बदलाव की जरूरत

बदलाव की जरूरत

सत्येन्द्र प्रसाद सिंह

सीबीआई के संकट ने भ्रष्टाचार विरोधी उस धारणा या मुहिम को झटका पहुंचाया है, जिसके तहत उसकी स्वायत्तता और उसके प्रमुख की निश्चित कालावधि की वकालत की जाती रही है। लेकिन मौजूदा संकट को एक व्यापक फलक पर देखने की आवश्यकता है। दो राय नहीं कि इसे सीबीआई के आंतरिक विवाद तक सीमित करके देखने का आग्रह हावी है, लेकिन यह एक व्यापक समस्या का लक्षण है। इस धारणा को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की उस टिप्पणी से बल मिलता है कि नौकरशाही विकास में सबसे बड़ी बाधा है। इसे फिलहाल छोड़ भी दिया जाए तो भी विचार करना वांछित होगा कि क्या नौकरशी का भयंकर पैमाने पर राजनीतिकरण हो चुका है? क्या वह भारतीय गणराज्य के सामने पेश चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है? सवाल यह भी कि वह मोदी सरकार के साथ तालमेल बिठा पा रही है, या नहीं? नहीं, तो क्यों? राष्ट्रीय विकास में अधिकारी तंत्र की भूमिका को तुच्छ नहीं कहा जा सकता लेकिन सीबीआई के मौजूदा विवाद पर जैसी राजनीति हुई, उससे संदेश गया कि नौकरशाही राजनीतिक दृष्टि से बुरी तरह विभाजित है।

इसके पहले भारतीय नौकरशाही के बारे में सामान्यत: यही माना जाता रहा है कि सरकार बदलने के बावजूद वह तटस्थ भाव से काम करती रहती है। दरअसल, यह तटस्थता कानूनी तरीके से चुनी गई किसी सरकार के प्रति निष्ठा रखने के लिए आवश्यक होती है, तो दूसरी ओर यह किसी राजनीतिक झुकाव को हतोत्साहित करती है। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही नियंतण्र स्तर पर तटस्थ अधिकारी तंत्र के सिद्धांत की आलोचना बढ़ती गई। भारत ने आजादी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हासिल की, इसलिए तटस्थ नौकरशाही की उम्मीद करना बेमानी है। भारत की नौकरशाही जिस ब्रिटिश शासन-पण्राली पर आधारित है, जिसकी खासियत तटस्थता रही है, अब वहां भी इसके प्रति संदेह प्रकट किया जाने लगा है। ब्रिटिश नौकरशाही की इस बात के लिए भी आलोचना की जाती है कि लोक कल्याणकारी राज्य की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम नहीं है। प्रगतिशील कदमों में रोड़ा अटकाने का काम करती है।

भारत की नौकरशाही पर यह बात कमोबेश लागू होती है। सामाजिक-सांस्कृतिक पर्वितनों के साथ कदम मिलाकर न चलने के कारण भी उसकी आलोचना होती है। दरअसल, उसका शिक्षण-प्रशिक्षण ही वैसा है, जो उसे समाज से काटकर रख देता है। वह जनता की आकांक्षा और महत्वाकांक्षा से उद्वेलित भी नहीं होती। इसीलिए ‘‘तटस्थ’ के बजाय प्रतिबद्ध नौकरशाही की मांग उठने लगी है। नई मान्यता के अनुसार अधिकारी वर्ग को सत्तारूढ़ दल के आधारभूत सामाजिक दर्शन के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। भारतीय नौकरशाही तटस्थता और प्रतिबद्धता के इन्हीं दो पाटों के बीच झूलती रही है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में इसमें और जटिलता आई है। दो राय नहीं कि भारत में अधिकारी तंत्र का राजनीतिकरण हुआ है। ऐसी परिस्थिति में राजनेताओं द्वारा सरकारी अधिकारियों के मूल्यांकन में उनकी राजनीतिक दृष्टि का खयाल रखा जाता होगा ताकि उसके साथ कामकाजी तालमेल बिठाया जा सके।

मोदी सरकार अधिकारियों की राजनीतिक दृष्टि का खयाल रखती है, या नहीं? बता पाना कठिन है, लेकिन मीडिया रिपोटरे से जाहिर है कि वह उन्हीं अधिकारियों को प्रश्रय देने की रणनीति पर चल रही है, जो उसकी अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे यानी उन्हें सरकार के हिसाब से निर्धारित समय पर टारगेट पूरा करना होगा। जाहिर है मंत्रालय में बैठकर शान-शौकत और आराम की जिंदगी की चाह रखने वाले नौकरशाह मोदी सरकार के साथ सहज नहीं रह पाएंगे। सरकार भी ऐसे नौकरशाहों से पिंड छुड़ाने में भला समझेगी। कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों को समय-पूर्व सेवानिवृत्ति दे दी गई। नतीजतन हो यह रहा हैं कि एक तरफ आईएएस दिल्ली आने के प्रति उत्साहित नहीं हैं, तो दूसरी तरफ मंत्रालय में पहले से उनका वर्चस्व भी नहीं रहा। भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय राजस्व सेवा और भारतीय वन सेवा का मंत्रालय में प्रतिनिधित्व बढ़ा है। यही नहीं, सरकार निजी क्षेत्र की प्रतिभाओं को सीधे संयुक्त सचिव स्तर पर लाने का फैसला कर चुकी है। मोदी सरकार चुपचाप नौकरशाही को दुरु स्त करने में लगी है। ऐसे में उच्च नौकरशाही के एक हिस्से में सरकार के प्रति नापसंदगी स्वाभाविक है। ऐसे नौकरशाह अगर विपक्षी दलों की मदद करें, तो अचरज की बात नहीं। समय की मांग है कि स्थानीय परिस्थितियों के मद्देनजर भारतीय नौकरशाही का पुनर्गठन किया जाए।