बांस संबंधी अधिनियम में सुधार Contemporary issues For IAS

हमारे देश में बांस के जंगल बहुतायत में हैं। बांस के पौधे की विशेषता है कि वह बहुत तेजी से बढ़ता है। इसका कोई भी पौधा तीन से पाँच महीने में पूरी वृद्धि कर लेता है। जबकि लकड़ी देने वाले अन्य पौधों को पेड़ बनने में लगभग पाँच वर्ष का समय लग जाता है। भारत में लगभग 14 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में इसके जंगल हैं और विश्व में इसकी बहुत मांग है। अतः आर्थिक दृष्टि से बांस का बहुत महत्व है।

भारतीय वन अधिनियम 1927 के खंड 2(7) में बांस को इमारती लकड़ी की श्रेणी में रखा गया था। अतः इस औपनिवेशिक कानून के चलते इसे ‘वन संपदा’ का हिस्सा माना गया और इसे ताड़ एवं अन्य वृक्षों की श्रेणी में रखा गया था।
अभी तक बांस के पेड़ों पर वन विभाग का एकाधिकार होने के कारण बांस के 60 अरब डॉलर के वैश्विक बाजार में भारत बहुत पिछड़ा रहा।
सरकार ने हाल ही में इसे इमारती लकड़ी की श्रेणी से हटाकर घास की श्रेणी में शामिल कर दिया है है। सन् 1996 में उच्चतम न्यायालय ने फटे हुए बांस को इमारती लकड़ी की श्रेणी से हटा दिया था। 2006 के वनाधिकार अधिनियम में बांस को ‘गैर इमारती वन संपदा’ के रूप में वर्गीकृत कर दिया गया था। दोनों ही तरह से बांस का व्यापार संभव नहीं हो पा रहा था एवं उलझन बनी हुई थी। अब सन् 1927 के अधिनियम में सुधार करके उस भ्रम को पूरी तरह से दूर कर दिया गया है।
बांस का इतना ज्यादा उत्पादन होने के बाद भी विश्व बाजार में भारत की भागीदारी मात्र 4.5 प्रतिशत है। चीन में 6.7 करोड़ हेक्टेयर (भारत से लगभग आधा) क्षेत्र में बांस के पेड़ हैं फिर भी यह बांस के विश्व बाजार का 50 प्रतिशत हिस्सेदार है।
अभी तक भारत बड़ी मात्रा में बांस का आयात करता रहा है। लेकिन अब स्थिति बदल जाएगी। बांस को ”मेक इन इंडिया“ के अंतर्गत अनेक उपक्रमों से जोड़ा जा सकेगा। इसके लिए सरकार की ओर से बैंक ऋण एवं सब्सिडी जैसी सुविधाएं दी जानी चाहिए।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित।