Daily Current(15/01/2018) For UPSC IAS CDS CAPF UPPSC MPPSC RAS

1. इस्रइली प्रधानमंत्री का प्रोटोकाल तोड़ मोदी ने किया स्वागत
• पीएम नरेन्द्र मोदी ने भारत दौरे पर आज यहां आए इस्रइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की सारे प्रोटोकाल तोड़ते हुए खुद हवाई अड्डे जाकर अगवानी की और पूरी गर्मजोशी के साथ गले लगाकर उनका स्वागत किया। पीएम मोदी की गर्मजोशी से प्रभावित होकर नेतन्याहू ने उनका शुक्रिया अदा किया।
• इस्रइली प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए हवाई अड्डे पर विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह के अलावा कई शीर्ष अधिकारी मौजूद थे। हवाई अड्डे से नेतन्याहू और मोदी सीधे तीन मूर्ति स्मारक पहुंचे। नेतन्याहू के साथ उनकी पत्नी सारा और 130 सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल भी भारत आया है।
• नेतन्याहू की यह भारत यात्रा पीएम मोदी की इस्रइल यात्रा के महज छह महीने बाद हो रही है। हालांकि किसी इस्रइली पीएम का यह 15 साल के लंबे अंतराल के बाद भारत आना हो रहा है। इससे पहले इस्रइल के पूर्व प्रधानमंत्री ऐरेल शेरोन 2003 में भारत आए थे।
• भारत और इस्रइल के बीच राजनयिक संबंधों के 25 साल पूरे होने के अवसर पर हो रही नेतन्याहू की इस यात्रा के अवसर पर दोनों देशों के बीच रक्षा, कृषि, व्यापार, साइबर अपराधों की रोकथाम तथा जल प्रबंधन के क्षेत्र में अहम करार होने की संभावना है।
• इसमें इस्रइल के साथ 430 करोड़ रूपये का बराक मिसाइल सौदा सबसे अहम माना जा रहा है। उम्मीद है कि इस मिसाइल खरीद से भारत की नौसेना की युद्धक क्षमता में और इजाफा होगा।

2. सिर्फ एक वोट से नहीं बदल सकते भारत और इजरायल के रिश्ते :- नेतन्याहू
• इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत के साथ उनके देश के रिश्ते को ‘स्वर्ग में हुआ गठबंधन’ करार दिया है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में सिर्फ एक नकारात्मक वोट से भारत-इजरायली रिश्ते के समीकरण नहीं बदल सकते हैं।
• यरुशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने के अमेरिकी फैसले के खिलाफ भारत के वोट पर नेतन्याहू ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि उनके विचार से एक वोट से आम धारणा पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। इस बात को आप अन्य दूसरे वोटों और हरेक बात के अलावा इन यात्रओं में भी देख सकते हैं।
• एक समाचार चैनल के पूछे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारत के फलस्तीन के पक्ष में वोट देने से स्वाभाविक रूप से निराशा हुई थी। लेकिन यह यात्र इस बात का प्रमाण है कि दोनों देशों का रिश्ता कई मोर्चो पर बढ़ता जा रहा है। फिर चाहे वह राजनीतिक मोर्चा हो, तकनीकी हो, पर्यटन, सुरक्षा और दूसरे कई क्षेत्र सभी तरफ द्विपक्षीय संबंध मजबूत हुए हैं। जल्द ही संयुक्त राष्ट्र के सभी वोटों में आप इसका असर देखेंगे।
• उल्लेखनीय है कि पिछले साल दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र में तुर्की और यमन के लाए प्रस्ताव के पक्ष में भारत ने वोट दिया था। इस प्रस्ताव में यरुशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने के अमेरिकी प्रस्ताव का विरोध किया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस प्रस्ताव का समर्थन भारत समेत 127 देशों ने किया था। जबकि विरोध में केवल 9 वोट पड़े हैं।
• इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा कि सबसे पहले तो दोनों देशों के बीच विशेष रिश्ते हैं। यह रिश्ते यहां की जनता के आपसी रिश्तों और नेताओं के आपसी रिश्तों पर आधारित हैं।
• भारत और इजरायल के बीच की साङोदारी ऐसी शादी है जो स्वर्ग में तय गई है। लेकिन इसे मूर्तरूप धरती पर दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अत्यधिक आदर होने की बात स्वीकार करते हुए नेतन्याहू ने कहा कि वह एक महान नेता हैं। क्योंकि वह अपने लोगों का भविष्य संवारने के लिए अधीर हैं।
• आतंकवाद रोधी सहयोग पर उन्होंेने कहा कि इसके मूल में खुफिया तंत्र है। इससे बेहतर कोई नहीं है। हम आपसे अपने खुफिया तंत्र को साझा करते हैं और पिछले कुछ सालों में करीब 30 प्रमुख आतंकी हमलों को रोक चुके हैं।
• यह साङोदारी हम सिर्फ भारत के साथ ही नहीं करते बल्कि दर्जनों अन्य देशों के साथ भी करते हैं। इजरायल कितने ही लोगों के जीवन की रक्षा करता है। जब आप एक विमान पर सवार होते हैं तो आप जानना चाहते हैं कि विमान को हवा में बम से तो नहीं उड़ा दिया जाएगा। इजरायल का यह योगदान हरेक फ्लाइट पर तो नहीं लेकिन कुछेक उड़ानों को लेकर जरूर होता है।
• जब उनसे पूछा गया कि क्या वह पाकिस्तान पर भारत की सीमा पार कर सर्जिकल स्ट्राइक को उचित मानते हैं, नेतन्याहू ने कहा कि भारत अपने फैसले खुद करता है और आतंकवाद से लड़कर ही उसका मुकाबला कर सकते हैं।
• सवालों का जवाब देते हुए नेतन्याहू ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह एक विदेश मंत्री होने की कोशिश कर रहे हैं और वह प्रधानमंत्री होने की भी कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि यह दोनों पोर्टफोलियो उन्हीं के पास हैं। चीन को लश्कर और हाफिज सईद के प्रस्ताव पर वीटो न करने के लिए इजरायल के मनाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह बातें टीवी पर तय नहीं की जा सकतीं। खासकर तब जब आप वाकई उसमें प्रगति चाहते हों।

3. कारोबार सुगमता सूची में बदलाव करेगा विश्व बैंक
• विश्व बैंक की लोकप्रिय कारोबार सुगमता (ईओडीबी) रैंकिंग की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों को और बल मिल गया है। विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री पॉल रोमर ने कहा है कि कारोबार में प्रतिस्पर्धा के बारे में राष्ट्रीय रैंकिंग की नए सिरे से गणना की जाएगी। कम से कम चार वर्षों की रैंकिंग रैंिकग की नए सिरे से गणना होगी।
• कारोबार सुगमता रैंिकग की विश्वनीयता को लेकर सवाल उठ रहे थे और कहा जा रहा था कि यह पूरी तरह सही नहीं है। रोमर की इस घोषणा के बाद ईओडीबी रिपोर्ट की विश्वसनीयता को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल से साक्षात्कार में रोमर ने यह घोषणा की। यही नहीं रोमर ने चिली से व्यक्तिगत रूप से माफी भी मांगी है। चिली की रैंकिंग 2014 के 34 से फिसल कर 2017 में 57 पर पहुंच गई।
• रोमर ने कहा, ‘‘मैं चिली से व्यक्तिगत रूप से माफी मांगता हूं। साथ ही किसी भी अन्य देश से माफी चाहता हूं, जहां हमने गलत धारणा बना दी है।’ रोमर की पिछले चार साल की कारोबार सुगमता रैंिकग की नए सिरे से गणना की घोषणा का भारत पर उल्लेखनीय असर पड़ सकता है।
• भारत की रैंकिंग 2014 के 140 से उछल कर 2018 में 100 पर पहुंच गई।उन्होंने कहा कि रिपोर्ट के साथ जो समस्या है वह मेरी गलती है क्योंकि हम चीजों को अधिक स्पष्ट नहीं कर पाए।
• रोमर ने कहा कि विश्व बैंक पुरानी रिपोर्टों को ठीक करने की प्रविया शुरू कर रहा है और उन्हें नए सिरे से प्रकाशित करेगा। इसमें यह बताया जाएगा कि तरीके में बदलाव के बिना रैंकिंग क्या होती।
• रोमर ने कहा कि वह उस प्रक्रिया की विश्वसनीयता का बचाव नहीं कर सकते जिनकी वजह से गणना का तरीका बदला है। ईओडीबी रैंकिंग की गणना के तरीके में पिछला बदलाव रोमर के पूर्ववर्ती कौशिक बसु के समय हुआ था।

4. उत्तर कोरिया ने फिर छेड़ा एकीकरण का राग
• दशकों की कटुता भुलाकर दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया धीरे-धीरे पास आ रहे हैं। दक्षिण कोरिया में होने विंटर ओलंपिक में कलाकारों का दल भेजने के उत्तर कोरिया के प्रस्ताव पर विचार के लिए दोनों देशों के अधिकारी सोमवार (आज) बैठक करेंगे।
• यह मुलाकात सीमावर्ती गांव पनमुनजोम में उत्तर कोरिया के स्वामित्व वाले इलाके में स्थित तोंजिल पैवेलियन में होगी। लेकिन उत्तर कोरिया अपना कोरियाई एकीकरण का राग भी नहीं भूल रहा। शनिवार को उत्तर कोरिया के सरकारी अखबार रोडोंग सिनमुन ने क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए जनभावना के अनुरूप एकीकृत कोरिया की आवश्यकता जता दी।
• इससे पहले पनमुनजोम गांव के ही दक्षिण कोरिया के नियंत्रण वाले इलाके में स्थित पीस हाउस में नौ जनवरी को दोनों देशों के अधिकारियों की बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ था। उक्त बैठक में उत्तर कोरिया के फरवरी में होने वाले विंटर ओलंपिक में भाग लेने पर सहमति बन गई।
• दक्षिण कोरिया के वार्ता शुरू करने के प्रस्ताव को उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने एक जनवरी को स्वीकृति दी थी। इसी के बाद दोनों देशों की बातचीत का सिलसिला चल निकला। अमेरिका और रूस ने दोनों देशों की बातचीत शुरू होने का स्वागत किया है। इससे कोरियाई प्रायद्वीप में बने युद्ध जैसे हालात को दूर करने में मदद मिली है।
• इसी के बाद समान भाषा और संस्कृति वाले दोनों देशों के कलाकारों के साथ मिलकर विंटर ओलंपिक में कार्यक्रम पेश करने पर विचार हो रहा है। दक्षिण कोरिया ने एक कदम आगे बढ़कर दोनों देशों की खिलाड़ियों को मिलाकर महिला हॉकी टीम बनाने का प्रस्ताव रखा है। यह टीम विंटर ओलंपिक में हिस्सा ले सकेगी।
• अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने अपनी 20 जनवरी की बैठक में दोनों देशों को आमंत्रित किया है। उसमें सहयोग के अन्य कई मुद्दों पर चर्चा होगी। दोनों देश अप्रत्याशित टकराव की आशंका खत्म करने के लिए सैन्य संपर्क शुरू पर भी विचार कर रहे हैं। बातचीत का सिलसिला जारी रहने पर भी सहमति बनी है।

5. परमाणु समझौते पर रूस आया ईरान के साथ
• ईरान के साथ दुनिया की प्रमुख देशों के परमाणु समझौते को बदलने की अमेरिकी कोशिश पर रूस ने कड़ी आपत्ति जताई है। कहा है कि वह इस समझौते में किसी भी बदलाव का कड़ा विरोध करेगा। इस बीच ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी ने इस समझौते को समझ न पाने का अमेरिका उलाहना दिया है। कहा है, मौजूदा अमेरिकी सरकार समझौते का मूल्यांकन कर पाने में असफल रही है।
• ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने के लिए सन 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की अगुआई में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोपीय यूनियन ने समझौता किया था। इसके तहत अमेरिका को ईरान के तेल व्यापार में किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाना था। साथ ही प्रमुख देशों को ईरान को कुछ सहूलियत देनी थी। बदले में ईरान को सीमित मात्र में यूरेनियम का संवर्धन करना था।
• उसके रिएक्टरों पर नजर रखने की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को सौंपी गई थी। लेकिन ट्रंप शुरू से ही ईरान के साथ हुए इस परमाणु समझौते का विरोध कर रहे हैं। अब उन्होंने इससे अमेरिका को अलग करने की चेतावनी दे दी है। साथ ही यूरोपीय देशों के साथ मिलकर ईरान पर नई शर्ते लगाने की जरूरत बताई है। इससे समझौते के स्वरूप को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं और ईरान ने भी कड़ी आपत्ति जताई है।
• इस मसले पर रूस ईरान के साथ आ खड़ा हुआ है। रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई राबकोव ने कहा है कि समझौते को लेकर अमेरिका का बदले रुख से उसे फर्क नहीं पड़ता। समझौते में किसी तरह के बदलाव का रूस विरोध करेगा। समझौते में बदलाव से गलत परंपरा की शुरुआत होगी और दुनिया में अविश्वास बढ़ेगा। इधर ईरान भी कह चुका है कि वह 2015 में हुए समझौते में किसी फेरबदल को स्वीकार नहीं करेगा।

6. केंद्र बनाएगा सुरक्षा बलों की 15 नई बटालियनें
• केंद्र सरकार देश के दो सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा बलों बीएसएफ और भारत आइटीबीपी की 15 नई बटालियनें बनाने की तैयारी में है। निकट भविष्य में इन नई बटालियनों को तनावपूर्ण माहौल वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन से लगी सीमा के रणनीतिक मोर्चो पर तैनात किया जाएगा।
• केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रविवार को बताया कि वह सक्रिय रूप से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में छह नई बटालियनें बनाने और भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) में नौ नई बटालियनें बनाने पर विचार कर रहे हैं। इनकी प्रत्येक बटालियन में करीब एक हजार प्रशिक्षित जवान और अफसर नियुक्त होते हैं।
• बीएसएफ के सूत्रों का कहना है कि निकट भविष्य में सुरक्षा बल नई यूनिटें बनाकर भारतीय जवानों और अफसरों की तादाद बढ़ाएगा ताकि उन्हें भारत-बांग्लादेश सीमा से लगे असम और पश्चिम बंगाल में तैनात किया जा सके।
• इसी तरह भारत और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा (आइबी) की भी प्रभावशाली तरीके से रक्षा की जाएगी। खासकर पाकिस्तान की सीमा से लगे पंजाब और जम्मू क्षेत्र को भी नई बटालियनों की तैनाती का गहन सुरक्षा कवच दिया जाएगा।
• देश के सबसे बड़े सुरक्षा बल बीएसएफ में 2.5 लाख जवान और अफसर हैं।
• आइटीबीपी में भी 90 हजार जवान हैं।
• गृह मंत्रालय के अधीन ऐसा एक अन्य यानी तीसरा सुरक्षा बल सहस्त्र सीमा बल (एसएसबी) भी है।
• एसएसबी नेपाल और भूटान से लगी भारतीय सीमा पर तैनात रहती है।सीमाओं की निगरानीतीनों पड़ोसी देशों के साथ भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा की लंबाई
• बांग्लादेश 4095.7 (किमी)1चीन 3488 (किमी)1पाकिस्तान 3323 (किमी)आइटीबीपी के एक वरिष्ठ अफसर ने बताया कि वास्तव में 12 नई बटालियनों की आवश्यकता है। लेकिन फिलहाल सुरक्षा बल को निकट भविष्य में ऐसी नौ नई यूनिटें भी पर्याप्त हो जाएंगी। इसके साथ ही आइटीबीपी 3,488 किलोमीटर लंबी बर्फीली सीमा इंटर बीओपी (बार्डर आउट पोस्ट) को भी कम करे जाने की कोशिश होगी।
• दरअसल, वास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल-एलएसी) पर हाल के दिनों में चीनी सेना की आक्रामक गतिविधियां तेज हो गई हैं। लिहाजा, यहां आइटीबीपी की बटालियनें बढ़ाने की तैयारी चल रही है।
• पर्वत प्रशिक्षण प्राप्त सुरक्षा बलों को हाल ही में सीमा पर कम से कम 47 नए बीओपी बनाने की मंजूरी मिली है। ताकि हिमालयी सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रभावशाली नियंत्रण के साथ सुरक्षा को और पुख्ता किया जा सके।
• गृह मंत्रलय के एक अफसर के अनुसार नई बटालियनों की मदद से सीमाओं पर पहले से अग्रिम मोर्चो पर तैनात सुरक्षा बलों को सैन्य शिविरों में भेजा जा सकता है और इसी तरह सुरक्षा बलों की मोर्चो पर अदला-बदली का काम और सहज और सुगम हो सकेगा।
• दरअसल, आइटीबीपी के अधिकांश बीओपी पहाड़ों के ऊंचे अक्षांशों पर हैं। यहां पहुंचना और रहना, दोनों ही बहुत कठिन काम है। इसी तरह बीएसएफ के भी अग्रिम मोर्चे बहुत ही दुर्गम पहाड़ियों की चोटियों पर हैं। जहां मौसम साल भर बहुत खराब रहता है।

7. कर मुक्त होगी 20 लाख तक की ग्रेच्युटी
• देश में संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को जल्द ही अच्छी खबर मिल सकती है। आगामी बजट सत्र में ग्रेच्युटी को लेकर संशोधन विधेयक पारित होने की उम्मीद है। इसके पारित होने से 20 लाख रुपये तक की ग्रेच्युटी टैक्स छूट के दायरे में आ जाएगी। अभी संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को 10 लाख रुपये तक की ग्रेच्युटी पर टैक्स नहीं देना पड़ता है।
• सातवें वेतन आयोग में सरकारी कर्मचारियों के लिए कर मुक्त ग्रेच्युटी की सीमा 20 लाख रुपये कर दी गई थी। सूत्रों के मुताबिक, बजट सत्र में ग्रेच्युटी भुगतान (संशोधन) विधेयक, 2017 पेश किया जाएगा। इसे शीतकालीन सत्र में संसद के समक्ष रखा गया था। आगामी सत्र में इसके पारित होने की उम्मीद है। सरकार संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए भी सरकारी कर्मचारियों की ही तरह टैक्स छूट के दायरे में आने वाली ग्रेच्युटी की सीमा को 20 लाख रुपये करना चाहती है।
• संसद से विधेयक पास होने के बाद सरकार को छूट के दायरे में आने वाली ग्रेच्युटी की सीमा को दोबारा तय करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। फिलहाल संगठित क्षेत्र में काम करने वालों को पांच साल या उससे ज्यादा की सर्विस पर 10 लाख रुपये तक की ग्रैच्युटी पर टैक्स छूट मिलती है।1यह विधेयक पारित होने के बाद, सरकार को केंद्रीय कानून के तहत मातृत्व अवकाश की अवधि और ग्रैच्युटी को नोटिफाई करने की अनुमति मिल सकेगी। श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने 18 दिसंबर, 2017 को लोकसभा में यह विधेयक पेश किया था।
• मौजूदा पेमेंट ऑफ ग्रैच्युटी एक्ट, 1972 को फैक्टियों, खदानों, तेल क्षेत्रों, बंदरगाहों, रेलवे कंपनियों आदि संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों के ग्रेच्युटी भुगतान के लिए लागू किया गया था।
• न्यूनतम वेतन के लिए आएगा वेज कोड : श्रम सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाते हुए सरकार बजट सत्र में वेज कोड (वेतन संहिता) विधेयक ला सकती है। यह सरकार की ओर से लाया जाने वाला पहला लेबर कोड होगा। इसके पारित होने के बाद सरकार विभिन्न क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन तय कर सकेगी।
• श्रम मंत्रलय 44 से ज्यादा श्रम कानूनों को समाहित करते हुए वेतन, औद्योगिक संबंधों, सामाजिक सुरक्षा और पेशेवर सुरक्षा की श्रेणी में चार संहिताएं लाने की तैयारी में है। वेज कोड इस दिशा में पहला कदम है। इस संबंध में मसौदा विधेयक अगस्त, 2017 में लोकसभा में रखा गया था। वहां से इसे सेलेक्ट कमेटी (प्रवर समिति) के पास भेज दिया गया था।
• इस संहिता में पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट, 1936, मिनिमम वेजेज एक्ट, 1949, पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट, 1965 और इक्वल रीम्यूनरेशन एक्ट, 1976 को समाहित किया गया है।

8. उत्तराखंड को मिलेंगे नए टाइगर रिजर्व
• बाघ संरक्षण में अहम भूमिका निभा रहे उत्तराखंड को इस साल दो नए टाइगर रिजर्व के रूप में नई सौगात मिल सकती है। नंधौर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और तराई पूर्वी वन प्रभाग में सुरई को टाइगर रिजर्व में तब्दील करने को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद विभाग ने इसका खाका तैयार कर लिया है। अब इसे स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड में रखने की तैयारी है।
• इस बीच नए टाइगर रिजर्व को लेकर जनता से सुझाव भी लिए जाएंगे। इन दोनों रिजर्व के अस्तित्व में आने पर राज्य में टाइगर रिजर्व की संख्या बढ़कर चार हो जाएगी।
• यह किसी से छिपा नहीं है कि उत्तराखंड में बाघ संरक्षण को हुए प्रयासों के सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं। 2015 के अखिल भारतीय बाघ आकलन में जहां उत्तराखंड में 340 बाघ थे, वहीं 2017 में इनकी संख्या बढ़कर 361 पहुंच गई है। फिर ये तो कार्बेट और राजाजी टाइगर लैंडस्केप के साथ ही इनके आसपास के 12 वन प्रभागों के आंकड़े हैं।
• अब तक बाघ पहाड़ों की ओर भी बढ़े हैं और 14 हजार फुट की ऊंचाई तक उच्च हिमालयी क्षेत्र में इनकी मौजूदगी के पुष्ट प्रमाण मिले हैं।
• इस सबके मद्देनजर ही राज्य में दो और नए टाइगर रिजर्व की कवायद भी प्रारंभ हुई और 2016 में स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड की बैठक में हल्द्वानी, तराई पूर्वी व चंपावत वन प्रभागों के कुछ हिस्सों को मिलाकर 2012 में बनाई गई नंधौर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के अलावा उत्तर प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिजर्व के उत्तराखंड में स्थित बफर जोन सुरई रेंज (तराई पूर्वी वन प्रभाग) को टाइगर रिजर्व में तब्दील करने का प्रस्ताव आया। फिर इसे एनटीसीए को भेज दिया गया।
• एनटीसीए ने 2017 में नंधौर और सुरई को टाइगर रिजर्व बनाने पर सैद्धांतिक सहमति दे दी।

 

भारत-इजरायल संबंधों की चुनौतियां और संभावनाएं

(हर्ष वी पंत, प्रोफेसर किंग्स कॉलेज, लंदन )

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू चार दिनों की यात्रा पर भारत में हैं। उनके इस दौरे से दोनों देशों के गहराते रिश्ते को एक नई ऊंचाई मिलने की आशा है। इससे पहले, एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल जुलाई में इजरायल का दौरा कर चुके हैं। वह किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला इजरायली दौरा था। उस दौरे में प्रधानमंत्री मोदी ने मान्य परंपरा से इतर फलस्तीन में अपना पड़ाव नहीं डाला, जो इस बात का संकेत था कि भारत अब इजरायल को लेकर किसी द्वंद्व का शिकार नहीं है। मोदी सरकार ने निश्चय ही भारत और इजरायल के रिश्ते पर पड़ी रहस्य की परत हटाई है और इसे पश्चिम एशिया के साथ भारत के व्यापक रिश्ते के केंद्र में ला दिया है।

नेतन्याहू एक ऐसे वक्त पर भारत आए हैं, जब दोनों देशों के रिश्ते कुछ झटकों से आहत हुए हैं। नई दिल्ली ने हाल ही में इजरायली कंपनी राफेल एडवान्स्ड डिफेंस सिस्टम्स से टैंक-रोधी निर्देशित मिसाइल (एटीजीएम) ‘स्पाइक’ विकसित करने को लेकर हुए 50 करोड़ डॉलर के करार को रद्द कर दिया है। चूंकि इजरायली कंपनी ने ‘मेक इन इंडिया’ के प्रावधानों के तहत प्रौद्योगिकी के पूर्ण हस्तांतरण पर अपनी आपत्ति जताई थी, इसलिए केंद्र सरकार ने यह कदम उठाया है। हालांकि ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि भारत ‘गवर्नमेंट-टु-गवर्नमेंट रूट’ यानी सरकारों की आपसी रजामंदी से स्पाइक खरीद सकता है। द्विपक्षीय संबंधों में खटास पिछले महीने तब भी दिखी थी, जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उस प्रस्ताव का समर्थन किया था, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के यरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने संबंधी फैसले की निंदा की गई थी। हालांकि, भारत ने यह साफ किया था कि व्यापक क्षेत्रीय संदर्भों में उसने यह फैसला लिया था, मगर इजरायल ने कूटनीतिक माध्यम से अपनी नाराजगी जताई थी। इसके बावजूद नेतन्याहू का भारत आना बता रहा है कि चंद झंझावातों से आपसी रिश्ते नहीं डिगते। यह यात्रा द्विपक्षीय रिश्ते को और व्यापक बनाने की कोशिश भी है, क्योंकि नेतन्याहू के साथ कारोबारियों का एक बड़ा दल भी भारत आया है।

सच यही है कि भारत और इजरायल के बीच एक मजबूत रक्षा साझेदारी स्पाइक विवाद के बावजूद बनी हुई है। नई दिल्ली ने हाल ही में अपनी नई पनडुब्बियों के लिए टॉर्पीडो खरीदने का बड़ा ऑर्डर इजरायल को दिया है, साथ ही सेना के लिए असॉल्ट रायफलें खरीदने की योजना भी बन रही है। इजरायल की अत्याधुनिक सैन्य प्रौद्योगिकी भारतीय सेना की ताकत बनी हुई है और दोनों देश गहन खुफिया सहयोग से इसे मजबूती दे रहे हैं। फिर आतंकवाद से निपटने का इजरायल का अनुभव निश्चय ही भारत के लिए मददगार हो सकता है। कृषि व पर्यावरण को लेकर भी दोनों देश एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं।

भारत और इजरायल का आपसी रिश्ता एशिया और खासकर पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिदृश्य से भी तय होगा। असल में, एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन का विस्तार मौजूदा क्षेत्रीय राजनीतिक-व्यवस्था को चुनौती दे रहा है। इस पर भारत सहित तमाम क्षेत्रीय देशों की नजर है। इजरायल को एशिया में हो रहे इस उथल-पुथल को लेकर अपना रुख साफ करना होगा। वहीं दूसरी तरफ, पश्चिम एशिया में शिया-सुन्नी टकराव ने सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव बढ़ा दिया है। वहां चूंकि सऊदी अरब, इजरायल और अमेरिका के बीच एक त्रिपक्षीय रिश्ता उभर रहा है, ऐसे में नई दिल्ली को बदलते घटनाक्रम के अनुसार अपनी दिशा तय करनी होगी। असल में, अरब दुनिया से भारत के बहुत सारे हित जुड़े हुए हैं। यरुशलम को इजरायली राजधानी बनाने संबंधी अमेरिकी कदम के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन इसकी तस्दीक करता है। ईरान के साथ भारत का पुराना रिश्ता भी मजबूत होते भारत-इजरायल संबंध के लिए एक बड़ी चुनौती माना जाता है। अच्छी बात है कि इजरायल ने इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी है और भारत में भी यह सोच है कि इजरायल विरोधी रुख में बदलाव से नई दिल्ली और अरब दुनिया के रिश्तों में ज्यादा खिंचाव नहीं बढ़ा है। चूंकि भारत व इजरायल आपसी संबंधों को आगे बढ़ाने को उत्सुक दिखते हैं, ऐसे में बेहतर होगा कि दोनों अपनी सीमाएं भी पहचानें। (Hindustan )(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

भारत-पाकिस्तान : बातचीत के बरक्स

(अवधेश कुमार)

इससमाचार ने पूरे देश को चौंकाया कि हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार नसीर खान जंजुआ के साथ थाइलैंड की राजधानी बैंकाक में दो घंटे की बातचीत हुई। पहली नजर में यह समझना कठिन था कि आखिर बातचीत हुई कैसे और क्यों? नरेन्द्र मोदी सरकार का स्टैंड यह रहा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ नहीं चल सकता है। इस आधार पर दोनों देशों के बीच बातचीत रुकी हुई है। पठानकोट हमले के बाद भारत ने बातचीत रद्द कर दिया था। तो फिर यह बातचीत क्यों हुई? इसकी जरूरत क्या आ पड़ी? इससे यह भी आशंका पैदा हुई कि कहीं सरकार अचानक अपना रवैया बदलकर फिर से बातचीत तो नहीं करने जा रही है। आखिर 2015 में दोनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री मोदी बिना पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के लाहौर चले गए थे। इसमें यह प्रश्न उठना स्वाभविक था कि क्या फिर वैसा ही कुछ होने जा रहा है? विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार से जब यह पूछा गया तो उनका जवाब था कि हम कहते रहे हैं कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते, लेकिन आतंकवाद पर तो बातचीत हो सकती है। तो क्या यह पाकिस्तान के साथ बातचीत आरंभ करने के लिए गढ़ा गया नया तर्क है? आतंकवाद के नाम पर दोनों देशों के बीच क्या फिर से बातचीत हो सकती है? ऐसे सारे प्रश्न लोगों के मन में उठ रहे हैं। इनका निश्चयात्मक भाव में कोई उत्तर देना कठिन है। वास्तव में रवीश कुमार द्वारा कही गई बातों के निहितार्थ काफी गहरे हैं। उसे ठीक से समझने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत कई स्तरों पर होती है, जिसे रोक नहीं सकते। दोनों देशों के डीजीएमओ यानी सैन्य ऑपरेशन के महानिदेशक समय-समय पर बातचीत करते हैं। इसी तरह सीमा सुरक्षा बल या बीएसएफ और पाकिस्तान रेंजर्स के बीच बातचीत होती रहती है। दोनों सुरक्षा सलाहकारों के बीच बातचीत ऑपरेशन स्तर का था। वास्तव में यह कहना कठिन है कि 26 दिसम्बर को दोनों सुरक्षा सलाहकारों के बीच क्या बातचीत हुई होगी। किंतु दोनों देशों के बीच जो स्थिति है, उसमें बहुत दोस्ताना माहौल तो नहीं ही हो सकता। नरेन्द्र मोदी सरकार अब पाकिस्तान के विरु द्ध अपने कड़े रु ख में इतना आगे बढ़ चुकी है कि उसके लिए अचानक पलटी मारना राजनीतिक रूप से भी जोखिम भरा होगा। वैसे भी पाकिस्तान की इस समय जो स्थिति है, उसमें बातचीत करने का कोई परिणाम भी नहीं आ सकता। यह रणनीतिक दृष्टि से भी उचित नहीं है। अमेरिका ने जिस तरह पाकिस्तान के खिलाफ अनपेक्षित रूप से अपना रवैया कड़ा किया हुआ है, उससे निकलने के लिए पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान की छटपटाहट साफ देखी जा सकती है। अगर अमेरिका ने वाकई अपने कथन के अनुरूप पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर हवाई हमला या अन्य सैन्य तरीके अपनाए तो वह क्या करेगा? चीन ने उसका समर्थन जरूर किया है, लेकिन वह किस सीमा तक वैसी स्थिति में उसका साथ देगा यह कहना कठिन है। बहरहाल, ऐसे समय में भारत किसी तरह की बातचीत कर पाकिस्तान को सांत्वना का पुरस्कार नहीं दे सकता। अमेरिका की चिंता यदि पाकिस्तान के पश्चिमी सीमा के आतंकवादियों की है तो हमारी चिंता भी हमसे लगे इलाके के आतंकवादी हैं। हमने सर्जिकल स्ट्राइक किया। कश्मीर में आतंकवाद के विरुद्ध बहुस्तरीय ऑपरेशन ऑल आउट चल रहा है। पाकिस्तान इससे इतना परेशान है कि उसने 2017 में 860 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया है। कहने का तात्पर्य यह कि सामान्य बातचीत का कोई वातावरण है ही नहीं। इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं होना चाहिए कि भारत आनन-फानन में पाकिस्तान के साथ राजनीतिक एवं राजनयिक स्तर की समग्र वार्ता आरंभ कर देगा। भारत का एक रु ख और रहा है। आरंभ के दिनों में ही मोदी सरकार ने साफ कर दिया था कि यदि आप कश्मीर के हुर्रियत नेताओं से बातचीत करते हैं तो फिर उन्हीं से कीजिए हमसे नहीं। यह रु ख भी अभी तक बदला नहीं है। तो फिर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान के क्या अर्थ हैं? भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत का मतलब समग्र वार्ता प्रक्रिया से होता है, जिसमें दोनों देशों के अधिकारियों एवं समय-समय पर नेता भी भाग लेते हैं। उस वार्ता के बारे में रवीश कुमार ने कोई बयान नहीं दिया है। जहां तक शेष बात का संबंध है तो वह होता रहेगा। सीमा के दोनों ओर की स्थिति पर डीजीएमओ बात करते हैं और करते रहेंगे। यह तो हमेशा होता है। इसी तरह सीमा सुरक्षा बल एवं पाक रेंजर्स भी बात करते रहेंगे। इन्हीं का विस्तारित रूप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की बातचीत है। इसमें युद्धविराम के उल्लंघन से लेकर सीमा पार आतंकवाद संबंधी बातचीत शामिल होता है। ऐसी बात में कोई हर्ज नहीं है। यह तो होना ही चाहिए। वैसे पाकिस्तान के साथ बातचीत में कोई हर्ज नहीं है अगर वह इस बात के लिए तैयार हो जाए कि एजेंडा केवल आतंकवाद होगा। रवीश कुमार ने आतंकवाद पर बातचीत का जो वक्तव्य दिया है वह यही तो है। अगर वह आतंकवाद पर बातचीत के लिए तैयार हो जाए तो हमें उसे हाथों हाथ लेना चाहिए। सच यह है कि पाकिस्तान कभी आतंकवाद के एजेंडे पर बातचीत के लिए तैयार होगा ही नहीं। आतंकवाद का मतलब सीमा पार आतंकवाद से है। इस पर बातचीत का मतलब होगा पाकिस्तान द्वारा इस बात की स्वीकृति कि वाकई भारत में उनकी सीमा से आतंकी भेजे जाते हैं। इस सचाई को पाकिस्तान कभी स्वीकारता ही नहीं है। ऐसे में वह इस एजेंडा पर बातचीत करने को क्यों कर तैयार होगा? इसलिए बैंकाक में दोनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत और उसके बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान से यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि सरकार की नीति में कोई परिवर्तन आ गया है। किंतु आप पाकिस्तान जैसे खतरनाक हालत से गुजर रहे एक देश से बिल्कुल संवादहीनता की स्थिति भी नहीं रख सकते। हां, अमेरिका ने जो दबाव बढ़ाया है उसका लाभ उठाने की तैयारी हमारी अवश्य होनी चाहिए। वैसे हालात में हम अपनी ओर से उसे दबाव में लाने की कोशिश कर सकते हैं। इसमें भारत की रणनीतिक क्षमता और कुशलता की परीक्षा होगी