औरपुरुषों तथा लड़कों और लड़कियों के मध्य उपस्थित असमानताओं पर प्रकाश डालने के लिए अधिक जानकारी एकत्रित करने की आवश्यकता है। यह जानकारी विशेष रूप से संसाधनों तक पहुंच तथा अवसरों व सुरक्षा के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है तथा इसके बिना बजट प्रक्रिया में लिंग परिप्रेक्ष्य समाहित करना सम्भव नहीं है।
  • नीति और बजट परिवर्तनों के साथ विश्लेषण को सम्बद्ध करने हेतु सीमित साक्ष्य उपलब्ध हैं क्योंकिवैश्विक रूप में भी जेंडर बजटिंग पहल अभी विश्लेषण के चरण में ही है।
  • संसदीय हस्तक्षेप की सीमा: विधान मंडल, ने लैंगिक-विशेषज्ञों (gender experts) और सिविलसोसाइटी के साथ मिलकर विभिन्न देशों में महत्त्वपूर्ण समर्थनकारी भूमिका निभाई है। परन्तु बजट प्रक्रिया में विधायिका की भूमिका प्रायः बजटीय अनुमोदन और पर्यवेक्षण तक ही सीमित रहती है। यह बजट निर्माण एवं इसके निष्पादन में सम्मिलित नहीं होती है।
  • जेंडर बजटिंग को संस्थागत बनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति: जेंडर बजटिंग के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त संसाधन और क्षमता की आवश्यकता होती है जो पारम्परिक बजट निर्माण और नीति प्रक्रियाओं को लम्बे समय से चले आ रहे पूर्वाग्रहों से मुक्त कर सके क्योंकि इससे महिलाएंऔर बालिकाएं नुकसान की स्थिति में रहती हैं।

 

6.6. ई-बजटिंग (E-budgeting

ई-बजटिंग मे आशय इलेक्ट्रॉनिक अथवा उद्यम-व्यापी (enterprise-wide) बजट से है। यह इंटरनेट की सहायता से लाभ प्रदान करता है। इसका लक्ष्य विभिन्न प्रतिष्ठानों द्वारा एक ऐसी उद्यम-व्यापी बजट प्रणाली निष्पादित करना है सरल एवं सुगम हो।

 

लाभ

  • यह प्रणाली अत्यधिक कुशल है, क्योंकि यह पर्यवेक्षण, नियन्त्रण और बोझिल लेखांकन कार्यों काउन्मूलन कर दक्षता लाने में सहायक है।
  • सुविधाजनक और अनुकूलनीय है क्योंकि कहीं भी तथा किसी भी समय बजट-निर्माण प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा सकता है।
  • इसके द्वारा ई-बिज़नस से तालमेल बनाये रखने में सक्षम योजनाओं का निर्माण सुनिश्चित होताहै
  • एक ही मंच पर प्रबंधकों, प्रशासकों और मंत्रियों के साथ सहयोग करने की क्षमता।
  • विश्वयापी संचार और सहयोग।
  • गणना और अन्य प्रक्रियाओं के स्वचालन से सुगम मूल्यांकन।

संसाधनों के कुशल आवंटन से निरंतर परिवर्तित होते आर्थिक परिवेश में सफलतापर्वक प्रतिस्पर्धा करने में सरकारों की सहायता करने के कारण ई-बजटिंग विश्व भर में एक मानक बनता जा रहा है।