रोजगार सृजन में कैसे मिल सकती है सफलता ?

रोजगार सृजन में कैसे मिल सकती है सफलता ?

अजित बालकृष्णन

पिछले दिनों एक दोपहर जब मैं न्यूयॉर्क सिटी के मैनहैटन में मैडिसन एवन्यू में यूं ही टहल रहा था तो मैं खाली पड़े स्टोरों को देखकर ठिठक गया। उनके तमाम रैक खाली थे और जहां तहां ‘किराये पर देना है’ के बोर्ड लगे हुए थे। यह इलाका भी पहले फलफूल रहे रिटेल कारोबार वाले फिफ्थ एवन्यू और ब्रॉडवे से अलग नहीं था। न्यूयॉर्क के कुछ हिस्से मसलन फैशनेबल मानी जाने वाली ब्लीकर स्ट्रीट, अब घोस्ट टाउन (खाली और उजाड़) की तरह नजर आने लगे हैं। अचल संपत्ति क्षेत्र में सूचनाओं का बड़ा स्रोत मानी जाने वाली डगलस एलिमैन के मुताबिक मैनहैटन में इस समय 20 प्रतिशत रिटेल स्टोर खाली पड़े हैं जबकि कुछ वर्ष पहले यह आंकड़ा महज 6 फीसदी था।

ई-कॉमर्स की बात करें तो क्या डिलिवरी बॉय तथा वेयरहाउस में मिलने वाले रोजगारों को अमेरिका में चल रही रोजगार की मौजूदा बहस में शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा क्या यह वाकई प्रभावी माना जा सकता है जबकि अमेरिका की कुल खुदरा बिक्री में ऑनलाइन ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी 6 फीसदी है। अगर यह बढ़कर 50 प्रतिशत हो जाए तो क्या होगा? मुंबई वापसी पर मैंने जो पहला समाचार पत्र उसमें छपी खबर अपने आप में एक चेतावनी समेटे थी, ‘रेलवे में 90,000 पदों के लिए 2.8 करोड़ लोगों ने किया आवेदन।’

मैंने मन ही मन खुद को धन्यवाद दिया कि मैं राजनेता नहीं हूं और मुझे आगामी चुनावों में अपनी सीट बचाए रखने की जद्दोजहद नहीं करनी है। रोजगार की कमी को लेकर उपजी चिंता जोर पकड़ रही है और राजनीतिक दलों ने इस विषय पर वादों और आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू भी कर दिया है। एक पार्टी कहती है कि युवाओं को अभी भी वादे के मुताबिक दो करोड़ रोजगारों का इंतजार है तो दूसरी पार्टी कहती है कि पिछले एक साल में संगठित क्षेत्र में 70 लाख से अधिक रोजगार सृजित हुए। एक जमाने में तिलक ने कहा था, ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ आज शायद इसे कुछ इस तरह कहा जाएगा, ‘हर महीने रोजगार की उम्र में पहुंच रहे लाखों भारतीयों को रोजगार प्राप्त करने का अधिकार है।’ साफ कहें तो भारत इकलौता ऐसा देश नहीं है जो रोजगार की समस्या से जूझ रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अब तक आयात शुल्क बढ़ाने, वीजा मानकों को कड़ा करने, मैक्सिको की सीमा पर दीवार बनाने की धमकी जैसे जो भी कदम उठाए हैं उन सबका लक्ष्य भी एक ही है: अमेरिकी लोगों को पर्याप्त रोजगार मुहैया कराना। ब्रिटेन ने ब्रेक्सिट के रूप में यूरोपीय संघ से अलग होने का जो आत्मघाती कदम उठाया वह भी इन चिंताओं के कारण उठाया गया क्योंकि उसे लग रहा था कि यूरोपीय संघ में बने रहने से अन्य यूरोपीय देशों के प्रवासी स्थानीय रोजगार छीन लेंगे।

ऐसा क्या हुआ कि दुनिया भर में अचानक रोजगार सबकी प्राथमिकता में आ गए? रोजगार से जुड़ी चिंताओं की एक बड़ी वजह यह है कि जीडीपी वृद्धि के अनुसार आकलित आर्थिक वृद्धि का अर्थ अब रोजगार में वृद्धि नहीं रह गया है। विश्व बैंक द्वारा भारत समेत दक्षिण एशिया के अर्थशास्त्रियों पर किए गए एक सर्वे (साउथ एशिया इकनॉमिक फोकस स्प्रिंग 2018: जॉबलेस ग्रोथ) में एक सवाल यह पूछा गया कि अगर भारत का जीडीपी एक फीसदी बढ़ता है तो रोजगार में कितनी बढ़ोतरी होगी? 35 प्रतिशत ने कहा कि रोजगार में नाम मात्र की वृद्धि होगी, 32 फीसदी का कहना था कि रोजगार में 0.3 फीसदी की बढ़ोतरी होगी, 25 प्रतिशत ने कहा कि रोजगार वृद्धि 0.3 फीसदी से एक फीसदी के बीच रहेगी जबकि केवल चार प्रतिशत ने कहा कि यह एक प्रतिशत से अधिक रहेगी। सबसे बुरी बात तो यह कि उनके मुताबिक रोजगार में जो बढ़ोतरी औपचारिक क्षेत्र में होनी थी वह असंगठित क्षेत्र में होगी।

हकीकत यह है कि कितने और किस प्रकार के रोजगार सृजित होंगे यह बात हमारे सामाजिक ढांचे को भी प्रभावित करेगी। पीटर ब्लाऊ और ओटिस डंकन ने अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘द अमेरिकन ऑक्युपेशनल स्ट्रक्चर’ में कहा है कि पेशे का ढांचा समकालीन समाज के स्तरीकरण का आधार है और जैसे जैसे सामंती घराने और वंशानुगत जाति व्यवस्था समाप्त होगी, वर्गीय भेद समाप्त होंगे और उनका स्थान पेशेवर भूमिका लेगी। इसके साथ ही संबद्ध आर्थिक लाभ भी सामने आएंगे। पूर्व शिक्षा सचिव अशोक ठाकुर और एआईसीटीई के पूर्व चेयरमैन एसएस मंथा दो ऐसे लोग थे जिन्हें पता था कि वे क्या बात कर रहे हैं। गत सप्ताह इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में उन्होंने कहा कि हाथ से काम करने वालों को लेकर गहरा सामाजिक पूर्वग्रह है क्योंकि इसे नीचा और अपमानजनक माना जाता है। यही वजह है कि सन 1960 के दशक में कोठारी आयोग के बाद बारहवीं की पढ़ाई के साथ अनिवार्य रूप से जोड़ा गया व्यावसायिक शिक्षा का पाठ्यक्रम नाकाम साबित हुआ।

यहां तक कि कौशल विकास के लिए नया मंत्रालय गठित करके कौशल विकास के काम को गतिशील बनाने का एक बेहतरीन प्रयास भी नाकाम ही रहा। उनका मानना है कि छात्रों को कक्षा नौ से ही व्यावसायिक पाठ्यक्रम में डाल देना समस्या का हल हो सकता है। उनका मानना है कि अगर इसे स्कूली और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बना दिया जाए तो व्यावसायिक शिक्षण को लेकर पूर्वग्रह दूर होंगे। रोजगार के मामले का एक दूसरा पहलू भी है: कई कारोबार देश में केवल इसलिए विकसित नहीं हो पा रहे क्योंकि लोगों के पास उनके लिए आवश्यक कौशल नहीं है। यह उस समय पर खासतौर पर होता है जबकि तकनीक परिदृश्य बदलाव के दौर से गुजर रहा हो। इसलिए कि हम सूचना के युग में हैं।

पाठ्यक्रम पीछे छूट रहा है क्योंकि उसके लिए इन बदलावों की गतिशीलता से मुकाबला कर पाना मुश्किल है। उदाहरण के लिए आज हमारे शीर्ष इंजीनियरिंग कॉलेजों और प्रबंधन संस्थानों में मशीन लर्निंग की बहुत अहमियत है लेकिन वह पांच वर्ष पीछे चल रहा है। इंजीनियरिंग कॉलेज में वह इसलिए पीछे है क्योंकि वहां सांख्यिकी मूल विषय नहीं है। इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित तथ्यों से संभावनाओं की ओर बदलाव को बढ़ावा नहीं देते। वहीं प्रबंधन संस्थानों में उन लोगों को बढ़ावा नहीं दिया जाता जो स्वयं आगे आकर गणना करते हैं। अन्य इंजीनियरिंग और प्रबंधन संस्थानों में यह पिछड़ापन 10 वर्ष तक का है। पॉलिटेक्रीक और आईटीआई में यह 25 वर्ष का है। अगर इसमें जल्दी सुधार नहीं किया गया तो भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएंगी। इसका असर लाजिमी तौर पर रोजगार पर भी पड़ेगा।