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NEWS PAPER EDITORIAL

सैन्य ताकत बढ़ाने के रास्ते की तलाश

(भारतेंदु कुमार सिंह)

विगत दिनों आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान जारी एक बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात पर सहमत थे कि भारत और अमेरिका दुनिया के दो महान लोकतांत्रिक देश होने के साथ ही बड़ी सैन्य ताकत भी हैं। जब दुनियाभर के अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार लोकतंत्र और सेना के रिश्तों को लेकर बहस कर रहे हैं उसी दौरान इस बयान के आने से तस्वीर और साफ हो जाती है। जहां भारत और अमेरिका ने लोकतंत्र के अनुकूल सामरिक साङोदारी करने का रास्ता चुना है।

यह सर्वविदित है कि दुनिया के ताकतवर देशों के पास शक्तिशाली सेना होती है। हालांकि यह त्रसदी ही है कि वर्चस्वशाली राजनीति में कुछ ही ऐसे होते हैं जिनमें लोकतांत्रिक परिपाटी पाई जाती है। ‘लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत’ के समर्थक इस बात की वकालत करते हैं कि लोकतांत्रिक शक्तियां एक दूसरे से लड़ा नहीं करतीं और उन्हें शांति बनाए रखने की परंपरा का पालन करना चाहिए, लेकिन समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों की असलियत इस परिकल्पना को ध्वस्त कर देती है और वैकल्पिक रास्ता अख्तियार करने पर मजबूर करती है। दूसरी तरफ, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के बाद ‘अधिनायकवादी’ चीन का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य ताकत के रूप में उभरने से शक्ति संतुलन की स्थिति और नाजुक हो गई है। इससे क्षेत्रीय शक्तियों के अमेरिकी नेतृत्व को संकट पैदा हो गया है। इस लिहाज से देखा जाए तो भारत-अमेरिका की नई सामरिक साङोदारी के चलते क्षेत्रीय शक्ति को संतुलित बनाने में मदद मिलेगी।

गौरतलब है कि ओबामा प्रशासन ने जहां भारत को अपना बड़ा रक्षा साझेदार माना था और अब वहीं ट्रंप प्रशासन उस परिकल्पना को ठोस अमलीजामा पहनाने का इच्छुक दिख रहा है। ट्रंप प्रशासन दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र का, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ रिश्ते को सामरिक साङोदार के रूप में तब्दील करना चाहता है। हालांकि यह लोकतांत्रिक विचार की कहानी का केवल एक पक्ष है, लेकिन सैन्य साजोसमान की खरीद-फरोख्त का दूसरा पहलू बहुत जटिल है। अपने सैन्य साजोसमान की बिक्री के लिहाज से अमेरिका लंबे समय से उभरते हुए एक बड़े बाजार के रूप में भारत का मूल्यांकन कर रहा है। भारत वैश्विक बाजार में अग्रणी हथियार आयातक रहा है। भारत अमेरिका की विभिन्न कंपनियों से पहले ही 15 अरब डॉलर यानी 960 अरब रुपये के सैन्य हथियार का सौदा कर चुका है।

‘मेक इन इंडिया’ की मुहिम के तहत घरेलू स्तर पर आयुध कारखाना विकसित करने और उसे विस्तारित करने के प्रयास के बावजूद भारत विदेशी हथियार विक्रेताओं को निकट भविष्य में आकर्षित करता रहेगा। राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका से हथियार खरीद कर भारत विश्वस्तरीय सैन्य शक्ति बने। हालांकि अमेरिका अब भी अपने हथियार और उसकी प्रौद्योगिकी भारत को बेचने में संकोच करता है। उदाहरण के तौर पर एफ-18 लड़ाकू विमानों की खरीद के मामले को देखा जा सकता है जिसे लेकर अमेरिका दुविधा में नजर आया। इसके बावजूद भी हाल के वर्षो में भारत-अमेरिका संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस का नई दिल्ली का हालिया दौरा इसकी तस्दीक करता है।

अमेरिका से सामरिक साझेदारी की वजह से हाल के वर्षो में परमाणु आपूर्ति समूह और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भारत को फायदा तो मिला है, लेकिन यह भी बात सही है कि अमेरिका हर मसले पर भारत का समर्थन करता हुआ नहीं दिखता है। मसलन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की उम्मीदवारी को समर्थन देने के मसले पर अमेरिका अभी तक सकारात्मक रुख नहीं दिखा पाया। इसके आलोक में भारत को हमेशा सतर्क होकर आगे बढ़ना चाहिए। एशियाई सुरक्षा की दिशा में अमेरिकी नीति अक्सर विवादित और दृष्टिकोण में सैन्यवादी रही है। इस ‘अहम’ नीति के नाकाम होने के बावजूद वाशिंगटन चीन को साधने के लिए तमाम साङोदारों को अपने साथ जोड़ने में जुटा हुआ है। मगर शक्ति संतुलन बनाने की इस तरह की गठजोड़ वाली राजनीति भारत के लिए मुफीद नहीं है।

भौगोलिक चुनौतियों को देखते हुए भारत को शक्ति संतुलन और अपने सुरक्षा सहयोग का भी ख्याल रखना होता है। ब्रिक्स के जरिये भारत को रूस के साथ रणनीतिक समझदारी दिखानी होती है, जबकि चीन के साथ सामरिक वार्ता भी जारी रखनी होती है। बहरहाल सैन्य साजोसमान की खरीद के मामले में अमेरिका सहयोगी साबित हो सकता है। मगर भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए और साथ ही रणनीतिक तथा कूटनीतिक बातचीत के जरिये अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं से रिश्ते को भी बनाए रखना चाहिए।

भारत अमेरिका के सैन्य अनुभव से कुछ सबक ले सकता है। पहला, अमेरिकी नेतृत्व सैन्य मामलों को लेकर हर पहलू से भलीभांति परिचित है। इस इक्सवीं सदी में अमेरिका के लॉकहीड मार्टिन, बोइंग जैसे वैश्विक दिग्गज रक्षा उद्योग में काम कर रहे हैं। वैश्विक हथियारों के कारोबार पर एक तिहाई हिस्सेदारी अमेरिकी कंपनियों की है। भारत अपनी जरूरत का उनसे दो-तिहाई हथियार खरीदता है। दूसरा, सैन्य सुधारों को लेकर विभिन्न क्षेत्रों में भारत को अमेरिका की गतिविधियों से सीखना चाहिए। मसलन संयुक्त कमां, सशस्त्र बलों में मानव संसाधन को कम करना और गैर-कोर गतिविधियों की आउटसोर्सिग करना।

भारतीय सेना में मानव शक्ति सुधारों की दिशा में शेकटकर समिति की सिफारिश का क्रियान्वयन एक अच्छा कदम है। भारत प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बढ़ाकर सेना में मानव संसाधन कम करने के अमेरिकी अनुभव से सीख सकता है। अभी भारत कई सैन्य खामियों का सामना कर रहा है। सैन्य शक्ति को बढ़ाना तभी संभव हो सकता है जब सेना से जुड़े मामलों को सुलझाने के लिए आर्थिक मदद मुहैया कराई जाए। यानी सेना का आर्थिक सशक्तीकरण के बाद उसकी स्थिति में सुधार की उम्मीद की जानी चाहिए।(दैनिक जागरण )

(लेखक भारतीय रक्षा लेखा सेवा से संबद्ध हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

प्लास्टिक कचरे से खतरे में समुद्री जीव-जंतु

(ज्ञानेन्द्र रावत)

प्लास्टिक कचरे की समस्या से आज समूचा विश्व जूझ रहा है। इससे मानव ही नहीं बल्कि समूचा जीव-जंतु एवं पक्षी जगत प्रभावित है। यदि इस पर शीघ्र अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में स्थिति और विकराल हो जाएगी। कहने का तात्पर्य यह कि उस समय स्थिति की भयावहता का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय प्राणी जगत यानी जीव-जंतुओं एवं पक्षियों का अस्तित्व ही समाप्ति के निकट होगा। देखा जाए तो आज प्लास्टिक कचरा पर्यावरण और जीव-जगत के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। वैज्ञानिकों के शोध-अध्ययन इसके के प्रमाण हैं। एक अध्ययन में कहा गया है कि बढ़ते प्लास्टिक कचरे के कारण धरती की सांस फूलने लगी है। सबसे बड़ी चौंकाने वाली और खतरनाक बात यह है कि यह समुद्री नमक में भी जहर घोल रहा है। इससे मनुष्य के स्वास्य पर दुष्प्रभाव अवयंभावी है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। कारण यह है कि प्लास्टिक एक बार समुद्र में पहुंच जाने के बाद विषाक्त पदार्थो और प्रदूषकों के लिए चुम्बक बन जाते हैं।

अमेरिका के लोग हर साल प्लास्टिक के 660 से अधिक कण निगल रहे हैं। अध्ययनों ने इसे प्रमाणित भी कर दिया है। यही नहीं असलियत तो यह है कि धरती पर घास-फूस पर अपना जीवन निर्वाह करने वाले जीव-जंतु भी प्लास्टिक से अपनी जान गंवा ही रहे हैं, समुद्री जीव-जंतु, मछलियां और पक्षी भी इससे अपनी जान गंवाने को विवश हैं। आर्कटिक सागर के बारे में किये गए शोध और अध्ययन और चौंकाने वाले हैं। शोध के अनुसार 2050 में इस सागर में मछलियां कम होंगी और प्लास्टिक सबसे ज्यादा। आर्कटिक के बहते जल में इस समय 100 से 1200 टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है जो तरह-तरह की धाराओं के जरिये समुद्र में जमा हो रहा है।

प्लास्टिक के यह छोटे-बड़े टुकड़े सागर के जल में ही नहीं पाए गए हैं बल्कि यह मछलियों के शरीर में भी बहुतायत में पाए गए हैं। ग्रीनलैंड के पास के समुद्र में इनकी तादाद सर्वाधिक मात्रा में पाई गई है। इसमें दो राय नहीं कि दुनिया के तकरीब 90 फीसद समुद्री जीव-जंतु-पक्षी किसी न किसी रूप में प्लास्टिक खा रहे हैं। यह प्लास्टिक उनके पेट में ही रह जाती है जो उनके लिए जानलेवा साबित हो रही है। यह प्लास्टिक प्लास्टिक के थैलों, बोतल के ढक्कनों और सिंथेटिक कपड़ों से निकले प्लास्टिक के धागे शहरी इलाकों से होकर सीवर और शहरी कचरे से बहकर नदियों के रास्ते समुद्र में आती है। समुद्री पक्षी प्लास्टिक की इन चमकदार वस्तुओं को गलती से खाने वाली चीज समझकर निगल लेते हैं। नतीजतन उन्हें आंत से संबंधित बीमारी होती है, उनका वजन घटने लगता है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बीते कुछ दशकों से समुद्र में फेंके जाने वाले प्लास्टिक से समुद्री जीवों की जान खतरे में आ गई है।

अगर जल्दी ही समुद्र में किसी भी तरह से आ रहे प्लास्टिक पर रोक नहीं लगाई गई तो तीन दशकों में पक्षियों की बहुत बड़ी तादाद खतरे में पड़ जाएगी। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच का तस्मानिया सागर का इलाका सर्वाधिक प्रभावित इलाका है। पीएनएएस जर्नल में प्रकाशित अमेरिकी वैज्ञानिक एरिक वैन सेबाइल और क्रिस विलकॉक्स के शोध के मुताबिक 1960 के दशक से लेकर अब तक समुद्र में पक्षियों के पेट में पाए जाने वाले प्लास्टिक की मात्रा दिनोंदिन तेजी से बढ़ती ही जा रही है। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि 1960 में पक्षियों के आहार में केवल पांच फीसद ही प्लास्टिक की मात्रा पाई गई थी। आने वाले 33 सालों के बाद 2050 में हालत यह होगी कि 99 फीसद समुदी पक्षियों के पेट में प्लास्टिक मिलने की संभावना होगी।

यदि दुनिया जहां के हालात पर नजर डालें तो पता चलता है कि नियंतण्र स्तर पर पिछले सात दशकों में प्लास्टिक का उत्पादन कई गुणा बढ़ा है। इस दौरान करीब 8.3 अरब मीट्रिक टन प्लास्टिक उत्पादन हुआ। इसमें से 6.3 अरब टन प्लास्टिक कचरे का ढेर लग चुका है, जिसका महज 9 फीसद ही रिसाइकिल किया जा सका है। साल 1950 में दुनिया में प्लास्टिक का उत्पादन केवल 20 लाख मीट्रिक टन था, जो 65 साल में यानी 2015 तक बढ़कर 40 करोड़ मीट्रिक टन हो गया है। हमारे यहां हर साल 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। पूरे देश के हालात की बात तो दीगर है, केंद्रीय प्रदूषण नियंतण्र बोर्ड की मानें तो दिल्ली में 690 टन, चेन्नई में 429 टन, कोलकाता में 426 टन और मुंबई में 408 टन प्लास्टिक कचरा हर रोज फेंका जाता है। दुख इस बात का है कि इस दिशा में सरकारों की बेरुखी समझ से परे है।(RS)

अल-जजीरा की भूमिका और खाड़ी देशों का संकट

(महेंद्र राजा जैन, वरिष्ठ हिंदी लेखक )

करीब बीस वर्ष पूर्व 1996 में जब अल-जजीरा नेटवर्क की शुरुआत हुई, तो खाड़ी के देशों के मीडिया ने उसे एक छोटे-मोटे नए खिलाड़ी से अधिक नहीं माना। पर जल्दी ही अरब देशों की समस्याओं, संकटों पर प्रस्तुत अपनी रिपोर्टों के कारण इस नेटवर्क ने अरब के मीडिया क्षेत्र में ताजा हवा का रूप ले लिया। यह अभूतपूर्व था। मगर जब इस टीवी चैनल ने खाड़ी देशों के तथाकथित ‘अछूतों’ पर टिप्पणियां शुरू कीं, तो उसे भी अप्रत्याशित रूप से अपमानजनक माना गया, क्योंकि सरकार ने मीडिया के लिए जो लक्ष्मण रेखा खींची थी, उसे उसी के अंदर रहना था। अधिकांश अरब देशों में वहां के मीडिया कर्मियों के लिए सरकारों ने सीमा रेखा खींच रखी है। निरंकुश शासक और नेता अपने विरुद्ध अप्रिय कुछ भी सुनना, देखना या पढ़ना नहीं चाहते और इसे रोकने के लिए उन्होंने काफी साधन जुटा रखे हैं। परोक्ष/ प्रत्यक्ष रूप से सरकार संचालित मीडिया के लोग उसके द्वारा निर्देशित ‘गार्डों’ के बाहर कोई और भूमिका नहीं अपना सकते। बहुमत के आधार पर भी वे सरकारों के लिए जो मैटर तैयार करते हैं, वह भी सेंसर के अधीन रहता है। एक बार मिस्र के सरकारी अखबार अल-अहराम के संपादक ओसामा सराया ने एक ब्रिटिश पत्रकार को बताया था कि वहां मीडिया का मुख्य काम सरकार के कामों की प्रशंसा करना है।

बाद में भले ही कुछ निजी मीडिया कंपनियां अस्तित्व में आईं, पर वे भी इस सीमा रेखा से बिल्कुल बाहर न निकल सकीं, क्योंकि प्राय: वे सभी किसी न किसी रूप में सरकारी पार्टनरशिप से जुड़ी थीं। इन नए मीडिया नेटवर्कों में से कुछ नाममात्र के लिए सीमा से बाहर गए, पर वे सरकारी पाबंदियां कभी नहीं लांघ सके। फिर भी इस नए सेक्टर ने तानाशाह सरकारों की सार्वजनिक छवि को उभारकर शीघ्र ही दुनिया में अपने लिए स्थान बना लिया। मीडिया को दी गई नाममात्र की छूट के कारण देश से बाहर बन रही छवि को देख निरंकुश सरकारें अपनी पीठ थपथपाने लगीं और प्रचार किया गया कि उनका मीडिया उनकी जो आलोचना कर रहा है, वह वहां के मीडिया को मिली अभिव्यक्ति की आजादी का सुबूत है। पर यह जुए में खेला गया एक दांव मात्र था।

खैर अरब जगत में स्वतंत्र-निष्पक्ष रिपोर्टिंग के समक्ष रोज नए खतरे दिखाए जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ समय पूर्व यूरोपीय समाचारपत्रों से पता चला था कि खाड़ी के देशों में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उन देशों के बीच एक ‘डील’ की गई थी कि अल-जजीरा सऊदी मामलों की रिपोर्टिंग में नरमी बरते। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, इस ‘डील’ के तहत अल-जजीरा को सऊदी अरब की सरकार के विरुद्ध उठने वाली आवाजों को प्रसारित होने से रोकना था। पर अल-जजीरा का यह कदम, यानी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक स्वतंत्र चैंपियन का कतर में शक्तिशाली कूटनीतिक प्लेटफॉर्म के नीचे झुक जाना -स्थानीय लोगों को रास नहीं आया। अल-जजीरा द्वारा ट्यूनीशिया की एज्नाहादा और मिस्र की मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी पार्टियों की सहानुभूतिपूर्ण कवरेज से उसके प्रति अविश्वास की पुष्टि हुई।

अल-जजीरा चैनल खाड़ी के देशों में उठ रहे जनांदोलनों को समर्थन देने वाले एक राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में जाना जाता रहा है। मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड की लगभग समाप्ति के बाद भी अल-जजीरा द्वारा उसके पक्ष में सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाने को उसकी राजनीतिक चाल माना जा रहा है।
इसके परिणामस्वरूप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक नियंत्रण मुक्त आजादी को देखते हुए संयुक्त अरब अमीरात ने कतर के प्रति किसी भी प्रकार के नरम रुख को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है। इसका उल्लंघन करने वालों को 15 वर्ष तक की जेल की सजा का प्रावधान है। अन्य देशों में स्वतंत्र निष्पक्ष पत्रकारिता के प्रति दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। अरब मीडिया में विचार-स्वातंत्र्य अब सीमित होता जा रहा है, पर अभी भी अल-जजीरा जैसे चैनल हैं, जो सभी प्रकार के दबावों के बीच निष्पक्ष पत्रकारिता का झंडा उठाए हुए हैं और उसके मीडियाकर्मी सभी प्रकार के खतरों का सामना करते हुए खाड़ी देशों की सरकारों के कारनामों का खुलासा करते रहते हैं।(हिंदुस्तान )

Pacific Ocean’s 11: on TPP without U.S.

The revival of the Trans-Pacific Partnership minus the U.S. opens opportunities for India

 

When Donald Trump abandoned the 12-nation Trans-Pacific Partnership (TPP) in his very first week after being sworn in as U.S. President, there were doubts whether the trade agreement, painstakingly negotiated over more than a decade, would survive. Japanese Prime Minister Shinzo Abe had termed the TPP without the United States — which contributed 60% of the combined Gross Domestic Product of the 12 members — as “meaningless”. Ten months on, exactly at a time when Mr. Trump was visiting Vietnam, trade ministers from the remaining 11 nations agreed in Danang in principle to a new pact, the Comprehensive and Progressive Agreement for the Trans-Pacific Partnership (CPTPP), revising some of the features of the TPP. For the agreement to take effect, the pact requires domestic ratification, which is expected to be complete by 2019. This major step taken by the 11 countries of the Pacific Rim excluding the U.S. is a reflection of two things. First, these countries recognise that multilateral free trade, contrary to any misgivings, is beneficial in the long run. The TPP in its current form has significant protections for labour and environment and is in this regard an advance over other free trade agreements. Second, the U.S.’s self-exclusion reflects a failure on the part of the Trump administration; studies have shown significant benefits in comparison to minor costs — in terms of jobs — to the U.S. on account of the pact.

 

As things stand, the pact without the U.S. can only be interpreted as yet another step that diminishes American power and the international order that it has so far led. Already, Mr. Trump’s decision to pull out of the Paris climate accord and his repudiation of the Iran nuclear deal have raised suspicions about American commitment to well-negotiated treaties that seek to solve or have solved long-standing issues. Mr. Trump couches his regime’s policies as populist nationalism — ‘protecting labour’ in the case of the abandonment of the TPP, promoting jobs in fossil fuel-intensive sectors to justify the repudiation of the Paris Accord, and retaining American exceptionalism in West Asian policy in scrapping the Iran nuclear deal. While rhetoric to this effect had fuelled his presidential campaign with a heavy dose of populism, the actual effect of going through with these actions has been to create a suspicion among America’s allies about his reliability when it comes to standing by old commitments. Mr. Trump’s agenda to pull his country out of multilateral agreements has coincided, ironically, with the rise of China as the leading world power promoting globalisation. Now the ASEAN-plus-six Regional Comprehensive Economic Partnership (RCEP), on which China is pushing for an agreement, could benefit from complementarities with the CPTPP. India, which is also negotiating the RCEP, must utilise this opportunity to win concessions on services trade liberalisation as part of the plan.

In Good Faith: The morality of jumping lights

 

There are obvious and central differences between thinking of morality and in the way that we think of traffic. While both spheres, bounded by rules and supported by sanctions, aim at a smooth and conflict- free interaction between individuals, there is an essential asymmetry between them: Traffic rules are entirely regulative. It doesn’t matter if you drive on the left or right, as long as you drive on a particular side. Like the introduction of odd-even number plates, these rules can be arbitrarily altered or suddenly suspended without our being able to complain that the air has been taken out of civil liberty.

Moral and juridical rules, however, are constitutive of the way in which we live and interact with each other. They cannot, we hope, be arbitrarily replaced by another set, in which, say, murder is okay but marriage is not. Traffic restrictions lie on the surface of human interaction, where men and machines, and men in and as machines, are regulated and must regulate themselves. But while morality underpins these rules, it also frames them: How we behave on the road is an image of ourselves. How we drive is how we are driven. Much needs to be done to understand why there are so many routine violations of traffic rules. Is it because there are not enough policemen or not enough decent men on our roads?

Take traffic lights as a paradigm case. In Delhi, jumping lights is a feature of daily life. It is, in principle, dangerous and very often fatal for either the violator or the innocent passerby or both. If everyone crashed lights, there would be chaos. Comparably, if everyone always told lies, there would be no difference between lying and truth-telling, making it impossible to lie. But that’s not quite right: There are numerous occasions when everyone has to crash lights for the simple reason that they don’t work. There is a parallel lesson for the moral violation of lying: With increasing lying, the difference between truth and falsity is not abandoned, as Kant thought, but actually sharpened. If fake news makes all non-authoritative news suspect, new standards of authority must be devised. Even the absence of news or its manipulation flags itself: We do not abandon truth, but look more carefully for it.

Non-functioning traffic lights force people to take unilateral decisions when co-operative action is called for. This has the effect, not legally but psychologically speaking, of legitimising jumping lights when they do work. They say that killers become inured after the first (few) kills. Crashing lights also alters our character. We infect each other until the malady becomes an epidemic. Soon, we think little of rule-breaking, especially when no one is looking. Like school children singing patriotically and piously as their teachers look on, motorbikes and cars line up obediently at crossings only when some competent authority is present. Even the presence of a patrol car will not deter experienced jumpers for only traffic police can issue chalans. The violator, like any repeat offender, is aware of what he is doing. For, crashing lights is perfectly rational.

There are broadly two concepts of rationality at work: Reason is either a faculty which, having a (rational) goal as its aim, chooses the best available means to achieve it. Or it is merely a faculty which calculates the means to any given end. For most people, practical reason is a means to achieve immediate goals, whatever they may be. In the case of the light-crasher, the goal is simply getting across quickly.

Slowing down the speedster includes strategies like timers on lights which show the duration of the impending wait (in the old days when petrol was cheaper than it is now, but salaries lower, drivers used to switch off their engines for the minute or two that they had to wait). Subliminal messages like “relax” appear red-faced on some signals, playing both good and bad cop. No study has been done to determine how effective such psychological policing is. In any case, at traffic lights you only have to get the first few vehicles to stop to stop the others per force.

But the assumption that light-crashers are in a hurry is questionable: It is not the real reason for jumping lights (fallacy of pro causa non causa). Those who jump lights appear to be in a hurry; but are in no more haste than everybody else, and not more likely to get anywhere faster. There may, in fact, be no one reason why people jump lights, just as there is no one reason why people vote for a particular candidate or a particular party; they may do so for reasons often unknown to themselves.

Here, it is not the hurry to get across that best describes such misconduct, but the opportunity to leave fellow travellers behind. This is what lures the criminal to make his dash. His motive is simply to get the better of others; it’s a competitive play which can explain other forms of non- egalitarian behaviour; a kind of cheating, short-changing someone else, not because it makes you richer, but because it enables you to “steal a march on them’’. Most likely, this fills out a sense of self-worth that may be otherwise missing; accomplishing something that is potentially dangerous. It is this that often makes the light rider throw caution to the winds, he simply wants to seize the day.

No arguments will be effective against such behaviour, least of all the one from self interest: You might kill or be killed or injured. The future isn’t here or now after all. Suicidal behaviour is not the privilege of fanatics, nor fun only for fundamentalists. So back to the good old carrots and sticks. Carrots being in short supply, the stick alone remains. As Lord Krishna said “dando damyatam asmi”. If there is one area where no one could rightly complain of police action, it is the one area where the police seem least active. Which makes one wonder if law and order are really a priority.

 

 

 

IMPORTANT NEWS ARTICLE

1-प्रति व्यक्ति औसत जीडीपी में सुधार
• अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के आंकड़े की ताजा रपट के अनुसार प्रति व्यक्ति औसत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से भारत एक पायदान ऊपर चढ़ कर 126वें स्थान पर पहुंच गया है। हालांकि वह अभी भी अपने दक्षेस समकक्षों की तुलना में नीचे है।
• मुद्राकोष की सूची में खनिज तेल संपन्न कतर शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। यह रैंकिंग अंर्ताष्ट्रीय मुद्रा कोष की अक्टूबर 2017 की क्र य शक्ति समानता पर आधारित आंकड़ों पर की गई है। भारत में प्रति व्यक्ति औसत जीडीपी पिछले साल 6,690 डालर के मुकाबले बढ़कर इस साल 7170 डालर हो गया और वह 126वें पायदान पर पहुंच गया।
• दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में क्रेडिट सुइस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2.45 लाख करोड़पति हैं और देश की कुल घरेलू संपदा 5000 अरब डालर है।
• प्रति व्यक्ति औसत 1,24,930 डालर के जीडीपी के साथ कतर 2017 में सबसे अमीर देश रहा। इसके बाद मकाउ (प्रति व्यक्ति जीडीपी 1,14,430 डालर) और लक्जमबर्ग (1,09,109 डालर) का स्थान है।
• ब्रिक्स देशों में प्रति व्यक्ति औसत जीडीपी के लिहाज से भारत का स्थान सबसे नीचे हैं।
• रिपोर्ट के अनुसार रूस में प्रति व्यक्ति औसत जीडीपी 27,900 डालर जबकि चीन में 16,620 डालर, ब्राजील मं( 15,500 डालर और दक्षिण अफ्रीका में प्रति व्यक्ति औसत जीडीपी 13,400 डालर है।
• शीर्ष 10 देशों में चौथे स्थान पर सिंगापुर (90,530 डालर), पांचवें पर ब्रूनई (76,740 डालर), छठवें पर आयरलैंड (72,630 डालर), सातवें पर नोर्वे (70,590 डालर), आठवें पर कुवैत ( 69,670 डालर), 9वें पर संयुक्त अरब अमीरत (68,250 डालर), 10वें पर स्विट्जरलैंड (61,360 डालर) है।
• प्रति व्यक्ति जीडीपी पिछले वर्ष के मुकाबले बढ़ कर 7170 डालर पर पहुंचा
• पिछले वर्ष 6690 प्रति व्यक्ति रहा था देश का सकल घरेलू उत्पादन
• हालांकि ब्रिक्स देशों में प्रति व्यक्ति जीडीपी में सबसे नीचे है भारत
• इस साल 1,24,930 डालर के साथ पहले पायदान पर रहा कतर2-लॉजिस्टिक्स को बुनियादी ढांचा क्षेत्र का दर्जा जल्द

• लाजिस्टिक्स क्षेत्र को जल्द बुनियादी ढांचा क्षेत्र का दर्जा मिलेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इससे इस क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी दरों पर धन जुटाने में मदद मिलेगा और इसका विदेशी व्यापार बढ़ेगा।

• अधिकारी ने बताया कि इस बारे में वाणिज्य मंत्रालय द्वारा आगे बढ़ाए गए प्रस्ताव को वित्त मंत्रालय ने मंजूरी दे दी है। जल्द इस बारे में अधिसूचना जारी की जाएगी। अधिकारी ने कहा, देश के व्यापार को प्रोत्साहन के लिए क्षेत्र में भारी निवेश की जरूरत है।

• बुनियादी ढांचा क्षेत्र का दर्जा मिलने से उद्योग को निवेश आकर्षित करने में मदद मिलेगी। वाणिज्य मंत्रालय की परिभाषा के अनुसार लाजिस्टिक्स में औद्योगिक पार्क, भंडारण गृह, शीत भंडारण और परिवहन सुविधाएं आती हैं।

• बुनियादी ढांचा क्षेत्र का दर्जा मिलने से इस क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी दर पर कर्ज मिल सकेगा। लाजिस्टिक्स की लागत से निर्यातकों की नियंतण्र स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता प्रभावित होती है।

• लाजिस्टिक्स क्षेत्र के महत्व को समझते हुए सरकार ने वाणिज्य मंत्रालय में एक अलग विशेष सचिव स्तर का पद बनाया है।

3-वैज्ञानिकों को एक बार फिर मिलीं गुरुत्वाकर्षण तरंगें

• वैज्ञानिकों ने एक बार फिर ब्लैक होल में गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज की है। धरती से करीब एक अरब प्रकाश वर्ष दूर और सूर्य से क्रमश: सात व 12 गुना अधिक भार वाले दो हल्के ब्लैक होल के आपस में मिलने से इन तरंगों की खोज हुई है।
• दोनों ब्लैक होल जब आपस मिले तो इनका द्रव्यमान सूर्य से 18 गुना ज्यादा था। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्लैकहोल्स के टकराने पर अंतरिक्ष और समय के संबंध का पता लगता है।
• लेजर इंफ्रोमीटर ग्रेवीटेशनल वेव्स ऑब्जर्वेट्री (लिगो) परियोजना और इटली स्थित वर्गो डिटेक्टर से जुड़े वैज्ञानिकों ने इस खगोलीय घटना से इस वर्ष जून को रूबरू हुए। हालांकि खोजों को समझने में अधिक समय लगने से इसकी घोषणा में देरी हुई।
• पहली बार 2015 में चला था पता : जीडब्ल्यू170608 सबसे हल्का ब्लैक होल है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब गुरुत्वाकर्षण तरंगों के माध्यम से ब्लैक होल का पता लगाया गया है। पहली बार 14 सितंबर, 2015 को इन तरंगों की खोज हुई। तब इसे सदी की महान खोज कहा गया था।
• क्या है अवधारणा : वैज्ञानिकों का मानना है कि कई खरब साल पहले जब इस सृष्टि की शुरुआत भी नहीं हुई थी तब दो विशालकाय ब्लैक होल्स आपस में टकराए थे। उनकी टक्कर से बड़ी मात्र में ऊर्जा निकली थी।
• इतनी ऊर्जा कि हजारों सूर्य की ऊर्जा भी मिला दें, तो उसके सामने फीकी पड़ जाए। इसी के साथ ही कई तरंगें भी पैदा हुईं और पूरे ब्रह्माण्ड में फैल गईं।
• इन्हीं तरंगों को गुरुत्वाकर्षण तरंग कहा जाता है और माना जाता है कि ये तरंगें आज भी भटक रही हैं, जो अक्सर हमसे और हमारी धरती से टकराती हैं लेकिन असर इतना कम होता है कि हम इन्हें महसूस नहीं कर पाते, इन्हें सिर्फ अति-संवेदनशील उपकरणों के जरिए ही पकड़ा जा सकता है।

4-मनमोहन सिंह को मिलेगा इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार

• पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 2004 से 2014 के बीच देश का नेतृत्व करने और नियंतण्र स्तर पर भारत का ओहदा बढ़ाने के लिए इस साल का इंदिरा गांधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार दिया जाएगा।
• इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट के बयान के अनुसार, सिंह को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली एक अंतरराष्ट्रीय ज्यूरी द्वारा पुरस्कार के लिए सर्वसम्मति से चुना गया।
• ट्रस्ट सचिव सुमन दुबे ने बयान जारी कर बताया, इंदिरा गांधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार मनमोहन सिंह को 2004 से 2014 के बीच देश का नेतृत्व करने और उनकी उपलब्धियों के लिए दिया जाएगा।

 

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