Daily Current(23/11/2017) For UPSC IAS CDS CAPF UPPSC MPPSC RAS

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NEWS PAPER EDITORIAL

विकास के दावे और गरीबी

(देवेंद्र जोशी) 
(jansatta)

गरीबी रेखा को ऊपर-नीचे करके आजादी से लेकर अब तक गरीबों की संख्या भले ही घटाई- बढ़ाई जाती रही हो, लेकिन गरीबी की रेखा न घटी और न ही गरीब-अमीर के बीच की खाई कम हुई। वर्षों से अर्थशास्त्र में यह पढ़ाया जा रहा है कि भारत एक अमीर देश है जिसमें गरीब लोग निवास करते हैं। संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद गरीबी के आंकड़ों मे हो रही निरंतर वृद्धि सोचने को मजबूर करती है कि आखिर क्या वजह है कि एक तरफ करोड़पति अमीरों की संख्या बढ़ती जा रही है, तो दूसरी तरफ, फुटपाथ पर भीख मांग कर गुजारा करने वालों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 2013 में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या सबसे अधिक भारत में थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि उस साल भारत की तीस प्रतिशत आबादी की औसत दैनिक आय 1.90 डॉलर से कम थी और दुनिया के एक तिहाई गरीब भारत में थे। आज भी इस स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। ‘पॉवर्टी ऐंड शेयर प्रॅसपेरिटी’ (गरीबी और साझा समृद्धि) शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि क्षमता से नीचे चल रहे होने के बावजूद पूरी दुनिया में गरीबी की दर में गिरावट तो आई है लेकिन जिस अनुपात में अमीरों की आय बढ़ी है उस अनुपात में यह गिरावट बहुत मामूली है। 2013 में जारी आंकड़ों के मुताबिक पूरी दुनिया में गरीबों की संख्या करीब 80 करोड़ में भारत में गरीबी रेखा के अंतरराष्ट्रीय मानक से नीचे जीवनयापन कर रहे लोगों की संख्या 22.7 करोड़ है। माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने कभी कहा था कि ‘गरीबी में जन्म लेना गुनाह नहीं है, गरीबी में मर जाना गुनाह के समान है।’ एक क्षण के लिए यदि इस कथन को सही भी मान लिया जाए तो प्रश्न उठना लाजमी है कि इस गुुुनाह केलिए आखिर जिम्मेवार किसे माना जाए। उस गरीब को, जो तमाम प्रयासों के बावजूद गरीबी से उबरने योग्य अर्थोपार्जन नहीं कर पाया, या उस सरकार को, जो संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद उसके लिए नौकरी-धंंधे का बंदोबस्त नहीं कर पाई? क्योंकि बिल गेट्स से काफी पहले, गरीबी के कारण कर्ज मेंं डूबे किसानों के बारे में भारत के अर्थशास्त्री कह चुके हैं कि भारत का किसान कर्ज में जन्म लेता हैै, कर्ज में ही बड़ा होता हैै और कर्ज में ही मर जाता है। यही स्थिति गरीबों की है।

निश्चित ही गरीबों की स्थिति में बदलाव के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का असर भी हो रहा है। विश्व सामाजिक सुरक्षा के तहत रोजगार प्रदान करने में विश्व बैंक ने मनरेगा को पहले स्थान पर माना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे भारत के पंद्रह करोड़ लोगों को रोजगार मिल रहा है। इसी तरह मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) योजना को भी सबसे बड़ा विद्यालयी कार्यक्रम कहते हुए इसकी सराहना की गई है। इससे 10.5 करोड़ बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। वास्तविकता यह भी है कि मिड-डे मील योजना और मनरेगा भ्रष्टाचार की शिकार रही हैं। देश में जहां एक तरफ स्मार्ट सिटी और डिजिटलाइजेशन की बात हो रही है, वहीं करीब सत्ताईस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। गरीबी एक ऐसा कुचक्र है जिसमें उलझा व्यक्तिचाह कर भी उससे निकल नहीं पाता है। अंतत: गरीब को गरीब बनाए रखने के लिए गरीबी ही जिम्मेवार होती है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रेगनर नर्कसे ने कहा है कि ‘कोई व्यक्ति गरीब है, क्योंकि वह गरीब है। यानी वह गरीब है इसलिए ठीक से भोजन नहीं कर पाता, जिससे उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, जिससे वह कुपोषण का शिकार रहता है। परिणामस्वरूप वह ठीक तरह से काम नहीं कर पाता है।

नतीजतन वह गरीब ही बना रहता है। इस तरह गरीबी का दुश्चक्र अंत तक उसका पीछा नहीं छोड़ता है।’ योजनाएं बना देना और समिति गठित कर देना एक बात है और उनका सही क्रियान्वयन दूसरी बात। क्या सरकार वाकई गरीबी कम करने के लिए प्रतिबद्ध है? सरकार द्वारा जारी आंकडेÞ तो कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के मुताबिक 1999-2000 में निर्धनता का प्रतिशत 26.1 था, जो 2004-05 में घट कर 21.8 प्रतिशत रह गया था। लेकिन 2008 में सरकार द्वारा गठित तेंदुलकर समिति ने माना कि निर्धनता का प्रतिशत 37.2 था। यूपीए-2 सरकार के समय, 2013 में, एनएसएसओ के अनुमान पर योजना आयोग ने शहरी इलाकों में 28.65 रुपए और ग्रामीण इलाकों में 22.42 रुपए रोजाना कमाने वाले को गरीबी रेखा के नीचे रखा था। इस पैमाने को लेकर मुख्य विपक्षी दल के नाते तब भाजपा ने खूब बवाल मचाया था। लेकिन 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद योजना आयोग ने 32 रुपए ग्रामीण और 47 रुपए शहरी इलाकों में दैनिक खर्च का पैमाना तय किया। यह भी किसी मजाक से कम नहीं है।

वर्तमान महंगाई के दौर में ये आंकडेÞ गरीब के जले पर नमक छिडकने से कम नहीं हैं। इस आंकडेÞ को ही पैमाना मान कर गणना की जाए तो आज भारत में गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालों की संख्या 37 करोड़ से ज्यादा है। विकासशील देशों की बात तो छोड़िए, भारत की हालत तो अफ्रीका के कई दुर्दशाग्रस्त देशों से भी खराब है। लोगों के हाथों में मोबाइल, कंप्यूटर और सड़कों पर गाड़ियों की संख्या देख कर देश की स्थिति का आकलन करने वालों को समझना चाहिए कि दुनिया बिल्कुल वैसी नहीं है जैसी टीवी के रंगीन परदे पर दिखाई देती है। कभी-कभार खबर बनकर सामने आने वाली कुछ घटनाएं गरीबी के भयावह मंजर से रूबरू करा देती हैं। जैसे हाल में एक गरीब बारह किलोमीटर तक अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर ढोने को मजबूर हुआ, तो दूसरे को कूड़े के ढेर में आग लगा कर लाश का क्रियाकर्म करना पड़ा।

आर्थिक विकास दर (जीडीपी) को अब खुशहाली का पैमाना नहीं माना जा सकता। जहां एक ओर नेता, अफसर, व्यापारी, धर्म के ध्वजवाहक ठाठ की जिंदगी बसर कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांव, कस्बे, पहाड़ी व रेगिस्तानी इलाकों और झुग्गी-झोपड़ी तथा तंग गलियों में रहने वाले लोग जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं। उनके पास न तन ढंकने को कपड़ा है, न पेट भरने को भोजन और सिर पर छत का तो सवाल ही नहीं। भारत को बाजार आधारित खुली अर्थव्यवस्था बने पच्चीस साल से अधिक का समय हो चुका है। इसके बाद भी देश की एक चौथाई आबादी गरीब है, तो प्रश्न उठेगा ही कि आखिर क्या किया हमने इतने सालों में? जबकि इस दौरान भारत की विकास दर अच्छी-खासी रही। राज्यों की दृष्टि से देखें, तो छत्तीसगढ़ सबसे गरीब राज्य है, जहां ग्रामीण गरीबी 44.6 प्रतिशत है। केंद्रशासित प्रदेशों में दादर एवं नगर हवेली सबसे गरीब है जहां 62.9 प्रतिशत गरीबी है। भूखे को रोटी देना जितना जरूरी है, उससे कहीं अधिक जरूरी उसे कमाने लायक बनाना है। आर्थिक सर्वेक्षणों के नतीजों से स्पष्ट हो गया है कि अब तक की सारी गणनाओं में गरीबी की जो स्थिति बताई जाती है वह वास्तविकता से कम है। भारत में ज्यादातर गरीब लोग (करीब साठ प्रतिशत) बिहार, झारखंड, ओड़िशा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में रहते हैं। लिहाजा, इन राज्यों के मद््देनजर कुछ विशेष योजनाएं बननी चाहिए।

कौशल विकास से जुड़ी भारत की तलाश

देश की राजनीति और समाज को मौजूदा स्थिति में एक साथ आगे चलने की आवश्यकता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजित बालकृष्णन

आज से कुछ वर्ष पहले आदर्श नायकत्व के दौर में मैंने अपने पड़ोस के एक स्कूल में कक्षा 8 के बच्चों को बीजगणित पढ़ाने की हामी भरी थी। यह स्कूल कोलाबा (मुंबई) में मेरे घर से चंद कदमों की दूरी पर है। मेरी कक्षा में जो बच्चे थे उनमें बड़ी तादाद करीबी ससून डॉक पर काम करने वाले मछुआरों के बच्चों-बच्चियों की थी। हालांकि मेरी यात्राओं ने मेरे उस आदर्शवादी प्रयास पर अंकुश लगा दिया लेकिन फिर भी मेरे दिलोदिमाग में उन बच्चों की प्रतिभा और सीखने की उनकी ललक की याद अब तक ताजा है। अगर उनमें से कोई मुझ जैसे मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुआ होता तो वे यकीनन आईआईटी और आईआईएम में बढिय़ा प्रदर्शन कर रहे होते। दुख की बात है कि मेरे उन छात्रों में से कई को अपने परिवार के लिए पैसे कमाने की खातिर पढ़ाई छोडऩी पड़ी और वे डिलिवरी ब्वॉय और घरेलू सहायिकाओं के रूप में काम करने लगे।
इसमें कोई नई बात नहीं है। हम सभी यह बात जानते हैं। हम सभी ऐसी परिस्थितियों से दो चार हो चुके होते हैं। इसके बाद हमें अक्सर ऐसी सलाह सुनने को मिलती है कि इस समस्या का असली हल यही है कि एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था पेश की जाए जहां व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता हो। अगर इन बच्चों को ऐसा कौशल दिया जाए जो इनको बेहतर जीवन जीने में सहायक हो तो फिर उनको तीन साल की कॉलेज डिग्री की जरूरत ही क्या है जबकि उसकी मदद से वे अपनी आजीविका तक नहीं कमा सकते। एक दशक या उससे अधिक समय से देश के अधिकांश राज्य और केंद्र सरकार कौशल विकास कार्यक्रम चला रहे हैं। इनके लिए बाकायदा विभाग बनाए गए हैं और मंत्रियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है लेकिन नतीजे में कुछ खास नजर नहीं आता। विभिन्न समितियों की मदद से कौशल आधारित रोजगार तैयार करने की कोशिश की गई। ऐसे रोजगार जो भविष्य में युवाओं के काम आ सकें। इसके लिए अलग पाठ्यक्रम तैयार किया गया। सीमेंस और एलऐंडटी जैसी कई कंपनियों ने तगड़े प्रयास किए लेकिन भारत में जिस पैमाने पर कौशल विकास की आवश्यकता है उसे देखते हुए ये प्रशिक्षण नाकाफी साबित हुए। कई लाख भारतीय बच्चे माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं जबकि इनमें से कुछ हजार ही कौशल विकास कार्यक्रमों का लाभ ले पा रहे हैं।
मैंने इस क्षेत्र में गहन प्रयास कर रहे विचारवान लोगों के साथ मुलाकात कर इस बारे में ज्यादा मालूमात जुटानी चाही। उनमें से एक ने मुझसे ऐसी बात कही जो अब भी मेरे दिमाग में गूंज रही है। उन्होंने कहा, ‘जर्मनी जैसे देशों में अपने हाथ से काम करने और उसके सही होने पर तारीफ मिलने का सिलसिला बचपन से शुरू हो जाता है। उदाहरण के लिए किसी टूटी हुई खिड़की को ठीक करना।’ वहां बच्चे ऐसे माहौल में बड़े होते हैं जहां ऐसे कौशल की सराहना की जाती है और सफेदपोश मध्यवर्ग के मातापिता भी ऐसे कामों की तारीफ करते हैं। एक ऐसे समाज में जहां व्यावसायिक शिक्षण और कौशल आधारित रोजगारों की अहमियत है, वहां शुरुआत से ही मिलने वाली यह तारीफ मायने रखती है। भारत में कुछ अज्ञात वजहों से सामाजिक आकांक्षाओं का ताल्लुक सरकारी नौकरी से है। ऐसे काम जहां आप अपनी डेस्क पर बैठते हैं और पेन व कागज की मदद से कंप्यूटर के सहारे अपना काम करते हैं।
किसी देश के सामाजिक पहलू को कभी भी उसकी शिक्षा व्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। मुझे इसका पहला अनुभव उस समय हुआ जब मैं पूर्वी भारत में पॉलिटेक्रीक्स की कार्यप्रणाली का अध्ययन करने में तल्लीन था। देश के पॉलिटेक्रीक्स की अक्सर इस बात के लिए आलोचना की जाती है कि वे बढिय़ा कौशल संपन्न स्नातक नहीं दे पा रहे हैं। मुझे इसकी वजह का अंदाजा है। मुझे लगता है कि बच्चों पर माता-पिता का सामाजिक दबाव बहुत ज्यादा होता है। इसलिए जो बच्चे इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला नहीं ले पाते हैं वे बाद में पॉलिटेक्रीक कॉलेज के कोटा के सहारे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेने का प्रयास करते हैं। इसकी वजह से पॉलिटेक्रीक संस्थानों ने अपने पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिया ताकि जो पॉलिटेक्रीक छात्र बाद में इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला ले लेते हैं वे कहीं इंजीनियरिंग कॉलेज के पाठ्यक्रम से पिछड़ न जाएं। जाहिर सी बात है इस पूरी प्रक्रिया में वे बच्चे कहीं पीछे छूट जाते हैं जो पॉलिटेक्रीक में पढ़ाई करते हुए कौशल विकास करना चाहते हैं।
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर कैथलीन थेलेन ने अपनी पुस्तक हाऊ इंस्टीट्यूशंस इवॉल्व- द पॉलिटिकल इकनॉमी ऑफ स्किल्स इन जर्मनी, ब्रिटेन ऐंड यूनाइटेड स्टेट्स ऐंड जापान, में इस बात का उल्लेख किया है कि जर्मनी जैसे समाज में व्यावसायिक शिक्षण का माहौल पहले से मौजूद है और ब्रिटेन में भारत की तरह पहले से व्यावसायिक शिक्षण का कोई माहौल नहीं रहा है लेकिन अब वह जगह बना रहा है। ब्रिटेन में प्रशिक्षण की कमी को अगर अर्थशास्त्रियों की भाषा में समझें तो एक ऐसे देश में जहां कुशल लोगों की कमी है, वहां अगर किसी फर्म में उच्च गुणवत्ता वाला कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम हो तो अन्य लोग अपने कर्मचारियों को उनका मुफ्त लाभ उठाने के लिए प्रेरित करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के चलते ब्रिटेन एक ऐसे दुष्चक्र का शिकार हो गया जहां अर्थव्यवस्था में कौशल की कमी के चलते विभिन्न फर्म इस बात के लिए प्रोत्साहित हुईं कि वे कम कौशल से बनने वाले उत्पाद खरीदें। वह कहती हैं कि इससे कौशल में निवेश कम हुआ।
वह समाजविज्ञानी गैरी बेकर का हवाला देते हुए कहती हैं कि कौशल दो प्रकार का होता है। विशिष्टï कौशल, जो किसी फर्म के लिए जरूरी होता है और सामान्य कौशल जो विभिन्न कंपनियों और कर्मचारियों के बीच विस्तारित रह सकता है। जब कंपनियां कौशल प्रशिक्षण का काम करती हैं तो उनके पास ऐसी कोई वजह नहीं होती कि वे आम कौशल को प्रोत्साहन दें। वहीं दूसरी ओर विशिष्टï कौशल की बात करें तो वह पूरी तरह अहस्तांतरणीय होता है। यानी उसका एक खास जगह इस्तेमाल संभव होता है। वे उसी कंपनी के लिए मूल्यवान होते हैं। इससे आप यह समझ सकते हैं कि आखिर क्यों कंपनियों के लिए होने वाला कौशल विकास समूची अर्थव्यवस्था में कौशल की कमी की समस्या को दूर नहीं कर पाता। थेलन कहती हैं कि उदार बाजार वाली अर्थव्यवस्थाओं में युवाओं में ऐसे कौशल विकास के लिए खासा प्रोत्साहन होता है जिनका बाजार हो। विशिष्टï कौशल पर यह बात लागू नहीं होती। नई प्रौद्योगिकी के विकास का समाज और सामाजिक ढांचे से संबंध होता है। एक बड़ा घरेलू बाजार और कौशल विकास व्यवस्था की कमी ने ऐतिहासिक रूप से भी और आज भी अमेरिकी कारोबारी जगत को अपने उत्पादों को मानक बनाने और कौशल को प्रतिस्थापित करने वाली तकनीक तलाशने पर मजबूर किया है।

किसान का नुकसान

अगर खाद्य तेल पर आयात शुल्क में बढ़ोतरी करने और दालों पर निर्यात प्रतिबंध समाप्त करने का इरादा इन जिंसों की कमजोर कीमतों को बढ़ाकर किसानों को लाभ पहुंचाने का है तो इससे कोई फायदा होता नहीं दिखता। इन फसलों का ज्यादातर हिस्सा खरीफ के मौसम में उत्पादित होता है और उसकी कटाई पहले ही हो चुकी है। किसान औनेपौने दाम पर उनका सौदा भी कर चुके हैं। किसानों को इसका लाभ तब मिलता जबकि ये निर्णय बुआई के पहले लिए गए होते। इससे वे इन फसलों का रकबा बढ़ा सकते थे या कम से कम फसल कटाई के समय ही उनको इनकी बेहतर कीमत मिल पाती। फिलहाल कीमतों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी व्यापार और प्रसंस्करण उद्योग को लाभान्वित करेगी और किसानों की हालत जस की तस रहेगी। 
हकीकत में तिलहन और दलहन इकलौती ऐसी फसल नहीं हैं जिनकी कीमतों में गिरावट आई है। अधिकांश कृषि जिंसों की कीमतें पिछले साल हुए बंपर उत्पादन के बाद से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे रही हैं। कुछ मामलों में कीमतें उत्पादन मूल्य से भी कम हो गईं। कीमतों में आई यह गिरावट इस वर्ष भी जारी रही, हालांकि उड़द और कपास को छोड़कर अधिकांश खरीफ फसलों का उत्पादन या तो पुराने स्तर पर बरकरार रहा या गिरा। इसका दोष सरकार की गलत कृषि मूल्य निर्धारण नीतियों को भी जाता है जो मोटे तौर पर मुद्रास्फीति प्रबंधन से संबंधित हैं। इसे गत वर्ष 2.3 करोड़ टन की जरूरत के मुताबिक उत्पादन के बावजूद 50 लाख टन दालों के आयात से भी समझा जा सकता है। जरूरत से ज्यादा आपूर्ति ने कीमतों को प्रभावित किया। तकरीबन 180 किसान संगठनों के गठबंधन ने सोमवार को दिल्ली में किसान मुक्ति संसद का आयोजन किया और उपज की अच्छी कीमत और ऋण में रियायत की मांग की। कमजोर कीमतों के चलते किसानों को करीब 36,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। बताया जाता है कि यह आकलन करते वक्त एमएसपी और मौजूदा थोक कीमतों को ही ध्यान में रखा गया है। बहरहाल, वास्तविक नुकसान ज्यादा हो सकता है क्योंकि अनेक किसानों को अपनी उपज को आधिकारिक थोक कीमतों से कम में बेचना पड़ा क्योंकि उनको अपनी नकदी संबंधी जरूरतों को पूरा करना था। ऐसे में यह उम्मीद करना बेमानी है कि अपेक्षाकृत देरी से उठाए गए नीतिगत कदम किसानों की समस्या हल कर पाएंगे।
सही मायनों में जरूरत यह है कि कृषि मूल्य और व्यापार को लेकर स्थिर नीतियां बनाई जाएं। इसमें आयात और निर्यात भी शामिल हैं। इसमें बाजार की मांग और कीमतों के अनुरूप उत्पादन करने की इजाजत भी शामिल है। फिलहाल नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने अपनी कई रिपोर्ट और चर्चा पत्रों में इस बात पर जोर दिया है। इस दिशा में कुछ उम्मीद सरकार के हालिया निर्णय से भी उपजती है जहां उसने एक फॉर्मूला विकसित करने की बात कही है ताकि कृषि आयात और निर्यात पर शुल्क बढ़ाने और घटाने का काम थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर किया जाए। यह विचार काफी हद तक तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन द्वारा 1980 के दशक के मध्य में अपनाए तरीके के अनुरूप ही है। इसकी वजह से देश उस दशक के अंत तक खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो सका। उस योजना को छोडऩे और बाजार की उपलब्धता और मूल्यों की असामान्यता को लेकर तगड़ी प्रतिक्रिया के साथ सरकार ने पारदर्शी नीति व्यवस्था का लाभ गंवा दिया। आश्चर्य नहीं कि घरेलू तेल की जरूरतों के मामले में हमारी आयात निर्भरता एक बार फिर 70 फीसदी पर पहुंच गई। ऐसे में केवल आयात निर्यात शुल्क से छेड़छाड़ से काम नहीं चलेगा।

Pill talk — On antibiotic resistance

Consumer awareness is needed on the danger of reckless antibiotic use

Around the time the UN Climate Change Conference drew to a close in Bonn last week, so did the World Antibiotic Awareness Week, a World Health Organisation campaign to focus attention on antibiotic resistance. The global threats of climate change and antibiotic resistance have much in common. In both cases, the actions of people in one region have consequences across the globe. Also, tackling both requires collective action across multiple focus areas. For resistance, this means cutting the misuse of antibiotics in humans and farm animals, fighting environmental pollution, improving infection control in hospitals, and boosting surveillance. While most of these goals need government intervention, individuals have a critical part to play too. This is especially true for India, which faces a unique predicament when it comes to restricting the sale of antibiotics — some Indians use too few antibiotics, while others use too many. Many of the 410,000 Indian children who die of pneumonia each year do not get the antibiotics they need, while others misuse drugs, buying them without prescription and taking them for viral illnesses like influenza. Sometimes this irrational use is driven by quacks. But just as often, qualified doctors add to the problem by yielding to pressure from patients or drug-makers. This tussle — between increasing antibiotic use among those who really need them, and decreasing misuse among the irresponsible — has kept India from imposing blanket bans on the non-prescription sale of these drugs.

When policymakers did propose such a ban in 2011, it was met with strong opposition. Instead, India turned to fine-edged tools such as the Schedule H1, a list of 24 critical antibiotics such as cephalosporins and carbapenems, whose sale is tightly controlled. But even Schedule H1 hasn’t accomplished much: pharmacists often flout rules, and drug controllers are unable to monitor them. Thus, the power to purchase antibiotics still remains in the hands of the consumer. It is up to consumers now to appreciate the threat of antibiotic resistance and exercise this power with care. These miracle drugs form the bedrock of modern medicine today, and are needed for everything from prophylaxis for a complicated hip surgery to treatment for an infected knee scrape. Losing these drugs would mean that even minor illnesses could become killers, and the cost of health care will soar. Consumers need to remember that not all illnesses need antibiotics, and the decision on when to take them and for how long is best left to a doctor. Multi-resistance in some tertiary-care hospitals to bugs like Staphylococcus aureus has grown to dangerous levels. But the experience of countries like Australia shows that cutting down on antibiotics can reverse such trends. The National Action Plan on Antimicrobial Resistance aims to repeat such successes in India. Meanwhile, awareness must be built among consumers so that they see the coming crisis and take up the baton.

A wilful negligence

How many more farmers must die before the prime minister condescends to take notice? How many rats must the protesting Tamil Nadu farmers at Jantar Mantar eat before the government acts? How many more fake farm loan waiver schemes will be announced before the cabinet realises that farmers cannot be fooled anymore? Despite 300,000 farmers taking their lives over the past two decades, this government is unmoved.

The central government constituted a series of high-powered committees on farmers’ suicides. They made explicit recommendations. The Ramesh Chand Committee Report of March 2015 said the Minimum Support Price (MSP) should be calculated by computing farm labour at the skilled wage rate, calculating land rent at the actual rent without any ceiling, calculating interest on working capital by including a factor relating to borrowing from non-institutional sources, calculating interest on working capital for the whole and not half the crop season, by including in the cost of cultivation post-harvest costs and by including the rate of inflation. If this is done, the MSP would rise by over 50 per cent.

It also recommended that the government correct all instances where the MSP is lower than the cost of production. It drew attention to the recommendations of the National Farmers Commission headed by M.S. Swaminathan that had made a similar recommendation decades ago. Not only has the MSP not been scientifically revised, but farmers have been forced to sell below the MSP across India.

The Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana (PMFBY) was launched with fanfare to provide crop insurance to nine crore agricultural households. The Centre for Science and Environment reported that only 20 per cent of the eligible farmers were covered and most farmers had no idea about the scheme. Rs 13,240 crore of government money found its way into the bank accounts of private insurance companies that more often than not refused to pay, making a variety of excuses.

This insurance scheme does not cover tenant farmers even though they constitute 50 per cent of farmers’ suicides in Andhra Pradesh and other states. They should be registered and given documents such as the Loan Eligibility Cards as in AP and the Bhoomiheen Kisan Credit Card or the Certificate of Cultivator so that get crop insurance, crop loss relief and other benefits. The insurance schemes does not cover women farmers even though the National Farmers’ Commission recommended decades ago that their names be included in the column of cultivators and concessions on registrations and stamp duty be granted to women to incentivise land transfers to them. M.S. Swaminathan had even drafted a Women Farmers Entitlements Bill, 2011 which was revised by the Mahila Kisan Adhikar Manch. No one in government took notice.

Many expert committees have recommended urgent steps to reduce rural indebtedness to contain the intensification of the debt burden which has risen alarmingly. For this, the RBI guidelines that require 18 per cent of Adjusted Net Bank Credit (ANBC) to be set aside for agriculture, and 8 per cent of this exclusively for small and marginal holders, must be followed. Instead, the government allowed big industrial houses to corner capital meant for poor farmers by amending the RBI definition of “agriculture” and “allied activities” to allow for large agri-businesses.

The central government-appointed Task Force on Organic and Non-Chemical Farming recommended in 2016 that all states should substitute chemical fertilisers with bio inputs in at least 10 per cent of the net cultivated area (up from 1 per cent today) and provide high-quality organic seeds to farmers by 2025. Similar recommendations were made by the Parliamentary Committee on Estimates headed by Murli Manohar Joshi. However, GM food giants like Monsanto have a more powerful lobby of MPs than organic farmers.

Finally, trade policies have destroyed the lives of tens of thousands of farmers. At times of high production, import policies have been tweaked to allow for cheap imports, decimating the farm economy. All over the world, governments subsidise and take care of their farmers. Here we push them to suicide.

IMPORTANT ARTICLE

1.दिल्ली पर नहीं हो सकता स्थानीय सरकार का अधिकार
• सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने दलील दी कि केंद्र में चुनी हुई सरकार है। वह पूरे देश की केंद्रीय सरकार है। वहीं दिल्ली देश की राजधानी है। इस तरह इस पर सबका अधिकार है।
• केंद्र सरकार का अधिकार है कि वह देश की राजधानी में लोगों के बारे में फैसला ले। केंद्र में भी चुनी हुई सरकार है और उसका दिल्ली पर पूरा नियंतण्रहै। केन्द्र शासित प्रदेश में विधान सभा हो या न हो केंद्र सरकार का उस पर पूरा कंट्रोल है। यहां की चुनी हुई सरकार ये दावा नहीं कर सकती कि दिल्ली पर सिर्फ उसका अधिकार है ऐसा नहीं हो सकता।
• अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि उदाहरण के तौर पर अगर दिल्ली में केंद्र का कंट्रोल नहीं रहेगा तो दिल्ली की चुनी हुई सरकार किसी राज्य विशेष के लोगों को किसी विभाग में नौकरी पर रखना शुरू करेंगी तो फिर कैसी स्थिति उत्पन्न होगी ये सोचने वाली बात होगी।
• मनिंदर सिंह ने कहा कि वह किसी विशेष सरकार का नाम नहीं ले रहे लेकिन कल को कोई सरकार यदृ कहने लगे कि गणतंत्र दिवस का परेड अमुक जगह नहीं होना चाहिए फिर कैसी स्थिति होगी। दिल्ली सरकार के पास कोई भी विशेष कार्यकारी अधिकार नहीं है क्योंकि वह केंद्र शासित प्रदेश है।
• दिल्ली में अधिसंख्य सरकारी नौकरियां केंद्र के अधीन हैं और उसके पास तमाम फैसला लेने का अधिकार है। ये अलोकतांत्रिक नहीं हो सकता कि केंद्र सरकार दिल्ली में प्रशासन पर अपना कंट्रोल करे।
• केंद्र की दलील थी कि एलजी के लिए मंत्रीपरिषद की सलाह मानना बाध्यकारी नहीं है। इस पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने सवाल किया कि क्या एलजी के पास सारे अधिकार खुद में निहित हैं? तब एएसजी ने कहा कि एलजी को मंत्रीपरिषद फैसले के बारे में सूचित करते हैं और फिर एलजी उस बारे में मंजूरी देते हैं। चुनी हुई सरकार हर फैसले के बारे में एलजी को अवगत कराएंगे।
• अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सारे अधिकार राष्ट्रपति के पास निहित हैं और इसका प्रशासन केंद्रीय शासन के हाथ में है। राष्ट्रपति एलजी के जरिए कामकाज देखते हैं।
• ये राज्य नहीं है। इस दौरान दिल्ली सरकार की वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि उनकी ओर से ये स्टैंड नहीं रहा कि वह राज्य सरकार हैं बल्कि विशेष दर्जे की दलील है।

2. 15वें वित्त आयोग के गठन को मंजूरी
• सरकार ने 15वें वित्त आयोग के गठन को मंजूरी प्रदान कर दी है। प्रधानमंी नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक मे इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की गई।
• बैठक के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संवाददाताओं से कहा कि 15वें वित्त आयोग का टर्म ऑफ रिफ्रेंस शीघ ही अधिसूचित किया जाएगा। श्री जेटली ने कहा कि 14वें वित्त आयोग की सिफारिशें एक अप्रैल, 2015 से प्रभावी हो चुकी हैं और ये 31 मार्च, 2020 तक प्रभावी रहेंगी।
• हमें 01 अप्रैल 2020 से नए वित्त आयोग की सिफारिशें लागू करनी हैं। उन्होंने कहा कि अब तक का अनुभव रहा है कि वित्त आयोग को परामर्श तथा अन्य प्रक्रियाओं में करीब दो साल का समय लगता है।
• जेटली ने एक सवाल के जवाब में बताया कि भारत राज्यों का संघ है और राज्यों को भी अपने अस्तित्व के लिए कुछ चाहिए होता है।

3. दिवाला कानून में होगा बदलाव
• सरकार दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता कानून में जरूरी संशोधन के लिए अध्यादेश जारी करेगी। इस कानून में कर्ज में फंसी कंपनियों की संपत्तियों का बाजार निर्धारित दर पर समयबद्ध निपटारा किये जाने का प्रावधान किया गया है।
• कानून को कारपोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा अमल में लाया जा रहा है।वित्त एवं कारपोरेट कार्य मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को पत्रकारों को बताया कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में आज कानून में कुछ बदलाव करने के लिए अध्यादेश लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। हालांकि, कानून में क्या संशोधन किए जाएंगे, इसके बारे में तुरंत कोई जानकारी नहीं मिल सकी।
• सरकार की ओर से यह पहल ऐसे समय की जा रही है जब कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर कुछ क्षेत्रों में चिंता व्यक्त की गई। इसमें एक मुद्दा इसको लेकर भी उठा है कि कानून की खामियों का फायदा उठाते हुए दिवाला प्रक्रि या में आई कंपनी पर उसके प्रवर्तक फिर से नियंतण्रहासिल करने की जुगत लगा सकते हैं।
• कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने कानून की कमियों की पहचान करने और उनका समाधान बताने के बारे में 14 सदस्यीय एक समिति गठित की है। कारपोरेट कार्य सचिव इंजेती श्रीनिवास की अध्यक्षता में गठित दिवाला कानून समिति कानून के क्रियान्वयन में आने वाली समस्याओं पर गौर करेगी।
• दिवाला संहिता में अब तक 300 मामले नेशनल कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में समाधान के लिए दर्ज किए जा चुके हैं। दिवाला कानून में एनसीएलटी से मंजूरी मिलने के बाद ही किसी मामले को समाधान के लिए आगे बढ़ाया जाता है।

4. आतंकवाद से मिलकर निपटेंगे भारत व रूस
• केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को भारत और रूस के बीच आतंकवाद और संगठित अपराध से निपटने में सहयोग संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर करने को मंजूरी प्रदान कर दी ।
• पीएम नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इसके तहत भारत और रूस के बीच आतंकवाद के सभी स्वरूपों एवं संगठित अपराध से निपटने में सहयोग संबंधी समझौता पर हस्ताक्षर करने को मंजूरी दी गई है।
• गृह मंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाले शिष्टमंडल की 27 से 29 नवंबर तक होने वाली रूस यात्रा के दौरान हस्ताक्षर होना प्रस्तावित है। भारत और रूस का आपसी हितों के मामले पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर करीबी सहयोग का लम्बा इतिहास रहा है ।
• दुनिया में आतंकवाद और संगठित अपराध के बढ़ने के साथ यह जरूरी हो गया है कि सभी देश मिलकर आतंकवाद के सभी स्वरूपों का मुकाबला करें। यह प्रस्तावित समझौता अक्टूबर 1993 के समझौते का स्थान लेगा, जो सुरक्षा के क्षेत्र में आपसी हितों को मजबूत बनाने की दिशा में मददगार है ।
• इसमें नए एवं उभरते हुए खतरों से संयुक्त रूप से मुकाबला करने की बात कही गई है । इसके तहत भारत और रूस के बीच सूचनाओं के आदान प्रदान, विशेषज्ञता, सर्वश्रेष्ठ पहल को साझा करने पर जोर दिया जा रहा है।

5. ‘‘जीईएस’ भारत-अमेरिका की मजबूत दोस्ती का प्रमाण
• अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सलाहकार एवं बेटी इवांका ट्रंप का कहना है कि भारत-अमेरिका नियंतण्र उद्यमी शिखर सम्मेलन-2017 (जीईएस ) दोनों देशों के बीच मजबूत दोस्ती का एक प्रमाण है।
• इवांका धन्यवाद परंपरा पूरी करते हुए भारत के लिए रवाना हुई। हैदराबाद में 28 से 30 नवम्बर के बीच होने वाले जीईएस में इवांका अधिकारियों के एक उच्चस्तरीय अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल, महिला उद्यमियों और उद्योगपतियों का नेतृत्व करेंगी।
• तीन दिवसीय शिखर सम्मेलन को इवांका संबोधित भी करेंगी। इस सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे।
• इवांका ने अपनी भारत यात्रा से पहले कहा, शिखर सम्मेलन की थीम पहली बार वुमन फस्र्ट एंड प्रॉस्पेरिटी फॉर ऑल है, जो प्रशासन की उस सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होंगी तो ही उनका समुदाय एवं देश कामयाब होगा।
• शिखर सम्मेलन में 170 देशों के 1500 उद्योगपति हिस्सा लेंगे। इनमें से करीब 350 प्रतिभागी अमेरिका के होंगे, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय-अमेरिकी हैं। इवांका ने कहा कि मैं यात्रा को लेकर काफी उत्साहित हूं।
• उन्होंने कहा कि भारत, अमेरिका का एक महान दोस्त एवं साझेदार हैं। सहयोग का लक्ष्य साझा आर्थिक विकास और सुरक्षा साझेदारी है।

6. आयकर में भी सुधार की तैयारी

• वर्षो से लंबित जीएसटी को लागू कर देश की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन करने के बाद मोदी सरकार अब प्रत्यक्ष कर ढांचे में सुधार की दिशा में बढ़ रही है। इसके तहत सरकार नया आयकर कानून बनाने जा रही है। इस संबंध में केंद्र ने एक टास्क फोर्स गठित की है।
• यह 56 साल पुराने आयकर कानून की समीक्षा करेगी। इसके आधार एक नए प्रत्यक्ष कर कानून का मसौदा तैयार करेगी। माना जा रहा है कि नए कानून में मध्यवर्ग और उद्योग जगत को टैक्स में सीधे राहत देकर मांग व निवेश बढ़ाने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं।
• मौजूदा आयकर कानून 1961 में बना था। तब से लेकर अब तक इसमें कई बार संशोधन हो चुके हैं। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल 1-2 सितंबर को नई दिल्ली में शीर्ष कर अधिकरियों के ‘राजस्व ज्ञान संगम’ में मौजूदा आयकर कानून की समीक्षा कर इसका मसौदा पुन: तैयार करने की जरूरत पर बल दिया था।
• एक जुलाई की मध्यरात्रि को जीएसटी के शुभारंभ के मौके पर प्रधानमंत्री ने संसद के केंद्रीय कक्ष में आयोजित कार्यक्रम में महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन के कथन ‘अगर दुनिया में कोई चीज समझना सबसे ज्यादा मुश्किल है तो वह आयकर है’ का उल्लेख किया था।
• यह कह करके उन्होंने यह स्पष्ट संकेत दिया था कि जीएसटी के बाद उनकी सरकार का लक्ष्य आयकर कानून में सुधार करना है। 2014 में सत्ता में आने से पूर्व भाजपा ने ‘टैक्स टेररिज्म’ से मुक्ति दिलाने का वादा भी किया था। इसी पृष्ठभूमि में ही सरकार ने यह टास्क फोर्स गठित की है।
• केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के सदस्य (विधायी) अरविंद मोदी के नेतृत्व वाली यह छह सदस्यीय टास्क फोर्स विभिन्न देशों में प्रचलित प्रत्यक्ष कर प्रणालियों और सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय पद्धतियों का अध्ययन करेगी। इसके आधार पर देश की आर्थिक जरूरतों के हिसाब से उपयुक्त प्रत्यक्ष कर कानून का मसौदा तैयार करेगी। टास्क फोर्स छह माह में अपनी रिपोर्ट सीबीडीटी को सौंपेगी।
• इस स्थिति में सरकार अगले आम चुनाव में जाने से पूर्व प्रत्यक्ष कर कानून में बदलाव की घोषणा कर सकती है। जानकारों का मानना है कि अगर इस मसौदे में जनता को आयकर से छूट की कुछ अहम सिफारिशें आती हैं तो उसका राजनीतिक लाभ भी मिलेगा।
• ये हैं टास्क फोर्स के सदस्य : टास्क फोर्स में पूर्व आइआरएस अधिकारी जीसी श्रीवास्तव, भारतीय स्टेट बैंक के गैर-आधिकारिक निदेशक और सीए गिरीश आहूजा, अन्स्र्ट एंड यंगके अध्यक्ष और क्षेत्रीय प्रबंधक राजीव मेमानी, कर अधिवक्ता मुकेश पटेल और आर्थिक थिंक टैंक इक्रियर की कंसल्टेंट मानसी केडिया को इसका सदस्य बनाया गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम इस टास्क फोर्स में स्थायी रूप से आमंत्रित सदस्य होंगे।

7. जिंबाब्वे में नांगाग्वा कल राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे

• जिंबाब्वे में रॉबर्ट मुगाबे के उत्तराधिकारी के रूप में एमर्सन नांगाग्वा शुक्रवार को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। नांगाग्वा इस समय देश से बाहर हैं और राजधानी हरारे में स्वागत के लिए तैयार उनके समर्थक अपने नेता की वापसी का इंतजार कर रहे हैं।
• दो हफ्ते पहले मुगाबे की पत्नी ग्रेस से मतभेद गहराने पर नांगाग्वा उप राष्ट्रपति पद से बर्खास्त कर दिए गए थे। इसके बाद देश छोड़कर दक्षिण अफ्रीका चले गए थे।
• संसद के स्पीकर जैकब मुदेंदा ने बताया कि सत्तारूढ़ जानू-पीएफ पार्टी ने उन्हें जानकारी दी है कि राष्ट्रपति पद के लिए नांगाग्वा का नाम तय किया गया है। मंगलवार को रॉबर्ट मुगाबे (93) के इस्तीफा देने से राष्ट्रपति पद खाली हुआ था।
• मुगाबे ने जनता, पार्टी और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के दबाव के बाद पद से इस्तीफा दिया था। उससे एक सप्ताह पहले सेना ने उनके अधिकार छीनते हुए उन्हें आवास में ही नजरबंद कर दिया था। मुगाबे के इस्तीफे पर उनकी पार्टी ने कहा है कि वयोवृद्ध नेता को अब विश्रम की भूमिका में आ जाना चाहिए। पार्टी और देश उनके योगदान को कभी नहीं भूलेगा।
• जिंबाब्वे के सबसे नजदीकी सहयोगी चीन ने मुगाबे के इस्तीफे का स्वागत करते हुए कहा, जिंबाब्वे की आजादी और उसके निर्माण में मुगाबे का सबसे बड़ा योगदान है।
• चीन के वह अच्छे मित्र थे और रहेंगे। इससे पहले मुगाबे के इस्तीफे से उत्साहित लोग बैंड-बाजे के साथ हरारे की सड़कों पर उतरे और अपनी खुशी का इजहार किया।

8. कामयाबी : सुखोई से ब्रह्मोस का सफल परीक्षण
• दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस को बुधवार को वायु सेना के मुख्य लड़ाकू विमान सुखोई-30 से दागने का सफल परीक्षण किया गया। इसके साथ ही भारत ने दुनिया की सबसे घातक मिसाइलों में से एक ब्रह्मोस को जल, थल और वायु में स्थित प्लेटफार्मों से दागने की क्षमता हासिल कर ली।
• रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार ब्रह्मोस को वायु सेना के लड़ाकू बेड़े की रीढ़ माने जाने वाले सुखोई-30 विमान से बंगाल की खाड़ी में निर्धारित लक्ष्य पर दागा गया और इसने लक्ष्य पर सटीक तथा अचूक निशाना साध कर सफलता का इतिहास रच दिया।
• ब्रह्मोस को लड़ाकू विमान से पहली बार दागा गया है और इसके लिए हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड ने सुखोई विमान में जरूरी फेरबदल किए थे जिससे कि वह ढाई टन वजन की इस भारी भरकम मिसाइल को प्रक्षेपित कर सके।
• इस सफल परीक्षण से वायु सेना की मारक क्षमता कई गुना बढ़ गई है और जमीन तथा समुद्र से इसके सफल परीक्षणों के बाद भारत ने हवा से भी इस मिसाइल के प्रक्षेपण की क्षमता हासिल कर ली है।
• ब्रह्मोस मिसाइल भारत के प्रमुख रक्षा अनुसंधान संगठन डीआरडीओ और रूस के एनपीओएम का संयुक्त उपक्रम है।

9. IIT मुंबई देश में अव्वल, ब्रिक्स में 9वें स्थान पर

• क्यूएस की तरफ से जारी नई रैंकिंग में ब्रिक्स देशों के शीर्ष 20 विविद्यालयों में तीन आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरू को शामिल किया गया है।
• क्वाक्वारेली सायमंड्स (क्यूएस) रैंकिंग में भारत, चीन, रूस, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के 300 विविद्यालयों का आकलन किया गया और उनकी ग्रेडिंग की गई। क्यूएस को विश्व के प्रतिष्ठित रैंकिंग में गिना जाता है।
• भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई को नौवां स्थान दिया गया है, जिसके बाद आईआईएससी बेंगलुरू को दसवां, आईआईटी दिल्ली को 15 वां और आईआईटी मद्रास को 18 वां स्थान दिया गया है। चीन के शिंघुआ विविद्यालय, पेकिंग विविद्यालय और फुडान विविद्यालय को शीर्ष तीन रैंकिंग हासिल हुई है और शीर्ष दस में इसके आठ विविद्यालय शामिल हैं।
• यूजीसी के अध्यक्ष वीएस चौहान ने यहां रैंकिंग जारी करते हुए कहा कि रैंकिंग संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण हैं और भारत में रैंकिंग के कारण संस्थानों ने खुद की तरफ देखना शुरू कर दिया है। वर्ष 2017 की सूची में चीन के बाद भारत का सर्वाधिक प्रतिनिधित्व है।

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