भारतीय विरासत की रक्षा हेतु आपसी सहयोग जरूरी है।

नई दिल्ली में इंटरनेशनल कांउसिल ऑन मोन्यूमेन्टस एण्ड साइटस का अधिवेशन 11-15 दिसम्बर के बीच संपन्न हुआ है। 1965 से ही यह संस्था विश्व धरोहरों के लिए यूनेस्को के साथ मिलकर काम कर रही है। इस अधिवेशन के माध्यम से भारतीयों को अपनी खूबसूरत इमारतों एवं परिदृश्यों की साज-संभाल करने वालों को जानने में मदद मिली। साथ ही यह भी समझने में मदद मिली कि हमारे देश के अनेकवाद का पूरे विश्व में कितना विशिष्ट स्थान है।

इस वर्ष की संगोष्ठी का शीर्षक ‘विरासत एवं प्रजातंत्र‘ रखा गया है। इसके अंतर्गत चार पहलू हैं,

भिन्न- भिन्न समुदायों को विरासत प्रबंधन के काम में कैसे लगाया जा सकता है ?
सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से शांति एवं सद्भाव को कैसे बढ़ाया जा सकता है ?
सांस्कृतिक विरासत को संजोने में डिजीटल मीडिया का उपयोग कैसे किया जा सकता है? तथा
प्राकृतिक परिदृश्यों के साथ लोगों का कैसा संबंध है ?
हमारी सरकारों की उपेक्षा के कारण हमारी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों का क्रमशः क्षय होता जा रहा है। केवल कुछ ही अधिकारी हैं, जो इस प्रकार के कामों में रुचि रखकर अपना समय देना चाहते हैं। संस्कृति मंत्रालय एवं शहरी विकास मंत्रालय भारतीय पुरातत्व विभाग को नियंत्रित करते हैं, एवं धरोहरों की देखरेख करते हैं। उनका यह प्रयास पर्याप्त नहीं है।
शांति एवं सद्भाव के लिए राजनैतिक एवं कूटनीतिक स्तर पर अनेक चर्चाएं होती रहती हैं। अब सांस्कृतिक संबंधों को भी इसका हिस्सा बनाया जाना चाहिए। 2011 में जाफना में टी.एम.कृष्णा के गायन ने भारत-श्रीलंका संबंधों को नया आधार प्रदान कर दिया था।
अगर स्मारकों एवं अन्य विरासतों के लिए हम डिजीटल मीडिया की बात करें, तो देखते हैं कि अक्सर अनुवाद सुविधाओं के वायदे किए जाते हैं, लेकिन इनकी उपलब्धता इतनी आसान नहीं है। इस कार्य में विशेषज्ञता के साथ-साथ सृजनात्मक्ता की आवश्यकता है, जिसे समझदारी एवं ईमानदारी से व्यवहार में लाया गया हो। अतः इस कार्य में पुरातत्वविदों के साथ-साथ लेखकों एवं कलाकारों को भी जोड़ना होगा।
भारत में तेजी से होते शहरीकरण ने हमारी प्राकृतिक धरोहरों का बहुत नाश किया है। लोगों एवं सरकार के मन में प्राकृतिक परिदृश्यों, पारस्थितिकी तंत्र एवं सांस्कृतिक संबंधों की समझ को बढ़ाने की जरूरत है, ताकि हमारे पहाड़, रेगिस्तान और तटीय क्षेत्रों की रक्षा की जा सके।
समाधान

सरकारी संस्थाओं को चाहिए कि वे स्थानीय समुदाय (जिसमें सभी धर्म शामिल हो) को ऐतिहासिक स्मारकों की सुरक्षा एवं देख-रेख के काम में सहयोगी बनाएं। ऐसा करके उनके बीच के आपसी बैरभाव को कम किया जा सकेगा। इस बातचीत में खुलापन, रोचकता, इतिहास की समझ पैदा करने की क्षमता, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति एवं कौशल विकास के आयाम होने चाहिए। इसके लिए विरासत की ऐसी व्याख्या की जाए, जिससे प्राकृतिक धरोहरों के प्रति भी जागरूकता आए।

प्रजातंत्र लोगों के दिमाग को बदलने में सफल नहीं हो सकता। लेकिन स्पिक-मैके (SPIC-MACAY) जैसे गैर-राजनीतिक संगठन आपसी मेल-मिलाप को बखूबी बढ़ावा दे सकते हैं। हमारे प्रशासकों, इतिहासकारों एवं वास्तुविदों को चाहिए कि वे हमारी वर्षों पुरानी कारीगरों की जुगलबंदी को जीवित रखें।

‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ में प्रकाशित नारायणी गुप्ता के लेख पर आधारित।