CURRENT FOR UPSC 06-02-2018

राजकोषीय सुधार पथ पर वापसी के हों उपाय
वर्ष 2017-18 का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.5 फीसदी के बराबर रहा। यह गत वर्ष बजट में उल्लिखित स्तर से 0.3 फीसदी तक ज्यादा है।
रथिन रॉय, (लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी के निदेशक हैं।)

सरकार वर्ष 2017-18 के लिए राजकोषीय घाटे के तय लक्ष्य पर कायम नहीं रह सकी। यह अप्रत्याशित नहीं था। इस राजकोषीय फिसलन में बॉन्ड बाजार कारक रहा और बीते चार महीनों में बॉन्ड प्रतिफल में 110 आधार अंकों की बढ़ोतरी हुई है। बजट प्रस्तुत होने के बाद राजकोषीय फिसलन के बावजूद बॉन्ड प्रतिफल में मामूली बढ़ोतरी ही देखने को मिली। यानी राजकोषीय फिसलन उतनी नहीं थी जितनी कि बाजार को आशंका थी। मैं इस फिसलन की वजह का विश्लेषण करने का प्रयास करूंगा। वर्ष 2017-18 के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.5 फीसदी के बराबर रहा यानी गत वर्ष प्रस्तुत बजट में किए गए उल्लेख से 0.3 फीसदी अधिक। जबकि राजस्व घाटा जीडीपी के 2.6 फीसदी के बराबर रहा जो पिछले साल 1.9 फीसदी था। राजस्व घाटे में हुई बढ़ोतरी के चलते ही राजकोषीय घाटा बढ़ा। वर्ष 2017-18 के बजट अनुमान में इनके बीच का अनुपात 58.76 फीसदी था जबकि इस बजट में उल्लिखित संशोधित अनुमान में यह 73.78 फीसदी हो गया।

केंद्र सरकार को इस अनुपात को लेकर लंबे समय तक ढांचागत समस्याओं का सामना करना पड़ा है। वर्ष 1981-82 में यह केवल 4.5 फीसदी था और वर्ष 2012-13 तक यह बढ़कर 74.3 फीसदी पर जा पहुंचा। इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वर्ष 2016-17 में वह इसे 59 फीसदी पर लाने में कामयाब रही। यह बात ज्यादा चिंतित करने वाली है। आखिर राजस्व घाटे में इजाफा क्यों हुआ? वर्ष 2017 के बजट अनुमान में उल्लिखित वृहद-राजकोषीय जानकारी की तुलना कल दी गई जानकारी से करें तो कुल व्यय जीडीपी के उल्लिखित 0.47 फीसदी से अधिक है। राजस्व व्यय जीडीपी के संदर्भ में 0.68 फीसदी ज्यादा है और पूंजीगत व्यय करीब 0.21 फीसदी कम है। राजस्व के मोर्चे पर कर राजस्व जीडीपी के 0.28 फीसदी के साथ पिछले बजट में जताए गए अनुमान से अधिक है। गैर कर राजस्व में अनुमान की तुलना में गिरावट आई है। दोनों मिलकर एक दूसरे के प्रभाव को खत्म करते हैं। इसके बावजूद व्यय वृद्धि के अनुमान से ज्यादा रहने की समस्या है, न कि कम राजस्व की। इसके चलते भी राजकोषीय घाटे का स्तर बढ़ा है।

आखिर राजस्व व्यय में इजाफा क्यों हुआ? अगर हम अलग-अलग घटक पर नजर डालें और संशोधित अनुमानों में उतार-चढ़ाव पर दृष्टि डालें तो राजस्व व्यय 1.07 लाख करोड़ रुपये ज्यादा है। अन्य हस्तांतरण में व्यय 60,000 करोड़ रुपये की राशि राज्यों को चुकाई गई जीएसटी क्षतिपूर्ति के बराबर है। इसने भी घाटा बढऩे में भूमिका निभाई है। यह कहा जा सकता है कि गत वर्ष राजकोषीय लक्ष्य हासिल करने की कमजोर प्रक्रिया में यह नजर भी आया। परंतु यह भी मानना होगा कि जीएसटी पर सहमति हासिल करने की प्रक्रिया विचलन भरी रही। बाकी लोगों की बात करें तो प्रतिष्ठानिक व्यय इसलिए ज्यादा रहा क्योंकि पेंशन व्यय बढ़ा और रक्षा राजस्व व्यय तथा ब्याज भुगतान में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। ऐसे में गैर विकास राजस्व व्यय के चलते भी राजस्व घाटा बढ़ा।राजस्व के मोर्चे पर आय कर संग्रह एकदम लक्ष्य के बराबर नजर आता है और कॉर्पोरेट कर संग्रह में 25,000 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है। सीमा शुल्क राजस्व अनुमान से करीब 1,09,758 करोड़ रुपये तक कम रहा। ऐसा इसलिए भी नजर आ रहा है क्योंकि कई शुल्क जीएसटी में समाहित कर दिए गए हैं। वर्ष 2017-18 में कर राजस्व बजट अनुमान की तुलना में राजस्व व्यय में अधिक है लेकिन गैर कर राजस्व में करीब 53,000 करोड़ रुपये की कमी देखने को मिली है। यह राशि करीब उतनी ही है जितना इजाफा राजस्व घाटे और जीडीपी अनुपात में हुआ है। इसके लिए मोटे तौर पर सरकारी कंपनियों और आरबीआई का कम लाभांश उत्तरदायी है।

अगर गैर कर राजस्व अनुमानित से कम नहीं होता तो राजस्व घाटा एकदम लक्ष्य के अनुरूप होता। 11 महीने के बजाय अगर 12 महीने का जीएसटी राजस्व मिलता तो भी अच्छा होता लेकिन घाटे में इजाफा इसके चलते नहीं हुआ है। ऐसे में यह एकदम स्पष्ट है कि राजस्व घाटे के स्तर में यह विचलन चुनावी लोकलुभावन अथवा जीएसटी के लेनदेन की अनिवार्यता की वजह से नहीं हुआ है। यह गिरावट राजकोष की ढांचागत कमजोरी को दर्शाती है, न कि बजट निर्माण की किसी सामरिक या परिचालन चूक को।भविष्य की बात करें तो वर्ष 2018-19 का अनुमान निराशाजनक है। कर राजस्व में ज्यादा इजाफे की बात शामिल नहीं है। गैर कर राजस्व में और गिरावट आने की बात कही गई है। ऐसे में राजकोषीय घाटे में और कमी के लिए व्यय में कमी लानी होगी। राजस्व घाटे और राजकोषीय घाटे का अनुपात 66 फीसदी तक होने की बात कही गई है। यह लक्ष्य भी वर्ष 2017-18 के लिए निर्धारित 59 फीसदी के स्तर से काफी ज्यादा है। यानी सरकार पर राजकोषीय दबाव बना रहेगा और ब्याज भुगतान की हिस्सेदारी में इजाफा जारी रहेगा।

व्यय बजट का परीक्षण यह बताता है कि चुनावी साल में विस्तारवादी भावनाओं के बजाय बजट को बेहतर लक्षित किया गया है। कृषि क्षेत्र को ध्यान में रखकर बनाई गई योजनाओं की बात करें तो प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को महत्त्वपूर्ण आवंटन हुआ है। जबकि अन्य योजनाओं की बात करें तो वह स्थिर रहा है या कम हुआ है। यह बेहतर राजकोषीय प्रबंधन का उदाहरण है और इसमें प्राथमिकताओं का ध्यान रखा गया है। प्रमुख वृहद आर्थिक आंकड़ों में फिसलन देखने को मिली है। परंतु हमें यह भी समझना होगा कि ऐसा चुनावी वर्ष की बजटीय उदारता की वजह से नहीं हुआ है और न ही कमजोर बजट निर्माण से। अंशधारकों को समझना होगा कि वृहद आर्थिक स्थिति गंभीर है और राजकोषीय पथ पर वापसी के लिए अहम ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है। बिना अन्य अंशधारकों के सहयोग के वित्त मंत्री इससे नहीं निपट सकते। गैर कर राजस्व और व्यय को नियंत्रित करने के लिए यह आवश्यक है। इस संदर्भ में वित्त मंत्री का एफआरबीएम समिति की अनुशंसाओं को स्वीकार करने का बयान काबिलेतारीफ है। हालांकि बजट बाधाओं से संबंधित कुछ अहम उपाय भी शामिल हैं। इसमें मध्यम अवधि के बजट प्रावधान और राजकोषीय परिषद की स्थापना आदि शामिल हैं। मैं बस यही चाहूंगा कि ये प्रतिबद्धताएं जल्दी पूरी की जाएं और इनके लिए आगामी बजट तक इंतजार नहीं किया जाए।

सुविधाएं मिलेंगी तभी खेलों में महाशक्ति बनेगा भारत!
कैलाश बिश्नोई, दिल्ली विश्वविद्यालय

खेलों में भारत को विश्व विजेता बनाने के उद्देश्य के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रथम ‘खेलो इंडिया स्कूल गेम्स’ का शुभारंभ किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा, ‘यह सिर्फ कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक मिशन है। इस आयोजन से विभिन्न खेलों के 17 साल से कम उम्र के 1,000 प्रतिभावान बच्चों का चयन किया जाएगा, इन बच्चों को सरकार अगले आठ साल तक अपनी प्रतिभा में और निखार लाने के लिए उच्च स्तर का न केवल प्रशिक्षण सुविधाएं मुहैया कराएगी बल्कि इस अवधि तक सालाना 5 लाख रुपए भी दिए जाएंगे।

अभी तक खेलों में भारत के फिसड्डी होने का सबसे बड़ा कारण स्कूली स्तर पर बच्चों में खेल प्रोत्साहन का अभाव रहा है। भारत में शिक्षा प्रणाली भी ऐसी है, जहां स्कूलों में खेल सिर्फ एक्सट्रा करिकुलर एक्टिविटी के अन्तर्गत आते हैं, ताकि अच्छी नौकरी के लिए बायोडाटा थोड़ा अच्छा बन सके। चीन प्रतिभाओं को बहुत कम उम्र में चुन लेता है। इन युवा प्रतिभाओं को ज्यों ही नेशनल सेंटर में दाखिल किया जाता है उनकी जवाबदेही सरकार की हो जाती है और उन्हें किसी बात की चिंता नहीं करनी रहती। यहां तक कि अपनी शिक्षा के बारे में भी नहीं। लेकिन भारत में हम खेल की कीमत पर शिक्षा पर ध्यान देते हैं।

अब वक्त की मांग हैं कि देश में हर तहसील या उपखण्ड स्तर पर खेल स्कूल स्थापित किए जाएं, वहां खेल ही प्रमुख पढ़ाई हो और बाकि पढ़ाई का ज्यादा बोझ न हो। इन स्कूलों में ऐसे अत्याधुनिक खेल परिसरों का निर्माण किया जाये जहां खिलाड़ियों को हर सुविधा उपलब्ध हो, जैसी अमेरिका, चीन तथा रूस जैसे खेलों में अग्रणी देशों के खिलाड़ियों को मिलती हो। अगर हम 10-11 साल के बच्चों को लेकर तैयारी करेंगे तो बहुत जल्दी परिणाम मिलेगे।आज क्रिकेट, बैडमिंटन और हॉकी जैसे खेलों में लीग प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है, क्यों न इस लीग प्रणाली को शेष भारतीय खेलों में भी प्रयुक्त किया जाए, जिससे भविष्य में अन्य खेल के खिलाड़ियों को बेहतर अवसर और आर्थिक स्थिरता मिल सके।

स्थायी नौकरियों का मकड़जाल
मृणाल पांडे, (लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं)

बेरोजगारी फिलहाल देश की बड़ी चिंताओं में पहले पायदान पर है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने देश को आश्वस्त किया कि गत एक बरस में 18-25 की उम्र के 70 लाख युवाओं ने संगठित क्षेत्र में रोजगार पाया, इसका प्रमाण सरकारी बही में दर्ज कर्मचारी भविष्यनिधि (ईपीएफ) के 70 लाख नए खाते हैं। इस आशावादी घोषणा का आधार थी (विगत जनवरी में छपी आईआईएम के प्रोफेसर पुलक घोष व एक राष्ट्रीयकृत बैंक के बड़े अधिकारी सौम्यकांति घोष की) एक रपट। इस रपट की जानकारियां पूरी तरह उनको सरकारी बैंकिंग क्षेत्र से दिए गए ऐसे दुर्लभ डाटा पर आधारित थीं, जो अब तक सार्वजनिक रूप से यानी ऑनलाइन उपलब्ध नहीं हैं। कई विद्वानों ने शंका जाहिर की कि नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद सभी छोटी, मंझोली, बड़ी कंपनियों में हुई छंटनियां इस सरकारी डाटा में नहीं समेटी गई हैं। लिहाजा यह डाटा आज की सही तस्वीर नहीं देता। संभव यह भी है कि ये नए रोजगार नए नहीं। असंगठित क्षेत्र के कुछ उपक्रमों के कराधान के दायरे में आ जाने से वे अब संगठित की परिभाषा में दर्ज हो रहे हैं, सो ये पुरानी नौकरियां नई बोतल में पुरानी शराब की परिभाषा में आती हैं। यह बहस अभी दूर तलक जाएगी, पर यह शक के परे है कि दुनियाभर में युवाओं की सबसे बड़ी तादाद (73 करोड़) भारत में है। और 2019 तक तकरीबन 1 कराेड नब्बे लाख युवा रोजगार की कतार में होंगे।

यदि हम मान भी लें कि हां संगठित क्षेत्र में पढ़े-लिखे हुनरमंद मध्यवर्गीय युवाओं को बड़ी तादाद में सुनहरे रोजगार के अवसर मिलने लगे हैं, तो फिर यह देखना भी जरूरी है कि आज के महत्वाकांक्षी युवाओं के सबसे पसंदीदा व मोटी तनख्वाहें दिलाने वाले प्रबंधन क्षेत्र की खबरें क्या बताती हैं? यह वह मौसम है, जब बिजनेस कोर्स पूरा करने जा रहे छात्र बड़ी तादाद में अपने कॉलेजों में चातक की तरह कैंपस चयन की मार्फत किसी बड़ी कंपनी के एचआर अफसरों द्वारा मालदार वेतनमान वाली नौकरियों के लिए चुने जाने की उम्मीद लगाए रहते हैं। बच्चा बिजनेस स्कूल में दाखिला पा गया तो माता-पिता निश्चिंत हो रहते हैं कि उसका भविष्य बन गया। हमारे गुलाबी अखबारों में भी इस आशय की खबरें छपती रहती हैं कि किस तरह अमुक होनहार युवा कैंपस से चयनित किया जाकर, बीसेक की उम्र में ही किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सात अंक की सालाना तनख्वाह से जुड़ी नौकरी पा गया है।

पर हर साल सिविल परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले छात्रों में भी आईआईटी और डॉक्टरी की परीक्षा पास कर चुके युवाओं की बड़ी तादाद से लगता है कि शायद मध्यवर्ग की मानसिकता का भूगोल अभी भी उसी पुरानी धारणा पर टिका है, जो हाथ मैले करने वाले हर तरह के काम की तुलना में साफ वस्त्रों में कुर्सी पर बैठकर अफसर या बड़ा मैनेजर बनकर हुकुम चलाने वाली अफसरी या प्रबंधन की नौकरी को सबसे बेहतर मानती है। भरपूर मीडिया प्रचार और उसमें छपी सफल प्रबंधकों की सचित्र जीवन शैली देख-सुनकर बढ़ती बेरोजगारी के वक्त में भी आम धारणा यह बनी है कि उत्तम खेती अब समाप्त है। मध्यम यानी वणिज के लिए मूल पूंजी बड़े लोग ही हथिया सकते हैं। इसलिए किसी तरह पापड़ बेलकर बच्चा यदि प्रबंधन की डिग्री पा जाए, तो बढ़िया चाकरी पाने में कोई विलंब नहीं होगा। दूसरी तरफ इससे यह भी उम्मीद बनती है कि भारत में जब बड़ी विदेशी पूंजी आएगी और नामी कंपनियां स्थानीय कर्मचारियों का चयन करेंगी तो उन सबको प्रबंधन की विधिवत शिक्षा पा चुके, नई तकनीक के प्रयोग में सक्षम, हुनरमंद अफसर हाथ बढ़ाते ही मिल जाएंगे। पर सुर्खियों के परे जो डाटा खुद प्रबंधन शिक्षा विशेषज्ञ दे रहे हैं, कुछ और ही बताता है।

आज देश में बिजनेस प्रबंधन के चार बड़े संस्थानों के अलावा प्रबंधन कोर्स के लिए भारी मांग के चलते सैकड़ों नए निजी संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। बड़े शहरों की परिधि में खड़े किए गए इनमें से अधिकतर निजी संस्थान जरूरी फैकल्टी की कमी से ग्रस्त सिर्फ पैसा बनाने की फैक्टरियां बनकर रह गए हैं। फिर भी शत प्रतिशत प्लेसमेंट का दावा करते हुए अधिकतर संस्थान अगले सत्र के लिए नए छात्र और फंडिंग जुटा लेते हैं। और बहुत जरूरतमंद कंपनियों के मानव संसाधन विभाग इन कैंपसों से परिमार्जित चयन प्रक्रिया के तहत कुछ लक्षित पदों को तुरत भरकर कंपनी बोर्ड को तुष्ट कर देते हैं। भीतरखाने सभी स्वीकार करते हैं कि जिस स्तर की कुशलता की अब मांग है, उसके लिए यह चयन प्रक्रिया नाकाफी है। बंगलुरु तथा अहमदाबाद प्रबंधन संस्थान के शोध गवाह हैं कि इस तरह के चयन से बड़े संस्थान के छात्रों को फटाफट नौकरी भले मिलती हो, पर वे उनको अधिक समय तक तुष्टि नहीं देतीं। उनका मन अभी अवयस्क होता है। हो भी क्यों न? आज प्रबंधन के अधिकतर छात्र सिर्फ स्कूली पढाई खत्म कर कोचिंग संस्थानों की रट्टालगाई की तरफ दौड़ जाते हैं और किस्मत ने साथ दिया तो किसी बड़े वाले या नामी निजी प्रबंधन कोर्स में सीधे दाखिला पा लेते हैं वर्ना किसी निजी संस्थान का कोटा तलाशते हैं। प्रबंधन और डाटा दोनों बताते हैं कि 70 फीसदी प्रशिक्षु की नौकरी पा भी गए तो जल्द ही उन्हें लगने लगता है कि वे उसमें फिट नहीं हो पा रहे हैं। सो इन नौकरियों को वे तब तक येन-केन निभाते हैं, जब तक वे कुछ पैसा बचा लें और उनका बैंक लोन चुकता हो जाए। इसके बाद वे दोबारा पसंदीदा काम तलाशते हैं।

इस धकापेल, मोहभंग और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार से उन्हें बचाने के लिए छात्रकाल में किसी भी उच्च विशिष्ट शिक्षा के छात्रों को अपने रुझान और क्षमता का सही आकलन करने को स्कूल से कॉलेज तक शिक्षकों और मनोवैज्ञानिकों से निजी स्तर पर सघन परामर्श मिलना जरूरी है, ताकि वे माता-पिता की महत्वाकांक्षा तले या साथियों की देखादेखी किसी भेड़चाल से बचें। और बाद को नौकरी पाकर फिर उसे अधबीच में छोड़ लुढ़कते पत्थरों की तरह कुंठित दिशाहीन न बनें। पिछले कुछ सालों से इन कोर्सेस में दाखिला लेने को उत्सुक छात्रों का ट्यूशन कक्षा चलाने वाले मशीनी संस्थानों या भीड़भरी क्लासों में पढ़ते हुए अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या करना खतरे की घंटी है। वह दिखाता है कि हमारे यहां औसत अभिभावकों और समवयसियों की सराहना और ईर्ष्या के पात्र ऐसे छात्र वस्तुत: भीतरखाने कितना अकेला और दिग्भ्रमित महसूस करते हैं। अपने चमकीले छात्रकाल में इनमें से अधिकतर युवा हमारे देश के युवाओं के बेहतरीन प्रतिनिधि होते हैं। स्वप्नदर्शी, आशावान, बुद्धिमान और मेहनती। आने वाले वक्त में मान लीजिए, हरित-श्वेत क्रांतियां हो गईं, बड़ा विदेशी पूंजी निवेश का सोता उमड़ा और उत्पादन के साथ तकनीकी तथा सूचना प्रसार के क्षेत्रों का भी अपेक्षित विस्तार हुआ, तब क्या हम प्रबंधन शिक्षा की दशा-दिशा रातोंरात बदल सकेंगे? नहीं। तब क्या गारंटी है कि हम जाति प्रथा की ही तरह एक प्रतिशत आबादी के हाथ देश की तीन चौथाई कमाई जाना, विदेशों से मैनेजरों का आयात स्वीकार न कर लेंगे?

लोक चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए पीएम मोदी ने लगाया ग्रामीण भारत पर दांव
एनके सिंह, (लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

मोदी सरकार ने अपने आखिरी पूर्ण बजट में शहरी मध्यम एवं उच्च वर्ग की अपेक्षाओं को लगभग नजरअंदाज करते हुए ग्रामीण भारत पर अपना दांव लगाया है। शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात चुनाव के बाद यह अहसास हुआ कि किसानों को नाराज कर वह आगामी आम चुनाव की वैतरणी पार नहीं कर पाएंगे। इसकी एक झलक राजस्थान में दो लोकसभा एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों से भी मिली। भाजपा की ये तीनों सीटें कांग्रेस ने छीन लीं। अगर उपचुनाव परिणाम बजट के दिन नहीं आए होते तो शायद देश उन्हीं पर चर्चा कर रहा होता। जो भी हो, आम बजट पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। शहरी माध्यम एवं उच्च वर्ग जहां निराशा जता रहा है वहीं ग्रामीण भारत को एक आस नजर आ रही है।

बजट के गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि उसमें जो घोषणाएं की गई हैं वे ग्रामीण भारत के लिए पिछले कई दशकों से अपेक्षित थीं। कृषि के लिए यह क्रांतिकारी बजट साबित हो सकता है, लेकिन तभी जब जो वायदे किए गए हैं उन्हें सही से पूरा किया जाए। किसानों के उत्पाद की उचित मूल्य पर खरीद की सरकारी प्रतिबद्धता और 10 करोड़ गरीब परिवारों यानी करीब 50 करोड़ लोगों को पांच लाख का स्वास्थ्य बीमा सामाजिक सुरक्षा की दिशा में पहली जरूरत थी। कहना न होगा कि इन 10 करोड़ गरीब परिवारों में किसान, मजदूर और निम्न आय वर्ग का बड़ा तबका शामिल होगा, लेकिन यहां एक पेंच है। सरकार ने किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने का जो वायदा इस बजट में किया है वह खरीफ की फसल से लागू होगा और इस साल खरीफ की उपज की खरीददारी लगभग खत्म हो चुकी है। लिहाजा यह योजना अगली खरीफ से ही लागू हो सकेगी यानी आगामी नवंबर के आसपास। अगर मोदी सरकार समय से पहले चुनाव कराती है तो फिर वह अपना वायदा कब पूरा करेगी? जो सरकार की मंशा में विश्वास रखते हैं उनके अनुसार कोई भी सरकार जो चुनाव जीतना चाहती है वह किसानों को नाराज करने का जोखिम मोल नहीं ले सकती।अगर सरकार आगामी रबी की फसल के दौरान भी अपने वायदे को पूरा करती है तो एक अनुमान के तहत इस पर कुल खर्च लगभग 60 हजार करोड़ रुपये आएगा। चुनाव पूर्व ऐसा खर्च किसी सरकार के लिए कोई बहुत मुश्किल काम नहीं होना चाहिए। रबी की फसल की खरीददारी आगामी अप्रैल माह से शुरू होनी है और कोई भी वायदाखिलाफी सरकार को बेहद महंगी पड़ सकती है। हालात ऐसे हैैं कि मोदी सरकार किसानों की अनदेखी शायद ही कर पाए।

यह उल्लेखनीय है कि बजट से पहले सामने आए आर्थिक सर्वेक्षण में साफ तौर पर कहा गया है कि बीते चार सालों से किसानों की वास्तविक आय नहीं बढ़ी है। अच्छा होता कि सरकार को इसका भान पहले ही हो गया होता। पहली बार किसानों के उत्पाद के लिए लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने का संकल्प कृषि और किसानों की बेहतरी की दिशा में एक बड़ा कदम है।ध्यान रहे कि ऐसा वायदा 2014 के चुनाव के घोषणापत्र में भी किया गया था, लेकिन अगले ही वर्ष सरकार इससे मुकर गई और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में सरकारी पक्ष ने अपनी असमर्थता जता दी। जाहिर है कि विपक्षी दलों ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया और किसान भी संशकित हुए। अगर मोदी सरकार 2014 में ही किसानों को लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने को तैयार हो गई होती तो शायद उसे किसानों की नाराजगी का सामना नहीं करना पड़ता। यही नहीं तब किसानों की बेचैनी इतनी अधिक नहीं बढ़ी होती और शायद उद्योग जगत को मंदी जैसी हालत से भी दो-चार नहीं होना पड़ता। चूंकि सरकार एक बार वायदाखिलाफी कर चुकी है इसलिए उसे इस बार बहुत सतर्कता बरतनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य वास्तव में मिले।

चूंकि अगले वर्ष आम चुनाव प्रस्तावित हैैं इसलिए सरकार को कुछ ऐसे जतन करने ही होंगे जिससे इसी अप्रैल से शुरू होने वाले रबी की फसल की खरीददारी के दौरान लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने की योजना लागू हो सके। अगर ऐसा हुआ तो किसानों को पहली बार खेती मुनाफे का सौैदा महसूस होगी। किसानों की फसल का लागत मूल्य तय करने का काम कृषि मूल्य एवं लागत आयोग करता है और वह इसे दो पैमाने के तहत करता है। इन्हें ए-2 और सी-2 नाम से जाना जाता है। स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के अनुसार सी-2 पैमाने पर लागत में किसान और उसके परिवार का श्रम और जमीन की कीमत भी शामिल होती है। अगर यह मान लिया जाए कि सरकार दूसरे प्रावधान यानी ए-2, जिसमें किसान का श्रम और जमीन की कीमत शामिल नहीं होती, के तहत करती है तो भी यह किसानों के लिए एक बड़ी राहत होगी। उदाहरण के तौर पर धान की कीमत सी-2 आधारित फॉर्मूले के अनुसार 1426 रुपये प्रति क्विंटल है और अगर इस पर 50 प्रतिशत बढ़ाकर समर्थन मूल्य तय किया जाए तो धान का समर्थन मूल्य लगभग 2139 रुपये प्रति क्विंटल होगा। इतना ज्यादा मूल्य किसानों को आज तक नहीं मिला। इस गणना को अगर आगामी रबी और खासकर गेहूं की फसल पर लागू किया गया तो गेहूं का समर्थन मूल्य करीब 1900 रुपये प्रति क्विंटल हो जाएगा। उत्तर भारत मे बड़े पैमाने पर गेहूं की खेती करने वाले किसानों के लिए यह मूल्य एक तरह से वरदान साबित होगा। देखना है कि ऐसा होता है या नहीं?

प्रधानमंत्री ने जिस तरह बजट के बाद यह स्पष्ट किया लगभग 14.5 लाख करोड़ रुपये ग्रामीण भारत के कल्याण पर खर्च किए जाएंगे उससे साफ है कि वह ग्रामीण इलाके के लोगों की बेचैनी को भांप चुके हैैं। दरअसल सरकार के सामने आगे कुआं-पीछे खाई वाली स्थिति थी। अगर वह मध्यम और उच्च वर्ग को खुश करने के लिए आयकर और कॉरपोरेट कर में अपेक्षित छूट देती तो राजस्व कम आता। कल्याणकारी योजनाओं के लिए खर्च करने का मतलब होता राजस्व घाटे में भारी बढ़ोतरी जो किसी भी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता। दूसरी ओर अगर सरकार किसानों और गरीबों के लिए अपना पिटारा न खोलती तो वे निराश-हताश तो होते ही, नाराज भी होते। मोदी सरकार ने दूसरा विकल्प चुना। इसी के तहत उसने स्वास्थ्य बीमा योजना का प्रावधान रखा। अगर किसी गरीब का पांच लाख रुपये तक का इलाज सरकार की किसी योजना से मुफ्त होने लगे तो यह भारत में सामाजिक सुरक्षा का सबसे बड़ा कदम कहा जाएगा।

जिस तरह सरकार किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना दाम देने के मामले में हीलाहवाली नहीं कर सकती उसी तरह स्वास्थ्य बीमा योजना के मामले में भी कोई कोताही नहीं बरत सकती। इन दोनों वायदों को पूरा करना किसी चुनौती से कम नहीं, क्योंकि इसके लिए पूरा तंत्र बनाने और उसके काम की गहन निगरानी करने की भी जरूरत पड़ेगी। सरकार के सामने इस जरूरत को पूरा करने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं।

बेटियों को हक
संपादकीय

यकीनन यह खुशखबरी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में साफ किया है कि पुश्तैनी संपत्ति में बेटियों को हक सिर्फ 2005 में संशोधित कानून की अवधि के बाद ही नहीं मिलेगा, बल्कि पिछले दावे भी इसी कानून के हिसाब से तय होंगे।यानी उन्हें अपने हक के लिए किसी तारीख पर निर्भर नहीं रहना होगा।हमारे समाज में बेटियों को संपत्ति के हक से वंचित करने की परंपराएं ही नहीं, दलीलें भी दी जाती रही हैं। कई लोग पुश्तैनी संपत्ति में हक के बदले स्त्री-धन की परंपरा का हवाला देते हैं लेकिन उसमें दो पेच हैं।एक तो पुरुष-सत्ता वाले समाज में उस पर पति या परिवार का प्रत्यक्ष या परोक्ष अधिकार हो जाता है।दूसरे, वह पुश्तैनी संपत्तियों जितनी सुरक्षा प्रदान करने में पर्याप्त नहीं होता।फिर बेटियों को हर मामले में बेटों के बराबर अधिकार होने से स्त्री-पुरुष समानता के अलावा समाज में बेटों के प्रति मोह भी कुछ घटेगा। लिहाजा, इससे पुरुष वर्चस्व वाली व्यवस्था की बुनियाद भी हिलेगी।हाल में बेटों के प्रति मोह का एक उदाहरण इस साल के आर्थिक सव्रेक्षण में उभर कर सामने आया।हालांकि इसका एक सुखद पहलू स्त्री जनसंख्या में कुछ बढ़ोतरी के रूप में सामने आया, जो घटते स्त्री-पुरुष अनुपात और कन्या भ्रूण हत्या के दौर में वाकई शुभ कहा जाएगा।

आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि बेटों की चाह में बेटियों की आबादी 2.1 करोड़ ज्यादा हो गई. बेटियों की जनसंख्या के मामले में यकीनन यह खुशखबरी है और इससे स्त्री-पुरुष अनुपात कुछ बेहतर भी हुआ है। लेकिन असली सवाल मानसिकता का है या कहिए उससे भी बढ़कर समाज में पुरुष वर्चस्व का है। यह तभी टूटेगा जब स्त्रियों को संपत्ति में पूरा अधिकार हासिल होगा।इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने एक मायने में क्रांतिकारी फैसला सुनाया है, जिससे हमारे समाज का रंग-ढंग कुछ बदल सकता है। ऐसी ही बुनियादी नुक्ते बदलाव का वॉयस बनते हैं। इसका असर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों से ज्यादा होता है। इसलिए सरकार अगर स्त्रियों के लिए और सकारात्मक कानूनी रियायतें देने का कदम उठाए तो उसका ज्यादा असर होगा। संसद और विधायिकाओं में एक-तिहाई महिला आरक्षण विधेयक अभी लटका पड़ा है। यूपीए सरकार के दौरान यह विधेयक लोक सभा में अटक गया था। खासकर पिछड़े वगरे के नेताओं ने कुछ आशंकाएं जाहिर की थीं। सरकार को चाहिए कि सर्वानुमति बनाकर स्त्रियों का यह वाजिब हक उन्हें दिलाए।

If that door should shut now
India cannot be so opaque to history as to say no refugees will hereafter be allowed to enter its territory
Gopalkrishna Gandhi is a former administrator, diplomat and Governor

Additional Solicitor General Tushar Mehta has made an important statement before the Supreme Court (“India can’t be refugee capital: govt.”, The Hindu, February 1, 2018). Whether he intended it to or not, it contains a vision, a vision of India. Mr. Mehta presented that vision in terms of what India should not be.Responding to a plea by Rohingya refugees in India, Mr. Mehta said in the Supreme Court last week: “We do not want India to become the refugee capital of the world.” He went on to say to the Bench headed by the Chief Justice of India that if the Rohingya were given refuge, “People from every other country will flood our country.” And, he added: “This is not a matter in which we can show any leniency.”

Four positions can be distilled from those observations: “We” speak for India; that India does not want refugees; people from ‘every other’ country are likely to flood India; we will not let India become the world’s refugee capital.

The ‘we’

This article is not on the Rohingya’s case upon which we must trust the Supreme Court to pronounce as the great Sanskrit dictum suggests, ‘dirgham pasyatu ma hrasvam’ (look far ahead, be not short-sighted). It is on the Additional Solicitor General’s observation on India which is so important as to merit — demand — analysis.

To start with the important opening word in his remark, “We”. Does he intend to use “we” in the Constitution’s sense of “We the people…”? I doubt it, for only Parliament would feel mandated to use that expression. And even if the Lok Sabha or the Rajya Sabha were to pass a resolution, they would in all likelihood use “this House”, rather than “we”.

A law officer, when he uses “we”, has to mean those who have the power, the prerogative and the privilege to instruct him in the matter before the court. But in the statement in question being about India’s very personality, the “we” has to go beyond the knot of individuals who have conferred on a particular brief. It has to convey the thinking of the government as a whole.

A departure

That brings us to the second position taken by him, namely, that refugees will hereafter be unwelcome in India. If that is indeed the government’s thinking, then we have been given a major modification in the vision of ‘bahujana hitaya bahujana sukhaya’, where vouchsafing the good of the many and the happiness of the many is a ruler’s dharma, with lokanukampaya — compassion for the human being — governing state action. It reverses the ancient tradition of the janapada being not just the home for its jana but a sanctuary for all in need of ashraya, refuge — sarva lokashrayaya. It is perhaps this ethos that helped persecuted Zoroastrian migrants from Central Asia settle in and around Surat around the 16th-17th centuries to maintain their religious tradition.

Old texts, tenets and traditions apart, the Additional Solicitor General’s statement marks a departure from modern India’s experience in the matter. By the new yardstick, independent India’s giving ashraya in 1947 to over seven million refugees, mostly Hindu and Sikh, from the newly created state of Pakistan was wrong. And, by the same token, Pakistan should have sent back another seven million and more refugees, mostly Muslim, who left India for Pakistan. By that logic, the Dalai Lama should never have been given refuge in India nor the nearly 150,000 Tibetans who have come to India during the last 50 years. And, by the same logic, India should have used force, in 1971, to drive back the estimated 10 million men, women and children seeking shelter in India from genocide in East Pakistan. Tamils fleeing Sinhala intolerance, now said to number 100,000, should have been driven back over the Palk Strait to Sri Lanka, not offered even temporary tanjam. Afghan refugees, now numbering 10,000, should, by that principle, never have been given space in India, nor should Baloch political dissidents be given panah today. Individuals like U Nu when he exited from Ne Win’s regime, Sheikh Hasina when she came to India in self-exile, and several political figures from Sri Lanka and Afghanistan should, by that principle, have been bolted out, Taslima Nasreen never allowed to step foot in India.

Were Nehru, Shastri, Morarji Desai, Indira Gandhi, Rajiv Gandhi, V.P. Singh, Chandra Shekhar, Narasimha Rao, Deve Gowda, Inder Kumar Gujral, Atal Bihari Vajpayee all naive or worse in not closing India’s doors to shelter-seekers? Were they un-patriotic? And were the people of India, in understanding the ethos of ashraya, equally mistaken?The Additional Solicitor General’s remarks have amounted to saying “we” now have a new vision, a new perspective, a new philosophy of India that does not, will not, open its doors to the refugee. In fact, it has closed its doors to refugees and to refugee-hood itself. Now, this is not just a passing opinion on a transient matter but a rock-hard position concerning India and the human condition of nobody-ness, of homelessness, of statelessness that seeks refuge. In terms of the statement of the Additional Solicitor General, sanctuary or ashraya (Sanskrit), panah (Urdu), sharan (Hindi), tanjam (Tamil) are no longer to be India’s attributes. ‘Back you go!’, ‘Out!’, are to be our answers to any refugee at our door.

Seeking refuge

The third proposition, namely, that India is in danger of being flooded with refugees “from every other country” must cause astonished disbelief. Is the world pining for refuge in India? There is as much risk of India becoming the world’s refugee capital as there is hope of India becoming the world’s tourist capital. Common sense — a strong Indian trait — would tell us that only those in India’s neighbourhood facing the dire prospect of victimisation or death want India’s sanctuary. The same common sense has, for a cousin, another sense, an uncommon Indian sense, of seeing the urgency, the sheer panic, that is caused by victimisation and ethnic hate. And that enables us to see the heartlessness and the hollowness of the fourth proposition, namely, that we will not let refugees into India.

If a neighbouring country, out of political spite, “or on account of race, religion, political opinion”, were to force Hindus out of its borders and into India, we would be right in giving them ashraya. And we would be right to demand world condemnation of the outrage.Keeping our land and sea frontiers open for massive numbers of people to cross over is hugely problematic. And terrorists sneaking in as refugees with sinister designs constitute a grim reality. But when has India been spared of troubles that come ‘not as single spies but in battalions’? We, as a nation, cannot be so amnesiac, so altogether aphasiac, so opaque to history as to say no refugees, none at all, will hereafter be allowed to enter our territory.

Non-refoulement and international law are neither my expertise nor my theme here. The human condition is. And its most tragic experience — fear of persecution, of the furious chase, the flying bullet. William Blake wrote about two centuries ago: “Each outcry of the hunted Hare/A fiber from the Brain does tear.” India has not let the hunted hare die at its door. And if that door should shut now, a fibre from our collective brain must and will tear.