05-09-2019 DAILY CURRENT FOR UPSC

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1 ‘McrBC’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. McrBC एक जटिल बैक्टीरियल प्रोटीन (Bacterial Protein) है जो एक जीवाणु कोशिका में वायरल संक्रमण को रोकने में मदद करता है और आणविक कैंची (Molecular Scissors) के रूप में कार्य करता है।
  2. हाल ही में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा इसका निर्धारण किया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A केवल 1

B केवल 2

C 1 और 2 दोनों

D न तो 1 और न ही 2

Explanation

उत्तर: (a)

व्याख्या:

  • McrBC एक जटिल बैक्टीरियल प्रोटीन (Bacterial Protein) है जो एक जीवाणु कोशिका में वायरल संक्रमण को रोकने में मदद करता है और आणविक कैंची (Molecular Scissors) के रूप में कार्य करता है। अतः कथन 1 सही है।
  • हाल ही में पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (Indian Institute of Science Education and Research- IISER) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने ‘McrBC की परमाणु संरचना’ का निर्धारण किया है। अतः कथन 2 सही नहीं है।

2 कार्डियो-वैस्कुलर रोग (CVD) के संदर्भ में निम्न कथनों पर विचार कीजिये :

  1. निम्न आय वाले देशों में CVD के कारण होने वाली मौतें कैंसर की तुलना में तिगुनी हैं।
  2. इस रोग के लिये ज़िम्मेदार कारकों में धूम्रपान, व्यायाम की कमी, वसायुक्त आहार, मोटापा, उच्च रक्तचाप आदि शामिल हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A केवल 1

B केवल 2

C 1 और 2 दोनों

D न तो 1 और न ही 2

Explanation

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • CVD वैश्विक स्तर पर मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है परंतु उच्च आय वाले देशों ( (High Income Countries-HIC) में कैंसर के कारण होने वाली मौतों CVD की तुलना में दोगुनी हैं, जबकि भारत सहित निम्न आय वाले देशों (Low Income Countries-LIC) में CVD के कारण होने वाली मौतें कैंसर की तुलना में तिगुनी हैं।
  • इस शोध पत्र में निम्न आय वाले देशों (LIC) एवं मध्यम आय वाले देशों में (Middle-Income Countries-MIC) घरेलू वायु प्रदूषण को CVD के एक प्रमुख कारण के रूप में पहचाना गया है।
  • निम्न आय वाले देशों में जोखिम कारकों के कम होते हुए भी उच्च मृत्यु दर का कारण गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच की कमी और बीमा सुविधा का अभाव है।
  • हृदय रोग के जोखिम कारक वे विशेष आदतें, व्यवहार व दिनचर्या आदि हैं जो किसी व्यक्ति के हृदय रोग से ग्रस्त होने के जोखिम को बढ़ाते हैं।
    • धूम्रपान।
    • व्यायाम की कमी।
    • वसायुक्त आहार।
    • मोटापा।
    • उच्च रक्तचाप।
    • कार्डियो-वैस्कुलर रोग का पारिवारिक इतिहास।

3 UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. यह एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जो विश्व के सागरों और महासागरों पर देशों के अधिकारों एवं ज़िम्मेदारियों का निर्धारण करता है तथा समुद्री साधनों के प्रयोग के लिये नियमों की स्थापना करता है।
  2. संयुक्त राष्ट्र ने इस कानून को वर्ष 1982 में अपनाया था लेकिन यह नवंबर 1994 में प्रभाव में आया।
  3. भारत ने UNCLOS को वर्ष 1995 में अपनाया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A केवल 1 और 2

B केवल 2 और 3

C केवल 1 और 3

D उपरोक्त सभी

Explanation

उत्तर: (d)

व्याख्या:

  • यह एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जो विश्व के सागरों और महासागरों पर देशों के अधिकार एवं ज़िम्मेदारियों का निर्धारण करता है तथा समुद्री साधनों के प्रयोग के लिये नियमों की स्थापना करता है। अतः कथन 1 सही है।
  • संयुक्त राष्ट्र ने इस कानून को वर्ष 1982 में अपनाया था लेकिन यह नवंबर 1994 में प्रभाव में आया। अतः कथन 2 सही है।
  • भारत ने वर्ष 1995 में UNCLOS को अपनाया, इसके तहत समुद्र के संसाधनों को तीन क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है- आंतरिक जल (IW), प्रादेशिक सागर (TS) और अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ)। अतः कथन 3 सही है।

4 इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol-EBP) कार्यक्रम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. इस कार्यक्रम के तहत तेल कंपनियों द्वारा अधिकतम 10 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री की जाती है।
  2. भारत सरकार ने इस कार्यक्रम वर्ष 2010 में लागू किया था।
  3. 1 अप्रैल, 2019 से केंद्रशासित प्रदेश अंडमान निकोबार और लक्ष‍द्वीप को छोड़कर पूरे भारत में इस कार्यक्रम को विस्‍तारित किया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A केवल 1 और 2

B केवल 2 और 3

C केवल 1 और 3

D इनमें से कोई नहीं

Explanation

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol-EBP) कार्यक्रम के तहत तेल कंपनियों द्वारा अधिकतम 10 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री की जाती है। अतः कथन 1 सही है।
  • भारत सरकार ने इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol-EBP) कार्यक्रम वर्ष 2003 में लागू किया था। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • 1 अप्रैल, 2019 से केंद्रशासित प्रदेश अंडमान निकोबार और लक्ष‍द्वीप को छोड़कर पूरे भारत में इस कार्यक्रम को विस्‍तारित किया गया है, ताकि वैकल्पिक और पर्यावरण अनुकूल ईंधनों के इस्‍तेमाल को बढ़ावा मिले। अतः कथन 3 सही है।

5 ‘युद्ध अभ्‍यास 2019’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. यह अभ्यास भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा संयुक्‍त सैन्‍य प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग है।
  2. हाल ही में इसके 15वें संस्‍करण का आयोजन वाशिंगटन में संपन्न हुआ।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A केवल 1

B केवल 2

C 1 और 2 दोनों

D न तो 1 और न ही 2

Explanation

उत्तर: (a)

व्याख्या:

  • यह भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा संयुक्‍त सैन्‍य प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग है। अतः कथन 1 सही है।
  • भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के ‘संयुक्‍त सैन्‍य अभ्‍यास 2019’ के 15वें संस्‍करण का आयोजन 5-18 सितंबर, 2019 तक वाशिंगटन में किया जाना है। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • संगठनात्‍मक ढाँचे और युद्ध प्रक्रियाओं को समझने के लिये इस संयुक्‍त अभ्‍यास के दौरान विविध कार्रवाइयाँ की जाएंगी।

 

 

एएच-64ई अपाचे

AH-64E Apache

हाल ही में AH-64E अपाचे (AH-64E Apache) लड़ाकू हेलीकॉप्‍टर को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया।

 

  • भारतीय वायु सेना ने 22 अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्‍टरों के लिये बोइंग कंपनी और अमेरिकी सरकार के साथ अनुबंध पर हस्‍ताक्षर सितंबर 2015 में किये गये थे।
  • अब तक 8 हेलीकॉप्‍टर समय पर भारत को प्राप्त हो गए हैं, हेलीकॉप्‍टर की अंतिम खेप मार्च 2022 तक दी जाएगी।
  • भारत द्वारा Mi-35 बेड़े के स्‍थान पर अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्‍टरों की खरीदारी की जा रही है।
  • एंटी टैंक गाइडेड मिसाइलों, हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलों तथा रॉकेटों पर निशाना साधने के अतिरिक्‍त अपाचे हेलीकॉप्‍टर में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (Electronic Warfare- EW) क्षमताएँ विद्यमान हैं।
  • अपाचे हेलीकॉप्‍टर विश्‍व भर में ऐतिहासिक कार्रवाइयों का अभिन्‍न हिस्‍सा रहे हैं। साथ ही इन हेलीकॉप्‍टरों को भारतीय वायुसेना की मांग के अनुरूप बनाया गया है।
  • ये हेलीकॉप्‍टर अनेक हथियारों की डिलीवरी करने में सक्षम हैं।
  • इनमें हवा से ज़मीन पर मार करने वाले हेलफायर मिसाइल (Hellfire Missiles), 17 मिमी. हाइड्रा रॉकेट (Hydra rockets) और हवा-से-हवा में मार करने वाली स्टिंगर मिसाइल (Stinger Missiles) शामिल है।
  • अपाचे हेलीकॉप्‍टर में 30 मिमी. चेनगन (Chain Gun) के साथ ही फायर कंट्रोल राडार भी है, जो 360 डिग्री का कवरेज़ प्रदान करता है और इसमें नाइट विज़न प्रणाली भी शामिल है।
  • इस हेलीकॉप्‍टर का रख-रखाव करना भी आसान है और यह उष्‍णकटिबंधीय तथा रेगिस्‍तानी क्षेत्रों में संचालन हेतु सक्षम है।

राशन कार्ड पोर्टेबिलिटी में शामिल अन्य राज्य

1 अक्तूबर, 2019 से दो नए क्लस्टर केरल और कर्नाटक तथा राजस्थान एवं हरियाणा राशन कार्ड की अंतर-राज्यीय पोर्टेबिलिटी पहल में शामिल होंगे।

  • इससे पहले आंध्र प्रदेश और तेलंगाना तथा महाराष्ट्र और गुजरात के राशन-कार्डों की अंतर-राज्यीय पोर्टेबिलिटी शुरू की जा चुकी है।
  • हालाँकि राष्ट्रव्यापी पोर्टेबिलिटी वन नेशन वन राशन कार्ड प्रणाली के लिये रोडमैप तैयार किया जा रहा है जिसे जून 2020 तक लागू किये जाने की संभावना है।
  • 1 जनवरी, 2020 तक देश के 11 राज्यों के प्रवासियों द्वारा ग्रिड के भीतर किसी भी अन्य राज्य में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत गारंटीकृत राशन प्राप्त किये जाने की संभावना है।
  • जिसके अंतर्गत कुछ राज्यों ने इंट्रा-स्टेट पोर्टेबिलिटी को लागू करने का पहला चरण हासिल कर लिया है, जहाँ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के लाभार्थी अपने राज्य के भीतर पंजीकृत दुकान के अलावा किसी भी राशन की दुकान में राशन-कार्ड का उपयोग कर सकते हैं।
  • मार्च 2020 तक 13 अन्य राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों- तमिलनाडु, गोवा, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, दमन और दीव, तथा दादरा एवं नगर हवेली में इंट्रा-स्टेट पोर्टेबिलिटी लागू की जाएगी।

लियो परगेल’

Leo Pargyil

भारतीय सेना की एक टीम ने विषम मौसम की चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना करते हुए ‘लियो परगेल’ (Leo Pargyil) पर्वत पर सफलतापूर्वक फतह हासिल की।

 

  • भारतीय सेना ने यह सफलता 20 अगस्त, 2019 को सुबह 10.30 बजे हासिल की, इसके साथ ही इस पर्वत की चोटी पर राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ फहराया।
  • ‘लियो परगेल’ पर्वत हिमाचल की तीसरी सबसे ऊँची चोटी है जिसकी ऊँचाई लगभग 6773 मीटर है।
  • इसे सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण एवं तकनीकी दृष्टि से अत्यंत कठिन चोटी माना जाता है। यह पर्वत ज़ास्कर रेंज (Zaskar Range) में आता है।
  • इस अभियान दल को हिमाचल स्थित पूह (Pooh) से ट्राई पीक ब्रिगेड (Tri Peak Brigade) के कमांडर द्वारा 20 अगस्त को रवाना किया गया था तथा इसमें ट्राई पीक ब्रिगेड की महार रेजिमेंट की 18वीं बटालियन (18th Battalion the Mahar Regiment) के सैनिक शामिल थे।

भारत-अमेरिका युद्ध अभ्‍यास 2019

भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के संयुक्‍त सैन्‍य अभ्‍यास 2019’ के 15वें संस्‍करण का आयोजन 5-18 सितंबर, 2019 तक वाशिंगटन में किया जाना है।

  • दोनों देशों में बारी-बारी से आयोजित किये जाने वाले इस युद्ध अभ्‍यास को इस बार ज्‍वाइंट बेस लुईस मैक कॉर्ड, वाशिंगटन (Joint Base Lewis Mc Chord, Washington, USA) में किया जाएगा।
  • यह भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा संयुक्‍त सैन्‍य प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग है।
  • यह युद्ध अभ्‍यास दोनों देशों के सशस्‍त्र बलों को ब्रिग्रेड स्‍तर पर संयुक्‍त नियोजन के साथ बटालियन स्‍तर पर एकीकृत रूप से प्रशिक्षण का अवसर प्रदान करेगा।
  • संगठनात्‍मक ढाँचे और युद्ध प्रक्रियाओं को समझने के लिये इस संयुक्‍त अभ्‍यास के दौरान विविध कार्रवाइयाँ की जाएंगी।
  • इससे दोनों देशों के सशस्‍त्र बलों के बीच अंतर-संचालन में सहायता मिलेगी और अप्रत्‍याशित स्थिति से निपटा जा सकेगा।

ग्लोबल गोलकीपर अवार्ड’

Global Goalkeeper Award

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वच्छ भारत अभियान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और नेतृत्व हेतु बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा प्रतिष्ठित ग्लोबल गोलकीपर अवार्ड’ के लिये चुना गया है।

  • इस फाउंडेशन के मुताबिक, यह अवॉर्ड पाँच श्रेणियों के तहत किसी नेता द्वारा अपने देश में या वैश्विक स्तर पर सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयासों के लिये दिया जाता है।
  • इस पुरस्कार की पाँच श्रेणियाँ प्रोग्रेस’, ‘चेंजमेकर’, ‘कैम्पेन’, ‘गोलकीपर्स वॉइस’ और ‘ग्लोबल गोलकीपर’ है।
  • प्रधानमंत्री मोदी को स्वच्छ भारत अभियान में उनके नेतृत्व के लिये सम्मानित किया जाएगा। इस अभियान की शुरुआत दो अक्तूबर 2014 को हुई थी।
  • इससे पहले इस फोरम को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, फ्राँस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों, संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव अमिना मोहम्मद और नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मलाला युसुफजई तथा नादिया मुराद संबोधित कर चुके हैं।
  • ‘गोलकीपर्स’ कार्यक्रम को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों, संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव अमिना मोहम्मद, नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मलाला युसुफजई तथा नादिया मुराद संबोधित कर चुके हैं।

MAINS

आर्थिक सर्वेक्षण और न्यायिक सुधार

संदर्भ

वर्ष 2017-18 और 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षणों ने न्यायिक सुधार के पारंपरिक क्षेत्रों के लिये एक नई अंतर्दृष्टि प्रदान की। इन आर्थिक सर्वेक्षणों के साथ ही वर्ष 2018 और 2019 की विश्व बैंक की ‘कारोबार में सुगमता’ (Ease of Doing Business) रिपोर्टों ने न्याय वितरण से जुड़े कुछ मिथकों को उजागर किया है और उनकी पुष्टि भी की है। इन रिपोर्टों से यह इंगित होता है कि स्फूर्त प्रतिक्रियाएँ भर पर्याप्त नहीं हैं और आवश्यकता प्रणालीगत एवं संरचनात्मक सुधारों की है। अर्द्ध-न्यायिक कार्य करने वाले या प्रशासनिक निर्णय लेने वाले सरकारी अधिनिर्णायकों (Adjudicators) को अपने आदेशों की गुणवत्ता में सुधार करना चाहिये। निर्णय लेखन एक कला है, अतः इसे बेहतर बनाया जाना चाहिये। अपूर्ण/दोषपूर्ण आदेशों के कारण 31 मार्च, 2017 तक लगभग 7.58 लाख करोड़ रुपए तक के कर राजस्व विवाद की स्थिति बनी थी। यह जीडीपी के 4.7 प्रतिशत के बराबर है और इसमें वृद्धि ही हो रही है। कर से संबंधित सरकारी मुकदमेबाज़ी में सफलता की दर 30 प्रतिशत से भी कम है और कुछ मामलों में तो यह 12 प्रतिशत से भी कम है, जबकि मुकदमों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। लगभग 50,000 करोड़ रुपयए अवरुद्ध परियोजनाओं में फँसे हुए हैं और निवेश कम होता जा रहा है। ये दोनों जटिलताएँ न्यायालयों द्वारा मुख्यतः कमज़ोर मसौदे और तर्कों पर आधारित आदेशों पर लगाई गई रोक और स्थगन आदेशों के कारण उत्पन्न हुई हैं।

मिथक

प्रायः न्यायिक सक्रियता एवं न्यायालयों में न्यायाधीशों की कम संख्या को लंबित मामलों का प्रमुख कारण माना जाता है। किंतु आर्थिक सर्वेक्षण इस विषय पर एक पृथक दृष्टि प्रदान करता है। कुल मामलों में से लगभग 87.54 प्रतिशत मामले जिला न्यायालयों में लंबित हैं जहाँ न्यायिक सक्रियता की कोई भूमिका नहीं है। शेष 13 प्रतिशत लंबित मामलों में एक मामूली हिस्सा जनहित याचिकाओं का है जिस पर अधिक बहस करने की आवश्यकता नहीं है। सर्वेक्षण के अनुसार, न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर भी इस समस्या का हल नहीं खोजा जा सकता है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि शत-प्रतिशत निस्तारण दर (Clearance Rate) प्राप्त करने के लिये ज़िला न्यायालयों में केवल 2,279 रिक्तियों को भरना पर्याप्त है। इसी प्रकार उच्च न्यायालयों में शत-प्रतिशत निस्तारण दर प्राप्त करने के लिये केवल 93 रिक्त पदों को भरने की आवश्यकता है। रिक्त पदों को भरने और साथ ही सहायक कर्मचारी भी प्रदान किये जाएँ तो निस्तारण दर में नाटकीय रूप से वृद्धि होगी।

कम बजट आवंटन

यदि यह मान भी लिया जाए कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने और पर्याप्त संख्या में सहायक कर्मचारी उपलब्ध कराने से लंबित मामलों के आँकड़ों में अंतर आता है, तो इस कार्य हेतु बजट की कमी है। तथ्य यह है कि न्यायपालिका को आवंटित बजट जीडीपी का मात्र 0.08 से 0.09 प्रतिशत है। जापान, नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया और आइसलैंड का बजट ही भारत से कम है लेकिन इन देशों में मामलों के लंबित होने की कोई समस्या नहीं पाई जाती।

लंबित मामले तथा न्यायालय के कार्यदिवस

प्रश्न उठता है कि मामलों के लंबित होने या पेंडेंसी (Pendency) को परिभाषित कैसे किया जाए? वर्तमान में आधे घंटे पहले दर्ज किये गए मामले को भी लंबित/पेंडेंसी में गिन लिया जाता है, जो उचित नहीं है। ऐसा किया जा सकता है कि केवल एक वर्ष से अधिक समय से लंबित मामलों को ही लंबित मामलों की श्रेणी में गिना जाए। यह एक उपयुक्त और यथार्थवादी अंतर उत्पन्न करेगा तथा आँकड़ों को लेकर एक विवेकपूर्ण मूल्यांकन का अवसर प्रदान करेगा। इस बात का प्रायः उल्लेख किया जाता है कि भारतीय न्यायालय छुट्टियों के कारण लंबी अवधि के लिये बंद रहते हैं। इन छुट्टियों की अवधि अलग-अलग न्यायालयों में भिन्न होती है। कार्यदिवसों की संख्या को बढ़ाने से उच्चतम न्यायालय और कुछ उच्च न्यायालयों की उत्पादकता में सुधार लाया जा सकता है, परंतु इससे निचली अदालतों पर कोई खास प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। अधीनस्थ न्यायालयों, जिनमें लंबित मामलों की संख्या काफी अधिक है, में कार्यदिवसों की संख्या सरकारी कार्यालयों के कार्यदिवसों के लगभग समान है। प्रत्येक न्यायाधीश द्वारा मामलों के निपटान का वार्षिक औसत 746 है। इसे एक अच्छा औसत मान सकते हैं, यदि इस तथ्य पर गौर करें कि प्रत्येक सुनवाई (Trial) में साक्ष्य पर विशेष रूप से ध्यान देना भी आवश्यक होता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एक वर्ष में अपेक्षाकृत कम दिन काम करते हैं लेकिन उनके द्वारा मामलों के निपटान का वार्षिक औसत 2,348 है। छुट्टियों में कटौती कर कार्यदिवसों को बढ़ाने से हालाँकि मामलों के निपटान की दर बढ़ाया जा सकता है लेकिन छुट्टियों को कम करके लंबित मामलों की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है, इसके लिये बेहतर ‘केस और कोर्ट प्रबंधन’ (Case and Court Management) महत्त्वपूर्ण है।

न्यायालय प्रबंधन

विश्व बैंक की वर्ष 2018 और 2019 की ‘कारोबार में सुगमता’ रिपोर्टें बताती हैं कि भारत में किसी मामले के निर्णयन में लगने वाला समय औसतन 1,445 दिनों पर स्थिर बना हुआ है। इस रिपोर्ट के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया की गुणवत्ता में मामूली सुधार आया है (वर्ष 2017 के 10.3 से बढ़कर वर्ष 2018 में 10.5)। स्पष्ट है कि भारत में न्यायिक प्रक्रिया में उल्लेखनीय सुधार लाने के लिये भारी निवेश की आवश्यकता है। फास्ट ट्रैक कोर्ट या विशेष अदालतों की स्थापना अथवा न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करना व्यवहार्य समाधान नहीं हैं, बल्कि तदर्थ उपाय भर हैं। किसी मामले की कुल अवधि का लगभग 30 प्रतिशत नोटिस भेजने (Service of Notice) में ही बर्बाद हो जाता है। नोटिस और सम्मन की प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिये एक समाधान के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी ने ‘राष्ट्रीय सेवा और इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाओं की निगरानी (National Service and Tracking of Electronic Processes- NSTEP) नामक एक मोबाइल एप्लीकेशन लॉन्च किया है, लेकिन इसका उपयोग अभी भी सीमित है। सर्वोच्च न्यायालय के ई-प्रोजेक्ट्स के माध्यम से न्यायाधीशों और प्रशासनिक कर्मचारियों को कई अन्य साधन प्रदान किये गए हैं। इसका एकमात्र उद्देश्य वादी के लिये न्याय वितरण को अधिक उत्तरदायी बनाना है। इसकी नवीनतम कड़ी में दिल्ली में एक ‘वर्चुअल कोर्ट’ का शुभारंभ करना शामिल है। किंतु कंप्यूटरीकरण और स्वचालन (Automation) प्रक्रिया का उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों द्वारा पूर्ण और प्रभावी उपयोग नहीं किया जा रहा है।

पेशेवर प्रबंधक की अवधारणा

एक अन्य प्रबंधकीय समाधान के रूप में पेशेवर प्रबंधकों की अवधारणा पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। इस परिप्रेक्ष्य में 13वें वित्त आयोग द्वारा भी सिफारिश की गई है। इस प्रकार के प्रबंधक न्यायालय में न्यायाधीशों के अन्य प्रशासनिक कार्यों में सहायता करने के लिये उपयोगी हो सकते हैं तथा ऐसे प्रबंधक प्रबंधन क्षेत्र में शिक्षित तथा विशेषज्ञता को धारित करते हैं। न्यायालयों में न्यायालय प्रबंधकों (Court Managers) की नियुक्ति किये जाने पर कुछ मुख्य न्यायाधीशों ने न्यायालय प्रबंधन में उनकी संलग्नता को गंभीरता से लिया, जिसके परिणामस्वरूप यह प्रयोग पूर्ण रूप से विफल रहा। न्यायालय प्रबंधक या समकक्ष पेशेवर वर्तमान परिदृश्य में अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं और न्याय वितरण में तभी सुधार आ सकता है जब न्यायालय अपने प्रशासन में पेशेवरों की सहायता स्वीकार करें और उन्हें अपनाएँ।

भारतीय न्यायालयों और अधिकरण सेवाओं की स्थापना

अधिकतर न्यायिक सुधारों का रुझान न्यायाधीशों की गुणवत्ता और उनकी संख्या पर ही विशेष ध्यान देना रहा है, परंतु प्रमुख समस्या न्यायालयों की प्रणाली प्रमुखतः अनुषंगी और अप्रत्यक्ष कार्यप्रणालियों और प्रक्रियाओं के प्रशासन की गुणवत्ता से संबंधित है। राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त और नीति संस्थान द्वारा पेश की गई हालिया रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि कार्यक्षम कार्यप्रणाली के लिये न्यायालयों को सक्षम प्रशासन की अपेक्षा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रक्रियाओं का अनुसरण हो, दस्तावेज़ों का प्रस्तुतीकरण एवं संग्रहण तथा मानव संसाधन का प्रबंधन हो। न्यायालय प्रशासन को न्यायाधीशों के महत्त्वपूर्ण न्यायिक कार्य में सहायता करनी चाहिये। वर्तमान प्रणाली में भारतीय न्यायालयों में प्रशासन की मुख्य ज़िम्मेदारी मुख्य न्यायिक अधिकारी को सौंपी गई है। उसके पास इस कार्य के लिये अत्यधिक कम समय होने के अलावा यह अवधारणा प्रणालीगत सुधारों और प्रशासनिक सुधारों संबंधी संस्थागत ज्ञान के क्रमिक संचय में सहायक नहीं है। इस संदर्भ में भारतीय न्यायालय और अधिकरण सेवा (ICTS) नामक विशिष्ट सेवा का सृजन करने का प्रस्ताव किया गया है जो विधिक प्रणाली के प्रशासनिक पहलूओं पर विशेष ध्यान देती है। ICTS सेवा पहले भी अन्य देशों में न्यायालय प्रबंधन सेवा की दृष्टि से कार्य कर रही है तथा यह ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा आदि में भी मौजूद है। ICTS द्वारा निम्नलिखित कार्य किये जाएंगे-

  • न्यायपालिका के लिये आवश्यक प्रशासनिक सहायक कार्य करना।
  • प्रक्रिया से जुड़ी अक्षमताओं की पहचान करना और न्यायपालिका को विधिक सुधारों के संबंध में सलाह देना।

प्रौद्योगिकी का उपयोग

प्रौद्योगिकी से न्यायालय की क्षमता में काफी सुधार आ सकता है। इस दिशा में ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना एक प्रमुख प्रयास है, जो विधि और न्याय मंत्रालय द्वारा विभिन्न चरणों में क्रियान्वित की जा रही है। इससे राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड (NJDG) का सृजन संभव हो पाया है। यह प्रणाली अधिकतर मामलों, उनकी स्थिति और प्रगति संबंधी सूचना प्रस्तुत करने का सामर्थ्य रखती है। मामलों का डिजिटलीकरण होने से हितधारक व्यष्टिगत मामलों और उनकी बदलती स्थिति का हिसाब रख सकते हैं। अभी यह संभव नहीं है कि इस प्रयास से कार्यक्षमता में हुई बढ़ोतरी का सांख्यिकीय रूप से आकलन किया जा सके, परंतु यह निश्चित रूप से काफी बड़ा भावी कदम है।

निष्कर्ष

बेहतर प्रशासन, कार्यदिवसों की संख्या बढ़ाकर और प्रौद्योगिकी (कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भावी अनुप्रयोगों सहित) के प्रयोग से महत्त्वपूर्ण परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं। सुधारों का सटीक पूर्वानुमान लगाना काफी कठिन है, लेकिन बैकलॉग को समाप्त करने के लिये अपेक्षित कार्यक्षमता का वर्द्धन आवश्यक है। यदि न्यायिक सुधार पर गंभीरता से विचार करें तो शीघ्र व प्रभावी न्याय का स्वप्न सच हो सकता है और न्यायिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने वाले विश्व बैंक तथा अन्य संस्थानों व संगठनों की रिपोर्टों में भारत की स्थिति में सुधार आ सकता है। इस मुद्दे के सामाजिक और आर्थिक महत्त्व को ध्यान में रखते हुए नीति-निर्धारकों द्वारा इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिये।

प्रश्न: आर्थिक सर्वेक्षण में न्यायालय में लंबित मामलों के लिये न्यायालय के कुप्रबंधन को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इस संदर्भ में अपने विचार स्पष्ट कीजिये।

उदारवाद

चर्चा में क्यों?

ओसाका में G-20 की बैठक से ठीक पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक साक्षात्कार में कहा कि वैश्विक स्तर पर उदारवाद का अंत हो रहा है।

उदारवाद की पृष्ठभूमि :

  • उदारवाद एक राजनीतिक और नैतिक दर्शन है जो स्वतंत्रता, शासित की सहमति और कानून के समक्ष समानता पर आधारित है।
  • उदारवाद आमतौर पर सीमित सरकार, व्यक्तिगत अधिकारों (नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों सहित), पूंजीवाद (मुक्त बाज़ार ), लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, लिंग समानता, नस्लीय समानता और अंतर्राष्ट्रीयता का समर्थन करता है।
  • उदारवाद के मुख्यतः तीन पक्ष हैं:
  1. आर्थिक उदारवाद: इसमें मुक्त प्रतिस्पर्द्धा, स्व-विनियमित बाज़ार, न्यूनतम राज्य हस्तक्षेप और वैश्वीकरण इत्यादि विशेषताएँ शामिल हैं।

 

  1. राजनीतिक उदारवाद में प्रगति में विश्वास, मानव की अनिवार्य अच्छाई, व्यक्ति की स्वायत्तता और राजनीतिक तथा नागरिक स्वतंत्रता शामिल है।

 

  1. सामाजिक उदारवाद के अंतर्गत अल्पसंख्यक समूहों के संरक्षण से जुड़े मुद्दे, समलैंगिक विवाह और LGBTQ से संबंधित मुद्दे आते हैं।
  • प्रबोधन काल (Age of Enlightenment) के बाद से पश्चिम में दार्शनिकों और अर्थशास्त्रियों के बीच उदारवाद लोकप्रिय हुआ था।
  • उदारवाद ने वंशानुगत विशेषाधिकार, राज्य धर्म, पूर्ण राजतंत्र, राजाओं के दिव्य अधिकारों जैसे पारंपरिक रूढ़िवादी मानदंडों को प्रतिनिधि लोकतंत्र और कानून के शासन के माध्यम से रूपांतरित करने की मांग की थी।
  • उदारवादियों ने व्यापारिक नीतियों को आसान बनाने, शाही एकाधिकार और व्यापार हेतु अन्य बाधाओं को समाप्त करने की मांग की थी।

उदारवाद का वर्तमान स्वरूप:

  • रूस के अतिरिक्त भारत, चीन, तुर्की, ब्राज़ील, फिलीपींस और यहांँ तक ​​कि यूरोप में भी अब अत्यधिक केंद्रीकृत राजनीतिक प्रणालियांँ प्रचलित हो रही हैं जो उदारवाद की सामान्य विशेषताओं का विरोध कर रही हैं।
  • वर्तमान में इस प्रकार की प्रणालियों के समर्थक मानते हैं कि राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति के लिये उदारवादी लोकतंत्र की तुलना में ये प्रणालियांँ बेहतर तरीके से काम कर रही हैं।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उदारवाद पश्चिम में प्रमुख सामाजिक-राजनीतिक विचारधारा रहा है लेकिन हाल ही में पश्चिम में भी उदारवाद की स्थिति में गिरावट देखी जा रही है।
  • ब्रिटेन में ब्रेक्ज़िट का जनता द्वारा समर्थन, अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों का समर्थन, हंगरी के राष्ट्रपति विक्टर ऑर्बन और पूर्व इतालवी उपप्रधानमंत्री माटेओ साल्विनी की लोकप्रियता यह प्रदर्शित करती है कि पश्चिम के समाज में भी प्रचलित मूल उदारवाद के स्वरूप में अब परिवर्तन आ रहा है।
  • अमेरिका की नई प्रवासी नीतियों के माध्यम से प्रवासियों को अमेरिका में प्रवेश से रोका जा रहा है साथ ही जर्मनी द्वारा शरणार्थियों को स्वीकार करने की नीतियों से गलत परिणाम निकलने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
  • पोलैंड और हंगरी हिंसा एवं युद्ध से भागे शरणार्थियों के प्रवेश के पक्ष में नहीं हैं तथा लगभग सभी यूरोपीय संघ के सदस्यों का मानना है कि यूरोपीय संघ में शरणार्थियों के प्रवेश से यूरोप के पूर्ण एकीकरण की योजना बुरी तरह प्रभावित होगी।
  • समलैंगिक विवाह को केवल कुछ देशों द्वारा ही मान्यता दी जा रही है, दूसरी ओर समलैंगिकता हेतु कई देशों में मौत की सज़ा का प्रावधान है। LGBTQ (Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, QUEER) के अधिकारों में बहुत धीमी प्रगति देखी जा रही है, जबकि अब यह सिद्ध हो चुका है कि इस प्रकार के लोगों की शारीरिक संरचना प्रकृति द्वारा निर्धारित होती है।
  • कई देशों द्वारा पर्यावरण हित के विरुद्ध नीतियाँ बनाई जा रही हैं इसमें स्वयं के संकीर्ण हितों को वैश्विक जलवायु परिवर्तन से ज़्यादा प्राथमिकता दी जा रही है। हाल ही में ब्राज़ील के वनों में लगी आग हेतु सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है।
  • पर्यावरण संबंधी अभिसमयों की प्रकृति गैर-बाध्यकारी होने के कारण कई देश इस प्रकार के अभिसमयों से अलग होते जा रहे हैं। पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका का अलग होना संरक्षणवादी नीतियों को प्रदर्शित करता है।

वर्तमान समय में उदारवाद में गिरावट के कारण:

  • वर्ष 1991 में साम्यवाद के पतन के समय उदारवाद का प्रभाव अपने चरम पर पहुंँच गया था। इस समय तक उदारवाद की सफलता निर्विवाद रही थी और भविष्य में भी उदारवाद का कोई ठोस विकल्प नहीं दिखाई दे रहा था।
  • वर्ष 2008-2009 के वित्तीय संकट ने उदारवादी आर्थिक व्यवस्था को चुनौती दी, उस समय अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं के पास इस संकट का कोई भी समाधान नहीं था। उस समय की आर्थिक विकास दर मात्र 1% से 2% तक रह गई थी। इस आर्थिक संकट से उबरने में विश्व को काफी समय लग गया।
  • उदारवादी व्यवस्था दो स्तंभों पर टिकी हुई है- एक स्तंभ व्यक्ति की स्वतंत्रता है (उदारवादी इस सिद्धांत को अपना सर्वोच्च मूल्य मानते हैं) और दूसरा स्तंभ आर्थिक विकास तथा सामाजिक प्रगति हेतु प्रतिबद्धता है।
  • उदारवाद में इन दोनों स्तंभों को एक-दूसरे से संबंधित माना जाता है। वर्तमान विश्व की सबसे बड़ी समस्या यही है कि इस व्यवस्था के मूल सिद्धांत वैध नहीं रह गए हैं, वैश्विक आर्थिक विकास की प्रकृति प्रगतिशील तो है लेकिन समाज में समावेशी विकास का अभाव दिख रहा है। उदाहरणस्वरूप प्रति व्यक्ति आय तो बढ़ रही है लेकिन गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की प्रभावशीलता पर्याप्त नहीं है।
  • इस प्रकार की स्थितियों के मद्देनज़र विश्व द्विपक्षीय और गुटबाज़ी में फँसता जा रहा है। यूरोपीय संघ, अफ्रीका समूह, आसियान जैसे समूह कहीं-न-कहीं उदारवाद के मूल को क्षति पहुँचा रहे हैं।
  • शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ की शक्ति को संतुलित करने के लिये बनाए गए नाटो जैसे संगठन की वर्तमान प्रासंगिकता समझ से परे है। शायद इस प्रकार के संगठन केवल क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि इस प्रकार के संगठनों का कोई निश्चित ध्येय तक नहीं निर्धारित किया गया है।
  • आज उदारवाद अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहा है क्योंकि पुनर्जीवित राष्ट्रवाद इसके सम्मुख एक स्थायी खतरा उत्पन्न कर रहा है। इसी राष्ट्रवाद के स्वरूप में विभिन्न देशों में कट्टरपंथ का उदय हो रहा है। इस प्रकार के विचारों से घिरी सरकारें अपने देश को संधारणीय और वैश्विक हितों को नज़रअंदाज़ करते हुए प्राथमिकता देने वाली नीतियों का निर्माण कर रहे हैं।
  • उदारीकरण के बाद बहु-राष्ट्रीय कंपनियों द्वारा कंप्यूटर, रोबोट और सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग स्थानीय रोज़गार को प्रभावित कर रहा है, इस कारण से स्थानीय उद्योगों और संस्थाओं द्वारा उदारीकरण का विरोध किया जा रहा है।

आगे की राह:

  • कई उदार अर्थशास्त्रियों और पर्यावरणविदों के अनुसार, पृथ्वी के संसाधनों की सीमित क्षमता है और यह लगातार बढ़ती मानव आबादी तथा उनकी बढ़ती ज़रूरतों को समायोजित नहीं कर सकती है।
  • प्रकृति हमारी सभ्यता के वर्तमान विकास को बनाए नहीं रख सकती है और इसलिये सरकार की नीतियों में परिवर्तन आवश्यक है। अतः भौतिक चीज़ो का पीछा करने के बजाय एक खुशहाल और संतुष्ट जीवन जीने का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिये।
  • समावेशी नीतियों के निर्माण के साथ ही इनके क्रियान्वयन हेतु मानक स्थापित किये जाएँ साथ ही उदारवाद के मुख्य सिद्धांत सामाजिक कल्याण का गंभीरता से पालन किया जाए।
  • उदारवाद के अभिजात्यकरण को सीमित किया जाए क्योंकि इस प्रकार की स्थिति में सैधांतिक रूप से उदारवाद प्रगतिशील प्रतीत हो रहा है लेकिन व्यावहारिक रूप से वह काफी पिछड़ा हुआ है।
  • उदारीकरण को बढ़ाया जाना चाहिये जिससे सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों का समावेशी विकास किया जा सके।

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