Daily Current(21/11/2017) For UPSC IAS CDS CAPF UPPSC MPPSC RAS

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NEWS PAPER EDITORIAL

एनजीटी के निष्प्रभावी तौर-तरीके

(डॉ. भरत झुनझुनवाला)

नेशनल ग्रीन टिब्यूनल यानी एनजीटी पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में पराली जला पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन वह निर्थक साबित हुआ, क्योंकि एनजीटी किसानों की मूल समस्या को नजरअंदाज किया। पराली जला की समस्या इन राज्यों की विशेष परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होती है। पश्चिम बंगाल से तुलना कर पर यह बात स्पष्ट हो जाती है। बंगाल में हर वर्ष 3.6 करोड़ टन पराली होती है। इसकी तुलना में पंजाब में यह दो करोड़ टन ही होती है, लेकिन बंगाल में पराली नही जलाई जाती है जबकि पंजाब में जलाई जाती है। इसी प्रकार लगभग पूरे देश में धान का उत्पादन होता है, परंतु पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को छोड़कर अन्य कहीं बड़ी मात्र मे पराली नही जलाई जाती है।

पंजाब में पराली जला का मूल कारण श्रमिक की दिहाड़ी का ऊंचा होना है। पंजाब में सरकार द्वारा घोषित खेत मजदूरी की न्यूनतम दिहाड़ी 293 रुपये है जबकि बंगाल मे 213 रुपये। मेरा अनुमान है कि पंजाब मे धान की कटाई के समय वास्तविक दिहाड़ी 400 रुपये होगी जबकि बंगाल मे 200 रुपये। पराली को इकट्ठा कर में श्रम ज्यादा लगता है। गेहूं का भूसा थ्रेशर से छोटे टुकड़ों मे निकलता है जिन्हें ट्राली में भरकर किसान आसानी से घर ले आता है। इसके उलट पराली लंबे टुकड़ों मे निकलती है। मेरा अनुमान है कि यदि किसी ट्राली में दो टन भूसा लोड किया जा सकता है तो पराली मात्र आधा टन। उतनी ही पराली को घर ला में ट्राली को चार चक्कर लगा पड़ते हैं। भंडारण के लिए जगह भी बड़ी चाहिए। यही समस्या पराली से कागज बनाने में खड़ी हो जाती है। खेत से फैक्ट्री तक पहुंचने के लिए पराली को मशीन से गांठ में बांधना पड़ता है। तब ही ट्रक में पर्याप्त मात्र में पराली को लोड किया जा सकता है। बंगाल में श्रम का मूल्य कम होने से पराली को घर लाकर पशुओं को खिलाना अथवा फैक्ट्री तक पहुंचाना आसान है। इसकी तुलना में पंजाब में खर्च ज्यादा आता है, क्योंकि वहां श्रमिक की दिहाड़ी ऊंची है। इसलिए पंजाब में पराली को जलाया जाता है।

पंजाब में समस्या और ज्यादा विकराल हो जाती है, क्योंकि धान की कटाई और गेहूं की बुआई के बीच मात्र 15 दिन का समय मिलता है। इस समय श्रमिकों का उपलब्ध होना ज्यादा कठिन होता है। किसान को खेत से पराली हटाकर गेहूं की बुआई के लिए जुताई जल्दी करनी होती है। इसलिए वह पराली को जला देता है। दूसरी ओर बंगाल में धान की एक फसल के बाद धान की ही दूसरी फसल लगाई जाती है जो कि हर समय चलती रहती है। इसलिए किसी विशेष समय बंगाल में पराली का अत्याधिक उत्पादन नही होता है। पराली के उत्पादन एवं श्रम की उपलब्धता में भी संतुलन बना रहता है।

पंजाब की समस्या का हल यह है कि भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआइ पराली का उपयुक्त दाम निर्धारित करे जिससे ठेकेदारों के लिए पराली को किसान के खेत से उठाकर गांठ बनाकर निगम के गोदाम तक पहुंचाना लाभप्रद हो जाए। जिस प्रकार ईंट बना के लिए ठेकेदार झारखंड से मजदूर को केरल ले जाते हैं उसी प्रकार पराली की गांठ बना के लिए वे बिहार-झारखंड के मजदूरों को पंजाब ले आएंगे। निगम को पराली की गांठों को देश के दूसरे क्षेत्रों में गौपालकों अथवा कागज फैक्टियों को बेच देना चाहिए। इस व्यापार में निगम को घाटा लगेगा। यदि यह व्यापार लाभप्रद होता तो व्यापारी इसे स्वयं कर लेते। यह घाटा सरकार को वहन करना होगा। समय के साथ ही पराली की गांठों का राष्ट्रीय बाजार बन जाएगा। तब निगम का घाटा कम हो सकता है।

पराली की समस्या का दूसरा हल यह है कि धान की कटाई को विशेष प्रकार के हार्वेस्टर से करने को लाभप्रद बनाया जाए। वर्तमान हार्वेस्टर में पराली के लंबे टुकड़े निकलते हैं जो खेत में ही फैले रहते हैं। इनके स्थान पर ‘सुपर स्ट्रा मैजमेंट सिस्टम’ वाले हार्वेस्टर का उपयोग करना चाहिए। इन उन्नत हार्वेस्टर से पराली के छोटे टुकडेद निकलते हैं जो खेत में फैले रहते हैं और जुताई के समय दब जाते है। समय के साथ ही ये खाद बन जाते हैं। तब किसान को खाद मुफ्त में मिल जाएगी और पराली को जलाने की जरूरत भी नहीं रह जाएगी, परंतु उन्नत किस्म के हार्वेस्टर की लागत ज्यादा आती है इसलिए किसान उसका उपयोग नहीं करना चाहते। इनके उपयोग पर सरकार को सब्सिडी देनी चाहिए।

पराली की गांठों को खरीद अथवा उन्नत हार्वेस्टर का उपयोग कर के लिए सब्सिडी केंद्र सरकार को देनी चाहिए, क्योंकि इन कदमों का लाभ दिल्ली समेत पूरे देश को होगा। पंजाब से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वह दिल्ली को धुएं से मुक्त कर के लिए अपने राजस्व का उपयोग करे। इस दृष्टि से पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की सब्सिडी की मांग जायज है, परंतु उनकी यह मांग कि सब्सिडी धान के एमएसपी में 100 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि के रूप में दी जाए तो यह उचित नहीं है। किसान इस बढ़े हुए दाम को ले लेंगे, परंतु पराली जलाते रहेंगे, क्योंकि पराली के दोबारा उपयोग की मूल समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। समस्या का समाधान केंद्र सरकार द्वारा एफसीआइ तथा उन्नत हार्वेस्टरों पर सब्सिडी देकर ही निकल सकता है। दुर्भाग्य से ऐसा लगता है कि एनजीटी की पराली की समस्या को समझ एवं हल निकाल मे रुचि नहीं है। केवल हवाई आदेश पारित किए जा रहे हैं कि पराली जला पर प्रतिबंध है। ये आदेश वैसे ही हैं जैसे बच्चों के चॉकलेट अथवा आइसक्रीम खाने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। एनजीटी का प्रयास रहता है कि दिल्ली की मध्यमवर्गीय जनता को प्रसन्न करे, किसान कष्ट सहे तो सहे।

अन्य मामलों में भी एनजीटी का यही हाल है। जैसे उत्तर प्रदेश का रेनूकूट-सिंगरौली क्षेत्र और महाराष्ट्र का चंद्रपुर तापीय बिजली संयंत्रों के कारण भट्ठी बन गया है। लोग रोगों से ग्रसित हो रहे हे, परंतु एनजीटी को उनकी सुध नहीं है। एनजीटी केवल उनके द्वारा छोड़े जा वाले धुएं पर विचार कर रहा है। मूल विषय है कि देश के आर्थिक विकास के लिए कितनी बिजली की जरूरत है और इस जरूरत को पर्यावरण के न्यूनतम नुकसान से कैसे पूरा किया जाए। इन प्रश्नों पर एनजीटी मौन है। अतीत में एनजीटी पर्यावरण मंत्रलय को निर्देश दिया था कि विकास की सभी परियोजनाओं के लाभ हानि का समग्र मूल्यांकन कर के नियमों को बना के लिए कमेटी बनाई जाए। पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के अंतर्गत ऐसी कमेटी बनाई भी गई। कमेटी कहा कि थर्मल बिजली परियोजना का मूल्यांकन कर को बिजली से हो वाले लाभ एवं धुएं से हो वाली हानि का भी मूल्यांकन करना चाहिए। मंत्रालय को यह पसंद नही आया। मंत्रालय विज्ञप्ति जारी की कि केवल जंगल की हानि का मूल्यांकन जरूरी होगा। मंत्रालय के इस दुराग्रह पर एनजीटी मौन रहा और तमाम नुकसानदेह परियोजनाओं को दी गई स्वीकृति पर मुहर लगा दी। एनजीटी को चाहिए कि केवल दिल्ली की मध्यमवर्गीय जनता को प्रसन्न कर के स्थान पर पर्यावरण की मूल समस्याओं पर ध्यान दे।(DJ)

(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आइआइएम बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर हैं)

अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नई चौकड़ी क्वाड

(सी उदयभास्कर)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12वें पूर्वी एशिया सम्मेलन में भाग लेने के लिए 13-14 नवंबर को मनीला दौरे पर थे। उनकी यह यात्र द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकों से भरी रही। आसियान इस सालाना बैठक का बहुत ही सार्थक उपयोग करता रहा है। वह पूर्वी एशिया सम्मेलन के 18 नेताओं को एक मंच पर तो लाता ही है, साथ ही एपेक और आसियान की चिंताओं से भी उन्हें रूबरू कराता है। मोदी के लिए यह दौरा उच्च शिखर सम्मेलन सरीखा साबित हुआ। गौर से देखा जाए तो यह सम्मेलन भारत के लिए जहां राजनीतिक और कूटनीतिक लिहाज से संतोषजनक से कहीं बेहतर रहा वहीं सुरक्षा और कारोबार-अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कुछ खास नहीं रहा।

कूटनीतिक क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि एशिया-प्रशांत के स्थान पर भारत-प्रशांत का उल्लेख कर भारत की भूमिका को एक नई पहचान दी गई। सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड टंप द्वारा इसका अनुमोदन भी किया गया। इससे संबंधित दूसरा पहलू जापानी प्रधानमंत्री की अगुआई में क्वाड यानी चार देशों के समूह के विचार को पुन: जीवित करने से जुड़ा है। इस विचार ने 2007 के मध्य में आकार लिया था, लेकिन तब बीजिंग की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद वह जल्द ही दफन भी हो गया था। क्वाड दरअसल चार देशों का समूह है जो अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया को एक नौसैनिक छत के नीचे लाता है। शायद इसके पुनर्जीवित होने के तार गत अक्टूबर में हुए अमेरिकी रक्षा मंत्री रेक्स टिलरसन की भारत यात्रा से जुड़े हैं। उस समय उन्होंने क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए भारत-अमेरिका के बीच महत्वपूर्ण साझेदारी पर जोर डाला था और समुद्री क्षेत्र में सहयोग को और विस्तार देने के लिए भारत-प्रशांत का उल्लेख किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पूर्वी एशिया-जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और फिलीपींस की यात्रा के दौरान भी इसका बढ़-चढ़कर समर्थन किया। जहां एशिया-प्रशांत में भारत को बाहर रखा गया और इसके महत्व की अनदेखी गई तथा एशिया पर चीन-जापान-आसियान का प्रभुत्व माना गया वहीं भारत-प्रशांतकाफी समावेशी और लचीला है।

यह मूलत: दो महासागरों और एशिया तथा पूर्वी अफ्रीका के तटीय भूभाग को जोड़ता है। जाहिर है बीजिंग चीन के बजाय भारत को क्षेत्रीय स्थिरता की धुरी बनाने के अमेरिका की मुहिम से उत्साहित नहीं नजर आ रहा है और साथ ही क्वाड के पुनर्जीवन से भी वह चिंतित है।

मोदी के मनीला दौरे से भारत को दूसरा कूटनीतिक लाभ यह मिला कि वह शिखर स्तरीय बैठकों में कुछ विशिष्ट व्यक्तिगत छाप छोड़ने में कामयाब रहे। मीडिया में आई रिपोर्ट बताती हैं कि मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और चीनी प्रधानमंत्री ली कछ्यांग और अन्य सहित सभी 17 नेताओं से मुलाकात करने में सफल रहे। दिल्ली के लिए इसका संभावित राजनीतिक-कूटनीतिक लाभ तब और होगा जब अधिकांश आसियान नेता जनवरी 2018 में गणतंत्र दिवस परेड के दौरान उपस्थिति होंगे। माना जाता है कि दस आसियान नेताओं ने 2018 में गणतंत्र दिवस समारोह का हिस्सा बनने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। यदि वे सभी उस समय मौजूद रहते हैं तो यह भारत के लिए महत्वपूर्ण अवसर होगा और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ भारत के रिश्ते सुरक्षित स्थिति में पहुंच जाएंगे।

चीन के साथ उनके अनुभव कितने कटु हैं और उसके प्रति उनमें असुरक्षा का भाव किस हद तक है, इसको फिर से प्रकट करना जरूरी है।1मनीला में मोदी-ट्रंप और दो अन्य क्वाड देशों जापान और ऑस्टेलिया के राष्ट्र प्रमुखों शिंजो एबी और मैल्कम टर्नबुल के साथ बैठक में बीजिंग के लिए गूढ़ कूटनीतिक संदेश छिपे थे। चारों देशों ने एक सुर में दक्षिण चीन सागर में नौवहन की स्वतंत्रता के सिद्धांत को जारी रखने और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई। दक्षिण चीन सागर पर आसियान देशों की चिंता को चीन ने खारिज कर एक तरह से खुद के रक्षात्मक होने का संकेत दिया। इसके अलावा उसने क्षेत्र और विश्व को भी यह समझाने का प्रयास किया कि बीजिंग समुद्री दावों और संधियों पर अपनी मर्जी नहीं थोपेगा। हालांकि अधिकांश प्रमुख देशों ने चीन के इस रुख को नकार दिया, लेकिन इसके तनिक भी संकेत नहीं मिले कि कोई एक देश या देशों का गठबंधन या देशों का समूह इस मुद्दे पर उसके साथ सैन्य टकराव चाहता है, लेकिन एक बात तो साफ तौर पर प्रकट हुई कि चीन के प्रति उनके मन में नाराजगी कहीं गहरे तक बैठी है।

मनीला में क्वाड की बैठक भले ही निम्न अधिकारी स्तर की रही हो, लेकिन यह भी स्पष्ट था कि उसे उच्च स्तरीय राजनीतिक समर्थन हासिल था। इस मामले में राष्ट्रपति टंप ने अपने कार्ड कहीं चतुराई से खेले। उन्होंने द्विपक्षीय वार्ता में तो चीन और साथ ही राष्ट्रपति शी चिनफिंग की प्रशंसा की, लेकिन उसके तुरंत बाद नौवहन की स्वतंत्रता का समर्थन कर दिया और क्वाड देशों के लिए आदर का भाव भी व्यक्त कर दिया। क्वाड कैसे उभरकर वजूद में आएगा, यह बहुत कुछ चीन के एजेंडे और अमेरिका, जापान एवं ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रत्यक्ष सहयोगी सदस्यों और अमेरिका के हालिया रणनीतिक सहयोगी के तौर पर उभरे भारत के संबंधों पर निर्भर करेगा। यदि किसी गंभीर मामले में ये देश यथास्थिति बरकरार रखते हैं तो यह क्वाड के लिए अनुकूल स्थिति होगी, लेकिन इसकी राह में कुछ बाधाएं भी हैं जिसे ध्यान में रखना होगा। जैसे मोदी की अगुआई वाली एक्ट ईस्ट नीति के लिए कारोबार एक प्रमुख मुद्दा है, लेकिन मनीला सम्मेलन में अमेरिका, चीन और भारत के बिना ही 11 सदस्यीय टीपीपी यानी ट्रांस पैसेफिक टेड पार्टनर ब्लॉक बनाने की बात कही गई।
आखिर में सबसे जरूरी बात दक्षिण पूर्वी एशिया की सुरक्षा चुनौतियों की। मनीला में उपस्थित पूर्वी एशिया सम्मेलन के नेताओं के बीच रोहिंग्या संकट की ज्यादा चर्चा नहीं हुई। आसियान ने इसे लगभग छोड़ ही दिया और दक्षेस देशों की इतनी क्षमता नहीं है कि वे ऐसे संकट का समाधान कर सकें। लिहाजा संयुक्त राष्ट्र अब इसमें हस्तक्षेप करने जा रहा है। यह एक तरह से क्षेत्रीय संस्थाओं के लचर होने का भी संकेत है। कुल मिलाकर धीरे-धीरे विस्तृत हो रही इस मानव त्रसदी को रोकने के लिए नई दिल्ली को जमीनी हकीकत और सामूहिक असमर्थता पर मनन करना चाहिए।(DJ)
(लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

 

स्थिरता के लिए है जरूरी चार देशों का साथ आना

(डब्ल्यू पी एस सिद्धू प्रोफेसर, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी )

इंडो-पैसिफिक’ शब्द का इस्तेमाल समुद्री जीवविज्ञानी उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर से लेकर पश्चिम व मध्य प्रशांत महासागर तक पसरे पानी के विस्तार को परिभाषित करने के लिए करते रहे हैं। मगर 21वीं सदी की शुरुआत में इस शब्द को भू-राजनीतिक शब्दावली में जगह मिली और यहां यह अपनी वैज्ञानिक परिभाषा से कहीं अधिक विवादास्पद साबित हुआ। यह क्षेत्र 20वीं सदी में विभिन्न देशों और एक ही मुल्क के अलग-अलग राज्यों के बीच खूनी संघर्षों का गवाह तो बना ही, विफल, संभावित और स्थापित परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच निकट भविष्य में तनाव के बीज भी यहां खूब दिखते हैं। एक मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के न होने से यहां ऐसे तनाव की आशंका ज्यादा है। इस लिहाज से चतुष्कोणीय सुरक्षा वार्ता (क्वाड) को फिर से जीवंत करने की कोशिशों को देखें, तो यह एक उल्लेखनीय कदम है। ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका के बीच यह बातचीत मनीला में आसियान और ईस्ट-एशिया समिट के इतर हुई है।

क्वाड को फिर से जिंदा करने की कई वजहें हैं। चीन के साथ हुए डोका-ला विवाद और बाद में ‘बेल्ट रोड इनेशिएटिव’ ने भारत को इसके लिए प्रोत्साहित किया, तो ऑस्ट्रेलिया और कुछ हद तक जापान के लिए ऐसा करने की बड़ी वजह द्विपक्षीय गठबंधन के प्रति डोनाल्ड ट्रंप सरकार की प्रतिबद्धता और ‘क्वाड’ के वायदों के तहत उन्हें मजबूत बनाने की मंशा है। अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन की यात्रा से भी यही लगता है कि वाशिंगटन की मंशा इस क्षेत्र में अधिक से अधिक संबंध मजबूत करने की है। रही बात अमेरिका की, तो क्वाड उसे इस क्षेत्र में चीन के दबाव से उबरने का मौका दे सकता है। यह नाटो की तरह का संगठन हो सकता है, जिसे ‘रूस को बाहर रखने, अमेरिका को शामिल करने और जर्मनी का कद छोटा करने में’ सफलता मिली थी। इसी कारण कई पर्यवेक्षकों ने इस नए संगठन को चीन को घेरने के एक औजार के रूप में परिभाषित किया है। हालांकि एक प्रभावशाली संगठन बनने के लिए इसे नाटो के नक्शेकदम पर भी चलना चाहिए, यानी उसे ‘चीन को बाहर रखना होगा, अमेरिका को शामिल करना होगा और जापान को कम महत्व देना होगा’। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस क्षेत्र को लेकर वाशिंगटन की प्रतिबद्धता महज कहने भर की न रह जाए, बल्कि वह इसके लिए गंभीर भी बने।

डोनाल्ड ट्रंप की विघटनकारी व अलगाववादी प्रवृत्ति को देखते हुए (जो ईस्ट एशिया समिट में उनके न शामिल होने से जाहिर भी होता है) क्वाड की यह भूमिका काफी महत्वपूर्ण मानी जाएगी। इसी तरह, दूसरे विश्व युद्ध में दिखे जापान के बर्बर अतीत के मद्देनजर क्वाड में टोक्यो की भूमिका भी मामूली रखनी होगी, और इसमें किसी भी संशोधनवादी कदम को पर्याप्त जांचा-परखा जाएगा। हालांकि आशंका यह भी है कि कुछ आंतरिक मतभेदों के कारण शायद क्वाड अपनी क्षमता के अनुसार काम न कर सके। मसलन, भारत ‘नेविगेशन की स्वतंत्रता’ की वकालत तो करता है, पर विशेषकर दक्षिण चीन सागर में नौकायन युद्धपोतों के मामले में ऐसा करने को अनिच्छुक दिखता है। इसी तरह, 2015 की भारतीय समुद्री सुरक्षा रणनीति यह एहतियात बरतती दिखती है कि ‘जो राष्ट्र (इसे अमेरिका समझें) परंपरागत मित्र हैं’, उनके साथ सुरक्षा को लेकर अलग-अलग धारणाएं हो सकती हैं। क्वाड के सदस्य राष्ट्रों को ऐसे मतभेदों से पार पाना होगा।

सही है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शांति व स्थिरता कायम करने का यह एक महत्वपूर्ण प्रयास है, पर इसकी मजबूती के लिए कम से कम दो और काम किए जाने चाहिए। ईस्ट-एशिया समिट इसे राजनीतिक मजबूती दे सकती है, तो एपेक कारोबारी व आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी है। क्वाड के सभी सदस्य देश ईस्ट-इंडिया समिट में शामिल हैं, लेकिन भारत अब भी एपेक का सदस्य नहीं है। लिहाजा नई दिल्ली को एशिया-प्रशांत के इन तीनों स्तंभ का हिस्सा बनना होगा। सभी देशों को यह समझना होगा कि शांति कायम करने के लिए कभी-कभी एक लोकतांत्रिक सैन्य गठबंधन की जरूरत होती है। नाटो ने यह साबित भी किया है। इसके लिए भारत को सैन्य गठबंधन और सहयोग से परहेज की अपनी पुरानी और पारंपरिक समझ को त्यागना होगा।(हिंदुस्तान )

 

A fine balance — On the National Anti-profiteering Authority

The GST’s anti-profiteering body must not become a tool of harassment

 

Over four months into the troubled implementation of the goods and services tax, the Centre has operationalised a provision in the GST law that has been worrying industry. The National Anti-profiteering Authority, whose constitution was approved by the Cabinet last Thursday, is empowered to crack down on firms that fail to pass on the ‘benefits’ of the tax regime to consumers. The authority can order businesses to reduce product prices or refund to consumers ‘undue benefits’; in extreme cases it can impose a penalty on errant firms and cancel their registration as taxpayers. Where the consumers are difficult to trace individually, the amount construed by the authority to be the extent of undue benefit will be deposited in a consumer welfare fund. The authority will have its own bureaucracy — including a screening committee in each State that consumers can complain to; a standing committee in which profiteering allegations with an ‘all-India’ impact can be taken up; and an investigation wing that will vet complaints ‘with prima facie’ merit and report its findings to the NAA. More clarity is needed on how the government will ascertain the difference between undue profit and fair play — or the discretionary space available to the NAA could enable rent-seeking.

 

The trigger for setting up the authority is clearly the recent large-scale reduction in tax rates on more than 300 items, of which about 200 rate changes were to come into effect from November 15. The government is keen on ensuring that consumers have a better perception of the GST’s ground-level impact. Union Finance Secretary Hasmukh Adhia has urged companies (especially those in the fast-moving consumer goods segment) to ensure that new maximum retail prices are inscribed on products from November 15, even on existing inventory in the market. While wholesalers can still implement this, reaching every last retailer is a challenge. But firms have been warned that the entire retail chain must reflect revised prices in order to avoid anti-profiteering action; and the expectation is that there will be some exemplary action soon to make industry fall in line. Restaurant chains are also likely to face the heat for retaining price hikes; even though their tax rate has dropped, they no longer get any credits for taxes paid on inputs. Protecting consumer interest is important, but the prospect of the government monitoring prices and asking businesses to justify pricing decisions instead of letting market forces play out is unnerving. The NAA could take a cue from, if not partner, the Competition Commission of India in this, and focus on firms raising prices indiscriminately in markets where they enjoy a dominant position, or forming pricing cartels. The government must ensure that the authority’s powers are used transparently and only where there is genuine consumer/public interest at stake. Else, it runs the risk of making profit itself a bad word.

 

Falling apart — On Germany political crisis

As talks on a coalition fail in Germany, Angela Merkel faces her career’s biggest challenge

 

The crisis over government formation in Berlin has raised the possibility of fresh elections in Germany and the ripple effect of instability in the European Union. The breakdown in talks between Chancellor Angela Merkel’s Christian Democratic Union and potential partners to get the requisite numbers in the Reichstag has dealt a blow to a time-tested post-War model of political compromise and consensus-building. A major sticking point in the coalition negotiations among the three ideologically disparate parties — the centre-right CDU, the left-wing Greens and the pro-market Free Democratic Party — was whether the hundreds of thousands of Syrian refugees who migrated to Germany should be allowed to bring their families. Curiously, the CDU conceded the extension of the current freeze on family reunion, on the insistence of its sister party, the Christian Social Union. This is a substantial concession from a party that backed the government’s bold decision to open the doors in 2015 to rescue millions who had risked their lives to reach Europe. The Greens, key allies in a potential Jamaica coalition with the conservatives and the FDP, fell in line, despite their humanitarian stance on refugees. But the FDP dug in its heels, demanding the phasing out of a tax to support Germany’s eastern regions. Remarks by its leader that it is better not to govern than govern badly is a measure of the discord during the negotiations.

 

In this fluid scenario, another general election cannot be ruled out, especially as the centre-left Social Democratic Party has so far foreclosed the possibility of cohabiting with the conservatives in another grand coalition. After it received its worst-ever drubbing in the September elections, the party may be reluctant to revisit its position, lest it risk further erosion of its popular base. But in the unlikely event of it backing the CDU, the Social Democrats may insist on offering support to a candidate other than Ms. Merkel as Chancellor. A minority government led by the CDU is a theoretical possibility, but even the conservatives do not seem to warm up to it. That leaves the President with the responsibility of determining whether fresh elections are the only option. The far right Alternative for Germany, which emerged as the third largest party in the elections, believes it can further consolidate those unprecedented gains — something the mainstream parties will be conscious of during last-ditch attempts to cobble together a coalition. The proof of the efficacy of the German consensus model lay in solidifying the political centre-ground over the decades. The need for a strong middle ground could not be greater than it is at this point. Once the Netherlands and France averted political instability at the hands of populist and eurosceptic parties earlier this year, the outcome in Germany had appeared to be a foregone conclusion. Perhaps not.

 

IMPORTANT ARTICLE

लाजिस्टिक को मिला ढांचागत क्षेत्र का दर्जा

• लाजिस्टिक उद्योग को सरकार ने ढांचागत क्षेत्र का दर्जा प्रदान कर दिया है। शीतगृह, गोदाम सुविधा इत्यादि क्षेत्र लाजिस्टिक के तहत आते हैं।

• सरकार के इस कदम से अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।देश में बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने के लिए सरकार परिवहन और लाजिस्टिक क्षेत्र में और अधिक निवेश आकर्षित करने के लिए काम कर रही है।

• मौजूदा रूपरेखा में संशोधन करते हुए आर्थिक मामलों के विभाग ने एक अधिसूचना जारी की है। इसमें कहा गया है कि ढांचागत क्षेत्र का दायरा बढ़ाया जा रहा है। इसमें परिवहन क्षेत्र के तहत एक उपश्रेणी परिवहन एवं लाजिस्टिक को भी शामिल किया गया है।

• लाजिस्टिक में अंतरदेशीय कंटेनर डिपो समेत ऐसे मल्टी माडल लाजिस्टिक पार्क आते हैं जिनकी स्थापना न्यूनतम 50 करोड़ रपए के निवेश से न्यूनतम 10 एकड़ क्षेत्र में की गई हो। ऐसे शीतगृह जो कम से कम 15 करोड़ की लागत से और ऐसे गोदाम जो 25 करोड़ रपए की लागत से स्थापित किए गए हों, लाजिस्टिक क्षेत्र के तहत आते हैं।

• इन दोनों के लिए न्यूनतम भूमि के भी मानक तय किए गए हैं। आर्थिक मामलों के विभाग ने ढांचागत क्षेत्र की उप-श्रेणियों की वृहद संगत सूची को संशोधित करते हुए लाजिस्टिक क्षेत्र को इसी के वर्गीकरण में शामिल किया है।

• इस बारे में आर्थिक मामलों के विभाग ने जारी की अधिसूचना

• इसमें परिवहन क्षेत्र के तहत एक उपश्रेणी का किया गया है प्रावधान

• इसी श्रेणी में किया गया है लाजिस्टिक क्षेत्र को शामिल

• इसमें शामिल किए गए हैं कंटेनर डिपोदइसके दायरे में 10 एकड़ वाले लाजिस्टिक पार्क भी आएंगे

एनएसई ने शुरू किया एसएमई के लिए नया निफ्टी सूचकांक

• एनएसई समूह की इकाई इंडिया इंडेक्स सर्विसेज एंड प्राडक्टस (आईआईएसएल) ने एक नया निफ्टी सूचकांक शुरू किया है। इसके जरिए वह छोटी कंपनियों के अपने विशिष्ट एनएसई प्लेटफार्म पर सूचीबद्ध लघु व मध्यम उद्यमों (एसएमई) के प्रदर्शन का आकलन करेगी।

• कंपनी के एक बयान में कहा गया है कि उसका निफ्टी एसएमई इमर्ज इंडेक्स उन पात्र कंपनियों के पोर्टफोलियो के प्रदर्शन को परिलक्षित करता है जो इमर्ज पर सूचीबद्ध हैं। यह इमर्ज पर सभी सूचीबद्ध एसएमई के पूर्ण बाजार पूंजीकरण के लगभग 62 फीसद का प्रतिनिधित्व करता है।

• यह शुरुआत ऐसे दिन की गई है जबकि एनएसई में सोमवार को 100वीं एसएमई सूचीबद्ध हुई है। प्रतिस्पर्धी बीएसई के ऐसे ही प्लेटफार्म पर 200 से अधिक कंपनियां सूचीबद्ध हैं।

• आईआईएसएल के मुख्य कार्याधिकारी मुकेश अग्रवाल ने एक बयान में कहा इस सूचकांक में 14 विभिन्न क्षेत्रों की एसएमई हैं।

जर्मनी में सियासी संकट गहराया

• जर्मनी में नई सरकार के गठन के लिये गठबंधन को लेकर चल रही वार्ता टूट जाने से एक बार फिर सियासी संकट गहराता दिख रहा है और देश को इस मुश्किल से बाहर निकालने का सारा दारोमदार एक बार फिर चांसलर एंजेला मर्केल पर आ गया है।

• इन हालात में जर्मनी एक बार फिर समयपूर्व चुनाव के मुहाने पर है।पिछले कुछ हफ्तों से अस्थाई सरकार की वजह से जर्मनी कोई साहसी नीतिगत फैसला नहीं ले पा रहा है। कोई दूसरे संभावित गठबंधन की गुंजाइश नजर नहीं आ रही और ऐसे में जर्मनी एक बार फिर समयपूर्व चुनाव का सामना करने के लिये मजबूर हो सकता है। इसमें भी सितम्बर में हुये चुनावों की तरह किसी को पूर्ण गठबंधन नहीं मिलने का जोखिम है।

• मर्केल की उदारवादी शरणार्थी नीति गहन विभाजक साबित हुई और चुनावों में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद उन्हें असमान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

• एक महीने लंबी बातचीत के बाद फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता क्रि श्चियन लिंडनेर ने कहा कि एंजेला के सीडीयू-सीएसयू और पारिस्थितिकी समर्थक ग्रीन्स के कंजर्वेटिव गठबंधन के साथ सरकार बनाने के लिए विास का कोई आधार नहीं है।

• लिंडनेर ने कहा, खराब तरीके से शासन करने से बेहतर है कि शासन नहीं किया जाए। बातचीत आव्रजन पर अलग अलग नजरिया होने की वजह से बाधित हो गई। एफडीपी के फैसले पर खेद जताते हुए मर्केल ने जर्मनी को इस संकट से बाहर निकालने की बात कही।

• चांसलर के तौर पर..मैं यह सुनिश्चित करने के लिये वह सबकुछ करूंगी। जिससे यह देश इस मुश्किल वक्त से बाहर निकल आए।

रोहिंग्या समस्या के समाधान के लिए चीन ने पेश किया त्रिस्तरीय प्रस्ताव

• रोहिंग्या मुस्लिम समस्या पर चीन ने तीन चरणों का प्रस्ताव रखकर उसको क्रियान्वित करने का म्यांमार और बांग्लादेश से अनुरोध किया है। यह प्रस्ताव रखाइन प्रांत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जहां से छह लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान पिछले दो महीने में भागकर बांग्लादेश गए हैं।

• यह प्रस्ताव सोमवार को 51 एशियाई और यूरोपीय देशों के राजनयिकों की बैठक के दौरान रखा गया। म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर कई वर्षो से समस्या बनी हुई है।

• म्यांमार 11 लाख की आबादी में से ज्यादातर को अपना नागरिक नहीं मानता और उन्हें देश की संस्कृति से छेड़छाड़ का दोषी ठहराता है। 25 अगस्त को रोहिंग्या आतंकियों के हमले में दर्जन भर से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों की मौत के बाद सेना की कार्रवाई में म्यांमार के इन अल्पसंख्यकों में भगदड़ मच गई।

• रोहिंग्या मुसलमान जमीनी मार्ग और जल मार्ग से भागकर बांग्लादेश पहुंचे। संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के तमाम देशों ने अल्पसंख्यकों के पलायन पर चिंता जताई।

• उसी का नतीजा है कि शरणार्थियों की वापसी पर विचार के लिए म्यांमार की राजधानी में 51 देशों के प्रतिनिधियों की बैठक हो रही है। इस बैठक में चीन समेत कई देशों के विदेश मंत्री भी हिस्सा ले रहे हैं। बांग्लादेश का दौरा करने के बाद रविवार को म्यांमार पहुंचे चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा, समस्या के समाधान के लिए दोनों संबद्ध देशों का मिल कर काम करना जरूरी है।

• उनके सुझाए मसौदा के तहत पहले चरण में शांति स्थापित करनी होगी जिससे लोगों के मन में विश्वास पैदा हो। कानून व्यवस्था स्थापित हो। पिछले हफ्ते म्यांमार आए अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने भी ऐसी ही बातें कही थीं। लेकिन उन्होंने अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की घटनाओं की विश्वसनीय जांच की भी जरूरत बताई थी।

• वांग के अनुसार, विश्वास बहाली के बाद दोनों देशों को शरणार्थियों की वापसी की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। तीसरे चरण में गरीबी दूर करने के प्रयास करने होंगे, जो विस्थापन की समस्या की सबसे बड़ी वजह होती है।

भारत में बैटरी स्वैपिंग नीति उपयुक्त नहीं: गडकरी

• बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए नीति आयोग के प्रस्ताव से केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने असहमति जताई है। उन्नत इलेक्टिक गतिशीलता के लिए नीति आयोग ने बैटरी स्वैपिंग पालिसी का प्रस्ताव किया है। केंद्रीय मंत्री ने सोमवार को कहा कि यह नीति भारत जैसे देश के लिए उपयुक्त नहीं है।

• नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में मानकीकृत, स्मार्ट और स्वैप बैटरी की वकालत की है। आयोग ने कहा है कि इलेक्टिक और साझा वाहन अपनाने से डीजल और पेट्रोल के मद में छह करोड़ डॉलर (तीन करोड़ 90 लाख रुपये ज्यादा) की बचत हो सकती है।

• 2030 तक एक गिगाटन कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सकता है।

• नीति आयोग के इस परामर्श पर केंद्रीय सड़क परिवहन, राष्ट्रीय राजमार्ग एवं जहाजरानी मंत्री गडकरी ने कहा, ‘स्वैपिंग (बैटरी) नीति भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। इसका कारण यह है कि यह अत्यंत कठिन है। यह देश में संभव नहीं होने जा रहा है।’

• केंद्रीय मंत्री एफआइसीसीआइ की ओर से आयोजित स्मार्ट गतिशीलता कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे।1केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने इस मुद्दे पर उनके साथ बातचीत की थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि यह विचार उपयुक्त नहीं है और चल नहीं पाएगा।

• गडकरी ने कहा कि दिल्ली एवं अन्य जगहों पर प्रदूषण के उच्च स्तर को देखते हुए सार्वजनिक परिवहन के लिए बायो-ईंधन वाहन की जगह इलेक्टिक वाहन समय की मांग है। सरकार बुनियादी ढांचा पर काम कर रही है।

चीन ने बनाई पूरी दुनिया में मार करने वाली मिसाइल

• चीन सन 2018 में अगली पीढ़ी की लंबी दूरी तक मार करने वाली अत्याधुनिक मिसाइल को अपनी सेना में शामिल करेगा। यह मिसाइल मैक 10 (करीब 12 हजार किलोमीटर प्रति घंटा) की रफ्तार से जाकर 12,000 किलोमीटर की दूरी तक मार करने में सक्षम होगी।

• डोंगफेंग-10 नाम की यह मिसाइल एक साथ दस परमाणु बम ले जाने में सक्षम होगी, जो अलग-अलग ठिकानों पर गिराए जा सकेंगे।

• चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित खबर के मुताबिक 2012 में मिसाइल बनाने की घोषणा से अभी तक उसके आठ परीक्षण हो चुके हैं, जिनमें ज्यादातर सफल रहे हैं। इसलिए अब इसे 2018 के मध्य तक पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में शामिल किए जाने की संभावना बन गई है।

• अखबार ने यह बात हथियारों के मामले में सेना के सलाहकार शू गुआंग्यू के हवाले से कही है।

• डोंगफेंग-41 मिसाइल त्रि-स्तरीय ठोस ईंधन पर आधारित है। यह चीन की धरती से दुनिया के किसी भी देश को निशाना बना सकेगी। साउथ चाइना मॉर्निग पोस्ट अखबार के मुताबिक चीन ने नवंबर की शुरुआत में इस नई बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण कर लिया है लेकिन इसके बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं की।

• अमेरिकी सैटेलाइट टैकिंग सिस्टम ने अप्रैल 2016 में मिसाइल के सातवें परीक्षण के सुबूत पकड़े थे और जानकारी सार्वजनिक की थी। जबकि फीनिक्स टीवी के टिप्पणीकार और चीनी सेना के तोपखाना दस्ते में रहे सोंग जोंगपिंग का दावा है कि डोंगफेंग-41 को चीनी सेना में शामिल किया जा चुका है।

• रूसी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नई मिसाइल का निशाना मुख्य रूप से अमेरिकी शहर और यूरोप हैं। यह चीन की बड़ी प्रतिरोधक क्षमता बनेगी। इसके जरिये चीन अमेरिका पर रणनीतिक दबाव बनाने में कामयाब होगा।

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