Contemporary issues For IAS 2018 किसानों की आय को दोगुना कैसे करें?

आज के दौर में कृषि को एक बड़े उद्योग के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के देश कृषि के क्षेत्र में आयात कम करके निर्यात बढ़ाने के लिए उच्चतम तकनीकों का प्रयोग कर रहे हैं। चीन ने भी अमेरिका एवं ओशेनिया देशों से खाद्य पदार्थों के आयात को कम करने के लिए प्रस्तावित ‘नए सिल्क मार्ग’ के आसपास की बहुत सी भूमि को कृषि के लिए बचा रखा है। संयुक्त राष्ट्र ने भविष्यवाणी की है कि 2030 तक अधिकांश विकासशील देश कृषि ऊपज के लिए विकसित देशों पर निर्भर हो जाएंगे। इन सबके बीच भारत की स्थिति को जाँचना-परखना आवश्यक हो जाता है।

वर्तमान में भारतीय कृषि उत्पादकता और गुणवत्ता की कमी के साथ बढ़ते आयात से जूझ रही है। इन समस्याओं के निदान के लिए हमें पहले इनके कारणों को समझना होगा।

देश की लगभग 60 प्रतिशत सिंचाई वर्षा जल से होती है। 2014-15 के सूखे ने कृषि में होने वाली आय को कम कर दिया।
अधिकतर खेत एक एकड़ से कम के हैं। आकार में छोटे होने की वजह से मशीनी काम करना कठिन है।
अधिकतर किसान गरीब हैं। उनके पास अच्छे बीज और विशेषज्ञों की सलाह लेने के लिए पर्याप्त धन नहीं होता।
अब गुणवत्ता को बहुत महत्व दिया जाता है। इसके लिए मानक भी तय किए गए हैं। किसान के लिए यह संभव नहीं है कि वह सस्ते और ताजे उत्पाद को यूँ ही बेचकर अपनी आय बढ़ा ले। अधिकांश देशों के खाद्य सुरक्षा एवं गुणवत्ता विभागों को मानकों पर खरे उतरने वाले खाद्य पदार्थ स्वीकृत होते हैं। इसका अर्थ है कि ऊपज के स्टोरेज, पैकेज और परिवहन के स्तरों का बाकायदा रिकार्ड रखा जाना आवश्यक है। हमारे देश में अंगूर और केले की फसल विश्व का 4 प्रतिशत और 30 प्रतिशत है परन्तु हम मात्र 1.6 प्रतिशत एवं 0.4 प्रतिशत ही निर्यात कर पाते हैं।
पिछले 20 वर्षों में कृषि ऊपज के निर्यात की तुलना में आयात छः गुना बढ़ गया है। इनमें खाद्य तेल, दालें, सेव, कीवी, काजू तथा बादाम शामिल हैं। इन पदार्थों का उत्पादन आसानी से अपने देश में ही किया जा सकता है।
कृषि क्षेत्र में आयात को कम करने और कृषकों की आय बढ़ाने के लिए कुछ कदम उठाने होंगेः-

अनुबंधित कृषि (कान्ट्रेक्ट फार्मिंग) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। भारत का बहुत सा निर्यात कार्पोरेट फार्मिंग वेन्चर के द्वारा सम्पन्न होता है। इसके अंतर्गत किसानों से समझौते या अनुबंध के द्वारा भूमि लेकर उन्हें उसका किराया एवं लाभ का कुछ प्रतिशत दे दिया जाता है। या फिर ये कार्पोरेट समूह किसानों को कृषि के लिए सामग्री आवंटित करते हैं, सलाह देते हैं, पैदावार का निरीक्षण करते हैं, और उसे खरीद लेते हैं। ये समूह नई तकनीक एवं ज्ञान के द्वारा एकीकृत सप्लाई चेन बना लेते हैं। अनुसंबंधित कृषि बहुत आसान नहीं है। दशकों से इनका चलन होने के बावजूद मात्र 3 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि पर ही काम कर रहे हैं। लैण्ड पूलिंग कानून, भू- दस्तावेजों का ऑनलाइन प्रमाणीकरण, विवाद सुलझाने के लिए उचित प्रक्रिया आदि कुछ ऐसे मसले हैं, जिन पर काम करके अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाया जा सकता है।
देश के 10 श्रेष्ठ कृषि विश्वविद्यालयों को उत्कृष्ट बनाना होगा। ये संस्थान क्षेत्रीय मौसम के अनुकूल कृषि योजना बनाएं, किसानों को समय-समय पर सलाह दें, एकीकृत सप्लाई चेन के निर्माण में योगदान दें, और निर्यात को बढ़ाने का प्रयत्न करें।
प्रत्येक उप जिले में किसान केन्द्र बनाए जाएं। यह किसानों की कृषि संबंधी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऑल-इन-वन का काम करे। बैंक, इंश्योरेंस कंपनी, बीज, उपकरण एवं खरीददार आदि सभी के लिए एक ही केन्द्र हो। इन केन्द्रों को इलैक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-नाम) से जोड़ा जाए। इनमें से हर केन्द्र में पानी, मिट्टी और पोषक तत्वों की जाँच की मुफ्त सुविधा उपलब्ध हो।
सरकारी योजनाओं की निगरानी के काम में सक्रियता लानी होगी। पिछली खरीफ फसल के दौरान फसल बीमा योजना में पंजीकृत किसानों को बहुत विलंब से बीमे की राशि मिली थी। कुछ राज्यों ने प्रीमियम की राशि का भुगतान बहुत देर से किया।ई-नाम में भी धांधली को रोका जाए। बहुत सी मंडियां सामान्य बिक्री को ई-नाम के अंतर्गत दिखा रही हैं।
ड्रिप एवं स्प्रिकंलर सिंचाई प्रणाली में निधि को बढ़ाना होगा। माइक्रो-सिंचाई की ये तकनीकें बहुत कम पानी लेती हैं। नहरों और फ्लड सिंचाई प्रणाली में बहुत अधिक पानी और धन की बर्बादी होती है। अमेरिका और ईजरायल जैसे देश भी माइक्रो सिंचाई प्रणाली का उपयोग करते हैं।
कृषि क्षेत्र के विस्तार से लगभग 70 करोड़ भारतवासियों का जीवन बदल सकता है। ऐसा होने पर राष्ट्र-निर्माण के स्वरूप में भी आमूलचूल परिवर्तन लाया जा सकता है।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित अजय श्रीवास्तव के लेख पर आधारित।