Contemporary issues For IAS Date-26/11/2017

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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद विस्तार के प्रति भारत का रुख क्या हो?

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की स्थायी प्रतिनिधि मिकी हेली के हाल ही के कुछ बयानों से स्पष्ट होता है कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के विस्तार के साथ ही भारत को बिना वीटो के उसका स्थायी सदस्य बनाने के पक्ष में है। वहीं भारतीय सूत्रों का कहना है कि भारत को सुरक्षा परिषद् के अन्य सदस्यों की तरह ही उत्तरदायित्व एवं विशेषाधिकार दिए जाने चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें, तो भारत अपनी सदस्यता वीटो के साथ चाहता है। ऐसा रवैया अपनाने से पहले भारत को यह याद रखना चाहिए कि जी-फोर के अन्य देश जापान, ब्राजील एवं जर्मनी ने भी वीटो को कोई मुद्दा न बनाते हुए सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता ग्रहण की है।

विस्तार के मॉडल

सन् 2005 में तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता को बढ़ाकर 24 करने के लिए ‘इन लार्जर फ्रीडम’ नामक एक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें उन्होंने विस्तार के दो मॉडल प्रस्तावित किए थे।

मॉडल ए – उन्होंने छः नए स्थायी सदस्य एवं तीन नए अस्थायी सदस्यों को बढ़ाने की बात कही थी। ये तीन अस्थायी सदस्य प्रमुख क्षेत्रों से चुने जाने थे।

मॉडल बी – सदस्यों की एक नई श्रेणी के रूप में 8 नए सदस्य बनाने की बात कही गई, जिनका कार्यकाल चार वर्ष हो। इनके दोबारा चुने जाने का प्रावधान हो। इसके साथ ही एक सीट अस्थायी सदस्य के लिए रखी जाए।

अमेरिका की भूमिका

2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान उन्होंने सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता में विस्तार की आशा करते हुए भारत को उसमें शामिल किए जाने की बात कही थी। परन्तु संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी शिष्ट मंडल ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की। अतः भारत की स्थायी सदस्यता की बात ज्यों की त्यों रह गई।

दो वर्ष पूर्व संयुक्त राष्ट्र सदस्यों के विचारों के प्रकाशन में यह बात उजागर हुई कि अमेरिका सुरक्षा परिषद् का संक्षिप्त विस्तार चाहता है। वह सदस्यता में विस्तार के साथ वीटो दिए जाने का पक्षधर नहीं है। यू.के. और फ्रांस की तरह अमेरिका ने तब भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन भी नहीं किया था।

अन्य देशों की भूमिका

अभी तक फ्रांस ने भारत को वीटो के साथ स्थायी सदस्यता दिए जाने का सबसे अधिक समर्थन किया है। यू.के. ने जी-फोर देशों का बिना वीटो के समर्थन किया है। भारत के पुराने मित्र रूस ने किसी प्रकार की रुचि  नहीं दिखाई एवं चीन ने कहा कि इस विषय पर बातचीत के लिए अभी समय नहीं आया है।

भविष्य

निकी हेली के वक्तव्यों ने बिना वीटो के भारत की स्थायी सदस्यता का रास्ता खोल दिया है। परन्तु सदस्यों के बीच आए एक मसौदे से यह भी स्पष्ट होता है कि अभी सदस्य देशों में से किसी को भी पन्द्रह वर्ष तक वीटो मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। जी-फोर एवं अमेरिका के बीच एक संधि-बिन्दु भी दिखाई दे रहा है। परन्तु ऐसा भी लग रहा है कि अमेरिका की यह चाल भारतीय-अमेरिकियों का उपयोग करने के लिए चली गई हो।

कुछ भी हो, फिलहाल भारत को अमेरिका के समर्थन के प्रति सकारात्मक रहना चाहिए। और कुछ नहीं, तो बातचीत के रास्ते खुले रहेंगे और हो सकता है कि सुरक्षा परिषद् सुधार में कोई नया रास्ता निकाला जाए।

द हिन्दू’ में प्रकाशित टी.पी. श्रीनिवासन् के लेख पर आधारित।

रोजगार की दिशा में तीन कदम

देश में बेरोजगारी की समस्या कोई नई नहीं है। परन्तु वर्तमान सरकार ने सत्ता में आने से पूर्व जिस प्रकार से रोजगार के अवसरों की भरमार लगाने का वायदा किया था, उससे उलट औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों में काफी गिरावट देखने में आ रही है।देश के सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता से कम वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों को मिलाकर ‘अतिरिक्त कर्मचारियों’ की संख्या लगभग 5 करोड़ है। इसमें उन महिलाओं की गिनती नहीं की गई है, जिन्हें काम के बीच में से निकाल दिया जाता है।रोजगार क अवसरों में वृद्धि के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश, शिक्षा में निवेश, लघु एवं मझोले उद्यमों को बढ़ावा देने जैसे कई विकल्प सुझाए जाते रहे हैं। तीन विकल्प ऐसे हैं, जिन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।

·         वेतन सब्सिडी की नीति – वर्तमान में केन्द्र एवं राज्य स्तरों पर जितनी भी सब्सिडी दी जाती है। सभी पूंजी के रूप में दी जाती हैं-चाहे वह ब्याज पर हो या ऋण पर हो। हमारे सकल घरेलू उत्पाद में सब्सिडी का हिस्सा लगभग 5 प्रतिशत है। ये सब्सिडी पूंजी आधारित उत्पादन के तरीकों को बढ़ावा देती है। इसमें परिवर्तन करके इसे वेतन आधारित बनाया जा सकता है। यानी कोई भी उद्यमी जितनी अधिक नौकरियाँ देगा, उसे उतनी अधिक सब्सिडी मिलेगी।

झूठी नौकरियों को रोकने के लिए बायोमिट्रिक पहचान का सहारा लिया जा सकता है।

·         कौशल विकास – कौशल विकास का वर्तमान कार्यक्रम अधिक गति नहीं पकड़ पाया है। कौशल विकास मंत्रालय ने भी 30 करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने के अपने लक्ष्य को त्याग दिया है। जुलाई 2017 तक जिन 30 लाख लोगों ने किसी प्रकार का व्यावसायिक प्रशिक्षण लिया है, उनमें से 10 प्रतिशत से भी कम को रोजगार प्राप्त हुआ है।

·         इस क्षेत्र में हमें स्थानीय व्यवसायियों को जर्मन मॉडल की तरह काम करने को तैयार करना होगा। जर्मनी में विश्व का सफलतम व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया गया है। इस मॉडल में जर्मनी के व्यवसायी कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए काफी धन खर्च करते हैं। इससे उन्हें प्रशिक्षु के रूप में ही बहुत अच्छे कर्मचारी मिल जाते हैं। किसी भी स्थिति में रोजगार की गारंटी के बिना व्यावसायिक प्रशिक्षण देना व्यावहारिक नहीं है।

·         तीसरा मार्ग कृषि क्षेत्र से संबंधित है। आज की युवा पीढ़ी अपने पारंपरिक कृषि व्यवसाय से बाहर निकलने को आतुर है। दरअसल, इस व्यवसाय को अधिक उत्पादक एवं अधिक आय वाला बनाने की आवश्यकता है। अनाज की फसल से अधिक लाभ फल, सब्जी एवं पशुपालन में है। ये उद्यम भी रोजगार के कई अवसर देते हैं। परन्तु इस क्षेत्र को अधिक उत्पादक एवं रोजगारोन्मुख बनाने के लिए कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रीजरेटेड परिवहन की संख्या को बढ़ाना होगा।

बाजारों को भी व्यवस्थित करना होगा।

हमारे देश में कृषि बाजारों की व्यवस्था बहुत लचर रही है। खेत से सीधे दुकान पर उत्पाद की पहुँच बनाई जानी चाहिए। इससे मध्यस्थों से छुटकारा मिलेगा।

हमारे यहाँ के खेत बहुत छोटे-छोटे हैं। इन्हें मिलाकर बड़ी फार्मिंग कंपनी या अमूल की तर्ज पर को-आपरेटिव बनाए जा सकते हैं। इस माध्यम से विपणन एवं वितरण की सुविधा हो जाएगी। इसी तरीके से कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाया जा सकेगा।इन तरीकों पर अमल करके बेरोजगारी को विस्फोटक स्थिति तक पहुँचने से बचाया जा सकता है।

 टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित प्रणव वर्धन के लेख पर आधारित।

स्वच्छ राजनीति अभियान

राजनीति में अपराधीकरण का मामला कोई नया नहीं है। चुनाव सुधार के संबंध में जितनी भी बातें उठाई जाती हैं, उनमें चयनित उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड का भी मुद्दा उठाया जाता रहा है। दस मार्च, 2014 में उच्चतम न्यायालय ने इससे संबंधित एक आदेश भी दिया था, जिसमें चुनावों के उम्मीदवारों को अपराधी ठहराए जाने के बाद अयोग्य घोषित किया जाए या केवल चार्जशीट दाखिल होने के आधार पर अपराधी माना जाए, इसको लंबी बहस के लिए टाल दिया गया था।

तत्कालीन न्यायाधीश आर.एम.लोधा ने भारत की राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिए एक मशाल जलाई थी। अब इस मशाल का अपने हाथ में लेते हुए न्यायाधीश गोगोई एवं सिन्हा ने एक नवम्बर, 2017 को यह मुद्दा फिर से उठाया है। उन्होंने यह बताए जाने की मांग की है कि सांसदों एवं विधायकों की आपराधिक पृष्ठभूमि के 1,581 मामलों में से कितने मामले एक वर्ष में निपटाए गए एवं इनमें से कितनों को सजा हुई। केन्द्र सरकार ने इसका उत्तर देने हेतु छः सप्ताह की मांग की है।

वर्तमान स्थिति

लोकसभा के 542 सदस्यों में से 112 सदस्यों (21 प्रतिशत) ने स्वयं ही अपने विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामलों की बात ऊजागर की है। कल्पना कीजिए कि यही वे लोग हैं, जो हमारे लिए कानून बनाते हैं। आपराधिक पृष्ठभूमि से आने वाले सांसद एवं विधायक भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देते हैं। इस प्रकार वे नौकरशाही एवं पुलिस को भी दूषित कर देते हैं। टेंडर से लेकर भवनों की सुरक्षा या नियुक्तियों के मामले में भ्रष्टाचार का कारण राजनीति नैतिकता में पतन ही होता है।

 संवैधानिक प्रावधान

संविधान के अनुच्छेद 14ए के अनुसार राजनेताओं को विशिष्ट वर्ग में रखा जाता है, और उनका शीघ्र ट्रायल प्रजातांत्रिक आवश्यकता है। उनके लिए विशिष्ट न्यायालयों के निर्माण हेतु उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की पुनर्नियुक्ति की जा सकती है। तदर्थ नियुक्तियाँ भी की जा सकती हैं।

क्या संभव है?

राजनीतिज्ञों के आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटाने के दो तरीके हो सकते हैं। (1) एक तो इनके अभियोक्ता ऐसे चुने जाएं, जो किसी राजनैतिक दल से संबंद्ध न हों। एक अभियोजन निदेशालय की स्थापना की जाए, जिसका प्रमुख कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश हो। (2) ऐसा देखा गया है कि ट्रायल के दौरान राजनेता अंतरिम आदेशों का सहारा लेकर बार-बार ट्रायल में अवरोध पैदा करते हैं। ऐसी स्थिति में उच्च एवं उच्चतम न्यायालय भी असहाय हो जाते हैं। इसे रोकने की कोशिश करनी होगी। अगर मुख्य न्यायाधीश मिशन को पूरा करने की ठान लेंगे, तो वे रास्ता निकाल ही लेंगे।

इस समस्त प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए बुनियादी ढांचे और स्टाफ की जरूरत होगी। इसके लिए धन चाहिए। जो सरकार बैंक बैंलेंस शीट की सफाई क लिए 2.11 लाख करोड़ रुपए लगा सकती है, वह राजनीति की बैलेंसशीट की सफाई के लिए भी धन लगा सकती है। अगर ऐसा नहीं हो पाता, तो सरकार को एक ‘स्वच्छ राजनीति भारत बॉन्ड’ नामक कोष बना देना चाहिए। उम्मीद है कि देश के जागरूक नागरिक राजनीति की स्वच्छता के लिए इसमें खुलकर दान करेंगे।

द हिन्दू’ में प्रकाशित श्रीराम पंचू के लेख पर आधारित।

रूस की अक्टूबर क्रांति

1917 में हुई रूस की अक्टूबर क्रांति की चर्चा के बिना 20वीं शताब्दी का इतिहास लिखा नहीं जा सकता। 7 नवम्बर को रूसी समाजवादी क्रांति की शताब्दी पूर्ण हुई। एक देश के लिए यह ऐसी कहानी है, जिसने उसे बहुत ही कम समय में एक गरीब कृषि प्रधान देश से सैनिक और औद्योगिक ताकत बना दिया। इसे रूसी लोगों के साहस, त्याग और पीड़ा की कथा भी कहा जा सकता है। क्रांति के इस शताब्दी वर्ष में ऐसे भी कई विद्वान हैं, जो इसे विफल मानते हुए, उस दृष्टिकोण से इसका अध्ययन करना चाहते हैं। परन्तु तथ्य कुछ और ही बयां करते हैं।

अक्टूबर क्रांति का विचार इतना शक्तिशाली था कि इसने विश्व के अधिकांश दमित लोगों के दिलों को छू लिया। शोषण एवं गुलामी से मानव मात्र को स्वतंत्र करना ही क्रांति का मुख्य लक्ष्य था। इसने ऐसे पूंजीवाद को नकारकर समाजवाद की स्थापना की, जिसमें एक मानव दूसरे का शोषण करता है। इस क्रांति ने प्रकृति और मानव के बीच के संबंध को सद्भावपूर्ण बनाया एवं हर व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक सोपान के लिए तैयार कर दिया।अक्टूबर क्रांति ने पूरे विश्व के ऐतिहासिक एवं वैचारिक परिदृश्य को ही बदलकर रख दिया। इसने न केवल जार के शासन को परिवर्तित किया, बल्कि समस्त विश्व पर दूरगामी प्रभाव डाला।

·         अक्टूबर क्रांति का एशिया एवं भारत पर प्रभाव

समस्त विश्व के स्वतंत्रता आंदोलनों पर क्रांति का व्यापक प्रभाव पड़ा। इसमें भारत भी शामिल था। भारतीय स्थितियों में आज भी इसका उतना ही प्रभाव है। वर्तमान के समाजवादी एवं माक्र्सवादी दल इसका उदाहरण हैं। हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के प्रणेताओं ने भी रूसी क्रांति के विचारों का समर्थन किया था।अक्टूबर क्रांति के नेता लेनिन ने एशियाई देशों के समाजवादियों से अपील की थी कि वे अपने देश के अनुभवों एवं जरूरतों के अनुसार क्रांति की नई विचारधारा बनाएं। यद्यपि रूसी समाजवादी अतिवादी थे, लेकिन उन्होंने बाकी देशों को रूसी क्रांति की नकल न करने की ही सलाह दी। ‘‘काँक्रीट एनालिसिस ऑफ़ काँक्रीट कंडीशन्स’’ (ठोस परिस्थितियों का यथार्थपूर्ण विवेचन), यही लेनिन के द्वंद्ववाद की परिभाषा थी।

दरअसल, एशियाई देशों की परिस्थितियाँ काफी जटिल रही हैं। इसकी सामाजिक-आर्थिक संरचना की ऐतिहासिक परंपरा है। माक्र्स ने भी कहा था कि एशिया के सामाजिक एवं आर्थिक संबंध एक- दूसरे पर आरोपित हैं। माक्र्स ने इसे ‘‘एशियाटिक मोड ऑफ़ प्रोडक्शन’’ का नाम दिया था। लेनिन ने इन देशों के माक्र्सवादियों को अपने यहाँ की स्थितियों का विवेचन करके रणनीति बनाने को कहा था। भारत में जातिभेद और लिंगभेद जैसी जटिल संरचना रही है।

लेनिन के साम्राज्यवाद के विचार ने भी एशियाई देशों के समाज को समझने में सहयोग दिया। पूर्वी देशों में पूंजीवाद का स्वरूप जटिल है। पूंजीवाद की पश्चिमी अवधारणा पूर्वी देशा में विध्वंसक साबित हो रही है। इसने इन देशों की जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधनों, आदिवासियों, कृषकों एवं पर्यावरण के लिए संवेदनशील तंत्र को नष्ट कर दिया है। पूंजीवाद पर आधारित विकास का नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। वायु, जल एवं भूमि प्रदूषण ने किसानों को कंगाल कर दिया है। यही कारण है कि वे आत्महत्या करने को मजबूर हो गए हैं। रासायनिक खाद के अत्याधिक प्रयोग से खाद्यान्न, दूध, सब्जी का दूषित होना प्राणघातक बीमारियाँ तथा आए दिन होने वाले सड़क हादसे भी अन्य ऐसे ही उदाहरण हैं, जो भारत में पूंजीवादी विकास का नमूना पेश करते हैं।

पूंजीवादी-साम्राज्यवादी विकास का ही नया नाम नवउदारवाद है। इसने समाज में बहुत अधिक असमानता उत्पन्न कर दी है। सामाजिक मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। अपनी राजनीतिक शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए सत्ताधारी दक्षिणपंथी वर्ग और  अधिक फासीवादी होता जा रहा है, और वह प्रजातंत्र तथा उससे संबंद्ध संसद जैसी प्रजातांत्रिक संस्थाओं में सेंध लगा रहा है।अक्टूबर क्रांति  पूर्वी देशों में पूंजीवाद को बेहतर समझने में हमारी मदद कर सकती है। भारत में धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र, सामाजिक न्याय एवं समाजवाद की रक्षा के लिए सभी शोषित एवं दमित वर्गों को एकजुट होना होगा। यह अनिवार्य हो गया है कि भारतीय परिस्थितियों में समाजवादी माक्र्सवाद को वैज्ञानिक विचारधारा के रूप में सामने रखें। अभी मानवता को कई अक्टूबर क्रांतियों की आवश्यकता है।

 इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित डीराजा के लेख पर आधारित।

स्कूली शिक्षा में जवाबदेही

स्कूली शिक्षा में जवाबदेही तय करने के लिए अक्सर विद्यार्थियों के परीक्षा के अंकों को मापदंड बनाया जाता है। इसके आधार पर शिक्षकों को जिम्मेदार भी ठहराया जाता है। परन्तु क्या शिक्षा प्रणाली के मूल्यांकन का यह आधार उपयुक्त ठहराया जा सकता है? क्या विद्यार्थियों के कम अंकों के लिए केवल शिक्षकों को ही दोषी ठहराया जाना चाहिए?

संयुक्त राष्ट्र के धारणीय विकास लक्ष्य 4 में शिक्षा की गुणवत्ता के स्तर में सुधार हेतु जवाबदेही तय करने के लिए यूनेस्को न्यू ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2017 में कहा गया है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए केवल शिक्षक जिम्मेदार नहीं हैं। सरकार, स्कूल, शिक्षक, अभिभावक, समाज, मीडिया, अंतरराष्ट्रीय संगठन और निजी क्षेत्र आदि सभी इसके लिए जिम्मेदार हैं।

शिक्षा प्रणाली की जटिल कड़ी में शिक्षक तो मात्र एक ईकाइ है। अतः विद्यार्थियों के अंक कम आने या उनकी अनुपस्थिति के लिए किसी भी प्रकार से उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। इस आधार पर अगर शिक्षकों को दंडित किया जाए, तो इसके परिणाम बहुत नकारात्मक होंगे। एक तो शिक्षक केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने की दृष्टि से ही पढ़ाएंगे। ज्ञान देने और ज्ञानार्जन की प्रक्रिया को वैसे भी परीक्षा के अंकों में बांध देना कोई सही तरीका नहीं है। इससे कमजोर विद्यार्थी बहुत ही पीछे छूट जाते हैं। कुशाग्र विद्यार्थियों का भी दृष्टिकोण व्यापक नहीं हो पाता।

शिक्षकों की अनुपस्थिति को गुणवत्ता से जुड़ा दूसरा कारण माना जाता है। अजिम प्रेमजी फांऊडेशन ने 619 स्कूलों का सर्वेक्षण किया। इनमें लगभग 18.5 प्रतिशत शिक्षक अनुपस्थित पाए गए। इनमें से कुछ तो सरकारी ड्यूटी पर कहीं गए हुए थे, या फिर सही कारण से छुट्टी पर थे। अगर कामचोरी की दृष्टि स देखें, तो मात्र 2.5 प्रतिशत शिक्षक ही अनुपस्थित थे।

शिक्षकों की कमी एक बड़ी समस्या है। यही वह समय है, जब हम शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही के लिए उसके प्रत्येक हितधारक को जिम्मेदार ठहराएं और सकारात्मक प्रयास करें।

द हिन्दू’ में प्रकाशित उमा महादेवन-दासगुप्ता के लेख पर आधारित।