यूरोप के संघर्ष पर विश्व युद्ध का ठप्पा-डॉ. विजय अग्रवाल

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के सौ साल पूरे होने पर बीते सप्ताह पेरिस में दुनिया के करीब 70 देशों के नेता जुटे।

डॉ. विजय अग्रवाल , ( लेखक पूर्व प्रशासक एवं स्तंभकार हैं )

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के सौ साल पूरे होने पर बीते सप्ताह पेरिस में दुनिया के करीब 70 देशों के नेता जुटे। इनमें भारत के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी थे। इन नेताओं ने इस भीषण युद्ध में जान गंवाने वालों का स्मरण किया। इसके बाद से दुनिया के अनेक देशों में इस युद्ध का स्मरण करने के लिए अलग-अलग आयोजन हो रहे हैैं। इस क्रम में इस युद्ध के असर का विश्लेषण भी किया जा रहा है, लेकिन इस पर चर्चा मुश्किल से ही हो रही है कि आखिर इस संघर्ष को प्रथम विश्व युद्ध का नाम क्यों दिया गया? यह सवाल इसलिए, क्योंकि इस युद्ध में न तो दुनिया के सभी देश शामिल थे और न ही सभी देशों के हित निहित थे।

प्रथम विश्व युद्ध के इतिहास को सही संदर्भ में प्रस्तुत करने के पहले यहां पर उसकी संक्षिप्त पृष्ठभूमि का जिक्र उचित होगा। 28 जून, 1914 दिन रविवार को ऑस्ट्रिया-हंगरी के उत्तराधिकारी आर्क ड्यूक फ्रेंच फर्डिनेंड जब सराजेवो की सड़कों पर घूम रहे थे तब सर्बिया के एक राष्ट्र प्रेमी ने उनकी हत्या कर दी। ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया को चेतावनी जारी करने के ठीक एक महीने बाद 28, जुलाई 1914 को उसके खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। इसके एक महीने बाद ब्रिटेन और यूरोप के अन्य देश बारी-बारी से अपनी सुविधा और फायदे के लिहाज से इन दो गुटों में से किसी एक में शामिल होते चले गए।

इस युद्ध की आग अंतत: चार साल, तीन महीने और 12 दिन बाद 11 नवंबर, 1918 को शांत हुई। जब हम इसे ‘विश्व युद्ध’ कहते हैं तो दरअसल हम इस युद्ध के एक बहुत बड़े सत्य की अनदेखी कर रहे होते हैं। 20वीं शताब्दी के दूसरे दशक का यह कालखंड पूर्णत: यूरोपीय देशों के साम्राज्यवाद का उत्कर्ष काल था। यूरोप में इसके लगभग सात दशक पूर्व से ही तीव्र राष्ट्रवादी भावनाएं अंगड़ाइयां लेने लगी थीं। पूरा यूरोप जो वर्तमान की तुलना में कम ही संख्या में विभक्त था, अपनी-अपनी पहचान के लिए बैचेन हो रहा था। दूसरी तरफ एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों पर शिकंजा कसे यूरोपीय देशों के खिलाफ भी इन राष्ट्रों में विरोध की शुरुआत हो गई थी।

इस प्रकार यूरोप के बड़े देश न केवल अपने ही महाद्वीप की राष्ट्रवादी चेतना से परेशान थे, बल्कि उन राष्ट्रों से भी परेशान थे जहां शासन करके वे उनका जबर्दस्त आर्थिक शोषण कर रहे थे। यह स्थिति युद्ध के दौरान बनी रही। इस कथित प्रथम विश्व युद्ध में जिन 30 प्रमुख देशों ने भाग लिया उनमें से यदि अमेरिका, चीन और जापान को निकाल दिया जाए तो शेष सभी देश यूरोप के ही थे। अमेरिका भी इसमें युद्ध के अंतिम कुछ महीनों में ही शामिल हुआ। इस युद्ध में यदि उस दौर के गुलाम देशों की भूमिका के बारे में कोई तथ्य दर्ज है तो केवल इतना कि इन देशों के सैनिकों को युद्ध के लिए यूरोप भेजा गया।

जाहिर है कि यह उन राष्ट्रों का अपना निर्णय नहीं था, बल्कि खुद यूरोपीय देशों का निर्णय था, जो इन पर शासन कर रहे थे। जैसे ब्रिटेन भारत पर शासन कर रहा था और इसी कारण हमारे सैनिकों को इस युद्ध में जाना पड़ा। यदि हम उत्तरी अफ्रीका और मध्य-एशिया के यूरोप के नजदीकी वाले क्षेत्रों को छोड़ दें तो यह तथाकथित प्रथम विश्व युद्ध मुख्यत: यूरोप की धरती पर ही लड़ा गया। साथ ही यूरोपीय देशों के बीच ही लड़ा गया था। इसके विध्वंस का सबसे अधिक शिकार भी यूरोप ही हुआ। इसमें जिन साढे़ छह करोड़ सैनिकों ने भाग लिया था उनमें पांच करोड़ से अधिक सैनिक केवल यूरोप के ही थे। स्पष्ट है कि सबसे अधिक सैनिक यूरोप के ही मारे गए थे। इसके बाद शहीद होने वाले सैनिकों में भारतीय सैनिक थे। 1914 से 1918 तक चले इस युद्ध में करीब 11 लाख भारतीय सैनिकों ने हिस्सा लिया, जिनमें लगभग 74 हजार शहीद हुए। इस युद्ध के बाद जो संधियां की गईं वे यूरोपीय देशों के बीच ही की गईं। ये संधियां भी इतनी अव्यावहारिक थीं कि उससे दूसरे विश्व युद्ध का जन्म लेना स्वाभाविक था।

यह कहना गलत नहीं होगा कि दो राष्ट्रों के परस्पर प्रतिशोध की जो चिंगारी इतने विशाल युद्ध में तब्दील हुई उसका एक बहुत बड़ा कारण यूरोप के विभिन्न देशों के बीच परस्पर की गई वे जटिल संधियां थीं जिसने कई राष्ट्रों को न केवल एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया था, बल्कि एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा भी कर दिया था। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि 1939 में ‘द्वितीय विश्व युद्ध’ शुरू होने के पहले इसे ‘प्रथम विश्व युद्ध’ कहा भी नहीं जाता था। इसका प्रचलित नाम था-‘ग्रेट वार’। हालांकि यूरोप के अन्य दो युद्धों को भी इसी नाम से जाना जाता था। इनमें एक था-जर्मनी का 1618 से 1648 तक का तीस वर्षीय युद्ध और दूसरा फ्रांस के नेपोलियन द्वारा ब्रिटेन के खिलाफ 1793 से 1815 तक लड़ा गया युद्ध। अमेरिका के इतिहासकार भी इसे ‘ग्रेट वार’ के नाम से ही जानते थे। 1939 में जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ तब ब्रिटिश और कनाडा के कुछ इतिहासकारों ने ग्रेट वार को ‘प्रथम विश्वयुद्ध’ कहना शुरू किया। शायद उन्होंने इन दोनों युद्धों की स्पष्ट पहचान के लिए ऐसा किया। जो भी हो, यह अपेक्षाकृत एक बहुत बड़ा युद्ध था।

हर दृष्टि से इसमें विध्वंस भी सबसे अधिक हुआ, लेकिन यह विश्व युद्ध नहीं था। इसे विश्व युद्ध के बजाय यूरोपीय युद्ध कहना अधिक सही होगा। दरअसल यूरोपीय देश, जो उस समय विश्व भर में शासन कर रहे थे और लगभग विश्व बौद्धिकता पर भी उनका काफी कुछ आज जैसा ही कब्जा था, विध्वंस का दोषारोपण स्वयं पर नहीं होने देना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने विश्व चेतना को बरगलाने की दृष्टि से इसे एक ऐसा नाम दे दिया ताकि यह पता ही न चल सके कि इसके लिए जिम्मेदार कौन था? एक तरह से यूरोपीय देश बड़ी चालाकी से अपनी जिम्मेदारी से बच निकले। कम से कम हम भारतीय तो यह याद रखें कि यह कथित प्रथम विश्व युद्ध यूरोपीय राष्ट्रों की परस्पर प्रतिस्पर्धा, लोभ और संकीर्णता का परिणाम था। यह भी आवश्यक है कि आज जब संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था अस्तित्व में है तब इतिहास के तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन करके उन्हें दुरुस्त किया जाए।