सकारात्मक बदलाव

सकारात्मक बदलाव

संपादकीय

वानिकी क्षेत्र में कमजोर प्रदर्शन के अलावा वैश्विक तापवृद्घि में नियंत्रण के लिहाज से अन्य क्षेत्रों में भारत का प्रदर्शन काफी प्रभावशाली रहा है। भारत ने पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते में अपनी अर्थव्यवस्था में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 2005 के स्तर से 33 से 35 प्रतिशत कम करने की जो प्रतिबद्घता जताई थी और बिजली उत्पादन में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी 40 फीसदी करने की जो बात कही थी, वह उसे पूरा करने की राह पर नजर आ रहा है। भारत सरकार अगले महीने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन समझौता ढांचे (यूएनएफसीसीसी) के समक्ष जो द्विवार्षिक रिपोर्ट पेश करने जा रही है उसमें भी कहा गया है कि ये लक्ष्य 2030 की तय मियाद के पहले भी हासिल किए जा सकते हैं। यह बात इसलिए भी उल्लेखनीय है कि क्योंकि कई विकसित देश जो भारत की तुलना में कहीं अधिक प्रदूषण फैलाते हैं और जिन्हें इस मोर्च पर अधिक काम करना चाहिए था, वे इस मामले में पीछे रह गए हैं क्योंकि उन्हें आशंका है कि इसका उनकी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर होगा। अमेरिका तो पेरिस समझौते से बाहर निकलने पर भी विचार कर रहा है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के सकल घरेलू उत्पाद में उत्सर्जन का योगदान वर्ष 2014 तक ही वर्ष 2005 के स्तर से 21 प्रतिशत तक कम हो चुका था। इससे पता चलता है कि इस क्षेत्र में सालाना 2 फीसदी से भी अधिक का सशक्त सुधार देखने को मिला है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उत्सर्जन में काफी कमी आई है और एल्युमीनियम, लोहा, इस्पात, सीमेंट और उर्वरक आदि ऊर्जा की अधिक खपत वाले क्षेत्रों में भी सुधार देखने को मिला है। स्वच्छ ऊर्जा की बात करें तो कुल बिजली में गैर जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली की हिस्सेदारी 35 फीसदी हो चुकी है। इसके लिए 40 फीसदी का लक्ष्य तय किया गया था, यानी यह पूरी तरह पहुंच में है।

बहरहाल, ध्यान देने वाली बात यह है कि देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्घताओं का असर केवल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमताओं से ही संबंधित नहीं है। इसमें जलविद्युत और नाभिकीय ऊर्जा समेत तमाम गैर जीवाश्म ईंधन स्रोत शामिल हैं। वर्ष 2022 तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा सौर, पवन और जैव ईंधन इकाइयों के माध्यम से जुटाने का लक्ष्य तय किया गया है। जलवायु परिवर्तन के साथ देश की लड़ाई में हम पर्यावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा कम करने में चूक गए हैं। यह काम पौधरोपण के माध्यम से किया जा सकता है। द्विवार्षिक रिपोर्ट में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक वनों के जरिये कार्बन उत्सर्जन कम करने का उपक्रम वर्ष 2010 से 2014 के बीच कम होता गया। हालांकि पौधरोपण और कृषि वानिकी में विस्तार की वजह से वन्य क्षेत्र के बाहर यह बढ़ा भी।

दुर्भाग्य की बात है कि देश के वन्य क्षेत्र को बढ़ाने के लिए खासतौर पर बनाए गए ग्रीन इंडिया मिशन को अब तक वांछित परिणाम हासिल करने में नाकामी मिली है। इसमें दो राय नहीं कि हमारा देश जमीन की कमी वाला देश है। हमारे पास वन्य क्षेत्र बढ़ाने के लिए अतिरिक्त जमीन नहीं है लेकिन ऐसा करना असंभव भी नहीं है। कटे हुए वनों को दोबारा पनपा कर और बेकार भूमि पर रोपण करके कार्बन अवशोषण की व्यवस्था की जा सकती है। इसके अलावा सौर ऊर्जा क्षेत्र भी संभावित निवेशकों के बीच अपना आकर्षण गंवा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि सौर ऊर्जा के शुल्क में भारी गिरावट आई है और चीन से आयात होने वाले सौर उपकरणों पर शुल्क बढ़ा दिया गया है। जमीन की उपलब्धता भी इस क्षेत्र के लिए एक बड़ी समस्या है। इन मसलों को हल करना आवश्यक है। तभी जलवायु परिवर्तन से हमारी लड़ाई जारी रह सकेगी और हम इस क्षेत्र में दूसरों से आगे रह पाएंगे।