Daily Current(22/11/2017) For UPSC IAS CDS CAPF UPPSC MPPSC RAS

Youtube Channel-EXAM MADE EASY

Contribution link- Click Here

NEWS PAPER EDITORIAL

बदलते मौसम का भारतीय भूगोल

(अखिलेश गुप्ता, सलाहकार, विज्ञान व तकनीकी मंत्रालय )

जलवायु परिवर्तन अब एक आम चर्चा का विषय बन गया है। इस मसले पर बने संयुक्त राष्ट्र के अन्तर-सरकारी पैनल पांचवीं मूल्यांकन रिपोर्ट में पूरे विस्तार से यह बताया गया है कि किस तरह यह मानवीय क्रियाकलापों का ही नतीजा है। भारत में भी पिछले 100 वर्षों में पृथ्वी की सतह का तापमान लगभग 0.80 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। किसी क्षेत्र में यह तापमान ज्यादा बढ़ा है, तो किसी में कम। अखिल भारतीय स्तर पर मानसून वर्षा में किसी तरह की कमी-बेशी भले दी दर्ज न हुई हो, पर कुछ क्षेत्रों में इसमें कमी (जैसे पश्चिमी मध्य प्रदेश, पूर्वोत्तर राज्यों, गुजरात व केरल के कुछ भाग) और कुछ क्षेत्रों में वृद्धि (जैसे पश्चिम तट, उत्तरी आंध्र प्रदेश व उत्तर-पश्चिम भारत) देखी गई है। देश के मध्य व पूर्वी भागों में तेज वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं। मगर मानसून, सूखे व बाढ़ में कोई भी महत्वपूर्ण वृद्धि या कमी के लक्षण नहीं मिले हैं। देश के मध्य और पूर्वी भागों में तेज वर्षा के बार-बार होने की घटनाएं बढ़ी है। बंगाल की खाड़ी पर बनने वाले चक्रवाती तूफानों की कुल आवृत्ति विगत 100 वर्षों के दौरान लगभग एक समान रही है। इस सदी के दौरान भारतीय तटों पर औसत समुद्र स्तर लगभग 1़30 मिलीमीटर प्रति वर्ष बढ़ रहा है।

भारतीय उष्ण देशीय मौसम विज्ञान संस्थान का अनुमान है कि सदी के अंत तक सालाना औसत तापमान वृद्धि दो अलग-अलग परिदृश्यों के तहत तीन से पांच डिग्री सेल्सियस और 2.5 से चार डिग्री सेल्सियस के बीच होने की आशंका है। भारत में तापमान वृद्धि देश के समस्त क्षेत्र में एक समान रहने का अनुमान है, जबकि उत्तर पश्चिम क्षेत्र में थोड़ी अधिक गरमी का अनुमान है। भारतीय मानसून भूमि, महासागर और वातावरण के बीच जटिल अंतर-क्रिया का परिणाम है। ऐसे भी अनुमान हैं कि पश्चिमी तट, पश्चिमी मध्य भारत और पूर्वोत्तर क्षेत्र में गहन वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

जलवायु परिवर्तन ताजे पानी, कृषि योग्य भूमि और तटीय व समुद्री संसाधन जैसे भारत के प्राकृतिक संसाधनों के वितरण और गुणवत्ता को परिवर्तित कर सकता है। कृषि, जल और वानिकी जैसे अपने प्राकृतिक संसाधन आधार और जलवायु संवेदनशील क्षेत्रों से निकट रूप से जुड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश भारत को जलवायु में अनुमानित परिवर्तनों के कारण गंभीर संकटों का सामना करना पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र पैनल की रिपोर्ट में भारत पर पड़ने वाले असर का भी जिक्र है।

इसका सबसे बड़ा असर हमारे जल संसाधनों पर पड़ सकता है। ब्रह्मपुत्र, गंगा और सिंधु नदी प्रणालियां हिमस्खलन में कमी के कारण विशेष रूप से प्रभावित हो सकती हैं। नर्मदा और ताप्ती को छोड़कर सभी नदी घाटियों के लिए कुल बहाव में कमी आ सकती है। बहाव में दो-तिहाई से अधिक की कमी साबरमती और लूनी नदी घाटियों के लिए भी अनुमानित है। समुद्र तल में वृद्धि के कारण तटीय क्षेत्रों के निकट ताजा जल स्रोत लवण यानी खारेपन से प्रभावित हो सकते हैं।

भारत में खाद्यान्न उत्पादन जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और अन्य संस्थाओं ने वायुमंडल में कार्बन का स्तर बढ़ने से गेहूं और धान की उपज में कमी का भी अनुमान लगाया है। इसकी वजह से फल, सब्जियों, चाय, कॉफी, सुगंधित व औषधीय पौधों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। रोगाणुओं व कीटों की संख्या तापमान और आद्र्रता पर निर्भर होती है। जाहिर है, जलवायु परिवर्तन का असर इनके प्रकोप पर भी स्पष्ट दिखाई देगा। इसकी वजह से दुग्ध और मछली उत्पादन में भी कमी आ सकती है।
जलवायु में परिवर्तन महत्वपूर्ण रोगवाहक प्रजातियों (मसलन, मलेरिया के मच्छर) के वितरण को बदल सकता है, जिसके कारण इन रोगों का विस्तार नए क्षेत्रों में हो सकता है। यदि तापमान में 3.80 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि और इसकी वजह से आद्र्रता में 7 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो भारत में नौ राज्यों में वे सभी 12 महीनों के लिए मारक बने रहेंगे। जम्मू-कश्मीर और राजस्थान में उनके प्रकोप वाले समय में 3-5 महीनों तक वृद्धि हो सकती है। हालांकि ओडिशा और कुछ दक्षिणी राज्यों में तापमान में और वृद्धि होने से इसमें 2-3 महीने तक कम होने की संभावना है।

भारी जनसंख्या वाले क्षेत्र जैसे तटीय क्षेत्र शुष्क और अद्र्धशुष्क क्षेत्रों में बुआई वाले क्षेत्रों में जलवायु संबंधी जटिलताओं और वृहत जल प्रपातों से प्रभावित होते हैं, जिनमें से लगभग दो-तिहाई हिस्से पर सूखे का खतरा है। राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र तथा कर्नाटक, ओडिशा, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्रों में अक्सर बाढ़ आती है। लगभग 40 मिलियन हेक्टेयर भूमि के साथ-साथ उत्तर और पूर्वोत्तर कटिबंध में अधिकांश नदी की घाटियों में बाढ़ का खतरा है, जिससे प्रत्येक वर्ष औसतन लगभग तीन करोड़ लोग प्रभावित होते हैं। नैटकॉम ने तटीय जिलों की संवेदनशीलता पर समुद्र स्तर में वृद्धि से वास्तविक खतरे, जनसंख्या प्रभाव पर आधारित सामाजिक खतरे और आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन किया है। इसके अतिरिक्त, उष्णकटिबंधीय चक्रवात की गहनता में 15 प्रतिशत की वृद्धि देश में भारी जनसंख्या वाले तटीय क्षेत्रों पर एक खतरा पैदा करती है।

जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने एक सलाहकार परिषद का गठन किया है। परिषद ने सरकार, उद्योग और सिविल सोसाइटी सहित मुख्य पक्षधारियों से सलाह मशविरे के बाद कई दिशा-निर्देश दिए हैं। सरकार ने तकरीबन दस साल पहले जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना शुरू की थी। इसके अलावा, बहुआयामी, दीर्घकालीन और एकीकृत नीतियों के हिसाब से आठ राष्ट्रीय मिशन शुरू किए गए हैं। हालांकि इनमें से अनेक कार्यक्रम पहले से ही चल रहे कार्यों के हिस्से हैं। उन्हें बस नई स्थितियों और लक्ष्यों के हिसाब से ढालना है। उम्मीद यही है कि ये सब कार्यक्रम हमें जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे नुकसान से बचाने में मददगार साबित होंगे।(हिंदुस्तान )
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

हम महिलाओं से इतना क्यों घबराते हैं?

(प्रीतीश नंदी)

(वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म निर्माता)

पिछले हफ्ते सुर्खियां बनाने वाली तीनों फिल्में (दो भारतीय फिल्में गोवा के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह से निकाल दी गईं, जबकि जूरी इन्हें प्रदर्शित करना चाहती थी और एक बड़ी व्यावसायिक फिल्म को रिलीज करने की तारीख आगे बढ़ानी पड़ी, जब फिल्म निर्देशक का सिर और प्रमुख अभिनेत्री की नाक काट डालने की धमकी दी गई) मजबूत महिला किरदारों पर केंद्रित हैं। इसके पहले कुख्यात निहलानी युग में जिन फिल्मों को सेन्सर बोर्ड ने रोका वे भी ऐसी ही फिल्में थीं। ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ को इसी आधार पर मंजूरी नहीं दी गई कि ‘यह महिला उन्मुुख फिल्म है, जिसमें ‘जीवन से परे जातीं उनकी फैंटसी हैं’। अब इसका जो भी मतलब हो।
आश्चर्य है कि हम सेंसरशिप के ऐसे दौर में हैं, जिसमें फिल्मों पर सिर्फ उनकी राजनीति के कारण ही प्रतिबंध नहीं लगाया जाता। वैसी फिल्मों के तो बहुत उदाहरण हैं। शुरुआत ‘किस्सा कुर्सी का’ से हुई थी, जिसे इमरजेंसी के दौरान प्रतिबंधित करने के साथ उसका प्रिंट भी जला दिया गया था, क्योंकि फिल्म ‘असंभव-सी और नैतिक रूप से गिराने वाली कहानी’ कहती थी। इसमें बताया गया था कि कैसे चुनाव के दौरान दो प्रतिद्वंद्वी दलों के प्रत्याशियों को तीसरे दल ने रिश्वत देकर नाम वापस लेने पर राजी कर अपने उम्मीदवार को मैदान में उतार दिया (मजे की बात है कि 40 साल बाद ठीक यही हर चुनाव में हो रहा है)। अब फिल्मकारों को महिलाओं और ‘जीवन से परे जाती उनकी फैंटसी’ के मुद्‌दे उठाने के लिए परेशान किया जा रहा है। हम कौन-सी फैंटसियों की बात कर रहे हैं? मलायम फिल्म सेक्सी दुर्गा का नाम बदलकर एस. दुर्गा करने पर भी फिल्म महोत्सव में इसका प्रदर्शन रोक दिया गया। यह एक आप्रवासी युवती दुर्गा की सरल-सी कहानी है, जो कबीर नाम के युवा के साथ रात को भाग जाना चाहती है। दो गुंडे उन्हें इस वादे के साथ अपनी कार में बिठा लेते हैं कि वे उन्हें नज़दीक के रेलवे स्टेशन पहुंचा देंगे। पूरी फिल्म देर रात सुनसान सड़क की उस खौफनाक कार यात्रा पर केंद्रित है, जिसमें वे लोग खतरनाक ढंग से लड़की को घूरते हैं और उन्हें कार से उतरने भी नहीं देते।
बीच में केरल के गांव के दृश्य बताए गए हैं, जिसमें एक उत्सव के दौरान दुर्गा के रौद्र रूप काली के भक्त खुद को लोहे के हुक और छड़ों से छेदते हैं ताकि वे पापों से मुक्त हो सकें। बिना पटकथा के एक ही रात में शूट की गई शशिधरन की फिल्म को उस घटना में गहरी अंतर्दृष्टि डालने के लिए सराहना मिली है, जिसका सामना प्रतिदिन हर महिला को करना पड़ता है- आंखों से घूरकर कर किया गया दुष्कर्म। कोई हिंसा नहीं दिखाई गई है फिल्म में है केवल खौफ, जो हर महिला रोज महसूस करती है।
जिस दूसरी फिल्म को प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई वह राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक रवि जाधव की मराठी फिल्म ‘न्यूड’ है, जिसका चयन फिल्मोत्सव में भारतीय पेनोरमा के शुभारंभ के लिए किया गया था। यह एक महिला के बारे में है, जो निर्धन है और कलाकारों के लिए मॉडल बनने का काम करती है ताकि आजीविका कमा सके। लेकिन, समाज ऐसे पेशे को जिस तरह देखता है उसके कारण वह बेटे को भी नहीं बता सकती कि वह क्या काम करती है। उसकी दृढ़ता, उसका साहस, ज़िंदगी को आंखों में आंखें डालकर देखने की योग्यता फिल्म को इतना प्रभावशाली बनाती है कि आलोचकों ने इसे उस क्षेत्रीय फिल्म का शानदार उदाहरण माना है, जो रोज के जीवन से थीम उठाकर उसे नए धरातल पर ले जाता है।
हां, दोनों फिल्मों ने महिलाओं और ‘जीवन से परे जाती उनकी फैंटसी’ पर एक ऐसे माध्यम में फोकस करने का साहस किया है, जहां परम्परागत रूप से पुरुष ही केंद्र में रहे हैं। दोनों ऐसी समस्याओं को लेती हैं, जिनका सामना महिलाएं हमारे समाज में करती हैं। शायद इसी ने हर किसी को विचलित कर दिया है- यह असली महिला की आवाज है। यह ऐसी महिला नहीं जिसे आमतौर पर हम हमारी फिल्मों में देखते हैं। यह वास्तविकता, सच की आवाज है। हम जानते हैं कि राजनीति में भी इसके लिए कोई जगह नहीं है। यह रवैया सपने बेचने के व्यवसाय में ही मौजूद है।
अब तीसरी फिल्म की बात करें, वह जिसने सबसे ज्यादा सुर्खिया बटोरीं : संजय लीला भंसाली की ‘प्‌मावती’, जो आठ दिन बाद रिलीज होनी थी पर होगी नहीं। इस बार तो हमें सेंसर बोर्ड की राय भी नहीं मालूम, क्योंकि सेंसर बोर्ड के लिए इसका प्रदर्शन भी नहीं हुआ है। सेंसर के लिए प्रदर्शन इस आधार पर रोक दिया गया कि जमा किया गया फार्म अधूरा है। निर्माताओं ने भी लगता है बताया नहीं है कि फिल्म इतिहास पर आधारित है या कल्पना पर। मैं उनकी दुविधा समझ सकता हूं। यदि आप रामायण पर फिल्म बनाएं तो आप इसे इतिहास, कल्पना की रचना या पौराणिक क्या घोषित करेंगे? हमारी कई महान कथाओं की तरह इसमें हमेशा कुछ इतिहास, कुछ कल्पना, कुछ मिथक होगा। यह युद्ध पर आधारित उन फिल्मों के लिए भी सच है, जिन्हें हॉलीवुड बनाता है। क्या ‘ब्लैक हॉक डाउन’ इतिहास है? क्या कैथरीन बिगेलो की ‘द हर्ट लॉकर’ उन घटनाओं को सौ फीसदी बताती हैं, जिनकी परिणति ओसामा की हत्या में हुई?
कोई फिल्म ऐसी नहीं होती। खबरों से जो छूट जाता है उसे पकड़कर सिनेमा हमेशा ही वास्तविकता के परे चले जाता है। इसीलिए तो हम फिल्म देखने जाते हैं। वे हमें वे सत्य बताते हैं, जो अखबार टीवी चैनल तत्काल रिपोर्टिंग की तलाश में चूक जाते हैं। मैं भंसाली का प्रशंसक नहीं हूं। उनकी फिल्में तो मेरे सिर से ऊपर जाती हैं। देवदास एक अच्छी कहानी को परदे पर बर्बाद करने का उदाहरण है, क्योंकि उन्होंने इसमें जरूरत से ज्यादा नाटकीयता ग्लैमर से भर दिया था। हां, मुझे बताया गया है कि वे ईमानदार फिल्म निर्माता हैं (सेंसर बोर्ड के नए प्रमुख भी यह मानते हैं)। सारे ईमानदार फिल्म निर्माताओं की तरह उन्हें भी अपने दृष्टि का अधिकार है, फिर चाहे उसमें गलतियां ही क्यों हो। किसी भी स्वतंत्र समाज में फिल्म निर्माताओं को आतंकित हुए बिना अपनी बात अपने तरीके से कहने की आज़ादी होनी चाहिए। मुट्‌ठीभर लोगों के कारण भारत का तालिबानीकरण नहीं होना चाहिए।
इस बकवास को बंद करने का यही सही वक्त है। मुझे विश्वास है कि मोदी सरकार यह करेगी फिर चाहे भाजपा के कुछ बड़े नेता (कुछ कांग्रेस मुख्यमंत्री) नए तालिबान के पक्ष में बोलने वालों का बचाव करके सरकार को शर्मिंदा करने का प्रयास कर रहे हैं। (DJ)

              युवा आबादी को नाकाम करती स्वास्थ्य एवं शिक्षा प्रणाली

भारत अपनी युवा आबादी को नाकाम बना रहा है। युवाओं को रोजगार और आगे बढऩे के मौके नहीं मिल पा रहे हैं। उन्हें अपनी किस्मत खुद संवारने के लिए जरूरी सुविधाएं भी मुहैया नहीं हो पा रही हैं। हमने इन युवाओं को एक जहरीला पर्यावरण दिया है, उन पर बोझ डालने वाली स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था दी है और एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था दी है जो या तो महंगी या निष्प्रभावी है। इन सबके बाद हम उन्हें बाहर निकलने और दुनिया में परचम लहराने वाले उद्यमी या प्रभावी औद्योगिक श्रमशक्ति बनने को कहते हैं। क्या हम खुद से ही मजाक नहीं कर रहे हैं?
हरेक साल सर्दियों में दिल्ली की आबोहवा तीन महीनों तक सांस लेने के लिए दूभर हो जाती है। जब मैंने इस शहर का रुख किया था तो सर्दियों का लोग बेसब्री से इंतजार करते थे। उन जादुई महीनों में यह शहर सेरेंगेटी के कीचड़ भरे मैदानों या सहारा के रेतीले टीलों जैसा न होकर रहने लायक स्थान तो हो ही जाता था। लेकिन दुनिया की सबसे खराब हवा के साथ अब हमने दिल्ली की सर्दी को भी बरबाद करने का फैसला कर लिया है। डॉक्टरों का कहना है कि दिल्ली में पल-बढ़ रहे बच्चों के फेफड़ों को स्थायी नुकसान होने का खतरा है।
पिछले साल प्रकाशित अपने एक लेख में मैंने कहा था कि अच्छी हवा जैसे बाह्य तत्त्वों को अर्थशास्त्री अपने लेखा-जोखा में शामिल नहीं करते हैं। अगर विकास-केंद्रित अर्थव्यवस्थाएं हवा में फैले प्रदूषण को नजरअंदाज करती हैं तो फिर हमें सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि को केंद्र में रखने वाली अपनी नीति बदलने की जरूरत है। लेख के मुताबिक, फसलों के अवशिष्ट जलाने जैसी समस्या को दूर करने में आने वाली लागत को साफ तौर पर देखा जा सकता है और उससे आर्थिक ‘सक्षमता’ और जीडीपी में भी कमी आएगी। हवा में प्रदूषण फैलाने वाली वजहों को दूर करने से होने वाले लाभों को चिह्निïत कर पाना आसान नहीं है और जीडीपी में प्रत्यक्ष तौर पर उसके असर नजर नहीं भी आ सकते हैं।
यह तर्क अब भी समीचीन है। समूचा उत्तरी भारत एक बार फिर घने काले धुएं की चादर से ढक चुका है बल्कि बुनियादी सामाजिक ढांचे के प्रति हमारा रवैया राष्ट्रीय आय की गणना में इन पहलुओं को सीधे तौर पर शामिल न करने की प्रवृत्ति को नजरअंदाज करता है। अमेरिका के लोग फ्रांसीसी लोगों की तुलना में देर तक और कम उत्पादकता के साथ काम करते हैं। एक प्रासंगिक बिंदु यह है कि अमेरिकी लोग ब्रिटिश लोगों की तुलना में स्वास्थ्य देखभाल पर अधिक खर्च करते हैं। खर्च बढऩे से जीडीपी में अतिरिक्त योगदान होता है। ब्रिटेन में यह राष्ट्रीय आय का दसवां और अमेरिका में पांचवां हिस्सा है। इसके बावजूद एक अमेरिकी को ब्रिटिश नागरिक की तुलना में कमतर स्वास्थ्य सुविधा मिलती है। स्वास्थ्य देखभाल पर कम खर्च करने के बावजूद ब्रिटेन में जीवन प्रत्याशा अमेरिका के कुछ शीर्ष राज्यों के बराबर है। यह अमेरिका में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के काफी हद तक निजी क्षेत्र द्वारा संचालित होने का असर है। अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली महंगी होने के साथ ही इसमें गैरजरूरी महंगे उपचारों को भी शामिल किया जाता है। ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के तहत कम लागत पर ही कोई स्वास्थ्य उत्पाद मिल जाता है। इसका मतलब है कि अगर ब्रिटेन आने वाले समय में अमेरिकी शैली वाली निजी क्षेत्र आधारित स्वास्थ्य प्रणाली लागू करने का फैसला करता है तो उसकी जीडीपी में जबरदस्त उछाल आ जाएगी। लेकिन उसके स्वास्थ्य नतीजे और जीवन स्तर में गिरावट आ जाएगी।
भारत सार्वजनिक धन खर्च किए बगैर जीडीपी वृद्धि की तलाश में लगा हुआ है लेकिन वह अपनी मौजूदा स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में जरूरी सुधार किए बिना ही इसका विस्तार करने की कोशिश कर सकता है। सबको एकसमान स्वास्थ्य सेवा देने का वादा कर सत्ता में आई सरकार के भीतर सोच यही है कि स्वास्थ्य ढांचा मुहैया कराने में निजी प्रावधान के साथ सब्सिडी-आधारित जटिल बीमा प्रणाली से ही बात बनेगी। भारतीय कामगारों के लिहाज से यह किसी आपदा जैसी स्थिति होगी लेकिन आर्थिक आंकड़ों एवं जीडीपी विकास के संदर्भ में यह बढिय़ा दिख सकता है। (और इससे राजनीतिक संपर्क रखने वाले लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर संचालित निजी अस्पतालों को फायदा होगा।) सरकार युवा भारतीयों की मानवीय पूंजी की कीमत पर अपनी भौतिक पूंजी की बचत कर पाएगी।
शिक्षा के मामले में भी इसी तरह का रवैया अपनाया जा रहा है। कम लागत वाली सार्वभौम एवं सर्वसुलभ शिक्षा मुहैया कराने के बजाय भारत खराब प्रदर्शन कर रहे सार्वजनिक स्कूलों और महंगे एवं असरहीन रूप से नियंत्रित निजी स्कूलों के भरोसे ही चल रहा है। बेहतर नतीजे देने वाले सार्वजनिक स्कूलों की जगह कोई भी नहीं ले सकता है। लेकिन यहां पर भी अक्षमता राजनीतिक मकसद के माकूल बैठती है और उससे जीडीपी में बढ़ोतरी ही होती है क्योंकि अभिभावक महंगे निजी स्कूलों के चंगुल में फंसने को मजबूर हैं। सरकार ने राजकोषीय जवाबदेही के संदर्भ में वाकई में बड़ा काम किया है। इसने भौतिक ढांचा खड़ा करने पर खर्च किया है लेकिन अगर इसने नियामकीय एवं कानूनी ढांचे पर अधिक जोर दिया होता तो निजी क्षेत्र से वह खर्च कराया जा सकता था। लेकिन सरकार ने मानवीय ढांचा और मानवीय पूंजी पर अधिक मानसिक ऊर्जा और धन नहीं लगाया है। अगर सरकार वाकई राजकोषीय उड़ान पथ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता शिथिल करती है तो वह जीडीपी में गिरावट की भरपाई के लिए भौतिक ढांचे पर अधिक खर्च की दिशा में आगे बढऩे के लिए प्रेरित हो सकती है। लेकिन ऐसा करने से हम युवा भारतीयों को लगातार नाकाम करते रहेंगे। इसके बजाय सरकार को अब शिक्षा, कौशल-विकास, स्वास्थ्य देखभाल और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। स्वस्थ और सुशिक्षित युवा ही अपने लिए उस भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जो उनकी सरकार दे पाने में नाकाम साबित हो रही है।

Helter Skelter — On the legacy of Charles Manson

Charles Manson’s murderous ways hold out a special caution for the America of today

Charles Manson, convicted for the brutal 1969 murders of nine individuals in California, died a natural death last Sunday, at the age of 83. His passing however will not diminish the profound influence that he and the “Manson Family,” a quasi-commune comprising mostly of abused and broken young women, had on the popular culture of the 1960s, a troubled decade that witnessed an intensifying battle for civil rights, the peak of the anti-war movement, and the “counterculture” associated with hippies, drug abuse, and free love. Manson and his followers were regarded by some as symbols of the dark side of this counterculture movement. Their notoriety came in August 1969, when, acting upon Manson’s instructions four of his followers, three women and a man, entered a posh Hollywood Hills home and slaughtered a heavily pregnant actress Sharon Tate – also the wife of film director Roman Polanski – and four of her friends. One of Manson’s followers, Susan Atkins, scrawled the word “pig” on the front door with the Ms. Tate’s blood, hinting at Manson’s paranoid delusions about fomenting a race war by framing African-Americans for this gruesome killing spree. Again, directed by Manson, his “family” went on to murder a wealthy couple in Los Angeles, Leno and Rosemary LaBianca, the following day, and they separately killed a Hollywood stuntman and another acquaintance of the group. Although Manson was convicted of first-degree murder in 1971, he escaped capital punishment after California outlawed the death penalty a year later.

Despite the depravity of Manson’s actions, his legacy has unfortunately been a contested notion. The fact that he achieved pop culture infamy through a variety of antics during his trial, and that this spawned an entire genre of “true crime” books and television movies, has muddied the recognition of the true horror of his outlook. Manson had a well-documented hatred of Jewish people, African-Americans and women. Rather than the liberal counterculture movement of the 1960s, his bigoted philosophy bears a disturbing resemblance in some respects with the far-right or alt-right brand of neo-fascism that has mushroomed in certain pockets of U.S. politics recently. Take Dylann Roof, for example, the white supremacist who also murdered, coincidentally, nine African-Americans in Charleston, South Carolina, in 2015. He too spoke of “race war” and lapped up alt-right materials online, indulging in the very same apocalyptic race-ramblings that Manson did. Manson was also known for drawing inspiration from the Beatles song “Helter Skelter,” which he interpreted as a description of an impending a race war that his band of white heroes had to survive. This narrative of race hate is currently undergoing a renaissance of sorts in the U.S., and this has coincided with the vitriolic campaign and administrative tenor of President Donald Trump. Neo-Nazis such as Richard Spencer appear emboldened by Mr. Trump’s wink-and-nod approach. The legacy of Manson should serve, if anything, as a poignant reminder to liberal America that the pillars on which their pluralist democracy was built must never be taken for granted.

       In Delhi’s air, a political crisis

Delhi’s pollution is no more an environmental issue. If that is how we keep trying to grasp and resolve it, we will get nowhere. People get impatient when they face a crisis. Depending on their roles and levels of despair, they join the various available games in order to feel alive though breathless. In Delhi, the powerful have joined the blame game, and the powerless are seeking individual solutions, such as room purifiers and masks. Many are in despair, and I suspect they are in a majority. They have given up hoping that a solution can be found. A number of solutions have been recommended, and nearly all of them are fantastic, in the sense they place extraordinary conditions before trial.

Indeed, some of these solutions have been tried. In quite a few cases, they were abandoned prematurely simply due to lack of will to persist for a length of time. Sustaining public interest over time has not been easy in any sphere. One might have thought that air pollution will prove an exception to this general rule because Delhi’s air had begun to make people sick a while ago. Doctors’ warnings make no public difference now, nor do harsh commentaries in the media. People say that only the judiciary can get something done, and it is true that the judiciary has made several laudable initiatives possible. However, there are limits to what judges can do in the absence of collective will.

Does someone feel sorry for Delhi? I know a few people whose ancestors lived in Delhi and some others who have spent their whole life in the city. More than sad, they feel angry. One can’t blame them for feeling permanently upset and helpless. Among them, there used to be elderly citizens who wielded some moral authority among citizens and, at the same time, they mattered to governments. They helped Delhi survive through some of its bad moments in its recent history. That option is no longer available, not so much because no senior people carry moral authority in the public mind, but rather because listening is no more a part of governance. In any case, those in important offices are no longer accessible, nor do they acknowledge, let alone answer, letters or e-mails. A new culture of deafness has set in among office-bearers even as accountability and transparency acquire status as official values.

That is why the crisis expressed by choking air quality cannot be considered an environmental one. It is a political crisis — in a fundamental, not in an electoral, sense. If democratic politics is about empowering the citizen, it has failed in Delhi. Citizens of the city have reached a state of disempowered existence and numbness through a series of silently suffered traumas. These traumas cannot be treated now, but acknowledging them might have some healing effect. Let me recall three of them.

One, the massive tree-loss and speedy construction work done for the 2010 Commonwealth Games (CWG) had acquired a sinister feel before the event. Elected student representatives of Miranda House college gave a scroll, carrying their protest, against the reckless destruction of their neighbourhood, to Delhi’s chief minister who had come for a ceremony. Newspaper reports said the CM put aside the scroll and showed no eagerness to find out why the student leaders were unhappy. This little episode signifies a dangerous surge in civic cynicism that occurred when Delhi’s soul was sold to swindlers for the sake of national honour lodged in the CWG. A chasm developed between common citizens and popular leaders. It caused the birth of a new political party and Delhi’s voters gave it a rare, glorious majority.

IMPORTANT ARTICLE

1.तलाक : बनेगा कानून : शीतकालीन सत्र में बिल लाने पर विचार कर रही सरकार
• सुप्रीम कोर्ट से एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को अवैध ठहराने के बाद अब सरकार कानून लाकर इसे पूरी तरह दुरुस्त करने में जुट गई है।
• माना जा रहा है कि आगामी संसद सत्र में ही सरकार इस कानून को अमलीजामा पहनाकर उन लोगों पर कार्रवाई का रास्ता तैयार कर देगी जो अभी भी एक बार में तीन तलाक के जरिये महिलाओं को प्रताड़ित कर रहे हैं। इसके लिए मंत्रियों की एक समिति भी बना दी गई है।
• इस फैसले के राजनीतिक महत्व को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1 इसी साल 22 अगस्त को एक बार में तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने महिलाओं में बराबरी का मार्ग प्रशस्त किया था। कोर्ट में केंद्र सरकार ने इसे खत्म करने की पैरवी की थी।
• सुप्रीम कोर्ट से एक बार में तीन तलाक को अवैध ठहराने के बाद यूं तो उस वक्त किसी कानून की जरूरत महसूस नहीं की गई थी। लेकिन, अब लगने लगा है कि कार्रवाई के लिए पुलिस को सबल करने के लिए कानून की भी जरूरत है।
• लिहाजा, केंद्र सरकार ने मंत्रियों की एक समिति बना दी है। यह समिति इस कानून के खाके पर विचार कर रही है। संभव है कि अगले महीने के अंत में होने वाले शीतकालीन सत्र में इसे पेश कर दिया जाए।
• अभी कोई कानूनी संरक्षण नहीं : दरअसल, मौजूदा कानून में तलाक-ए-बिद्दत की पीड़ित महिला के संरक्षण का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। वह लाचार होकर सिर्फ पुलिस के पास जाती है, क्योंकि मुस्लिम मौलवी उसकी कोई मदद नहीं करते।
• तीन तलाक के मामलों में पुलिस भी असहाय है, क्योंकि मौजूदा कानून में उसके पास पति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। फौरी राहत के तौर पर वह घरेलू ¨हसा, महिला के प्रति अत्याचार जैसे कानूनों में केस दर्ज करती है।
• प्रोफेसर ने दिया वाट्सएप पर तलाक : दरअसल, सरकार के पास रिपोर्ट आ रही है कि कई मामलों में अभी भी एक बार में तीन तलाक की घटनाएं हो रही हैं। हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने वाट्सएप और एसएमएस के जरिये पत्नी को एक बार में तीन तलाक दे दिया।
• सुप्रीम कोर्ट ने माना था असंवैधानिक : सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक को असंवैधानिक और मनमाना बताते हुए रोक लगाई थी। साथ ही इस पर कानून बनाने की जिम्मेदारी सरकार पर छोड़ी थी।

2. विश्व प्रतिभा सूची में तीन स्थान का उछाल
• प्रतिभाओं को आकर्षित, विकसित और उन्हें अपने यहां बनाए रखने के मामले में भारत की वैश्विक रैंकिंग तीन अंक सुधर कर 51वीं हो गई है।
• हालांकि इस मामले में स्विट्जरलैंड अब भी पहले स्थान पर बना हुआ है।स्विट्जरलैंड के प्रमुख बिजनेस स्कूल आईएमडी ने यह सूची जारी की है। विश्व प्रतिभा रैकिंग में यूरोप का दबदबा कायम है।
• यूरोप के स्विट्जरलैंड, डेनमार्क और बेल्जियम देश इस मामले में सबसे प्रतिस्पर्धी है।
• इसके अलावा आस्ट्रिया, फिनलैंड, नीदरलैंड, नॉर्वे, जर्मनी, स्वीडन और लक्जमबर्ग शीर्ष दस देशों में शामिल हैं।रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप की जबरदस्त शिक्षा पण्राली उसे भीड़ से अलग बनाती है।
• यह उसे स्थानीय प्रतिभा के विकास और उसी समय विदेशी प्रतिभा और उच्च कुशल पेशेवरों को आकर्षित करने की क्षमता प्रदान करता है। इससे कई यूरोपीय कारोबार अपने प्रदर्शन के लिए उन पर ऐतबार करते हैं।

3. दूसरी बार आईसीजे जज बने भंडारी
• अंतरराष्ट्रीय अदालत में भारत की ओर से नामित दलवीर भंडारी के मंगलवार को हुए पुन:निर्वाचन पर ब्रिटेन का कहना है कि वह करीबी दोस्त भारत की जीत से खुश है।
• महासभा में भंडारी को मिल रहे व्यापक समर्थन के बाद अंतरराष्ट्रीय अदालत की इस बेहद कठिन दौड़ से ब्रिटेन को अपने उम्मीदार का नाम वापस लेने के लिए बाध्य होना पड़ा।
• अंतरराष्ट्रीय अदालत के पांच में से चार न्यायाधीशों के चुनाव के बाद पांचवें न्यायाधीश के तौर पर पुन: निर्वाचन के लिए भारत के भंडारी और ब्रिटेन के क्रि स्टोफर ग्रीनवुड के बीच बेहद कड़ा मुकाबला था।
• सत्तर वर्षीय भंडारी की जीत के बाद विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट किया है, वंदे मारतम-भारत ने अंतरराष्ट्रीय अदालत के लिए चुनाव जीता।

4. जर्मनी में वार्ता विफल, नए चुनाव को तैयार हैं मर्केल

• जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने कहा कि अल्पसंख्यक सरकार चलाने की जगह वह नए चुनाव में उतरना पसंद करेंगी। उन्होंने यह संकेत गठबंधन का प्रयास विफल रहने के बाद दिया है। पिछले कुछ हफ्तों से अस्थायी सरकार की वजह से जर्मनी कोई साहसी नीतिगत फैसला नहीं ले पाया है।
• कोई दूसरे संभावित गठबंधन की गुंजाइश नजर नहीं आने से जर्मनी में समय से पहले एक बार फिर चुनाव हो सकता है।
• एंजेला मर्केल के मुताबिक, त्रिपक्षीय वार्ता की राह में सबसे बड़ी रुकावट उनकी उदार शरणार्थी नीति है। चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद उन्हें असमान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन के लिए मजबूर होना पड़ा था।
• एक महीने तक चली बातचीत के बाद फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता क्रिश्चियन लिंडनेर ने कहा कि एंजेला के सीडीयू-सीएसयू और पर्यावरण समर्थक ग्रीन्स के कंजर्वेटिव गठबंधन के साथ सरकार बनाने के लिए विश्वास का कोई आधार नहीं है।
• लिंडनेर ने कहा कि खराब तरीके से शासन करने से बेहतर है कि शासन नहीं किया जाए। एंजेला की उदारवादी शरणार्थी नीति ने 2015 से 10 लाख से ज्यादा शरणार्थियों को आने दिया है। इससे खफा होकर कुछ मतदाताओं ने अति दक्षिणपंथी एएफडी का दामन थाम लिया।

5. पाक ने सीपीईसी परियोजनाओं में चीनी मुद्रा के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी
• चीन-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरीडोर (सीपीईसी) पर चीन और पाकिस्तान में मतभेद गहरा रहे हैं । पिछले दिनों पाक ने भारतीय खुफिया एजेंसी पर सीपीईसी में गड़बड़ी फैलाने का आरोप लगाया था जिसे चीन ने खारिज कर दिया।
• अब पाकिस्तान ने सीपीईसी परियोजनाओं के लिए चीनी मुद्रा युआन के प्रयोग की इजाजत देने से यह कहते हुए मना कर दिया है कि इससे देश की आर्थिक संप्रभुता के लिए खतरा साबित होगा। ज्ञात हो, दोनों देशों के अफसरों की सोमवार को सीपीईसी की विकास योजना को लेकर बैठक हुई थी।
• इससे पहले पाक ने एक डैम के लिए 14 अरब डॉलर की चीनी मदद की पेशकश ठुकरा दी थी। उसने कहा था कि चीन 60 अरब डॉलर के इस प्रॉजेक्ट से बाहर रहे इसे पूरी तरह पाकिस्तान को ही बनाने दे।1अखबार डान के मुताबिक, बैठक में पाकिस्तान ग्वादर में युआन के इस्तेमाल के और अमेरिकी डॉलर के समान चीनी मुद्रा के इस्तेमाल की अनुमति देने को तैयार नहीं हुआ।
• अधिकारियों ने बताया कि चीन चाहता था कि पाक उसकी मांग माने और इसे लांग-टर्म प्लान (2014-2030) के अंतिम मसौदे में शामिल करे। चीनी मुद्रा के इस्तेमाल की चीन की मांग का पाकिस्तान का वित्त मंत्रलय ही नहीं स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने भी कड़ा विरोध किया था।
• अब दोनों ही पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि आगे भी चीन-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरीडोर से संबंधित सभी वित्तीय लेनदेन मौजूदा करंसी स्वैप व्यवस्था के तहत ही होंगे। 1पाकिस्तान के इस फैसले से चीनी अधिकारियों को निराशा हुई है।
• पाक अधिकारी ने बताया कि पाकिस्तान में चीनी मुद्रा के आम इस्तेमाल और डॉलर जैसा आदान-प्रदान दोतरफा आधार पर होना चाहिए। बैठक में तीन विशेष आर्थिक क्षेत्रों और कुछ रेल, बिजली और सड़क परियोजनाओं में बाधाओं के बावजूद सीपीईसी पर आगे बढ़ने का फैसला हुआ।
• उन्होंने कहा कि आगे सीपीईसी की संयुक्त सहयोग समिति (जेसीसी) की बैठक में इस मामले पर चर्चा होगी।

6. समाधान तलाशने रूस पहुंचे असद

• सीरिया से आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के पांव उखड़ते ही देश में चल रहे गृहयुद्ध के राजनीतिक समाधान की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसी क्रम में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद सोमवार को मॉस्को पहुंचे। तटीय शहर सोची के एक रिसॉर्ट में उनकी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से मुलाकात हुई।
• असद रूस में लगभग चार घंटे रहे। असद ने पुतिन को भरोसा दिलाया कि अब जमीनी सूरत हमारे पक्ष में है। हम राजनीतिक प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।
• रूस सीरिया विवाद का अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सहयोग से शांतिपूर्ण रास्ता निकालने की दिशा में सक्रियता से कार्य कर रहा है। रूस ने असद सरकार के पक्ष में लगभग दो वर्ष पूर्व सैन्य हस्तक्षेप किया था। इससे बशर अल असद सरकार को जीवनदान मिला था।
• पुतिन सीरिया के मुद्दे पर ईरान व तुर्की के राष्ट्राध्यक्षों से बात करेंगे। इनके अतिरिक्त अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मध्य पूर्व देशों के नेताओं को भी फोन कर उनके समक्ष अपनी राय रखेंगे। रूसी टीवी के अनुसार पुतिन ने असद को कहा कि आतंकियों पर पूरी तरह जीत के लिए अभी लंबी दूरी तय करनी है, लेकिन सीरिया में जहां तक आतंकरोधी संयुक्त अभियान की बात है, इसे अब खत्म किया जा रहा है।
• अहम यह है कि हम राजनीतिक सवालों पर फोकस करें। रूसी राष्ट्रपति ने असद सरकार के शांति व समाधान चाहने वाले सभी पक्षों से बातचीत की तैयारी पर संतोष जाहिर किया। उन्होंने कहा कि सीरिया की जनता ही असद का भविष्य तय करेगी।
• वहीं असद ने रूस के समर्थन के लिए सीरियाई जनता की ओर से आभार जताया और कहा कि हम इसे कभी नहीं भूल पाएंगे। ज्ञात हो कि रूस अब सीरिया के सभी जातीय समूहों व विद्रोहियों से बातचीत के पक्ष में है। इस दिशा में पूर्व में भी प्रयास हुए थे लेकिन सीरिया पर दुनिया भर के देशों के अलग-अलग नजरिए से यह सफल नहीं हो सका था।
• जहां रूस, ईरान और हिजबुल्ला का असद को समर्थन था, वहीं अमेरिका, तुर्की व खाड़ी देश असद के विरोध में जंग छेड़े विद्रोहियों का साथ दे रहे थे।

7. जिम्बाब्वे में 37 साल की सत्ता का पटाक्षेप : मुगाबे ने इस्तीफा दिया

• जिम्बाब्वे की संसद के स्पीकर जैकब मुदेंडा ने मंगलवार को कहा कि रॉबर्ट मुगाबे ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही मुगाबे की 37 साल चली आ रही सत्ता का पटाक्षेप हो गया है।
• कुछ दिनों पहले सेना जिम्बाब्वे की सत्ता पर काबिज हो गई थी और इसके बाद मुगाबे से शक्तियां छीन ली गई थीं। स्पीकर मुंदेड़ा ने मुगाबे का त्यागपत्र पढ़ा जिसमें लिखा हुआ था, मैं रॉबर्ट गैब्रिएल मुगाबे जिम्बाब्वे के संविधान की धारा 96 के तहत औपचारिक रूप से अपना इस्तीफा देता हूं जो तत्काल प्रभावी है।
• इस्तीफे की यह बड़ी खबर संसद के विशेष संयुक्त सत्र के समक्ष दी गई। मुगाबे पर महाभियोग के प्रस्ताव पर र्चचा करने के लिए विशेष सत्र बुलाया गया था।
• मुगाबे 1980 से जिम्बाब्वे की सत्ता पर आसीन थे। इस्तीफे की खबर आते ही राजधानी हरारे की सड़कों पर जश्न शुरू हो गया। लोगों ने कारों के हॉर्न बजाकर और चिल्लाकर खुशी का इजहार किया।

8. हाई कोर्ट अपने आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में

• इलाहाबाद हाई कोर्ट अपने ही आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। रजिस्ट्रार जनरल की ओर से याचिका दाखिल कर हायर ज्युडिशियल सर्विस के न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता सूची रद करने के आदेश को चुनौती दी है।
• इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट बुधवार को सुनवाई करेगा। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 30 जून 2017 को प्रदेश की उच्च न्यायिक सेवा (हायर ज्युडिशियल सर्विस) के प्रमोटी और सीधी भर्ती के अधिकारियों की वरिष्ठता सूची रद कर दी थी। हाई कोर्ट ने प्रशासनिक छोर को नए सिरे से वरीयता सूची बनाने का आदेश दिया था।
• उस आदेश के बाद से आज की तारीख में उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारियों की कोई वरिष्ठता सूची नहीं है। इससे न्यायिक अधिकारियों को न तो जिला अदालतों और न ही हाई कोर्ट में प्रोन्नत किया जा सकता है।
• इस समय उत्तर प्रदेश में 16 जिला अदालतों में पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा परंपरा के मुताबिक हायर ज्युडिशियल सर्विस के एक तिहाई न्यायिक अधिकारी हाई कोर्ट में प्रोन्नत होते हैं।
• इस हिसाब से हाई कोर्ट में भी करीब 14 न्यायिक अधिकारियों की प्रोन्नति रुकी पड़ी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से दाखिल याचिका में उच्च न्यायालय के आदेश का विरोध करते हुए कहा गया है कि वरिष्ठता सूची और चिन्हित रिक्तियों को अंतिम रूप दिया जा चुका था। ऐसे में इसे रद किया जाना उचित नहीं है।
• कहा गया है कि वरिष्ठता सूची और रिक्तियों का निर्धारण नियमों के मुताबिक किया गया था। याचिका में वरिष्ठता सूची तय करने को लेकर लंबा ब्योरा दिया गया है। 1शीर्ष न्यायालय से हाई कोर्ट का आदेश रद करने की गुहार लगाई गई है।
• मालूम हो, प्रोन्नति और रिक्तियों का यह विवाद सिर्फ 2009 तक की रिक्तियों का हैं। उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का इतिहास बहुत पुराना है। हाल ही में स्थापना के 150 वर्ष पूरे करने वाले इस उच्च न्यायालय ने तमाम ऐतिहासिक फैसले दिए हैं।

9. दिवालिया कानून में बदलाव के सुझाव देगी लॉ कमेटी

• सरकार ने दिवालिया कानून के तहत बढ़ते मामलों के मद्देनजर 14 सदस्यों वाली लॉ कमेटी के सदस्यों के नाम तय कर दिए हैं। कॉरपोरेट मामलों के सचिव आइ श्रीनिवास की अध्यक्षता वाली यह समिति इन्सॉल्वेंसी व बैंक्रप्सी कोड (आइबीसी) के क्रियान्वयन से जुड़े मुद्दों की पहचान करेगी। कमेटी इन दिक्कतों को दूर करने के सुझाव भी देगी।
• इस संबंध में सरकारी अधिसूचना जारी कर दी गई है।1लॉ कमेटी में श्रीनिवास के अलावा रिजर्व बैंक के निदेशक सुदर्शन सेन, लोकसभा के पूर्व महासचिव टीके विश्वनाथन, एडलवीस ग्रुप के चेयरमैन राकेश शाह और एक्सप्रो इंडिया के चेयरमैन सिद्धार्थ बिरला के नाम भी शामिल हैं।
• आइबीसी को जब लागू किया गया था तो माना गया कि यह बैंकों के 9.5 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्जे (एनपीए) की समस्या का अंतिम समाधान निकाल लेगा। लेकिन छह महीने में पता चल गया है कि इसके मौजूदा स्वरूप में कई खामियां हैं।
• ऐसी खबरें आ रही हैं कि दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही कंपनियों के प्रमोटर खुद ही नीलामी में शामिल होकर इन पर अपना कब्जा बनाए रखने की फिराक में हैं। इससे आने वाले दिनों में मुश्किलें ज्यादा हो सकती हैं। लिहाजा सरकार ने अब आइबीसी में बदलाव की सिफारिश करने के लिए इन्सॉल्वेंसी लॉ कमेटी बनाई है। यह दो महीने में अपने सुझाव देगी।
• माना जा रहा है कि नई समिति ऐसे प्रावधान लाएगी जिससे कर्ज नहीं चुकाने प्रमोटरों को अपनी कंपनियों की जब्त संपत्तियों को रोकने की व्यवस्था हो। आइबीसी के बनने के बाद नेशनल कंपनी लॉ टिब्यूनल (एनसीएलटी) में कुल 300 मामले भेजे जा चुके हैं।

AIR NEWS

NEWS-Click Here

SAMAYAKI-Click Here

Surkhiyon me –

Charcha ka Vishay hai-  

Public Speak-

Vaad-Samvaad-

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.