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NEWS PAPER EDITORIAL

केवल कार्बन घटाने से धरती का तापमान कम नहीं होगा

 The Economist Newspaper 

दो साल पहले दुनिया ने संकल्प लिया था कि वह धरती का तापमान औद्योगिकीकरण शुरू होने के पहले से काफी कम रखेगी। यानी वृद्धि को 2 डिग्री सेंटीग्रेड से काफी कम कर देगी। मौसम विज्ञानी और जलवायु परिवर्तन के आंदोलनकर्ता खुश हो गए। राजनेताओं ने एक-दूसरे की पीठ थपथपाई। पेरिस समझौते की अस्पष्टता और डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा अमेरिका को समझौते हटाने के फैसले सहित कुछ झटकों के बाद भी बोन में हाल में हुए शिखर सम्मेलन में नेताओं का एक-दूसरे की पीठ थपथपाना जारी है।
पेरिस समझौता मानकर चलता है कि दुनिया वायुमंडल में से कार्बनडाइऑक्साइड निकालने का तरीका खोज लेगी। वजह यह है कि गैसों के उत्सर्जन में इतनी कटौती नहीं की जा सकती कि बढ़ता तापमान सफलतापूर्वक थम जाए। लेकिन, इस पर कोई चर्चा ही नहीं है कि पहले से मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को कैसे घटाया जाएगा (सूर्य की रोशनी में बाधा डालकर तापमान घटाने के अधिक क्रांतिकारी उपाय पर तो और भी कम चर्चा होती है)। जब तक यह नहीं होता, जलवायु परिवर्तन रोकने का वादा टूटना तय है।
जलवायु परिवर्तन पर अंतर्सरकारी पेनल के 116 में से 101 मॉडल मानकर चलते हैं कि हवा में से कार्बन निकाल लिया जाएगा ताकि 2 डिग्री का लक्ष्य हासिल किया जा सके। लेकिन, उसके लिए 2100 तक 819 अरब टन गैस हटानी होगी। इतनी तो मौजूदा दर पर दुनिया बीस वर्षों में उत्सर्जित करेगी। यदि आजमाई हुई टेक्नोलॉजी मौजूद भी हो तो इतने बड़े पैमाने पर कार्बन हटाने की योजना लागू करना बहुत बड़ा अभियान होगा। जबकि ऐसी टेक्नोलॉजी है नहीं। कुछ बिजली उत्पादन केंद्र और उद्योग कार्बन डाइऑक्साइड को हवा में छोड़ने की बजाय जमीन में संग्रहित करते हैं लेकिन, यह बहुत ही छोटे पैमाने पर होता है। इससे केवल उत्सर्जन कम होता है, प्रक्रिया नहीं उलट जाती, जो हमें चाहिए।
फिर क्या हो सकता है? एक विकल्प है अधिक जंगल उगाना, जो कार्बन सोखने का काम करते हैं या सतही जुताई वाले खेतों की जगह गहरी जुताई वाले खेतों को लाया जाए। बायोमास बर्निंग पावर प्लांट्स में कार्बन को इकट्‌ठा करके संग्रहित करने का काम भी किया जा सकता है। केमिकल फिल्टर के जरिये कार्बन को सीधे हवा से खींचकर स्टोर किया जा सकता है। अथवा खनिजों को पीसकर जमीन और समुद्र में डाला जा सकता है ताकि युगों में होने वाली प्रक्रिया को कुछ वर्षों में संपन्न कराकर कार्बोनेट चट्‌टानें बनाई जा सके। इनमें कार्बन डाइऑक्साइड कैद हो जाती है।
दुनिया की बढ़ती आबादी को भारत के बराबर क्षेत्रफल में पेड़ लगाने या ऊर्जा के लिए फसले उगाने के लिए प्रेरित करना भी असंभव ही लगता है। खेती की पद्धतियां बदलना सस्ता है पर वैज्ञानिकों को शक है कि उससे इतनी भी कार्बनडाइऑक्साइड सोखी जा सकेगी कि खेती से निकली गैस को ही संतुलित कर सके। हवा से सीधे कार्बनडाइऑक्साइड सोखना और कार्बन को चट्‌टान में बदलने की प्रक्रिया में जमीन ज्यादा नहीं लगती लेकिन, दोनों ही बहुत महंगे उपाय हैं। अक्षय ऊर्जा से दुनिया के लिए काफी हद तक फायदेमंड बिजली बनाई जा सकती है पर अभी किसी को ग्रीनहाउस गैस हटाकर धनी होने का तरीका नहीं मालूम है। जब जरूरत बहुत ज्यादा है, उसका विज्ञान शैशव अवस्था में और व्यावसायिक फायदे नदारद तो दायित्व सरकार और निजी फाउंडेशन्स पर जाता है पर वे दायित्व की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं।
एक तरीका यह है कि यदि कार्बनडाइऑक्साइड का बड़ा बाजार खड़ा हो जाए तो हवा से इसे निकालने का फायदा इसे प्रोत्साहन देगा। लेकिन, अभी तो इसके उपयोग बहुत सीमित हैं। यदि रेग्यूलेटर ऐसे उद्योगों पर सिंथेटिक ईंधन इस्तेमाल करने का दबाव डालें जो अपने उत्सर्जन को बिजली में नहीं बदल सकते जैसे विमानन उद्योग तो कार्बन डाइऑक्साइड की मांग बहुत बढ़ सकती है, क्योंकि इस ईंधन में यह गैस कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होती है। यदि बाजार से फायदा मिले तो सरकारें दे सकती हैं। हमने तो इसके लिए टैक्स लगाने का सुझाव दिया है। मुनाफे के अभाव में जीवाश्म ईंधनों से चलने वाले प्लांट से उत्सर्जन घटाने के लिए कार्बन कैप्चर और स्टोरेज अभियान चल नहीं सका। इसके लिए लगने वाला किट बिजली की लागत दोगुना बढ़ा देगा। इसके बाद भी ऊंची दर रखकर कार्बनडाइऑक्साइड घटाने को प्रोत्साहन देंगे तो अर्थव्यव्था का दम घुट जाएगा। जब तक नीति निर्माता हवा से गैस हटाने को गंभीरता से नहीं लेंगे तब तक पेरिस का वादा और भी खोखला लगेगा।
सब्सिडी का विकल्प है। इसके बिना अक्षय ऊर्जा को पेट्रोल ईंधन से होड़ लेने में अधिक समय लगता। लेकिन, इसमें बर्बादी ज्यादा होती है। जर्मनी ने लो कार्बन वाली बिजली पर 1 खरब डॉलर लगाए और फिर भी वह बिजली की आधी जरूत के लिए कार्बन छोड़ने वाले ईंधन पर ही निर्भर है। इसके बाद भी सरकारें हवा से निकालकर स्टोर की गई हर टन कार्बनडाइऑक्साइड पर पुरस्कार दे सकती है। यह राशि सारे देशों द्वारा मिलकर बनाए कोष से दी जा सकती है। गैसें छोड़ने के इतिहास के आधार पर देश अपना योगदान दे सकते हैं (सबसे ऊपर अमेरिका, यूरोप चीन आएंगे)। पर व्यावहारिक स्तर पर ऐसा कोई तरीका नहीं है कि देशों से पैसा वसूल किया जा सके।
बेशक पेरिस समझौते की खामियों का सामना करना ज्यादातर सरकारों के बस की बात नहीं है। ट्रम्प का अमेरिका तो उत्सर्जन घटाने को ही तैयार नहीं है, फिर हवा से कार्बन सोखने की तो बात ही छोड़ो। अमेरिका साथ भी दे तो समस्या जादुई ढंग से सुलझ नहीं जाएगी। कई धनी देश कह भी रहे हैं कि विकासशील देशों की तुलना में वे बहुत ज्यादा कार्बन कटौती कर रहे हैं। लेकिन हवा से गैस सोखना कोई कम ग्रीनहाउस गैसें छोड़ने का विकल्प नहीं है। यह तो जरूरी होगा ही। जब तक नीति निर्माता हवा से गैस हटाने को गंभीरता से नहीं लेंगे तब तक पेरिस का वादा और भी खोखला लगेगा।

मुगाबे के पतन में चीन की भूमिका

(हर्ष वी पंत, प्रोफेसर किंग्स कॉलेज, लंदन )

रॉबर्ट मुगाबे 93 वर्ष की परिपक्व आयु में अपने विख्यात जीवन की आखिरी जंग लड़ते दिखे, जब वह आसानी से सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं थे। अन्य तानाशाहों की तरह वह भी मान बैठे थे कि मामूली रूप में ही सही, सत्ता में बने रहना उनके लिए अपना भविष्य संवारने में मददगार साबित होगा, जो अंधकारमय दिख रहा था। आखिरकार मुगाबे को न सिर्फ राष्ट्रपति का पद छोड़ना पड़ा, बल्कि घोषणा करनी पड़ी कि उन्होंने यह फैसला बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से लिया है। उनके इस फैसले से राजनेताओं और जिम्बाब्वे की आम जनता में खुशी की लहर है। हालांकि जिम्बाब्वे की सेना की मंशा शुरू से साफ थी और मुगाबे की अपनी ही पार्टी जानू-पीएफ ने भी उनके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई शुरू कर दी थी, जो दो दिनों में पूरी हो जाती। लेकिन इन तमाम संकेतों और चौतरफा दबाव के बावजूद मुगाबे ने इस्तीफा देने से इनकार करके सबको चौंका दिया था। उन्होंने तो अपने टेलीविजन संबोधन में अगले महीने होने जा रहे जानू-पीएफ की ‘पार्टी कांग्रेस’ में अध्यक्षता करने तक की घोषणा कर दी थी।

यह सारी उठापटक तब शुरू हुई, जब उप-राष्ट्रपति इमर्सन मनंगाग्वा को बर्खास्तगी के बाद जिम्बाब्वे छोड़ना पड़ा। तमाम लोग इस कार्रवाई को मुगाबे की अपनी पत्नी को बतौर नेता पेश करने की कवायद मान रहे थे। उनके इस कदम से सेना के सब्र का बांध टूट गया और उसने मुगाबे की सत्ता को पलटने और उन्हें नजरबंद करने का फैसला कर लिया। यह तो शुरू में ही साफ हो गया था कि मुगाबे अपना जन-समर्थन खो चुके हैं, इसके बावजूद वह अड़े रहे और हर मुमकिन कोशिश कर पद छोड़ने से बचते रहे। नतीजतन, उनकी खुद की पार्टी ने उनके खिलाफ महाभियोग लाने का फैसला लिया। इसमें मुगाबे पर तमाम तरह के आरोप लगाए जाने वाले थे, जिनमें से एक पत्नी मोह में ‘सांविधानिक शक्तियों को ताक पर रखना’ भी था।
ऐसे भी संकेत मिले कि बुरे अंजाम की आशंका में रॉबर्ट मुगाबे इस संकट से बाहर निकलने के लिए वार्ता करने को तैयार थे। जिम्बाब्वे की सेना ‘मुल्क की मौजूदा स्थिति पर’ मुगाबे के ‘रोडमैप’ से सहमत थी, जिसमें मनंगाग्वा से मुगाबे की सीधी बातचीत की बात कही गई थी। हालांकि अब मनंगाग्वा मुल्क वापस लौट चुके हैं। वह जानू-पीएफ के नेता चुने जा चुके हैं और देश का नेतृत्व संभालने के लिए पदभार ग्रहण करने को तैयार हैं।

अफ्रीकी सियासत में सेना का दखल आमतौर पर नया नहीं है, पर जिम्बाब्वे के इस संकट को सैन्य कार्रवाई नहीं कहा जा रहा है। तख्तापलट की खबरों का सेना ने भी जोरदार खंडन किया है। इसकी वजह किसी हद तक मुगाबे का जिम्बाब्वे के इतिहास में एक ऐतिहासिक कद होना है, तो कुछ हद तक अफ्रीकी महाद्वीप में सेना को समर्थन न मिलना भी है। क्षेत्रीय व वैश्विक आरोपों से बचने के लिए सेना ने बड़ी चतुराई और सावधानी से इस बहस को मुगाबे विरोधी आंदोलन के इर्द-गिर्द कुछ यूं समेट दिया कि उसकी छवि ज्यादा दागदार नहीं दिखती। वैसे भी शीत युद्ध के सफलतम दिनों से तुलना की जाए, तो अफ्रीका में सेना की आभा पहले की अपेक्षा कमजोर ही हुई है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अफ्रीकी संघ (एयू) और दक्षिण अफ्रीकी विकास समुदाय (एसएडीसी), दोनों ही सैन्य तख्तापलट का समर्थन करने के प्रति अनिच्छुक दिखे।

जिम्बाब्वे के इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसमें चीन की भूमिका है। चीन की दखलंदाजी को लेकर कयास लगाए जाते रहे हैं। कहा जा रहा है कि मुगाबे को पद से बेदखल करने की जिम्बाब्वे सेना की योजना से चीन पहले से अवगत था। मुगाबे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के चंद दिनों पहले ही जिम्बाब्वे के सेना प्रमुख कॉन्सटैनटिनो चिवेंगा बीजिंग गए थे। जाहिर सी बात है, बीजिंग ने इस आरोप से साफ-साफ इनकार किया है, और कहा है कि जनरल चिवेंगा का वह दौरा एक ‘सामान्य सैन्य दौरा’ था। उसका यह भी कहना है कि ऐसी खबरें उसकी छवि खराब करने के लिए प्रसारित की गई हैं और यह एशिया महाशक्ति और अफ्रीका के बीच ‘तनाव पैदा करने’ की सोची-समझी कोशिश है।

उल्लेखनीय है कि चीन और जिम्बाब्वे उस समय से ही करीब हैं, जब मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर पश्चिमी देशों ने जिम्बाब्वे पर कई प्रतिबंध लगाए थे और मुगाबे ने अपनी ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ यानी पूरब की तरफ देखो नीति की ओर कदम बढ़ाना शुरू किया था। मुगाबे ने तब साफ-साफ कहा था, ‘हम अब पूरब की ओर देखने लगे हैं, जहां सूरज उगता है और हमने अपनी पीठ पश्चिम की तरफ कर ली है, जिधर सूरज डूबता है।’ चीन ने भी अपनी तरफ से न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जिम्बाब्वे के खिलाफ लगाए जा रहे प्रतिबंधों पर वीटो कर दिया था, बल्कि वह हरारे के एक बड़े निवेशक, कारोबारी साथी और रक्षा उपकरणों के आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरकर सामने आया। इसी साल जनवरी में मुगाबे ने चीन का दौरा उस वक्त किया था, जब मुगाबे की आर्थिक नीतियों से बीजिंग के चिंतित होने की खबरें हवा में तैर रही थीं। दरअसल, मुगाबे ने जिम्बाब्वे में हीरा-खदानों के राष्ट्रीयकरण का फैसला ले लिया था, जो बीजिंग के गले नहीं उतर रहा था। चीन वहां निवेश का बेहतर माहौल बनाना चाहता है और खबर है कि इसी वजह से वह मनंगाग्वा का समर्थन कर रहा है।

बहरहाल, जिम्बाब्वे में चीन की इस रुचि को आश्चर्य की नजरों से नहीं देखना चाहिए। इतिहास गवाह है कि ताकतवर मुल्क हमेशा से ऐसा करते रहे हैं। चीन भी अब महाशक्ति बन चुका है। ऐसे में, उसके लिए इस तरह किसी दूसरे मुल्क में दखल देना या दिलचस्पी लेना आम माना जाएगा। ऐसे मामलों में हर बार चीन का नाम सामने आने पर हमें चौंकना नहीं चाहिए। चीन की इस मंशा का गवाह जिम्बाब्वे कोई आखिरी उदाहरण भी नहीं है। यह तो महज एक शुरुआत है।(हिंदुस्तान )
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

ई बस्ता : यह है अच्छी शुरुआत

(डॉ. विशेष गुप्ता)

पूरा देश इस समय मासूमों के कंधों पर लगातार बढ़ते बस्ते के बोझ से परेशान है और तड़पती मासूमियत की सुनवाई देश में नदारद है। शायद इसी समस्या के तहत भारत सरकार स्कूली बच्चों के लिए बस्तों का बोझ कम करने के लिए ई बस्ता कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। कार्यक्रम के तहत स्कूली बच्चे अब अपनी रुचि के अनुसार पाठ्यसामग्री डाउनलोड कर सकेंगे। गौरतलब है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल ही में 25 केंद्रीय विद्यालयों में प्रायोगिक तौर पर स्कूली बच्चों के बस्तों का बोझ कम करने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया था। दरअसल, मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अभी कुछ ही समय पहले देशभर के छात्रों को डिजिटल शिक्षा पद्धति के तहत जोड़ने की प्रतिबद्धता दोहराई थी। उसी के तहत ई बस्ता और ई पाठशाला कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जा रहा है। एनसीईआरटी भी स्कूलों में दरजे एक से लेकर 12वीं तक की कक्षा के लिए ई सामग्री तैयार कर रही है। ज्ञात हुआ है कि एनसीईआरटी द्वारा अब तक 2350 ई सामग्री तैयार की जा चुकी हैं। साथ ही 50 से अधिक तरह के ई बस्ते भी तैयार किए जा चुके हैं। तय बताते हैं कि अब तक 3294 ई बस्तों के साथ में 43801 ई सामग्री को डाउनलोड भी कर लिया गया है। केवल इतना ही नहीं मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक ऐप भी तैयार कर लिया है।

इसके जरिये छात्र एड्रायड फोन व टैबलेट के जरिये सामग्री भी डाउनलोड कर सकते हैं। कहना न होगा कि पहली यूपीए सरकार ने भी इसी संबंध में ‘‘आकाश टैबलेट योजना’ शुरू की थी। टैबलेट तैयार भी किए गए थे परंतु यह परियोजना शुरू नहीं की जा सकी। अब भारत सरकार ने ई बस्ता के रूप में देश के छात्रों की मदद को तेजी से अपना हाथ बढ़ाया है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक देश में छात्रों के लिए सस्ते टैबलेट और स्कूलों को फ्री इंटरनेट की सुविधा प्रदान नहीं की जाती। सही बात यह है कि सरकार ने इसे अभी पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया है। उम्मीद है बहुत जल्दी सरकार कुछ सुधार के बाद इसे पूरी तरह लागू कर देगी। कहने की जरूरत नहीं कि आज तकरीबन सभी स्कूल कोर्स की पढ़ाई, होमवर्क व रटंत विद्या को बालक के शैक्षिक विकास के लिए जरूरी मान रहे हैं। शिक्षाविदों के साथ-साथ प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में बनी समिति ने शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की सलाह दी थी। इससे जुड़े तमाम अध्ययन भी बताते हैं कि बच्चों के कधों पर लादे जाने वाले भारी-भरकम बस्तों के बोझ का उनकी पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता से कोई सीधा संबंध नहीं है। शायद यही वजह है कि बस्ते का यह बोझ अब बच्चे की शिक्षा, समझ और उनके स्वास्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है।

उदाहरण बताते हैं कि बस्तों के भारी वजन और उनके होमवर्क के चलते बच्चों की आंखें कमजोर हो गई हैं, सिर में दर्द रहने लगा है और उनकी अंगुलियां टेढ़ी होनी शुरू हो गई हैं। बाल मनोविज्ञान से जुड़े अध्ययन भी बताते हैं कि चार साल से लेकर बारह साल तक की उम्र के बच्चों के व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास होता है। पिछले दिनों देश के कई बड़े महानगरों में एसोचैम का दो हजार बच्चों पर किए गए सव्रे में साफ कहा गया था कि यहां 5 से 12 वर्ष के आयु वर्ग के 82 फीसद बच्चे बहुत भारी स्कूल बैग ढोते हैं। इस सव्रे ने यह भी साफ किया कि दस साल से कम उम्र के लगभग 58 फीसद बच्चे हल्के कमर दर्द के शिकार हैं। हड्डी रोग विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बच्चों के लगातार बस्तों के बोझ को सहन करने से उनकी कमर की हड्डी टेढी होने की आशंकाएं प्रबल हो जाती हैं।

कहना न होगा कि देश में कुछ समय पहले बच्चों की पीठ दर्द और कंधों की जकड़न की समस्या से निजात दिलाने के लिएमानवाधिकार आयोग ने दखल देते हुए अपना फैसला सुनाया था। यह सच किसी से छिपा नहीं है कि नर्सरी, केजी, पहली या दूसरी कक्षा के बच्चों के स्वभाव को समझे बिना अगर उन पर पढ़ाई का बोझ डाल दिया जाता है तो उनकी स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। बच्चों पर किताबों का यह भार केवल भौतिक ही नहीं होता,बल्कि यह उनके मानसिक विकास को भी अवरुद्ध करता है। आशा है कि केंद्र सरकार की ई बस्तों के साथ में डिजिटल पाठ्यसामग्री व ब्लैकबोर्ड के विस्तार की यह मुहिम इन नौनिहालों के बचपन की मासूमियत को बचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी।

ब्रह्मोस ने बढ़ाई देश की ताकत

(डॉ. लक्ष्मी शंकर यादव)

22 नवंबर को ब्रह्मोस मिसाइल का सफल परीक्षण करके भारत ने एक और नया मुकाम हासिल कर लिया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस दिन भारत ने दूसरी बार सुखोई-30 एमकेआइ सुपरसोनिक लड़ाकू विमान से इस मिसाइल का सफल प्रक्षेपण किया है। वर्तमान समय में इस मिसाइल को थल, जल एवं आसमान में कहीं से भी छोड़ा जा सकता है। यह मिसाइल जमीन के नीचे परमाणु बंकरों, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स और समुद्र के ऊपर उड़ान भर रहे लड़ाकू विमानों को निशाना बनाने में सक्षम है।
सुखोई-30 एमकेआइ के साथ जोड़कर ब्रह्मोस का पहली बार परीक्षण 25 जून, 2016 को किया गया था। यह परीक्षण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल के हवाई अड्डे पर किया गया था। तब 2500 किलोग्राम वजन के प्रक्षेपास्त्र के साथ उड़ान भरने वाला भारत पहला देश बन गया था। वह विमानन इतिहास में एक यादगार दिन था। अब इस नई सफलता के बाद सुखोई विमानों में ब्रह्मोस मिसाइलों का लगा दिया जाएगा जिससे वायु सेना की मारक क्षमता काफी बढ़ जाएगी। इस परीक्षण का उद्देश्य सुखोई के जरिये हवा से जमीन पर मार करने में सक्षम बनना था। अब भारतीय वायु सेना पूरी दुनिया की अकेली ऐसी वायु सेना बन गई है जिसके पास सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली है। अब वायु सेना दृश्यता सीमा से बाहर के लक्ष्यों पर भी हमला कर सकेगी। लगभग 40 विमानों में यह प्रणाली लगाए जाने की योजना है।
इस कामयाबी के बाद भारत दुनिया में स्वयं को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने में भी सफल हुआ है। भारत इस मिसाइल के निर्यात की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी में लग गया है। एमटीसीआर का सदस्य बनने के बाद यह कार्य और आसान हो गया है। वियतनाम 2011 से इस तेज गति की मिसाइल को खरीदने की कोशिश में लगा हुआ है। वह चीन से बचाव के लिए ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल सिस्टम लेना चाहता है। इस अत्याधुनिक मिसाइल सिस्टम को बेचने के लिए भारत की नजर में वियतनाम के अतिरिक्त 15 अन्य देश भी हैं। वियतनाम के बाद फिलहाल जिन चार देशों से बिक्री की बातचीत चल रही है उनमें इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, चिली व ब्राजील हैं। शेष 11 देशों की सूची में फिलीपींस, मलेशिया, थाईलैंड व संयुक्त अरब अमीरात आदि शामिल हैं।
इन सभी देशों के साथ दक्षिण चीन सागर मसले पर चीन के साथ तनातनी चल रही है।1दुनिया की सबसे तेज गति वाली मिसाइलों में शामिल ब्रह्मोस मिसाइल सर्वाधिक खतरनाक एवं प्रभावी शस्त्र प्रणाली है। यह न तो राडार की पकड़ में आती है और न ही दुश्मन इसे बीच में भेद सकता है। एक बार दागने के बाद लक्ष्य की तरफ बढ़ती इस मिसाइल को किसी भी अन्य मिसाइल या हथियार प्रणाली से रोक पाना असंभव है। 300 किलोग्राम वजन के हथियार को ले जाने में सक्षम इस मिसाइल को मोबाइल करियर से भी लांच किया जा सकता है। यह परीक्षण इसी श्रेणी का था। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का परीक्षण पोखरण क्षेत्र में कई बार किया जा चुका है। पूर्व में विकसित की गई इस मिसाइल में अब कुछ सुधार किए गए हैं। इसकी क्षमता को बढ़ाया गया है। इस मिसाइल की खासियत यह है कि इसे समुद्र और सतह के साथ हवा से भी दागा जा सकता है।
गत वर्ष सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का नौसेना के युद्धपोत आइएनएस कोच्चि से सफल परीक्षण किया गया था। इस परीक्षण के जरिये युद्धपोत की अत्याधुनिक प्रणाली की क्षमताओं को भी परखा गया था। यह ‘एक्सेप्टेंस टेस्ट फायरिंग’ के तहत परीक्षण किया गया था। ब्रह्मोस का जून 2014 और फरवरी 2015 में आइएनएस कोलकाता से पहले ही सफल परीक्षण किया जा चुका है। यह अमेरिका की सबसोनिक क्रूज मिसाइल टॉमहॉक से तीन गुना अधिक तेज है। यह भारतीय नौसेना का अत्यंत शक्तिशाली व नवीन युद्धपोत है। सामान्य तौर पर एक पोत की क्षमता आठ मिसाइलों की होती है, लेकिन आइएनएस कोलकाता 16 ब्रह्मोस मिसाइलें दाग सकता है। इसमें खास तरह के यूनिवर्सल वर्टिकल लांचर डिजाइन का प्रयोग किया गया है जिसकी सहायता से क्षैतिज रूप में इस मिसाइल से किसी भी दिशा में हमला किया जा सकता है। ब्रह्मोस का प्रक्षेपण पनडुब्बी, पोत, विमान या जमीन पर आधारित मोबाइल ऑटोनोमस लांचर्स से भी किया जा सकता है। इसकी अधिकतम गति 2.8 मैक अर्थात ध्वनि की गति से लगभग तीन गुनी अधिक है। 1सुखोई लड़ाकू विमानों को ब्रह्मोस से लैस करने से भारत उन विशिष्ट देशों के क्लब में शामिल हो गया है जिनके लड़ाकू विमान क्रूज मिसाइलों से लैस हैं। ब्रह्मोस के अब तीन स्वरूप विकसित किए जा रहे हैं। अब पानी के अंदर व हवा में प्रक्षेपित किए जाने वाले संस्करणों पर काम जारी है। सेना की दो रेजीमेंटों में यह मिसाइल पूरी तरह से परिचालन में है। सेना ब्रह्मोस ब्लॉक-2 मिसाइलों की दूसरी रेजीमेंट तैयार कर रही है जिसे लैंड अटैक क्रूज मिसाइल के नाम से जाना जाता है। इस मिसाइल को इस प्रकार से तैयार किया गया है कि घनी आबादी में भी छोटे लक्ष्यों को निशाना बनाया जा सकता है। ब्रह्मोस ब्लॉक-2 से आंतकवादी शिविरों समेत बेहद सटीक लक्ष्यों को भेदा जा सकता है। यह सर्जिकल स्ट्राइक करने में पूरी तरह से सक्षम है। सेना ने अब तीसरी रेजीमेंट में इसकी तैनाती के लिए उत्पादन संबंधी ऑर्डर दिया है।
ब्रह्मोस के ब्लॉक-3 संस्करण का आधुनिक दिशा-निर्देशों और उन्नत सॉफ्टवेयर के साथ सफल परीक्षण किया जा चुका है। इस परीक्षण में विभिन्न बिंदुओं पर इसकी कलाबाजियां सम्मिलित थीं। यह मिसाइल ध्वनि की गति से भी तेज गति से गोते लगा सकती है तथा कठिन से कठिन लक्ष्यों पर भी सटीक निशाना लगा सकती है। इसकी अद्यतन संचालन तकनीक और उन्नत सॉफ्टवेयर ने इसे जमीन पर 10 मीटर उंचाई पर स्थित लक्ष्य को भी भेदने में कुशल बना दिया है। इससे सीमा पार के क्षेत्रों में बिना तबाही मचाए आतंकवादी शिविरों को ध्वस्त किया जा सकता है।
(लेखक सैन्य विज्ञान विषय के प्राध्यापक हैं)

Politics and Padmavati

Chief Ministers cannot cite law and order threats as an excuse to curb free expression

The Hindu

Given the violence and the threats, it is perhaps not surprising that the producers of Padmavati have decided to ‘voluntarily’ defer its release. But irrespective of how this changed timetable plays out, the conduct of politicians over the past few days has been cynical and deeply unmindful of the rule of law. In February 1989, days after Ayatollah Khomeini of Iran had issued a fatwa against him for his novel The Satanic Verses, Salman Rushdie published an open letter to Rajiv Gandhi, then Prime Minister. He reminded the Prime Minister that his book had already been banned in India in October 1988, under the Customs Act, and that while issuing the curb on its import the Finance Ministry clarified that the “ban did not detract from the literary and artistic merit of Rushdie’s work”. “Thanks for the good review,” wrote Rushdie, adding that it appeared “as if your Government has become unable or unwilling to resist pressure from more or less any extremist religious grouping”. It is worth recalling that letter, as it provides a benchmark to map the race to the bottom in the current row over Padmavati. Today, as a number of Chief Ministers across north India rail against the film and threaten to disallow its screening without requisite cuts, there is no longer even that perfunctory clarification that their action has nothing to do with the artistic merit of the film. And it is no longer the case that the governments are unwilling to resist pressure from extremist groups such as the Karni Sena. Chief Ministers now are actually rallying opinion against the film to whip up caste and religious anxieties.

Yogi Adityanath of Uttar Pradesh has forged an absurd equivalence between “those giving death threats” and Sanjay Leela Bhansali, the film’s director, for “hurting public sentiments”. Vijay Rupani in Gujarat has taken a cue from Shivraj Singh Chouhan in Madhya Pradesh and called for a ban. This is in complete disregard of the Supreme Court judgment in S. Rangarajan v. P. Jagjivan Ram that the state cannot cite concerns about a “hostile audience” in curbing freedom of expression. Vasundhara Raje of Rajasthan, in fact, has argued that the “censor board” must go beyond just certifying a film, and should be mindful of the possible results after its release. And Amarinder Singh in Punjab has said he opposes a ban but “cinematic licence” cannot extend to twisting “historical facts”. The fact that these open appeals against cinematic expression are going mostly unchallenged across the political spectrum carries dark forebodings. The issue here is no longer Padmavati, its artistic merit or the factuality or otherwise of multiple retellings of the narrative. What is of real concern is the spectacle of state functionaries ignoring their constitutional responsibility in upholding free expression, and placing themselves alongside those out to intimidate, and release sectarian furies.

 

The hungry nation

indianexpress

India’s international financial rating was recently upgraded by Moody’s — a decision which recognises the reforms and structural changes initiated by the present government. A recent survey of the Pew Research Center refers to the immense popularity of Prime Minister Narendra Modi within the country — clearly indicating the high expectations citizens have of him. Both pieces of news have been rightly welcomed in the country.

However, the nation can’t pick and choose. It can’t say that all favourable reports are true, but deny the existence of unfavourable reports or claim that those are inimical to India. For instance, the Pew Research Center, some time back, had concluded that Indian school standards are among the worst in the world. Recently, the Washington-based International Food Policy Research Institute (IFPRI) released the 2017 Global Hunger Index (GHI), in which India ranks 100 among the 119 countries studied. The country’s rank, in fact, had fallen by three places compared to 2016. Though these significant bits of information were not discussed much in the media, some sections close to the authorities ridiculed the Hunger Index, referring to it as a “half-truth” and questioned the credentials of IFPRI. A few others said the index really measured levels of malnutrition, stunting etc, and not “hunger”, clearly missing the essential point of the survey. In the 2017 Hunger Index, India falls behind war-ravaged Iraq, and the international “outcast”, North Korea. Only two countries in Asia — Afghanistan and Pakistan — are below India in the ranking. India is now ahead of only countries such as Sierra Leone, Madagascar, Chad and Yemen, all “one-party” democracies otherwise seen as dictatorships.

In recent months, a number of international and Indian studies have corroborated the GHI report. A World Bank report referred to the illiteracy rates in India; Thomas Piketty wrote about the top 0.1 per cent of India’s population having the same share of growth in income as the bottom 50 per cent; ASER has consistently referred to abysmal primary and secondary schooling standards; repeated studies on nutrition, and child mortality in India establish the critical situation in this regard. Clearly, there is no shortage of reminders of the terrible condition of the “common man”. It is no coincidence that the countries at the top of every economic and social index in the world are closely identified with high-quality education, public health and nutrition. The nation should stop fooling itself. The delusion that India is an aspirant to be a “world power” is like a donkey dressing itself up, imagining that it is a race-horse.

The current precarious social and human conditions were not created in a day — these are the wages of a corrupt political system, where the spoils were appropriated by a select few who ran the country during the past five decades, pursuing disastrous policies, deliberately with poor implementation to suit the needs of the ruling classes. Major changes relating to human affairs, including in education, infrastructure, public health cannot take place in days or weeks, or even years. As it is now, no one in the country will miss the ministries of education, public health, environment, childcare and agriculture at the Centre or the states if they are abolished. Surely, it is early to blame the current government for the disastrous situation the country finds in, but the current inaction will force them to own up the situation in a couple of years.

Major economic policies have been ushered in in the recent past. Demonetisation symbolises the formal recognition of black money — no country can afford to have a parallel economy eating its vitals. The GST, with all its teething problems, can transform the economy within five years. The Digital India programme, despite its current tardy implementation, can turn the administration efficient. These are valuable and significant steps, and have withstood concerted opposition from vested interests. However, major reforms in the social sector are yet to be ushered in. As and when it happens, trust entrenched interests to attack them.

There is inadequate recognition that the common man’s needs have to be the priority of a democratic government. Even a superpower will not remain stable if the bottom 25 per cent of its population lives in penury. There is not enough recognition of the power of the informal sector, currently numbering six crore, as a change agent, and the critical importance of making resources available to them at non-usurious rates. There is no awareness that primary and secondary education can be a major change agent in 10 years, if there is genuine reform. In short, with the technology available today, the country can be transformed in ten years — but this can’t be done just by speeches, and with good intentions alone.

It is the social sectors — education, public health, nutrition etc — which need the direct attention of the highest manager of the country. Policies concerning these sectors need to be reformed and necessary resources have to be provisioned to usher in change.

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1.ओबीसी आयोग के लिए फिर बिल लाएगी सरकार
• सरकार राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने के लिये संसद के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में फिर विधेयक पेश करेगी। शीर्ष सरकारी अधिकारियों ने बृहस्पतिवार को यह बात बतायी।
• अधिकारियों ने बताया कि यह कदम राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) को अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों की रक्षा के लिए पूर्ण अधिकार प्रदान करने में मददगार होगा। एक अधिकारी ने नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर बताया कि सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने को प्रतिबद्ध है और संसद के आसन्न सत्र में इस विधेयक को लाने का निर्णय किया है।
• उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित विधान को ओबीसी समुदाय के मतदाताओं पर पकड़ मजबूत बनाने के भाजपा के कदम के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों ने कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग के समकक्ष दर्जा प्रदान करने के लिए सरकार ने पहले एक विधेयक पेश किया था।
• प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक पहले लोकसभा में पेश किया गया जहां यह पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में यह कुछ संशोधनों के साथ पारित हुआ । इसके कारण विधेयक के दो तरह के प्रारूप दोनों सदनों से पारित हुए।

2. वैश्विक साइबर स्पेस सम्मेलन में मोदी ने कहा, प्रौद्योगिकी तोड़ती है हर बाधा
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साइबर स्पेस को आतंकवाद और कट्टरपंथ का मैदान बनने के खतरे को रोकने के लिए दुनिया के देशों के बीच सूचना के आदान-प्रदान और समन्वय स्थापित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि निजता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच बारीक संतुलन बनाया जा सकता है।
• बृहस्पतिवार को वैश्विक साइबर स्पेस सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इंटरनेट अपने आप में समावेशी प्रकृति का है, लेकिन खुले और सुलभ इंटरनेट की खोज अक्सर खतरे को बुलावा देती है। वेबसाइट की हैकिंग और उसे विकृत बनाने की खबरें तो छोटी बात है।
• इनसे स्पष्ट होता है कि साइबर हमले एक बड़ा खतरा हैं विशेष तौर पर लोकतांत्रिक विश्व में। हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि हमारे समाज के संवेदनशील वर्ग साइबर अपराधियों के दुष्ट साजिशों के जाल में नहीं फंसें। हमें इसके लिए सजग रहने की जरूरत है।
• मोदी ने कहा कि इसके लिए इस बात पर काफी ध्यान देने की जरूरत है कि साइबर खतरों से निपटने के वास्ते हमारे पास अच्छी तरह से प्रशिक्षित और सक्षम पेशेवर हों। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष मई और जून में वैश्विक स्तर पर साइबर हमले में 3,00,000 कम्प्यूटर प्रभावित हुए। इसके कारण बैंकों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कई प्रतिष्ठानों का कामकाज बाधित हुआ।
• उन्होंने कहा कि हैकिंग शब्द ने आज रोमांचक रूप ले लिया है, हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि साइबर सुरक्षा हमारे युवाओं के कैरियर के लिए आकर्षक और व्यवहार्य विकल्प बने।
• मोदी ने कहा कि इसी के साथ सभी देशों को यह जिम्मेदारी लेना सुनिश्चित करना चाहिए कि डिजिटल स्पेस आतंकवाद और कट्टरपंथ की अंधकारपूर्ण ताकतों का मैदान नहीं बनना चाहिए।
• सूचनाओं का आदान-प्रदान और सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल इस खतरे के सतत रूप से बदलते स्वरूप से निपटने के लिए महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने सम्मेलन में जन धन बैंक अकाउंट, आधार प्लेटफार्म और मोबाइल माध्यम पर जोर दिया और कहा कि इससे भ्रष्टाचार को कम कर पारदर्शिता लाने में मदद मिल रही है।
• मोदी ने डिजिटल माध्यम और प्रौद्योगिकी की सराहना करते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी हर बाधा को तोड़ती है। सरकार डिजिटल पहुंच के माध्यम से लोगों का सशक्तिकरण करने के लिए प्रतिबद्ध है।

3. पीएम ने की उमंग एप की शुरुआत
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों को एक ही मंच पर सभी सरकारी सुविधाओं का लाभ देने के लिए बृहस्पतिवार को मोबाइल एप उमंग की यहां शुरुआत की।
• इस एप की शुरुआत पिछले साल दिसम्बर में ही की जानी थी। इस एप पर आधार, डिजिलॉकर, भारत बिल पेमेंट सिस्टम समेत कई अन्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी। आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक उमंग एप पर केंद्र समेत राज्य सरकारों की 1,200 से अधिक सेवाएं उपलब्ध होंगी।
• इस एप के जरिये लोग कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की सेवाओं का इस्तेमाल कर सकेंगे। इसके अलावा स्थायी खाता संख्या (पैन) का आवेदन तथा रोजगार तलाश रहे लोग प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में पंजीयन भी करा सकेंगे।
• यह एप 13 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। यह जल्दी ही यूएसएसडी के जरिये फीचर फोनों पर भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

4. शंघाई सम्मेलन में सुषमा करेंगी भारत का प्रतिनिधित्व
• विदेशमंत्री सुषमा स्वराज इस महीने के अंत में रूस के सोची में होने वाले शंधाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी।
• यह सम्मेलन 30 नवम्बर और 1 दिसम्बर को होने वाला है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, सुषमा स्वराज 30 नवम्बर और 1 दिसम्बर को रूस के सोची में होने वाले शंधाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी।
• वह 29 नवम्बर को वहां पहुंचेंगी और 30 नवम्बर को द्विपक्षीय बैठकों में हिस्सा लेंगी। उन्होंने कहा कहा, सुषमा इस दौरान रूसी प्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव की ओर से आयोजित भोज में भी शामिल होंगी।
• कुमार ने कहा, सुषमा का एक दिसम्बर को शिष्टमंडल के प्रमुखों के साथ सीमित लोगों के लिए निर्धारित बैठक में हिस्सा लेने का कार्यक्र म है और इसके बाद प्रारंभिक सत्र का आयोजन होगा।

5. अब होगी रोहिंग्या मुसलमानों की वतन वापसी : म्यांमार और बांग्लादेश ने किए समझौते पर हस्ताक्षर
• वैश्विक समुदाय से पड़ रहे दबाव के बीच म्यांमार ने उन लाखों रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस लेने पर बृहस्पतिवार को सहमति जताई जिन्होंने सैन्य कार्रवाई की वजह से भागकर बांग्लादेश में शरण ली।
• अमेरिका ने म्यांमार की सैन्य कार्रवाई को नस्ली संहार करार दिया है। म्यांमार के रखाइन प्रांत में सैन्य कार्रवाई के बाद अगस्त से अब तक 6.20 लाख लोग पलायन कर बांग्लादेश चले आए हैं।
• बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि हफ्तों की बातचीत के बाद दोनों पड़ोसी देशों ने विस्थापित लोगों की वापसी की व्यवस्था को लेकर हस्तक्षर किया। म्यांमार की नेता आंग सान सू की और बांग्लादेश के विदेशमंत्री अबुल हसन महमूद अली से राजधानी ने पी ताव में बातचीत की और दोनों देशों ने इस बारे में एक करार पर हस्ताक्षर किया।
• बांग्लादेश के अधिकारियों का कहना है कि जिस करार पर हस्ताक्षर किया गया है उसको लेकर पिछले कुछ महीने से बातचीत हो रही हैं और बुधवार को दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसको अंतिम रूप दिया। बांग्लादेश ने एक संक्षिप्त बयान में कहा, दोनों पक्षों ने दो महीनों में शरणाथियों की म्यांमार में वापसी शुरू कराने पर सहमति जताई है। अली ने म्यांमार के रखाइन प्रांत के लिए तीन एंबुलेंस भी सौंपी।
• सू की और उनकी बांग्लादेशी समकक्ष के बीच यह बातचीत पोप फ्रांसिस के इन दोनो देशों के दौरे से पहले हुई है। रोहिंग्या की दुर्दशा के बारे में पोप मुखर होकर सामने आए हैं।
• बांग्लादेश के विदेशमंत्री ने एक संक्षिप्त वक्तव्य में कहा, यह शुरुआती कदम है। वह रोहिंग्या को वापस लेंगे। अब हमें काम शुरू करना होगा। बहरहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि कितने रोहिंग्या शरणार्थियों को वापसी करने दिया जाएगा।

6. अमेरिका को सुपर पावर बने रहना है तो भारत से बढ़ाए रिश्ते : आस्ट्रेलिया
• ऑस्ट्रेलिया ने विदेश नीति पर श्वेत पत्र जारी करके भविष्य के संबंधों को लेकर दशा-दिशा स्पष्ट कर दी। अमेरिका से कहा है कि उसे अगर सुपर पावर का रुतबा कायम रखना है तो एशिया के मामलों में रुचि ले और यहां पर अपनी मौजूदगी बढ़ाए। एशिया में समान विचारधारा वाले देशों से सहयोग बढ़ाए। जाहिर है अमेरिका के इस निकट सहयोगी देश का इशारा भारत की ओर है। ऑस्ट्रेलिया ने चीन के बढ़ते प्रभाव से अमेरिका को आगाह किया है।
• 115 पेज के इस श्वेत पत्र में ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि दुनिया के धनी और ताकतवर देश ही अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से कुशलता के साथ मुकाबला कर सकते हैं। खुलेपन की नीति से ही अमेरिका दुनिया को उदारवादी नीतियों पर आधारित नेतृत्व दे सकता है।
• अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति के रूप में चुनाव दुनिया में सुपर पावर की भूमिका को संकुचित करने वाला है। यह ऑस्ट्रेलिया जैसे निर्यात पर आधारित देश के लिए नकारात्मक घटनाक्रम है। क्योंकि ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रांस पैसीफिक पार्टनरशिप रीजनल ट्रेड एग्रीमेंट को रद कर दिया।
• अमेरिका सहित 12 देशों के बीच हुआ यह समझौता वर्षो के विचार-विमर्श के बाद हुआ था। ऑस्ट्रेलिया ने अमेरिका के इस फैसले पर निराशा जताई है। श्वेत पत्र में कहा गया है कि मजबूत और बहिमरुखी अमेरिका दुनिया में शांति, स्थिरता और संपन्नता के लिए आवश्यक है।
• अमेरिका की कमजोरी और उसके अंतमरुखी होने से दुनिया की उदारवादी शासन व्यवस्था के कमजोर होने का खतरा है। श्वेत पत्र में कहा गया है कि मौजूदा समय में दो देशों में ऑस्ट्रेलिया अमेरिका के नेतृत्व में युद्ध लड़ रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिका के नेतृत्व में यही स्थिति रही है। अमेरिका तेज आर्थिक और सामरिक तरक्की का फायदा लेता रहा है।
• वैश्विक उदारवादी शासन व्यवस्था के चलते ऑस्ट्रेलिया को कभी उसको लेकर आपत्ति भी नहीं रही। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। चीन से अमेरिका को चुनौती मिल रही है। हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर का इलाका संतुलन का नया क्षेत्र बन गया है। ऐसे में अमेरिका को अपनी हैसियत बरकरार रखने के लिए नीति बदलनी होगी।

7. ब्रह्मपुत्र नहीं, तिब्बत की नदियों पर बांध बनाएगा चीन
• तिब्बत में कई जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण कर रहे चीन ने ब्रह्मपुत्र के बजाए अपने प्रांतों के करीब स्थित नदियों पर बांध बनाने की योजना बनाई है। चीनी के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने अपने लेख में इसकी जानकारी दी।
• उल्लेखनीय है कि ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध को लेकर भारत कई बार चीन के सामने ऐतराज जता चुका है। पिछले महीने चीन ने उन मीडिया रपट को खारिज करते हुए गलत करार दिया था, जिसमें कहा गया था कि चीन ब्रह्मपुत्र नदी से पानी को मोड़ने के लिए तिब्बत में अरुणाचल प्रदेश के समीप 1000 किलोमीटर लंबी सुरंग बना रहा है।
• चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदियों पर बनाए जा रहे विभिन्न बांधों को लेकर भारत ने पड़ोसी देश (चीन) के सामने अपनी चिंताएं उठाई थी। ब्रह्मपुत्र को चीन में यरलुंग त्संगपो के नाम से जाना जाता है।ग्लोबल टाइम्स ने अपने लेख में कहा, जिनशा, लान्कांग और नुजूयांग नदियां विशाल जल विद्युत क्षमता के साथ तिब्बत में खासे लोकप्रिय जलमार्ग हैं। साथ ही वह भारत से होकर नहीं गुजरती हैं।
• लेख में कहा गया है कि इसका यह मतलब नहीं है कि चीन से भारत में बहने वाली नदियों-जैसे यरलुंग जैगंबो नदी (ब्रह्मपुत्र) पर बने पनबिजली स्टेशन को तिब्बत में बिजली पहुंचाने की योजना से पृथक किया जाएगा, लेकिन वे इसके लिए पहली पसंद नहीं हो सकते।
• पहली बड़ी जल विद्युत परियोजना के रूप में ब्रह्मपुत्र पर जांगमू बांध समेत तिब्बत में सीमावर्ती नदी पर बनी चीन की कुछ और योजनाओं पर भारत में चिंता जताई थी।

8. ईपीएफ खाते में दर्ज होंगी ईटीएफ यूनिटें
• कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने पीएफ खातों में एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) यूनिटें जोड़ने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इससे करीब पांच करोड़ खाताधारकों को फायदा होगा। अगले साल मार्च अंत तक सभी खाताधारक कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) खाते में ईटीएफ यूनिटों की स्थिति भी देख सकेंगे।
• केंद्रीय ट्रस्टी बोर्ड (सीबीटी) की गुरुवार को हुई बैठक में यह फैसला लिया गया। सीबीटी ईपीएफओ की निर्णायक कमेटी है। इसके अध्यक्ष केंद्रीय श्रम मंत्री होते हैं।
• बैठक के बाद श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने बताया कि सीबीटी ने इक्विटी में होने वाले निवेश के मूल्यांकन के लिए नई अकाउंटिंग नीति को मंजूरी प्रदान कर दी है। इस नीति में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के सुझावों को भी शामिल किया गया है।
• श्रम सचिव एम सत्यवती ने बताया कि खाताधारक जब भी ईपीएफ खाते से एडवांस निकालेंगे या खाता बंद कराएंगे, ईपीएफओ ईटीएफ यूनिटों को लिक्विडेट कर देगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईटीएफ यूनिटों को पीएफ खाते में जोड़ने के बाद भी यह डीमैट से अलग रहेगा।
• इस खाते में ईटीएफ यूनिटें जुड़ने के बाद भी खाताधारक यहां ट्रेडिंग नहीं कर सकेंगे। इसके अलावा ईपीएफओ ईटीएफ यूनिटों को तभी लिक्विडेट करेगा, जब खाताधारक धन निकासी के लिए आवेदन करेंगे।
• ईपीएफओ ने अगस्त, 2015 में ईटीएफ में निवेश की शुरुआत की थी। श्रम सचिव के मुताबिक, ‘ईपीएफओ अब तक करीब 32,000 करोड़ रुपये ईटीएफ में निवेश कर चुका है।
• इस पर अब तक 21.87 फीसद का रिटर्न मिला है। हालांकि यह रिटर्न केवल अनुमानित ही है। ईपीएफओ को यह रिटर्न तभी मिलेगा, जब इस निवेश को भुनाया जाएगा।

9. चिट्ठी में पता लिखने की जरूरत नहीं अब हर घर का होगा यूनीक कोड
• आधार की ही तरह अब हर घर का यूनीक कोड होगा। यह उस घर की डिजिटल पहचान होगी, जिसमें पते का पूरा विवरण समाहित होगा। यानी चिट्ठी में पते की जगह अब बस एक कोड दर्ज करना होगा, चिट्ठी पते पर पहुंच जाएगी। गूगल मैप पर यदि लोकेशन ढूंढना है, तो पूरा पता लिखने की जरूरत नहीं होगी, सिर्फ यूनीक कोड डालने से लोकेशन सामने आ जाएगी।
• सरकार की ई-एड्रेस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए डाक विभाग ने तैयारी शुरू कर दी है। इसमें उसका साथ मैप माई इंडिया कंपनी दे रही है। योजना की शुरुआती दिल्ली, नोएडा और बोकारो से की जानी है।
• ऐसे बनेगा कोड : आपके घर या ऑफिस के पते की जियो टैगिंग की जाएगी। यानी रिमोट सेंसिंग के जरिये उसकी जियोग्राफिक लोकेशन को दर्ज किया जाएगा। इससे यह लोकेशन डिजिटल मैप से कनेक्ट की जा सकेगी। आपसे मोबाइल नंबर व परिवार के एक या दो सदस्यों का आधार नंबर भी लिया जाएगा।
• मैप माई इंडिया के मौजूदा ई-लॉक सॉफ्टवेयर की तर्ज पर डाक विभाग एक सॉफ्टवेयर तैयार करेगा। जिसके जरिये डिजिटल कोड जेनरेट किया जाएगा। छह डिजिट का यह कोड अल्फा न्यूमेरिक होगा, यानी यह अंकों और अल्फाबेट का मिलाजुला रूप होगा।
• इसमें घर की लोकेशन, गली, मोहल्ला, जिला, राज्य और देश मैप पर टैग रहेगा। गूगल मैप जैसे किसी भी डिजिटल मैप पर यह कोड डालते ही घर या गंतव्य का पता, मैप पर उसकी जियोग्राफिक लोकेशन सामने आ जाएगी।
• डाक के अलावा फायर सर्विस, एम्बुलेंस सेवा, आपातकालीन सेवा, कोरियर आदि के लिहाज से भी यह सुविधाजनक होगा। इसे प्रॉपर्टी के रिकॉर्ड से भी जोड़ा जा सकेगा।

10. नेवी को मिली पहली महिला पायलट
• भारतीय नौसेना में पहली बार किसी महिला पायलट की नियुक्ति की गई है। उत्तर प्रदेश की शुभांगी स्वरूप जल्द ही मेरीटाइम रिकानकायसन्स विमान उड़ाती दिखाई देंगी।
• इसके अलावा नई दिल्ली की आस्था सेगल, पुड्डूचेरी की रूपा ए और केरल की शक्ति माया एस को नौसेना की नेवल आर्मामेंट इंस्पेक्टोरेट (एनएआई) शाखा में देश की पहली महिला अधिकारी बनने का गौरव हासिल हुआ है।
• चारों महिलाओं ने बुधवार को एक कार्यक्र म में एझीमाला नौसेना अकादमी में नेवल ओरियन्टेशन कोर्स पास करने के बाद पासिंग आउट परेड में हिस्सा लिया।

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