संविधान : भारत की अंतश्चेतना

26 नवम्बर को ‘संविधान दिवस’ घोषित किया गया है परन्तु यह अन्य दिवसों की तरह ही सामान्य बीत गया। स्वतंत्र भारत ने अपनी शुरुआत प्रारब्ध की आशाओं एवं आकांक्षाओं के साथ की थी। उसे विभाजन हिन्दू-मुस्लिम झगड़े एवं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के रूप में अनेक त्रासदियां झेलनी पड़ीं। बी.आर.अंबेडकर ने संविधान के मसौदे को अंतिम रूप देते हुए प्रजातांत्रिक संविधान की आवश्यकताओं पर देश की मजबूरियों को हावी नहीं होने दिया। उन्होंने मसौदे पर धर्मतंत्र के किसी तत्व का प्रभाव नहीं पड़ने दिया। 26 नवम्बर 1949 को उन्होंने इस मसौदे को संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया था। सभा ने संविधान को स्वीकृत कर दिया और 1950 में भारत एक प्रजातांत्रिक गणतंत्र बन गया।

हमारा संविधान देश के प्रशासन से जुड़े नियमों से कहीं बहुत ऊपर है। यह एक बहुलवादी एवं विविधतापूर्ण समाज के मूल्यों को समाहित किए हुए है। साथ ही यह स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व, धर्मनिरपेक्षता, लैंगिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक समानता पर आधारित है। दूसरे शब्दों में कहें, तो हमारा संविधान एक सामाजिक दस्तावेज है।

भारत की व्याख्या किसी एक धर्म, भाषा या संस्कृति के रूप में नहीं की जा सकती। ऐसा करना संविधान के आदर्शों के विरूद्ध होगा। हमारे संविधान का संघीय ढांचा भारत की विभिन्न संस्कृतियों एवं भाषाओं को पनपने का पूर्ण अवसर प्रदान करता है। यह हमारे समाज के वंचितों एवं अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है। इसके उदार एवं समानाधिकारवादी मूल्य सभी नागरिकों को अधिकार एवं स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से जिस प्रकार से भारत एक राष्ट्र के रूप में समेकित रहा है, उसका श्रेय संविधान को जाता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक संविधान द्वारा अपने नागरिकों को दिए गए अधिकारों के प्रगतिशील ढांचे पर अनेक बार प्रहार किए गए हैं। 1999 एवं 2002 में एन डी ए सरकार ने संविधान की समीक्षा करने की तैयारी कर ली थी। तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर.नारायणन् ने ऐसा करने की छूट नहीं दी। उन्होंने कहा था-‘‘हमें इस बात की जांच करनी चाहिए कि संविधान ने हमें विफल किया है या हमने संविधान को विफल कर दिया है।’’

डॉ०अम्बेडकर ने पहले ही इस बात की चेतावनी दी थी कि कुछ तीक्ष्ण प्रशासनिक प्रयासों से संविधान के आदर्शों की अवहेलना करने का प्रयास किया जा सकता है। उन्होंने संवैधानिक नैतिकता के ऐसे आदर्शों को स्थापित किया था, जिसके अंतर्गत संवैधानिक संस्थाओं को पूर्ण सम्मान दिए जाने की बात की गई है। साथ ही अगर ये संस्थान नागरिकों के अधिकारों या संविधान को रौंदने का प्रयास करें, तो उन पर ऊँगली उठाने का भी प्रावधान रखा गया है। दुर्भाग्यवश आज सरकार के कार्यों की आलोचना करने वाले सरकार के आक्रामक तेवर से त्रस्त हैं। सरकार का यह दुष्चक्र संविधान की आत्मा के विरूद्ध है।

संविधान के निर्माण में विभाजन एवं टकराव की जगह समायोजन एवं आपसी समझ को स्थान दिया गया है। सरकार ने राष्ट्रवादिता को बलपूर्वक थोपकर इस तथ्य का नाश कर दिया है। संविधान ही वह शक्ति है, जो भारत को हिन्दू राष्ट्र में परिवर्तित करने की हिन्दूवादी शक्तियों से बचाए हुए है। गोरक्षा के नाम पर भारत के अनेक भागों में मुस्लिमों एवं दलितों की हत्या करना संविधान के विरूद्ध है।

हमें अपने देश की निर्धन, वंचित व उपेक्षित जनता के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। संविधान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का सबसे अच्छा माध्यम यही है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित डी.राजा के लेख पर आधारित।