साइबर स्पेस की सुरक्षा जरूरी है।

डिजीटल एवं तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था में भारत विश्व में शीर्ष स्थान रखता है। आउटसोर्सिंग क्षेत्र में लगभग 50 प्रतिशत से अधिक की साझेदारी भारत की है। आधार, माई गव, गवर्नमेंट ई-मार्केट, भारत नेट, स्टार्टअप इंडिया आदि भारत के ऐसे उत्कृष्ट कार्यक्रम हैं, जो उसे तकनीकी रूपातंरण की ओर ले जा रहे हैं। तकनीक आधारित स्टार्ट-अप्स् मंे भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। इसके सूचना एवं दूरसंचार क्षेत्र के 2020 तक 225 अरब डॉलर तक पहुँच जाने की संभावना है।

इन सब उपलब्धियों के साथ ही साइबर स्पेस में भारत के इन कार्यक्रमों पर अतिक्रमण का खतरा भी बढ़ गया है। जून 2017 तक देश में लगभग 27,482 साइबर सुरक्षा से जुड़ी धमकियाँ मिल चुकी हैं। अच्छी बात यह है कि सरकार इन खतरों की पहचान रखती है, और इनसे निपटने के लिए लगातार प्रयासरत भी है। इसी वर्ष अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार यूनियन द्वारा साइबर सुरक्षा पर देशों की प्रतिबद्धता पर जारी एक आकलन में 65 देशों में भारत को 23वां स्थान दिया गया है।

हाल में, साइबर जगत में रैन्समवेयर अटैक सबसे अधिक प्रचलन में है। यह एक ऐसा अटैक है, जिसमें उपभोक्ता के डाटा को सार्वजनिक या ब्लॉक करने की धमकी दी जाती है। वान्नाक्राई और पेत्या के अलावा लॉकी, सर्बर, शार्करास, कृपटैक्स और सैम सैम ऐसे ही कुछ रैन्समवेयर अटैक हैं। इसमें उपभोक्ता से रैन्सम या फिरौती की मांग की जाती है।ये अटैक मोबाइल फोन या ई-पैड तक सीमित नहीं है। एंड्रॉयड पर चलने वाले टेलीविजन भी इसके शिकार हो रहे हैं। 2016 में की-रेंजर नामक रैन्समवेयर ने मैक के उपभोक्ताओं को शिकार बनाया। इसी प्रकार मीकाई बोटनेट मैलवेयर ने घरेलू राउटर एवं अन्य इंटरनेट उपभोक्ताओं पर आक्रमण किया।इंटरनेट के बढ़ते क्षेत्र के साथ अब नीति एवं योजनाओं के निर्माण में साइबर सुरक्षा के एकीकृत प्रयास किए जाने चाहिए। एशिया पेसिफिक कम्प्यूटर इमरजेंसी रेस्पोन्स टीम कांफ्रेंस में हमारे सूचना-प्रोद्योगिकी मंत्री ने साइबर सुरक्षा की नीतियों को बढ़ाने पर बल दिया।

साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए सरकार, स्टार्टअप को 5 करोड़ तक का अनुदान देने के लिए तैयार है।
हमारे दूरसंचार मंत्री ने 2017 में साइबर स्पेस के विश्व सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों से इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का आहवान किया। साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि देशों की आपसी लड़ाई में कोई भी देश इंटरनेट के कोर पर हमला न करें।
पूरे विश्व में सुरक्षित, अंतर-संचालित एवं सार्वभौमिक इंटरनेट सेवाओं के लिए जेनेवा की तरह के ही एक सम्मेलन की आवश्यकता है, जो इस क्षेत्र में उच्च स्तरीय प्रावधानों का संचालन कर सके।
‘द हिन्दू’ में प्रकाशित शुबी चतुर्वेदी के लेख पर आधारित।