Daily Current(13/01/2018) For UPSC IAS CDS CAPF UPPSC MPPSC RAS

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1.सुप्रीम कोर्ट में सब सही नहीं, खतरे में पड़ सकता है लोकतंत्र
• विवादों को सुलझाने वाली शीर्ष न्यायिक संस्था खुद ही कठघरे में खड़ी हो गई है। एक अभूतपूर्व घटना में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) दीपक मिश्र के खिलाफ सार्वजनिक मोर्चा खोल दिया। आगाह किया कि संस्थान में सब कुछ ठीक नहीं है। स्थिति नहीं बदली तो संस्थान के साथ साथ लोकतंत्र भी खतरे में है।
• मीडिया के सामने आने के न्यायाधीशों के चौंकाने वाले फैसले ने न सिर्फ आंतरिक कलह को खोलकर सामने रख दिया है, बल्कि कानूनविदों को भी खेमे में बांट दिया। पूरे दिन यह अटकल चलती रही कि जवाब में सीजेआइ भी अपना पक्ष रख सकते हैं। उन्होंने अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल से बात जरूर की, लेकिन खुद मीडिया से दूर रहे।
• अटार्नी जनरल के मुताबिक, जजों को प्रेस कांफ्रेंस करने जैसे कदम से बचना चाहिए था। शुक्रवार का दिन सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में अभूतपूर्व घटना के रूप में दर्ज हो गया। यूं तो कई मसलों पर कोर्ट के अंदर मतभेद की चर्चा होती रही है, लेकिन मीडिया से दूरी बनाकर रखने की सारी परंपराएं टूट गईं। व्यवस्था को लेकर बगावत हुई और खुले तौर पर आरोप भी लगाए गए। लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ में मोटी दरार दिखी।
• मुख्य न्यायाधीश के बाद वरिष्ठता में दूसरे से पांचवें क्रम के जजों यानी जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने मीडिया से रूबरू होते हुए आरोप लगाया कि ‘सुप्रीम कोर्ट प्रशासन में सब कुछ ठीक नहीं है और कई ऐसी चीजें हो रही है जो नहीं होनी चाहिए। अगर यह संस्थान सुरक्षित नहीं रहा तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।’
• सात पेज का पत्र किया जारी : जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि चारों जजों ने मुख्य न्यायाधीश को कुछ दिनों पहले पत्र लिखकर अपनी बात रखी थी। शुक्रवार को भी सुबह उनसे मुलाकात कर शिकायत की, लेकिन वह नहीं माने। इसीलिए लोकतंत्र की रक्षा के लिए उन्हें मीडिया के सामने आना पड़ा। उन्होंने मीडिया को सात पेज की वह चिट्ठी भी वितरित की जो जस्टिस मिश्र को लिखी गई थी। उसमें मुख्य रूप से पीठ को केस आवंटित किए जाने के तरीके पर आपत्ति जताई गई है।
• न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया के एक मुद्दे का तो पत्र में उल्लेख है लेकिन माना जा रहा है कि यह खींचतान लंबे अर्से से चल रही थी। शायद सीबीआइ जस्टिस बीएच लोया की मौत का मुकदमा तात्कालिक कारण बना, जिस पर शुक्रवार को ही सुप्रीम कोर्ट की अन्य बेंच में सुनवाई थी।
• अपने आवास के लॉन में मीडिया से रूबरू जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि उन्हें बहुत भारी मन के साथ प्रेस के सामने आना पड़ा है क्योंकि ‘वह नहीं चाहते बीस साल बाद कोई बोले कि उन्होंने अपनी आत्मा बेच दी।’ सुप्रीम कोर्ट में तनातनी का आलम क्या है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि चिट्ठी में ही चारों जज ने साफ किया कि ‘मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम नहीं हैं।
• पीठ को केस आवंटित करने का उनका अधिकार भी केवल सामान्य परंपरा का हिस्सा है, कानून नहीं।’ एक सवाल के जवाब में जस्टिस रंजन गोगोई ने रैंक तोड़ने की बात से इन्कार करते हुए कहा-‘वह देश के प्रति अपने ऋण को चुका रहे हैं।’ ध्यान रहे कि जस्टिस गोगोई ही अगले मुख्य न्यायाधीश बनने वाले हैं। वैसे चारों न्यायाधीश वरिष्ठ हैं और कोलेजियम में मुख्य न्यायाधीश के अलावा ये ही चारों हैं।
• यह पूछने पर कि क्या वह जस्टिस मिश्र का महाभियोग चाहते हैं, जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा-‘अपने शब्द हमारे मुंह में न डालिए।’
• जस्टिस मदन भीमराव लोकुर:- साल 1974 में दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में स्नातक करने वाले जस्टिस मदन भीमराव लोकुर गुवाहाटी और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं। उन्हें 4 जून 2012 को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। जस्टिस लोकुर इस वर्ष 30 दिसम्बर को सेवानिवृत्त होंगे।
• जस्टिस चेलामेश्वर:- 23 जून 1953 को आंध्र प्रदेश में जन्मे जस्टिस चेलामेश्वर 1997 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जज बने थे। उन्हें 2007 में गुवाहाटी हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया। इसके बाद साल 2010 में वह केरल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने और फिर 20 अक्टूबर 2011 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। वे 22 जून 2018 को रिटायर होंगे।
• जस्टिस कुरियन जोसेफ:- 30 नवंबर 1953 को जन्मे जस्टिस कुरियन जोसेफ दो बार केरल हाईकोर्ट के कार्यकारी चीफ जस्टिस रह चुके हैं। उन्हें 2013 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया था और फिर 8 मार्च 2013 को वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने। जस्टिस जोसेफ कुरियन 29 नवंबर 2018 को सेवानिवृत्त होंगे।
• जस्टिस रंजन गोगोई:- 18 नवंबर 1954 को जन्मे जस्टिस गोगोई ने गुवाहाटी हाई कोर्ट में ही अधिकांश प्रैक्टिस की। साल 2001 में उन्हें गुवाहाटी हाई कोर्ट में परमानेंट जज नियुक्त किया गया। इसके बाद जस्टिस गोगोई का ट्रांसफर साल 2010 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में कर दिया गया। 23 अप्रैल 2012 को जस्टिस गोगोई को सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त किया गया। इन्हें 17 नवम्बर 2019 में रिटायर होना है।
• जजों के प्रमुख आरोप: सीजेआइ खास मामले पसंद की पीठों व जजों को ही सौंपते हैं। केस बंटवारे में नियमों का पालन नहीं कर रहे।
• सीजेआइ बराबर के जजों में प्रथम होते हैं, न कि उनसे कम या ज्यादा।
• सीजीआइ उस परंपरा से बाहर जा रहे हैं, जिसमें महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय सामूहिक तौर पर लिए जाते रहे हैं।
• कोर्ट में बहुत कुछ ऐसा हुआ है, जो नहीं होना चाहिए था।
• सुप्रीम कोर्ट पर एक नजर : स्वीकृत 31 पदों में से फिलहाल 25 जज हैं।
• सीजेआइ दीपक मिश्र का कार्यकाल दो अक्टूबर, 2018 तक है। उसके बाद जस्टिस रंजन गोगोई अगले सीजेआइ होंगे, क्योंकि जस्टिस चेलमेश्वर जून में ही रिटायर हो जाएंगे।
• केस बंटवारे का पारंपरिक तरीका1सीजेआइ प्रशासनिक प्रमुख होने के नाते विषयवार रोस्टर बनाते हैं।
• संबंधित केस उसके हिसाब से ही संबंधित पीठ को सौंपे जाते हैं।
• आरोप इस व्यवस्था के बाहर जाकर केस बंटवारे का है।

2. आरपी लूथरा मामला : न्यायालय में विवादों की जड़
• उच्चतम न्यायालय के चार सर्वाधिक वरिष्ठ न्यायाधीशों ने प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को जो पत्र लिखा था, उसमें बिना किसी तर्क के तरजीह वाली पीठ को चयनात्मक तरीके से मामले को आवंटित करने के बारे में सवाल उठाने के लिये आरपी लूथरा बनाम भारत सरकार के मामले का उल्लेख किया गया है। उस मामले में मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर का उल्लेख किया गया है।
• उच्चतम न्यायालय के चार सर्वाधिक वरिष्ठ न्यायाधीशों न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन एवं अन्य बनाम भारत सरकार : (2016) 5 एससीसी 1: के अनुसार जब एमओपी पर इस अदालत की संविधान पीठ को फैसला सुनाना था तो यह समझना मुश्किल है कि कैसे कोई अन्य पीठ इस विषय पर सुनवाई कर सकती है।
• गत वर्ष 27 अक्टूबर को शीर्ष अदालत की दो न्यायाधीशों की पीठ ने उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर को अंतिम रूप देने में विलंब के मुद्दे का न्यायिक पक्ष की तरफ से परीक्षण करने पर सहमति जता दी थी और अटार्नी जनरल से जवाब मांगा था। पीठ ने कहा था, हमें प्रार्थना पर विचार करने की जरूरत है कि व्यापक जनहित में एमओपी को अंतिम रूप देने में और विलंब नहीं होना चाहिये। यद्यपि इस अदालत ने एमओपी को अंतिम रूप देने के लिये कोई समयसीमा नहीं तय की है, लेकिन इसे अनिश्चिकाल के लिये नहीं खींचा जा सकता है।
• आरपी लूथरा खुद वकील हैं। वह खुद इस मामले में पेश हुए थे और एमओपी के अभाव में उन्होंने उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्तियों को चुनौती दी थी। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) मामले में फैसले के मद्देनजर एमओपी को अंतिम रूप दिया जाना था।
• यह पत्र तकरीबन दो महीने पहले चारों न्यायाधीशों ने प्रधान न्यायाधीश को लिखा था, लेकिन उसे आज मीडिया को जारी किया गया। उसमें सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एवं अन्य बनाम भारत सरकार (एनजेएसी मामला) में संविधान पीठ के फैसले का भी उल्लेख है जिसमें केंद्र से सीजेआई के साथ विचार-विमर्श करके नया एमओपी तैयार करने को कहा गया था। एनजेएसी मामले में बहुमत के फैसले से असहमति जताते हुए न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने कहा था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम पण्राली ‘‘अपारदर्शी’ है और ‘‘पारदर्शिता’ की जरूरत है।
• न्यायमूर्ति चेलामेश्वर एनजेएसी मामले में पांच सदस्यीय संविधान पीठ का हिस्सा थे। आरपी लूथरा मामला हालांकि बाद में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष गत आठ नवंबर को सूचीबद्ध किया गया था। उसने एमओपी को अंतिम रूप देने में विलंब के मुद्दे का परीक्षण करने के दो न्यायाधीशों की पीठ के 27 अक्तूबर के आदेश को वापस ले लिया था।
• तीन न्यायाधीशों की पीठ ने तब कहा था, इन मुद्दों पर न्यायिक पक्ष विचार नहीं कर सकता है क्योंकि एनजेएसी मामले में संविधान पीठ ने पहले ही कानून तय किया है।चार न्यायाधीशों ने अपने पत्र में कहा, एमओपी के बारे में किसी भी मुद्दे पर र्चचा मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में होनी चाहिये और पूर्ण अदालत द्वारा होनी चाहिये। इतने महत्वपूर्ण मामले पर अगर न्यायिक पक्ष को विचार करना है तो इसपर संविधान पीठ के अलावा किसी और को विचार नहीं करना चाहिये।
• चारों न्यायाधीशों ने इस घटनावम को ‘‘गंभीरंिचता’ के साथ देखा जाना चाहिए। पत्र में कहा गया था, माननीय प्रधान न्यायाधीश हालात में सुधार करने के लिये कर्तव्य से बंधे हैं और कॉलेजियम के अन्य सदस्यों के साथ पूर्ण र्चचा और जरूरत पडने पर बाद में इस अदालत के अन्य माननीय न्यायाधीशों के साथ र्चचा के बाद उचित उपचारात्मक कदम उठाएं।
• चारों न्यायाधीशों ने पत्र में प्रधान न्यायाधीश से यह भी कहा था, एक बार जब आप आरपी लूथरा बनाम भारत सरकार मामले में 27 अक्टूबर 2017 के आदेश से पैदा हुए मुद्दे का पर्याप्त निराकरण कर देते हैं और अगर यह उतना जरूरी हो जाता है तो हम इस अदालत द्वारा दिये गए अन्य न्यायिक आदेशों से विशेष रूप से आपको अवगत कराएंगे। उनसे भी उसी तरह से निपटने की जरूरत होगी।

3. इसरो ने अंतरिक्ष में लगाया शतक कार्टोसेट-2 समेत 31 उपग्रह भेजे
• अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत को महाशक्ति बनाने वाले इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। हॉलीवुड फिल्मों से भी कम खर्चे में मंगल तक अंतरिक्ष यान भेज देने वाली अंतरिक्ष एजेंसी ने शुक्रवार को 100वां उपग्रह भेजा।
• पिछली असफलता से पार पाते हुए इसरो ने कार्टोसेट -2 श्रृंखला के तीसरे उपग्रह समेत कुल 31 उपग्रहों को धरती की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। इस मौके पर कंट्रोल रूम में मौजूद इसरो के अध्यक्ष किरण कुमार ने कहा कि अंतरिक्ष एजेंसी 2018 की शुरुआत सफल प्रक्षेपण से कर रही है। कार्टोसेट का प्रदर्शन अब तक संतोषजनक है।
• उपग्रहों का प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से शुक्रवार सुबह 9.28 बजे पीएसएलवी सी-40 के जरिये किया गया। इससे पहले पीएसएलवी सी-39 का प्रक्षेपण असफल रह गया था, क्योंकि हीट शील्ड अलग नहीं हो पाए थे। पीएसएलवी सी-40 वर्ष 2018 की पहली अंतरिक्ष परियोजना है।
• इस सफल प्रक्षेपण के साथ किरण कुमार इसरो प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त हो गए। भारत सरकार ने उनकी जगह सिवान के को अंतरिक्ष एजेंसी का नया अध्यक्ष बनाया है।
• सात देशों के उपग्रह भेजे : शुक्रवार को जो 31 उपग्रह अंतरिक्ष भेजे गए हैं, उनमें से तीन भारतीय और 28 उपग्रह छह अन्य देशों के हैं। कार्टोसेट -2 के अलावा भारत का एक माइक्रो और एक नैनो उपग्रह भी भेजा गया है। कनाडा, फिनलैंड, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अमेरिका के तीन माइक्रो और 25 नैनो उपग्रह भेजे गए हैं। इनमें अकेले अमेरिका के 19 और दक्षिण कोरिया के पांच उपग्रह हैं।
• कार्टोसेट -2 की विशेषताएं : कार्टोसेट -2 उपग्रह का उपयोग शहरी और ग्रामीण अनुप्रयोगों की निगरानी, तटीय भूमि उपयोग विनियमन, सड़क नेटवर्क, नक्शा बनाने और जल वितरण जैसी सेवाओं के प्रबंधन में किया जाएगा।
• यह एक अर्थ इमेजिंग सेटेलाइट है, जो दुश्मन पर नजर रखने के काम आएगा। इससे भारत को सीमा पर आतंकी गतिविधियों पर नजर रखने में भी आसानी होगी।

4. आइडिया-वोडाफोन के विलय को कंपनी लॉ टिब्यूनल से मिली मंजूरी
• नेशनल कंपनी लॉ टिब्यूनल (एनसीएलटी) ने आइडिया सेल्युलर और वोडाफोन के बीच विलय को मंजूरी दे दी है। यह दोनों दिग्गज टेलीकॉम कंपनियों के एकीकरण की दिशा में एक और बड़ा कदम है।1आइडिया सेल्युलर ने रेगुलेटरी फाइलिंग में जानकारी दी कि टिब्यूनल की अहमदाबाद बेंच ने 11 जनवरी को विलय की योजना को मंजूरी दे दी।
• इसी तरह के वोडाफोन के आवेदन पर एनसीएलटी से मंजूरी मिलने के बाद दोनों कंपनियां अंतिम मंजूरी के लिए दूरसंचार विभाग में आवेदन कर सकेंगी। 1दोनों कंपनियों के विलय के बाद अस्तित्व में आने वाली नई कंपनी में वोडाफोन इंडिया की 47.5 फीसद हिस्सेदारी हो सकती है। बाकी हिस्सेदारी आइडिया के प्रमोटर आदित्य बिरला समूह के पास रहेगी।
• टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई के ताजा आंकड़ों के मुताबिक दोनों कंपनियों के मोबाइल ग्राहकों की कुल संख्या 40 करोड़ के ऊपर है। विलय के बाद बनने वाली कंपनी देश की सबसे बड़ा टेलीकॉम कंपनी होगी। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के अनुसार विलय के बाद कंपनी का कुल सालाना राजस्व 77,500 से 80,000 करोड़ रुपये के बीच होगा। स्पेक्ट्रम और इन्फ्रास्ट्रक्चर में पूंजीगत व्यय का दोहराव रुकेगा।
• वोडाफोन इंडिया के सात सर्किलों में और आइडिया के दो सर्किलों में स्पेक्ट्रम का परमिट 2021-22 में समाप्त हो रहा है। इन दोनों सर्किलों में उनके स्पेक्ट्रम की कुल कीमत ताजा नीलामी के अनुसार करीब 12 हजार करोड़ रुपये है।
• दोनों कंपनियों के ये परमिट अलग-अलग सर्किलों में हैं। इस तरह उन कंपनियों को स्पेक्ट्रम पर पूंजीगत व्यय में भी बचत होगी।

5. ग्लोबल वार्मिग से 20 वर्षो में पड़ेगी भयंकर बाढ़ की मार
• वर्तमान में ग्लोबल वार्मिग दुनिया के सबसे बड़े संकटों में से एक बन चुकी है। इसके वर्तमान और आगामी दुष्परिणामों के बारे में वैज्ञानिक और शोधकर्ता निरंतर आगाह कर रहे हैं और इससे बचने के लिए उचित कदम उठाने की सलाह भी दे रहे हैं। इसी कड़ी में एक और अध्ययन सामने आया है, जिसमें एक भयानक स्थिति के पैदा होने की चेतावनी दी गई है।
• शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्लोबल वार्मिग जिस तरह से अपना असर दिखा रही है उस हिसाब से आगामी 20 वर्षो में अमेरिका के अधिकतर हिस्सों के अलावा भारत, अफ्रीका और मध्य यूरोप के कई इलाके भयंकर बाढ़ की चपेट में होंगे। इससे बड़े स्तर पर जनजीवन प्रभावित होगा और आर्थिक व सामाजिक संकट पैदा हो जाएंगे।1शोधकर्ताओं के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिग के कई दुष्परिणामों का सामना हम आज भी कर रहे हैं। उनमें से एक नदियों में बाढ़ है।
• यह नवीन अध्ययन इस आपदा के व्यापक स्तर को जानने के लिए जर्मनी स्थित पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (पीआइके) के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इसमें चेतावनी दी गई है कि वर्ष 2040 तक नदियों में उफान बढ़ता जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप कई शहर और इलाकेबाढ़ की चपेट में होंगे।
• सुरक्षा स्तर बढ़ाने की जरूरत : शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि बाढ़ के कारण दुनियाभर के लाखों लोग संक्रमण की चपेट में होंगे। सांइस एडवांसेस नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, इस अध्ययन के प्रमुख लेखक और पीआइके में शोधकर्ता स्वेन विलनर का कहना है कि आगामी दो दशकों में आने वाले इस भयंकर संकट से यदि बचना है तो अमेरिका को कम से कम अपने सुरक्षा स्तर को दोगुना करने की जरूरत है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव यहीं पड़ने वाला है। इसलिए बेहतर यही होगा कि इसके लिए उपयुक्त कदम अभी से उठाए जाने शुरू कर दिए जाएं।
• ये कदम उठाए जाने की दी सलाह : शोधकर्ताओं ने कुछ जरूरी कदमों को उठाने की सलाह भी दी है। इसके तहत नदी प्रबंधन में सुधार, भवन निर्माण के मानकों को सख्त करना, खतरे वाले स्थानों से बस्तियों के स्थानांतरण की व्यवस्था आदि ऐसे कदम हैं, जिससे इस आपदा के असर को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
• इतने लोग होंगे प्रभावित : शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि, उत्तरी अमेरिका में बाढ़ से प्रभावित होने वालों की संख्या में 10 लाख तक का इजाफा हो सकता है। पहली नजर में यह आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं लगता है, लेकिन इस संख्या के 10 गुना तक बढ़ने की आशंका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा दक्षिण अमेरिका में 60 लाख से 1.2 करोड़ लोग, अफ्रीका में ढाई करोड़ से साढ़े तीन करोड़ और एशिया में सात करोड़ से 15 करोड़ के करीब लोग इससे प्रभावित होंगे। हालांकि ये केवल शुरुआती अनुमान हैं।
• इन आंकड़ों के और विशाल होने की भी आशंका है। विभिन्न स्रोतों से जुटाए गए तथ्यों का कंप्यूटर द्वारा विश्लेषण करने के बाद शोधकर्ताओं ने उपरोक्त आंकड़े जारी किए हैं। विलनर के मुताबिक, इन आंकड़ों के पूरी तरह सटीक होने की पुष्टि नहीं की जा सकती। यह मोटा-मोटा अनुमान है। संकट इससे कई ज्यादा बड़ा या इससे कुछ कम भी रह सकता है।

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