Daily Current(25/11/2017) For UPSC IAS CDS CAPF UPPSC MPPSC RAS

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NEWS PAPER EDITORIAL

चुनावी मुद्दों का स्थानीयकरण

आम आदमी के लिए उसके गांव, कस्बे और शहर की छोटी-छोटी सुविधाएं ही अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था और सुशासन का पैमाना हैं

इस समय उत्तर प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव प्रचार पूरे शबाब पर है। पहले चरण के लिए मतदान हो चुका है। दूसरे-तीसरे चरण के लिए तैयारी हो रही है। एक दिसंबर को मतगणना होनी है। वर्ष 1992 में 74वें संविधान संशोधन से नगरीय निकायों अर्थात नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा मिला था। तबसे कभी भी न चुनावों को न तो जनता ने और न ही राजनीतिक दलों ने ज्यादा महत्व दिया। ऐसा पहली बार हो रहा है कि दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दल-भाजपा और कांग्रेस-पूरे दम-खम के साथ यह चुनाव लड़ रहे हैं। यही नहीं, प्रदेश में क्षेत्रीय महत्व के दोनों दल सपा और बसपा भी पिछले 22 वर्षो में पहली बार अपनी-अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ रहे हैं। न राजनीतिक दलों का नगरीय निकाय चुनावों के प्रति ऐसा प्रेम अचानक क्यों उमड़ा? यह भारतीय राजनीति और शासन के लोकतंत्रीकरण का संकेतक है। काफी समय से देखा जा रहा है कि चुनाव चाहे नगरपालिकाओं, पंचायतों या फिर विधानसभा अथवा लोकसभा केक्यों न हों, मुद्दे वही होते हैं। मुद्दों का स्थानीयकरण होता जा रहा है। जनता को बिजली, पानी, सड़क, नाली, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, रोजगार आदि अपने क्षेत्र में चाहिए, चाहे वह छोटे शहर में रह रही हो या बड़े नगर में, गांवों में हो या कस्बों में। न्हीं क्षेत्रों से मिलकर ही तो पूरा देश बना है और न्हीं छोटे-छोटे क्षेत्रों में रहने वालों की संख्या प्रदेश और देश की सरकार एवं राजनीति को बदलने की बड़ी क्षमता रखती है। शायद यह बात राष्ट्रीय राजनीति पर लंबी-लंबी बहस करने वाले राजनीतिक दलों को अब समझ में आने लगी है।1नवंबर 2017 में जब मोदी सरकार ने नोटबंदी की अचानक घोषणा की तो तमाम राजनीतिक दलों, मीडिया और विश्लेषकों ने उसके दुष्परिणामों को तना बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया कि लगा कि अब तो मोदी सरकार के ‘बुरे-दिन’ आ ही गए, पर तभी ओडिशा, महाराष्ट्र, चंडीगढ़, दिल्ली आदि के स्थानीय चुनावों में जनता ने भाजपा के पक्ष में जबरदस्त मतदान कर सबको स्तब्ध कर दिया। स्पष्ट हो गया कि जनता को नोटबंदी से कोई परेशानी नहीं हुई, बल्कि शायद उसे ख़ुशी हुई। स पर उत्तर प्रदेश की जनता ने तो जैसे पक्की मुहर ही लगा दी जब उसने विधानसभा चुनावों में भाजपा गठबंधन को 325 सीटें देकर उसे ऐतिहासिक विजय प्रदान की। यह ऐसा समय था जब मोदी सरकार बचाव की मुद्रा में थी और उसके पास नोटबंदी की ‘मार्केटिंग’ का कोई अवसर भी न था। शायद सी प्रवृत्ति को भांपकर भाजपा उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों को दिसंबर 2017 में होने वाले गुजरात के विधानसभा चुनावों से जोड़ कर देख रही है। उसका मानना है कि एक दिसंबर को उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव परिणाम आने के बाद 9 और 14 दिसंबर को जब गुजरात में मतदान होगा तो उसके अच्छे प्रदर्शन का सकारात्मक प्रभाव निश्चित पड़ेगा। कांग्रेस का भी यही मानना है कि यदि वह उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में भाजपा को पटखनी दे सकी तो गुजरात चुनाव में उसके पक्ष में माहौल और बेहतर हो सकेगा जिसका लाभ उसे 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में मिल पाएगा। ऐसा देश में पहली बार है कि राजनीतिक दल स्थानीय चुनावों को विधानसभा और लोकसभा के चुनावों से सीधे-सीधे जोड़ कर देख रहे हैं। संभवत: सीलिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को पहली बार नगरीय निकाय चुनावों में स्टार-प्रचारक की भूमिका में उतरना पड़ा। यह चुनाव उनके आठ महीने के कार्य-काल पर एक जनमतसंग्रह सा भी होगा। से गंभीरता से लेते हुए भाजपा ने पहली बार निकाय चुनावों में अपना संकल्प-पत्र जारी किया है, जिसमें नगरपालिकाओं को ‘छोटी-सरकार’ मानते हुए नागरिकों को ‘विश्व स्तरीय सुविधाएं’ मुहैया कराने का आश्वासन दिया गया है। मुख्यमंत्री योगी के साथ-साथ सांसद मनोज तिवारी और हेमामालिनी की भी मांग हो रही है। कांग्रेस ने भी अपने स्टार प्रचारकों को उतारा है और अपनी वाकपटुता के चलते नवजोत सिंह सिद्धू की मांग बढ़ गई है, पर ताज्जुब है कि पहली बार चुनाव चिन्ह पर उतरने के बावजूद अखिलेश और मायावती न चुनावों में प्रचार नहीं कर रहे। संभवत: उन्हें शंका है कि कहीं पिछले विधानसभा चुनाव परिणामों की पुनरावृत्ति न हो जाए जिसमें सपा को 403 सीटों में केवल 47 और बसपा को मात्र 19 सीटें मिली थीं। 1जिस प्रकार स वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा नोटबंदी को लेकर बचाव की मुद्रा में थी उसी तरह वह निकाय चुनावों में जीएसटी को लेकर बैकफुट पर है, पर अच्छी बात यह है कि जीएसटी को भाजपा ने प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया और जीएसटी काउंसिल के माध्यम से लगातार उसमें संशोधन और परिवर्तन करती जा रही है जिससे व्यापारी और ग्राहक, दोनों लाभान्वित हो रहे हैं। ससे भले ही सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा हो, जिसकी तरफ भाजपा के बागी नेता यशवंत सिन्हा ने शारा भी किया है, लेकिन जब सरकारी खजाना भी जनता का ही है तो फिर क्या गम है? हां, कांग्रेस जरूर सका राजनीतिक लाभ लेना चाहती है और राहुल गांधी पूरे देश में नोटबंदी और जीएसटी के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। गुजरात में व्यापारियों का अच्छा खासा वर्ग है, लेकिन देखना है कि जिस तरह पूरे देश और सभी राज्यों को साथ लेकर मोदी सरकार जीएसटी के मामले में आगे बढ़ रही है उसके विरोध का कांग्रेसी दांव कहीं उल्टा न पड़ जाए?1अभी हाल में अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग संस्था मूडीज ने 13 वर्षो के बाद भारत की रेटिंग बेहतर की है और सके कुछ समय पहले विश्वबैंक ने भी भारत में ‘ज ऑफ डूंग बिजनेस’ में भारत को 30 अंकों की लंबी छलांग देकर प्रथम 100 देशों में स्थान दिया था। अफसोस कि यह तब न हो पाया जब देश में एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री रहा। कहीं गुजरात की मिट्टी में ही कुछ अर्थ-ज्ञान के संस्कार तो नहीं? पहले बापू के चरखे ने मैनचैस्टर और ब्रिटिश साम्राज्य को शिकस्त दी और अब प्रधानमंत्री मोदी ने जन-धन, नोटबंदी, जीएसटी, आधार, ‘डायरेक्ट-बेनिफिट-ट्रांसफर’, काले-धन पर लगाम, बिचौलियों का अंत आदि अनेक नए-नए प्रयोगों से एक विशेष आर्थिक-मौद्रिक पर्यावरण बनाने की कोशिश की है, जो आगे क्या गुल खिलाएगा, उसका अभी से अनुमान लगाना मुश्किल है। ये सभी उपाय आज किसी दवा की कड़वी घूंट की तरह लग सकते हैं, लेकिन जिस दिन ससे समाज अपने को पहले से बेहतर महसूस करने लगेगा उसी दिन वह समझ जाएगा कि एक विकसित और खुशहाल समाज का रास्ता कठिन आर्थिक निर्णयों से होकर जाता है। लोकतंत्र में कोई भी पार्टी सत्ता में हमेशा नहीं रह सकती और चूंकि आम आदमी के लिए उसके गांव, कस्बे और छोटे-बड़े शहर की छोटी-छोटी सुविधाएं ही अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था और सुशासन का पैमाना होती हैं सलिए जब कभी उनके शासन की बारी आए तो वे ‘लॉलीपॉप-पॉलिटिक्स’ छोड़कर व्यक्ति, समाज और देश के हित में निर्भीक होकर कठोर निर्णय लें। राजनीतिक दल आम आदमी की अपेक्षाओं को जितनी जल्दी समङों, उनके लिए उतना ही बेहतर होगा।1 (लेखक सेंटर फॅार द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं

नई सुबह के इंतजार में नेपाल

भारत की दिलचस्पी का कारण यही है कि नेपाल इन चुनावों के जरिये राजनीतिक उठापटक से मुक्त हो पाता है या नहीं?

डॉ. श्रीष पाठक

नेपाल में नया संविधान लागू होने के बाद पहली बार चुनाव होने जा रहे हैं। प्रांतीय और संसदीय चुनाव दो चरणों में 26 नवंबर और 7 दिसंबर को होने हैं। इन चुनावों पर भारत के अलावा बाकी दुनिया की भी दिलचस्पी है। भारत की दिलचस्पी का एक कारण तो यही है कि नेपाल इन चुनावों के जरिये पिछले कई दशकों की राजनीतिक उठापटक से मुक्त हो पाता है या नहीं? दूसरा कारण यह है कि वहां बनने वाली नई सरकार भारतीय हितों के प्रति कितनी संवेदनशील रहती है। ध्यान रहे कि पिछले कुछ समय से नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। भारत की तरह चीन की भी यही चाहत है कि नेपाल में उसके हितों की चिंता करने वाली सरकार बने। चुनाव परिणाम कुछ भी हों, नेपाल ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राज्यों और केंद्र के चुनाव एक साथ ही दो चरणों में कराने का निर्णय लिया है। पहला चरण 26 नवंबर को है और दूसरा 7 दिसंबर को। एक साथ चुनाव कराने से संसाधनों की बचत तो होगी ही, सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित देश को एक प्रधानमंत्री भी मिलेगा। यह यकीनन एक प्रगतिवादी कदम है और आशा की जानी चाहिए कि नेपाल अपने इस लोकतांत्रिक प्रयोग में सफल होकर एक सुदृढ़ राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ पाएगा। 1नेपाल केपिछले तीन दशक त्रसद राजनीतिक अस्थिरता के रहे हैं, जिसमें दस साल भयंकर हिंसा से भरे रहे हैं। वहां 1990 में बहुदलीय लोकतंत्रीय संसदीय व्यवस्था को अपनाया तो गया, पर गत 27 सालों में देश में 25 सरकारें आईं और एक बार बलपूर्वक राजकीय सत्ता परिवर्तन भी हुआ। 2001 में चुनाव के दो साल के भीतर ही आपातकाल लागू कर दिया गया था। 2005-06 में भारत के प्रयास से माओवादियों को राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल किया गया और नए गणतांत्रिक नेपाल के नए संविधान के गठन के लिए 2008 में प्रथम संविधानसभा बनाई गई। विभिन्न अस्मिताओं वाले नागरिकों के सम्यक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर खींचातानी चलती रही और 2013 में द्वितीय संविधान सभा का गठन किया गया। ये संविधान सभाएं संविधान-निर्माण के लिए सहमति जोहती रहीं और साथ-साथ शासन-प्रशासन भी किसी प्रकार चलाती रहीं। सितंबर 2015 में उसे नया संविधान मिला। नेपाल अपने सभी नागरिकों के लिए एक उपयुक्त संविधान बनाए, इसमें भी भारत को अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ा। नए संविधान के अनुसार नेपाल एक गणतांत्रिक लोकतंत्र होगा जिसमें राष्ट्रपति संवैधानिक प्रधान और प्रधानमंत्री के पास वास्तविक शक्तियां होंगी और देश सात राज्यों का एक संघीय ढांचा बनेगा। नेपाल में 2013 के बाद से पिछले चार साल में चार सरकारें आ चुकी हैं जो नेपाली कांग्रेस के सुशील कोईराला, शेर बहादुर देउबा, माओवादी गठबंधन के पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड और केपी ओली के नेतृत्व में बनीं। नए संविधान के मुताबिक देश में त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था को अपनाया गया है, जिसमें केंद्रीय संसदीय स्तर, राज्य स्तर और निकायों का स्थानीय स्तर भी समावेशित है। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष और नियमित अंतराल पर होने वाले चुनाव किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लक्षण हैं। नेपाल एक छोटा देश हैं, लेकिन वहां राजनीतिक दलों की भारी भीड़ सी है। हालांकि मुख्य मुकाबला नेपाली कांग्रेस और दो वाम गुटों के गठबंधन के बीच है।1दरअसल नेपाल ने समानांतर मतदान प्रणाली व्यवस्था को चुना है जिसमें विभिन्न प्रत्याशी दो रीतियों से चुने जाएंगे। तकरीबन साठ प्रतिशत प्रत्याशी फस्र्ट पास्ट द पोस्ट यानी एफपीपी (जो अधिक मत पाया, वह जीता) पद्धति से और बाकी प्रत्याशी आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से चुने जाएंगे। जहां एफपीपी पद्धति एक सरल चुनाव पद्धति है वहीं आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति जटिल तो है, परंतु प्रत्याशियों का सम्यक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। नेपाल के संविधान-निर्माताओं ने अपने स्तर पर यह कोशिश की है कि गठित होने वाली आगामी संसद में सभी हित और अस्मिताएं सम्यक प्रतिनिधित्व के साथ प्रशासन में योग दें ताकि देश फिर किसी आंतरिक संघर्ष की स्थिति में न फंसे। राज्यों और केंद्रीय विधानमंडल के लिए एक साथ चुनाव कराने के नेपाल के प्रयोग को भी भारत को गौर से देखना होगा, क्योंकि एक अर्से से यहां यह मांग हो रही है कि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ होने चाहिए। अब जब भारत की साक्षरता लगभग 75 प्रतिशत के करीब है तब आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाए जाने के लिए भी जरूरी विमर्श करना चाहिए, क्योंकि यही पद्धति भारत की विशाल विविधताओं का सम्यक प्रतिनिधित्व कर सकती है। 1(लेखक राजनीतिशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

ई राह तलाशती जिंबाब्वे की राजनीति

मुगाबे की विदाई से जिंबाब्वे में शांति और राजनीतिक स्थिरता के साथ ही आर्थिक तरक्की की उम्मीद भी की जानी चाहिए 1

जिंब्बावे में आज जो सियासी तस्वीर बनी है, उसे दरअसल जनता को हाशिये पर डालने का नतीजा बताया जा रहा है

आखिरकार जिंबाब्वे को सत्तालोलुप राष्ट्रपति डॉ. रॉबर्ट मुगाबे से मुक्ति मिल गई। मुगाबे के इस्तीफे से पिछले पखवाड़े जिंबाब्वे के उपराष्ट्रपति पद से बर्खास्त एमर्सन मानांगाग्वे के राष्ट्रपति बनने का रास्ता भी साफ हो गया है। सत्तारूढ़ दल जानू पी एफ मानांगाग्वे को अपना नेता पहले ही चुन चुका है और इससे जिंब्बावे में एक तरह से शांति बहाली हो गई है, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति मुगाबे की पत्नी के मंसूबों को देखते हुए इसे लेकर अभी संदेह बरकरार है

आजकल

अवाम को हक से वंचित रखने का नतीजा

अनंत मित्तल 1जिंबाब्वे को आखिर अपने 93 वर्षीय सत्तालोलुप राष्ट्रपति डॉ. रॉबर्ट मुगाबे से मुक्ति मिल गई। इससे पिछले पखवाड़े जिंबाब्वे के उपराष्ट्रपति पद से बर्खास्त एमर्सन मानांगाग्वे के राष्ट्रपति बनने का रास्ता भी साफ हो गया है। जिंबाब्वे का सत्तारूढ़ दल जानू पी एफ मानांगाग्वे को अपना नेता पहले ही चुन चुका है। डॉ. मुगाबे दुनिया में सबसे उम्रदराज राष्ट्राध्यक्ष थे जिनके नेतृत्व में उनके देश ने 1980 में भारत की ही तरह अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाई थी। मुगाबे ने 22 नवंबर की शाम राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था। वे अपनी पार्टी द्वारा संसद में महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने तक पूरे 37 साल सत्ता में बने रहे। मुगाबे ने अपनी दूसरी पत्नी ग्रेस मरुफु को अपनी जगह राष्ट्रपति बनाने पर इस्तीफा देने की शर्त रखी थी, लेकिन सेना ने उनकी एक नहीं सुनी। ग्रेस को अपनी राजगद्दी सौंपने के फेर में मुगाबे द्वारा अपने वफादार साथी और उपराष्ट्रपति मानांगाग्वे को बर्खास्त किए जाने के बाद से ही सेना उन्हें समझा रही थी। सेनाध्यक्ष जनरल चिवेंगा ने उनसे जब मानांगाग्वे को बहाल करने को कहा तो उन्होंने अपनी कैबिनेट से उन पर देशद्रोह के आरोप में कार्रवाई करने की मंजूरी ले ली। इसके बावजूद सेना ने जब उन्हें नजरबंद करके उनका इस्तीफा मांगा तो भी वे अपने पद पर डटे रहे। आखिरकार उनकी पार्टी जानू-पीएफ, यानी जिंबाब्वे अफ्रीकन नेशनलिस्ट यूनियन -पेटियाटिक फ्रंट ने उन्हें अपने अध्यक्ष पद से हटाकर उन पर महाभियोग की कार्यवाही का प्रस्ताव पारित किया। साथ ही उनकी शाहखर्च पत्नी ग्रेस मुगाबे को भी पार्टी से निकाल बाहर किया। मुगाबे से ग्रेस उम्र में 41 साल छोटी हैं। मुगाबे भी बांग्लादेश के निर्माता एवं संस्थापक राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान की तरह क्रांति नायक से सत्ता के मोह में लगभग तानाशाह बन चुके थे। यह बात दीगर है कि बांग्लादेश क्रांति के तीन साल बाद ही शेख मुजीब की परिवार सहित हत्या के बाद वहां कई साल लंबा फौजी शासन रहा, जबकि जिंबाब्वे में सेना ने एक पखवाड़े में ही सत्ता नागरिक प्रशासन को सौंप दी।1डॉ. मुगाबे के नेतृत्व में अफ्रीकी देश पश्चिमी रोडेशिया ने सत्तर के दशक में अंग्रेजों से छापामार युद्ध करके आजादी पाकर अपना नाम जिंबाब्वे रख लिया था। विडंबना यह रही कि उनके इस्तीफे पर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे का कहना है कि आखिर जिंबाब्वे के नागरिक आजाद हो गए। मानांगाग्वे पदच्युत होने पर दक्षिण अफ्रीका भाग गए थे। वहीं से उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा से फोन करवा कर मुगाबे पर इस्तीफे का दबाव डलवाया। केन्या के पूर्व राष्ट्रपति और मुगाबे के पुराने मित्र जोमो केन्याटा ने भी उन्हें पद छोड़ने के लिए समझाया। ग्रेस के गुर्गे समङो जाने वाले वित्त मंत्री इग्नेशियस चोम्बो भी हिरासत में हैं। सेना का मुख्य मकसद उनकी 52 वर्षीय ग्रेस को उनका उत्तराधिकारी बनने से रोकना था। फिजूलखर्ची और दिखावे की आदत के कारण ग्रेस का नाम लोगों ने ‘गुच्ची ग्रेस’ रख दिया था। गुच्ची दरअसल दुनिया के सबसे महंगे समान बनाने वाली इतालवी ब्रांड का नाम है। यह विडंबना ही है कि गरीबी और बेरोजगारी के जाल में फंसे जिंबाब्वे को अंग्रेजों की गुलामी से निजात दिलाने वाले मुगाबे की पत्नी ही अपने ऐश्वर्य का दिखावा करके गरीब जनता का मजाक उड़ा रही थी। ग्रेस कभी राष्ट्रपति कार्यालय में सचिव हुआ करती थीं। ग्रेस का विरोध दरअसल डॉ. मुगाबे से शादी से पहले ही उनके बच्चों की मां बन जाने के बाद से ही होता रहा है। मुगाबे ने 1992 में अपनी पत्नी के निधन पर ग्रेस से शादी कर ली थी। ग्रेस से मुगाबे के तीन और कुल पांच बच्चे हैं। मुगाबे की बढ़ती उम्र के कारण पिछले कुछ साल में ग्रेस सत्ता पर हावी थीं।1ग्रेस की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने पहली बलि मुगाबे के उत्तराधिकारी और तत्कालीन उपराष्ट्रपति जोयस मुजुरू को पदच्युत करा के ली। उसके बाद ग्रेस सत्ताधारी दल की महिला शाखा की मुखिया बन बैठी। ग्रेस ने अपना अगला निशाना उपराष्ट्रपति मनांगाग्वे को बनाया। ग्रेस और डॉ. मुगाबे पर मनांगाग्वे को आइसक्रीम में जहर खिलाने की साजिश का भी आरोप है। हालांकि मियां-बीवी मिलकर उल्टे मनांगाग्वे पर ही सत्ता हथियाने की साजिश का आरोप लगाने लगे। इसी साल जुलाई में ग्रेस ने डॉ. मुगाबे पर अपना उत्तराधिकारी चुनने को दबाव बनाया था। बताया जाता है कि पेरिस में ग्रेस ने अपने किसी दौरे में 75,000 डॉलर मूल्य की खरीदारी कर डाली थी। इसके अलावा मुगाबे दंपति 44 एकड़ में फैलीे 25 बेडरूम वाली महलनुमा हवेली में रहता है जिसकी साज-सज्जा फ्रांस के वास्तुकारों से कराई गई। कुल मिलाकर मुगाबे दंपति की संपति एक से तीन करोड़ अमेरिकी डॉलर के बीच आंकी जाती है। 24 फरवरी 1924 को पैदा हुए रॉबर्ट गैबरील मुगाबे के शासनकाल में जिंबाब्वे अफ्रीका के अनाज के भंडार से गरीबी और भुखमरी के देश में बदल गया। उनके राज में खूब खूनखराबे और हत्या तथा विपक्षी नेताओं का दमन हुआ। चुनावों में धांधली करके अपनी कुर्सी बचाते रहे। वे 1980 में पहली बार प्रधानमंत्री बने। उसके दो साल के भीतर आंदोलन भड़क उठे। सैन्य दमन में सैकड़ों लोग मारे गए। मुगाबे 1987 में संविधान बदलकर खुद राष्ट्रपति बन गए। 1ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ने मुगाबे की अलोकतांत्रिक हरकतों के कारण उन्हें दिए गए नाइटहुड सम्मान को भी छीन लिया था। वे 2013 में रिकॉर्ड सातवीं बार चुनाव जीते, लेकिन 2016 में ही उनका व्यापक विरोध शुरू हुआ। उनकी इन्हीं हरकतों से नाराज होकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के संगठन ने भी मुगाबे का डटकर विरोध किया। मुगाबे के मानवाधिकार विरोधी रुख और चुनावी गड़बड़ियों के कारण अमेरिका पहले से ही उनसे नाराज है। ऐसा माना जा रहा है कि जिंबाब्वे के तख्तापलट में चीन की भी बड़ी भूमिका रही है। चीन दरअसल जिंबाब्वे में फिलहाल सबसे बड़ा विदेशी निवेशक देश है, मगर मुगाबे 2008 से उसके कारोबार में भी टांग अड़ा रहे थे। बहरहाल मुगाबे की विदाई के साथ ही जिंबाब्वे में शांति और राजनीतिक स्थिरता के साथ ही आर्थिक तरक्की की उम्मीद भी की जानी चाहिए। 1(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)अजय पंवार 1रॉबर्ट मुगाबे के राष्ट्रपति पद से इस्तीफे के बाद जिंब्बावे 37 साल के दमनपूर्ण शासन से छुटकारा पाकर राहत की सांस ले रहा है। सेना की कार्रवाई और जिंबाब्वे के मौजूदा हालात कई मायनों में विलक्षण हैं। मानवता के इतिहास में अनेक क्रांतियां हुई हैं, लेकिन इतनी शांतिप्रिय तरीके से सत्ता परिवर्तन शायद ही पहले कहीं हुई हो। हालांकि इस घटना को पूर्ण क्रांति नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसमें वह सब कुछ है जो किसी देश के पूरे राजनैतिक परिदृश्य को बदलने में मददगार होता है। 1इस घटना की जड़ें 70 के दशक के जिंबाब्वे से जुड़ी हुई हैं जब ब्रिटिश उपनिवेशवाद से त्रस्त देश को मुगाबे ने आजादी की ओर बढ़ाया और स्वयं को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। समय के साथ उनकी अदूरदर्शिता बढ़ती गई और समस्त अफ्रीकी महाद्वीप के साथ जिंबाब्वे भी अविकसित देशों में होने तथा बेहतर नेतृत्व के अभाव में आज भी दयनीय हालत में है और यही इस क्रांति का कारण भी है। बहरहाल जिंब्बावे की स्थिति हालांकि कुछ समय बाद यथावत हो जाएगी, लेकिन उभरती अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी निवेश आकृष्ट करने की संभावनाओं को धूमिल कर देगी। वर्ष 2016 में भारत जिंबाब्वे का व्यापार 133 मिलियन डॉलर तक पहुच चुका है, जो अलोकतांत्रिक परिस्थितियों के कारण और नीचे जा सकता है। इसमें नुकसान केवल जिंबाब्वे का ही है। हालांकि भारत निर्यातक की भूमिका में है तथा व्यापार में लाभ की स्थिति में भी है। वहां की लघु एवं मध्यम उद्यम में निवेश करने के साथ साथ ऊर्जा एवं स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण परियोजनाएं प्रगतिशील हैं। सरकार के स्तर पर शायद इतनी गंभीर स्थिति का सामना शायद न करना पड़े। मगर निजी निवेशकों को प्रभावित कर पाना टेढ़ी खीर साबित होने वाला है। अफ्रीकी देशों की धीमी आर्थिक गति विश्व समुदाय के सहयोग के बावजूद भी न्यून बनी हुई है तथा इस प्रकार की राजनीतिक उठापटक उन्हें पीछे ही धकेलने वाली है जो वैश्विक आय में असमानता बढ़ाएगी। मुगाबे के शासन का अंत हालांकि कई दृष्टियों से स्वाभाविक भी है। लगभग 4 दशकों की एंटी-इंकंबेंसी तथा उस पर दमनपूर्ण शासन इस सब के लिए भूमिका तैयार कर चुके थे। नए समय के साथ तादात्म्य स्थापित करने के लिए आवश्यकता थी कि सत्ता का हस्तांतरण अपेक्षाकृत जवान एमर्सन के हाथों में सौंप दी जाती क्योंकि मुगाबे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उम्र ज्यादा होने की वजह से सक्रिय भूमिका में नहीं थे। अभी जिंबाब्वे एमर्सन की वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है। जिंबाब्वे में सेना की कार्रवाई भी विश्व की अनेक सैनिक कार्रवाइयों से भिन्न है। अनेक देशों में ऐसी परिस्थितिया रक्तरंजित होने के साथ साथ सैनिक तानाशाही को भी जन्म देती है जैसा पाकिस्तान व मिस्न में देखा गया, लेकिन यहां मुगाबे को विस्थापित करने के अलावा उन्हें कोई हानि नहीं पहुंचाई गई। देश उनकी पदच्युति का जश्न मना रहा है। सेना ने अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए केवल अशक्त नेतृत्व को विस्थापित करने का कार्य किया है न कि वैकल्पिक सत्ता केंद्र बनने का। देश को एक लोकतांत्रिक मुखिया देना ही उनका सवरेत्तम लक्ष्य जान पड़ता है।1फिलहाल, जिंबाब्वे के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बदलाव तथा नए तंत्र से सामंजस्य बिठाने में अनेक समस्याओं का सामना अवश्य करना पड़ेगा, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में इस प्रकार की घटना इतिहास की इस उक्ति को सत्यापित करती है कि राष्ट्रीय सत्ता किसी की व्यक्तिगत जागीर नहीं है। मगर दुर्भाग्यवश बहुत से राजनीतिक घराने इस तथ्य को समझ नहीं पा रहे हैं। देशवासियों को उनके हकों से वंचित रखने तथा उचित प्रतिनिधित्व न देने का परिणाम ही इस तरह की कार्यवाहीयों को प्रोत्साहित करता है।1(लेखक जेएनयू में रिसर्च स्कॉलर हैं)

रक्षा आधुनिकीकरण के लिए जोखिम जरूरी

बोफोर्स विश्व इतिहास की शायद इकलौती ऐसी तोप होगी जिसके दम पर एक चुनाव जीता गया। इस तोप के पीछे विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसा प्रभावशाली व्यक्तित्व था।  उन्होंने सन 1988 में इलाहाबाद उपचुनाव के साथ राजीव गांधी को खत्म कर देने की चुनौती दी थी। सिंह ने ग्रामीण इलाहाबाद के मैदानी इलाकों में मोटरसाइकिल से घूम-घूम कर प्रचार किया था। वह गांवों में रुकते, बात करते और आगे बढ़ जाते।

उनका संदेश एकदम साफ था। आपके घर में सेंध लगाई गई है। कैसे? जब आप एक पैकेट बीड़ी या माचिस खरीदते हैं तो आप जो पैसे देते हैं उसका कुछ हिस्सा कर के रूप में सरकार के पास जाता है। उसी कर से सरकार अस्पताल और स्कूल चलाती है, सेना के लिए हथियार आदि खरीदती है। ऐसे में अगर कोई आपके पैसे का कुछ हिस्सा चुराता है तो आप इसे अपने घर में सेंधमारी नहीं तो और क्या कहेंगे?

यहां तक सबकुछ बहुत बढिय़ा था लेकिन उन्होंने इसमें दो और चीजें जोड़ दीं। पहली, वह कहते कि बोफोर्स के चोरों के नाम मेरे कुर्ते की जेब में हैं और मेरे सत्ता में आने का इंतजार कीजिए।  दूसरा, जवान इस बात को लेकर स्तब्ध हैं कि उनको ऐसी तोप दी गई है उलटा फायर कर शत्रु के बजाय उन्हें मार डालती है। इससे कोई मूर्ख बनता हो या नहीं लेकिन भीड़ का मनोरंजन होता था।
उस बात को तीन दशक बीत चुके हैं। बोफोर्स मामले में न तो कोई गिरफ्तारी हुई न किसी को सजा हुई। उस वक्त जितने भी लोगों पर जांच में या किस्से कहावतों में आरोप लगाया गया था वे अब जीवित नहीं हैं। बोफोर्स तोप का प्रदर्शन शानदार रहा है। उसने करगिल में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। आज भी यह हमारी सैन्य क्षमता का अहम हिस्सा है।
तब से 30 साल के वक्त में न तो किसी नई तोप का ऑर्डर किया गया न ही देश में तोप बनाई गई। हालांकि धनुष नामक तोप के कुछ प्रारूप जरूर बने। संक्षेप में कहें तो तब से हमारे पास कोई नई बोफोर्स नहीं आई है। इस मसले में कोई अवैध लेनदेन साबित नहीं हुआ है और न ही कोई जेल गया है।
भारत का रक्षा खरीद का रिकॉर्ड गांव के उस मूर्ख की कहानी जैसा है जो प्याज चुराता पकड़ा गया था। पंचायत ने उससे कहा कि 100 जूते खाए या 100 प्याज। मूर्ख ने प्याज का खाने का फैस्ला किया। 10 प्याज खाने के बाद ही वह उकता गया। उसने कहा कि अब वह जूते ही खाना चाहता है लेकिन वह 10 जूते भी नहीं झेल पाया और दोबारा प्याज पर आ गया। सन 1977 के बाद देश की रक्षा खरीद को समझने के लिए यह सबसे अच्छा उदाहरण है। हम उस वर्ष को आधार बना रहे हैं क्योंकि उसी साल देश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी और तभी सोवियत संघ से हथियार खरीदने की प्रक्रिया से विचलन देखने को मिला था।
जनता सरकार ने जो पहली गुंजाइश तलाशी वह थी एंग्लो-फ्रेंच जगुआर। प्रतिद्वंद्वी एजेंटों ने पत्रकारों के बीच खबरें भेजनी शुरू कर दीं और रिश्वत का शोर मचने लगा। जगुआर का मामला भी विवादित हुआ। बाद की सरकारों ने उसे भी रद्दी में डाल दिया और वह कभी पूर्ववर्ती स्तर पर नहीं पहुंच सका। जहां तक उसकी क्षमता की बात है तो 40 वर्ष बाद भी वायुसेना 100 से अधिक जगुआरों की सेवा ले रही है। इसे उड़ता ताबूत जैसे नामों से भी नवाजा गया।
इसके बाद इंदिरा गांधी की वापसी हुई और हमने दोबारा सोवियत संघ का रुख किया। राजीव ने इस व्यवस्था को बदल दिया। इन दिनों यह कहना कोई अच्छी बात नहीं है। मैं लोगों की नाराजगी का जोखिम मोल लेते हुए कहना चाहूंगा कि देश के इतिहास में तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण की दिशा में काम करने वाले इकलौते नेता राजीव गांधी थे। वह रक्षा बजट को जीडीपी के 4 फीसदी के ऊपर ले गए जबकि इससे पहले यह दो फीसदी तक रहता था। उन्होंने फ्रांस से मिराज 2000 खरीदे। नौसेना के लिए ब्रिटेन से हैरियर खरीदे, स्वीडन से बोफोर्स तोप, फ्रांस से मिलान और मात्रा मिसाइल, जर्मनी से टाइप 209 पनडुब्बियां खरीदीं। इन सबके साथ घोटाले उछाले गए। इसलिए ये सभी शुरुआती खरीद स्तर पर ठहर गए। तकनीक का हस्तांतरण, सह उत्पादन आदि कुछ नहीं हो सका।
उन्होंने भी बड़े पैमाने पर सोवियत हथियार खरीदे। इनमें बीएमपी सशस्त्र लड़ाकू वाहन, नई किलो पनडुब्बियां शामिल थीं। एक परमाणु क्षमता संपन्न पनडुब्बी लीज पर ली गई। इसकी कीमत उन्होंने सत्ता गंवाकर चुकाई। इसमें रिश्वत और घोटाले शामिल रहे होंगे लेकिन कटु सत्य यही है कि अगर आज भी हमें जंग में उतरना पड़े तो ज्यादातर वही हथियार काम आएंगे जो राजीव गांधी या उनके बाद नरसिंह राव ने खरीदे।
रक्षा खरीद में भाजपा सरकारों का प्रदर्शन निराशाजनक है। वाजपेयी सरकार ताबूत घोटाले (झूठा) की जद में थी और युद्घ जैसी परिस्थितियां बनने पर ही उसने थोड़ी बहुत ही खरीद की। मोदी सरकार से जरूर उम्मीद थी लेकिन अब तक उसने केवल 36 राफेल विमानों का ऑर्डर दिया है। पिछली सरकार ने 126 विमानों के सौदे की बात की थी। उसके अलावा तो पिछली सरकार के सौदे ही आगे बढ़ रहे हैं। मेक इन इंडिया समेत तमाम बातें हो रही हैं लेकिन काम कुछ नहीं। मजेदार बात है कि हथियार खरीद को लेकर बोफोर्स जैसा डर ही भाजपा को रोके हुए है।
नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान में हथियार खरीद के मोर्चे पर समझौता न करना अहम था। साढ़े तीन साल बाद इस मोर्चे पर उनके हाथ कुछ नहीं है। भय, अनिर्णय और ध्यान की कमी को इस बात से समझा जा सकता है कि मोदी सरकार में अब तक चार रक्षा मंत्री बन चुके हैं। इसके अलावा रेल मंत्रालय में भी चार मंत्री रहे। दोनों की हालत छिपी नहीं है।
राफेल सौदा हुआ लेकिन अब वह भी निशाने पर है। यह मोदी की परीक्षा है। क्या उनमें यह कहने का साहस है कि मैं और मेरी सरकार ने कुछ भी गलत नहीं किया है, और क्या वह इस सौदे को आगे बढ़ाएंगे? गौरतलब है कि राजीव गांधी ने कहा था कि उन्होंने या उनके परिवार ने कुछ गलत नहीं किया है।
इस सौदे के बिना वायुसेना की ताकत बहुत क्षीण हो जाएगी। सुखोई 30 भी अब दो दशक पुराना हो चुका है। अगर मोदी कुछ नहीं कर पाए तो इतिहास उनका आकलन केवल बयानबाजी करने वाले के रूप में करेगा। राफेल को लेकर वही पुरानी बातें दोहराई जाने लगी हैं। इस बहस का एक हिस्सा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से जुड़ा है।
एचएएल और अन्य सरकारी रक्षा उपकमों ने बीते छह दशक में कई आयातित उपकरण प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के जरिए बनाए लेकिन उनमें शायद ही कुछ काम का साबित हुआ। हम अब भी ऑर्डर करने, रद्द करने, दो बारा ऑर्डर करने की अंतहीन प्रक्रिया में लगे हुए हैं। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण दशकों से एक उलझन भर बना हुआ है। क्या मोदी में यह हिम्मत है कि वह सुनिश्चित कर सकें कि भारत वह खरीद सके जिसकी उसे आवश्यकता है। या तो वह राजीव की तरह जोखिम उठाकर रक्षा आधुनिकीकरण का बीड़ा उठाएं या फिर शी चिनफिंग और जनरल कमर बाजवा से चर्चा कर कश्मीर और अरुणाचल का मसला निपटा लें, अमेरिका/नाटो के साथ संधि कर भारत की रक्षा सुनिश्चित करें। ठीक वैसे जैसे जापान ने दूसरे विश्वयुद्घ के बाद किया। वह देश के रक्षा बजट को जीडीपी के एक फीसदी तक सीमित कर सकते हैं। वह भी इसलिए क्योंकि माओवादियों से निपटने के लिए इसकी जरूरत होगी। गणतंत्र दिवस की परेड और सैन्य अड्डïों पर मंत्रियों की तस्वीरें खिंचाने में भी यह काम आएगा।

 

The China plan — On Myanmar-Bangladesh deal on Rohingya

the agreement reached between Myanmar and Bangladesh to repatriate Rohingya refugees suggests that the Chinese proposal has found some traction as a solution to the crisis. It has been sealed after a three-month military operation by Myanmar in Rakhine, which resulted in around 600,000 Rohingya fleeing the province to Bangladesh, leading to a humanitarian crisis and a war of words between Dhaka and Naypyidaw. It is against this background that China stepped in with its three-point plan. Earlier this month, Chinese Foreign Minister Wang Yi travelled to Bangladesh and Myanmar with the proposal; Beijing later claimed both countries had accepted it. Under the plan, Myanmar and Bangladesh were to hold bilateral talks and reach a repatriation agreement – which has been achieved. However, the first step in Beijing’s approach – which involved a declaration of ceasefire in Rakhine to halt further displacement and bringing immediate relief to the state’s devastated Rohingya – has not taken effect. If this were to happen, the third part of the proposal will presumably take effect, with China providing economic assistance for the development of the Rakhine region as part of a long-term solution.

China, which has historically been wary of stepping into domestic conflicts in other countries, is being proactive in this case. Its own interest is at stake. Beijing enjoys good relations with both Bangladesh and Myanmar; also, Rakhine is an important link in its Belt and Road Initiative. China is building a $7.3 billion deep-water port in the province and has invested $2.45 billion to build an oil and gas pipeline connecting coastal Rakhine to Yunnan. China has put pressure on Myanmar because a protracted conflict in Rakhine will be decidedly against Beijing’s economic interests. The signing of a repatriation deal suggests this pressure tactic is working. But details of the agreement, including the number of Rohingya who will be sent back, and the timeline, have not been revealed. It is also not clear whether the refugees themselves want to go back to a place they had fled in such perilous circumstances. Or in the event they do, where they will be resettled. From the details of the plan it is clear that China sees the Rohingya crisis as an economic problem, given that its solution is centred on development. While economic assistance is essential, the real problem is arguably deeply political, and there needs to be an accompanying political solution. Any proposal can only make limited headway unless Myanmar is willing to roll back the institutional barriers that render Rohingya second-class people. Unless they are accepted as equal citizens, there is unlikely to be a long-term solution to the Rakhine unrest.

 

No proof required: Making RBI accountable

A year has passed since the first meeting of the Monetary Policy Committee in October 2016. An in-house observation (by MPC member Michael Patra in a speech on October 27) is, not surprisingly, self-laudatory. The facts speak differently. While the CPI inflation this fiscal year, at 2.7 per cent, is the lowest in the last 40 years, real policy rates are the highest in the last 14 years and industrial production, the fifth lowest in 21 years. GDP growth is at sub-6 per cent levels, from an 8.5 per cent level just two years ago.

Amidst much fanfare and support, the MPC made its first decision in October 2016. The MPC mandate was to bring the CPI inflation rate to below 4 per cent by March 2018, some five months from now. But what appears forcefully from the table (pre-MPC, the eight months of 2016 prior to the arrival of the MPC; post-MPC, the 14 months since) is that headline inflation has consecutively registered an inflation level well below 4 per cent for the last 12 months.

We need to explore the reasons for the controversial decision of the MPC to stubbornly raise the real repo rate. We are in an age where central banks are ever eager to communicate their thoughts, their policies, and do so well in advance. Unfortunately, the MPC members display a grandiose failure to communicate.

One of the most cited reasons for the RBI being so obstinate in not lowering real repo rates is that the MPC, being a new institution, had to show its independence from the Centre. Then why, just one month into the job, did the MPC cut rates in October 2016? The last eight months’ inflation data was registering an average of 5.5 per cent, the real repo rate (nominal repo rate minus y-o-y CPI inflation) had averaged 1.1 per cent, and was well below the assumed RBI repo target rate of 1.75 per cent. The GDP growth for the first two quarters was averaging 8.5 per cent. So why the unseemly hurry to cut the repo rate to 6.25 per cent ?

Patra defended the October MPC action as follows: Last month (August 2016) inflation data came in at 5 per cent, the repo rate is at 6.5 per cent, and unlike Raghuram Rajan, the MPC believes that the appropriate real repo rate for the Indian economy, in a world of declining and low inflation, is 1.25 per cent, some 50 basis points lower than the Rajan rate.

It all sounded so sensible. Then all hell broke loose — from the RBI/MPC side. Over the last 14 months, inflation has averaged 3.3 per cent, and the real repo rate has tripled to 3 per cent. In other words, the MPC has been way behind its own curve, its own stated goals. What explains this backward-bending RBI?

One popular explanation for the MPC acting in this high-handed manner is that it was “forced” into the decision of demonetisation, much against its wishes. However, it is very unlikely that RBI Governor Urjit Patel was not told about the impending demonetisation — we know that Rajan knew, and opposed, it. We can easily infer that if Patel had opposed demonetisation, he would not have accepted the job.

Some more facts. The 4 per cent goal was originally set by Rajan-Patel (and the ministry of finance) for March 2018. Second, the 4 per cent goal has now been met for the last 12 months, with an average deficiency of 100 bp. Third, even an outside rating agency (Moody’s) has approved of both demonetisation and declining inflation. It has remarked that inflation “has declined markedly and foreign exchange reserves have increased to all time highs, creating significant policy buffers to absorb potential shocks,” while the MPC expected demonetisation to raise inflation.

One final point about the strange goings on in Mumbai. The second lesson in economics, (after identification of winners and losers — see below) is that when uncertainty goes up markedly, the central bank is supposed to accommodate the uncertainty by lowering real rates. And what has Lord MPC done — the opposite, and raised such rates by 190 basis points (see table).

Does the RBI/MPC have an explanation for their policy actions? They have shifted the goalpost many times, and unfailingly, without reason. Core inflation, service inflation, HRA inflation, oil inflation, vegetable inflation, and unforeseen inflation. Not only have they not offered any explanation, they have manufactured reasons to hike rates.

I am not using the term “manufactured” lightly; readers of this column know that I have diligently reported that I cannot reproduce the RBI results on fiscal deficits causing inflation; worse, the RBI, in this open age, flaunts all norms of research by selectively picking data to suit its ideological biases (for those interested, the entire “accusation”, and the data, are posted in a short paper, ‘Attempting to Reproduce RBI Results on Fiscal Deficits Causing Inflation,’ at <http://goo.gl/cMpjdu&gt;\). I would encourage readers to run their own models to see who is wrong— me or the RBI. There is no in-between here.

Gainers — behind the MPC scene: It is easy to identify the winners with real rates being the third highest in the world (behind Brazil and Russia). Rakesh Mohan, former RBI deputy governor, had identified “lazy banking” as being a major outcome of the Indian financial system. The regulator (RBI) sets real interest rates so high that bankers find it worthwhile to safely loan to the government by buying more government securities than mandated by the SLR. Presently, the banks’ share of government securities is about 10 percentage points higher than mandated.

The second group that benefits are foreign investors. They borrow at less than 2 per cent in their home countries, buy Indian government bonds (thanks to the MPC) yielding an exorbitant 7 per cent, do not hedge exposures, and laugh their way to the bank.

The third group that benefits from high real interest rates is the political Opposition. You have to be living in a cave not to have noticed the spring in the step of every Opposition politician since the announcement, end of August, of 5.7 per cent GDP growth. This ammunition is just in time for state elections. It is universally-acknowledged that PM Narendra Modi’s popularity remains very high; also universally accepted is the fact that the only way for the Opposition to dent this popularity is if India has slow GDP growth, and low employment growth. And it is also universally acknowledged that employment and GDP growth are correlated — that is high real interest rates are an important cause of low GDP growth.

Not so curiously, the political opposition failed to mention RBI policy in their critical comments about the effect of demonetisation on GDP growth. The opposition chose to mention the tail (demonetisation) affecting growth, and not the biggest elephant (high interest rates) obstructing GDP growth. In my comments on the anniversary of demonetisation, I emphasised the important causative role of the MPC in causing growth to slow, and others agreed with me behind the scenes, but admitted that they could not object on TV!

Losers from MPC actions: Losers from MPC policy are the Indian economy, the Indian government, and the politicians in charge of the economy. In addition, interest payments are affected by RBI policy, and such payments account for over 96 per cent of the budgeted fiscal deficit for 2017-18; in 2015/16, they accounted for “only” 83 per cent.

The independence of the RBI, and MPC, is sacrosanct. But other countries have also encountered the problem of an institution not adhering to its mandate, going astray as it were. The most prominent example of an independent institution being made answerable to the people is the US FED. That is the subject of my next article.

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पिछड़े जिलों के लिए बनेगा ‘डिस्टिक्ट एक्शन प्लान’

115 जिलों के कायापलट का उठाया बीड़ा ए ‘न्यू इंडिया 2022’ के तहत तय किया लक्ष्य1हरिकिशन शर्मा, नई दिल्ली 1प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक ‘न्यू इंडिया’ बनाने का नारा दिया है। इसी नारे को जमीन पर उतारने के लिए सरकार ने पांच साल में देश के सर्वाधिक पिछड़े 115 जिलों के कायापलट का बीड़ा उठाया है। ये जिले शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसे मानव विकास के पैमाने पर तो पिछड़े हैं हीं, यहां बिजली, पानी व सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। इनमें से करीब चार दर्जन जिले वामपंथी अतिवादी ¨हसा और आतंकवाद के शिकार हैं। यही वजह है कि सरकार ने इनका हाल बदलने के लिए हर पिछड़े जिले के लिए एक ‘डिस्टिक्ट एक्शन प्लान’ बनाने का निश्चय किया है।1इन 115 जिलों में 19 जिले झारखंड, 13 बिहार, 10 छत्तीसगढ़, आठ उत्तर प्रदेश और पांच पश्चिम बंगाल के हैं। इन्हीं जिलों के लिए अगले पांच साल के लिए ‘डिस्टिक्ट एक्शन प्लान’ बनेगा और इसमें सामाजिक- आर्थिक विकास के अलग-अलग पैमाने पर समयबद्ध लक्ष्य तय किए जाएंगे। इसमें नौकरियों के सृजन का रोडमैप दिया जाएगा ताकि बेरोजगारी की समस्या का मुकाबला किया जा सके। 1केंद्र में हर जिले के लिए प्रभारी अधिकारी : इस पूरी योजना को धरातल पर उतारने के लिए केंद्र सरकार ने केंद्रीय मंत्रलयों में तैनात अतिरिक्त और संयुक्त सचिव स्तर के 115 अधिकारियों को प्रत्येक पिछड़े जिले का ‘प्रभारी अधिकारी’ बनाया है। ये अधिकारी राज्यों के संबंधित अधिकारियों के संपर्क में रहेंगे और ‘डिस्टिक्ट एक्शन प्लान’ को तैयार करके अमल में लाने में अहम भूमिका निभाएंगे। कैबिनेट सचिव पीके सिन्हा ने शुक्रवार को इन प्रभारी अधिकारियों की पहली बैठक बुलाई। उन्होंने प्रभारी अधिकारियों को तत्काल राज्यों के अधिकारियों के साथ इन जिलों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए टीम बनाने को कहा। कैबिनेट सचिव ने कहा कि इस काम के लिए धन की कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि इन जिलों के विकास के लिए जिला खनिज फंड और फ्लैक्सी फंड की राशि का इस्तेमाल किया जा सकता है।1हर जिले के विकास कार्यो की होगी निगरानी : नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने भी कहा कि देश के मानव विकास सूचकांक में व्यापक परिवर्तन लाने के लिए इन जिलों की स्थिति में सुधार लाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इन जिलों में विकास कार्यों की निगरानी सबसे अहम होगी। 1इस संबंध में उन्होंने आंध्र प्रदेश का अनुसरण करने की सलाह दी जिसके साथ निगरानी के लिए नीति आयोग ने हाल में एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। गृह सचिव राजीव गाबा ने भी कहा कि अगर इन जिलों की स्थिति में बदलाव आ गया तो इससे देश के सुरक्षा माहौल पर भी काफी फर्क पड़ेगा क्योंकि सर्वाधिक पिछड़े जिलों में करीब चार दर्जन जिले वामपंथी अतिवादी ¨हसा और आतंकवाद की समस्या से प्रभावित हैं।

खरी नहीं उतरी एसएंडपी की रेटिंग

सरकार को रास नहीं आया एजेंसी का कदम, अनुचित करार दिया1जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली1मूडीज की रेटिंग से गदगद भारत सरकार को दुनिया की एक अन्य रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) से निराशा हाथ लगी है। शुक्रवार को एसएंडपी ने भी भारत की रेटिंग जारी की। इसमें पहले की स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया गया है। एजेंसी ने अगले दो वर्षो के लिए भारत की अर्थव्यवस्था को बेहद उम्मीदों वाला बताया है, मगर फिलहाल रेटिंग के स्तर को स्थायी (बीबीबी-) पर ही बरकरार रखा है। सरकार को यह रेटिंग रास नहीं आई है। केंद्र ने इसे अनुचित करार दिया है। सरकार की नजर अब आने वाले दिनों में एक अन्य रेटिंग एजेंसी फिच की रिपोर्ट पर होगी।1एसएंडपी की रिपोर्ट में पिछली दो तिमाहियों में अर्थव्यस्था की विकास दर में आई गिरावट को बहुत तवज्जो नहीं दी है। उसने कहा है कि वर्ष 2018-2020 के दौरान भारत की विकास दर काफी मजबूत रहेगी। लेकिन सरकार के बढ़ते घाटे का स्तर, राजकोषीय घाटे की स्थिति और प्रति व्यक्ति आय का बेहद कम स्तर कुछ ऐसी वजहें हैं, जो रेटिंग बढ़ाने की गुंजाइश पर पानी फेर रही हैं। आने वाले दिनों में रेटिंग सुधारे जाने के संकेत दिए गए हैं, लेकिन यह सरकार की तरफ से राजकोषीय घाटे को कम करने और ऋण के स्तर को कम करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करेगा। इसी तरह से अगली दो तिमाहियों में आर्थिक विकास की दर में कमी होती है तो रेटिंग को घटाने की बात भी कही गई है। 1वित्त मंत्रलय के प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने कहा है कि रिपोर्ट में जिस तरह से प्रति व्यक्ति आय को कर्ज चुकाने की क्षमता के साथ जोड़ा गया है, वह कतई अनुचित है। आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव सुभाष चंद्रा ने कहा, ‘रिपोर्ट से लगता है कि एसएंडपी ने इसे काफी सतर्कता के साथ तैयार किया है। हम निराश नहीं हैं, लेकिन उम्मीद थी कि सरकार के कदमों को संज्ञान में लिया जाएगा।’ उन्होंने उम्मीद जताई कि आर्थिक सुधार के जो कदम हाल के दिनों में उठाए गए हैं, उसके निकट भविष्य के परिणामों को देखते हुए रेटिंग एजेंसी अपना विचार बदलने के लिए बाध्य होगी। केंद्र सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने की अपनी योजना पर अडिग है। 1अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एसएंडपी को सबसे कठोर रेटिंग एजेंसियों में शुमार किया जाता है। वर्ष 2007 में इसने भारत की रेटिंग में सुधार किया था। तब तक इसने भारत की रेटिंग बीबी (प्लस) दे रखी थी, जिसे घटा कर बीबीबी (माइनस-स्टैबल) किया गया था। बीच में इसने कई बार भारत की रेटिंग घटाने की धमकी दी थी। शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में भी मध्यकालिक व दीर्घकालिक अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था की तमाम खूबियों का जिक्र किया गया है, लेकिन रेटिंग स्थिर रखी गई है। इसने नोटबंदी और जीएसटी की वजह से अर्थव्यवस्था के कुछ समय के लिए प्रभावित होने की बात कही है। 1अगले तीन वर्षों के लिए भारत की औसत आर्थिक विकास दर 7.5 प्रतिशत और प्रति व्यक्ति आय में 6.5 फीसद की सालाना वृद्धि की उम्मीद जताई है। लेकिन भारत की मौजूदा 2,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय को बेहद नकारात्मक प्रभाव वाला फैक्टर करार दिया गया है। रिपोर्ट में भारत की राजनीतिक स्थिति की भी चर्चा है। इसमें भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती राजनीतिक शक्ति को आर्थिक सुधारों के लिए सकारात्मक माना गया है। चूंकि इससे राज्यसभा में पार्टी मजबूत होगी और आर्थिक सुधार से जुड़े विधेयकों को पारित करवाने में आसानी होगी। जहां तक राजकोषीय घाटे की स्थिति है, तो एसएंडपी को भरोसा है कि केंद्र सरकार अपने स्तर पर इसे संभाल लेगी, मगर असल समस्या राज्यों के स्तर पर आने वाली है। राज्यों की माली हालात बहुत मजबूत नहीं दिखाई देती।

अक्षय ऊर्जा प्रोजेक्टों का होगा ऑक्शन

Click here to enlarge imageनई दिल्ली1केंद्र सरकार अगले साल मार्च तक अक्षय ऊर्जा क्षेत्र की 21 गीगावॉट की परियोजनाओं के लिए निविदाएं आमंत्रित करेगी। इसमें तीन से चार हजार मेगावॉट की हिस्सेदारी पवन बिजली (विंड पावर) की होगी। तीसरे और चौथे दौर की निविदाओं में प्रत्येक दौर में 1.5 से 2 गीगावाॉट की बोली लगेगी।1अब तक अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में सौर और पवन बिजली परियोजनाओं के लिए निविदाओं के दो दौर हो चुके हैं। पहले दो दौर की परियोजनाओं से 2,000 मेगावॉट विंड पावर की क्षमता जुड़ेगी। बिजली एवं अक्षय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने शुक्रवार को कहा कि सरकार ने 2018-19 और 2019-20 में विंड पावर उत्पादन की क्षमता में दस-दस हजार मेगावॉट की क्षमता जोड़ने की योजना बनाई है। वर्तमान में देश में 32 हजार मेगावॉट विंड पावर का उत्पादन हो रहा है। सरकार चाहती है कि साल 2022 तक विंड पावर की उत्पादन क्षमता 60,000 मेगावॉट तक पहुंच जाए। केंद्र सरकार अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए लगातार सौर ऊर्जा पर जोर दे रही है। साल 2022 तक एक लाख मेगावॉट सोलर पावर उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार अगले दो साल 30-30 हजार मेगावॉट की परियोजनाओं के लिए निविदाएं मंगाएगी। सिंह ने दावा किया कि साल 2022 तक अक्षय ऊर्जा से 1.75 लाख मेगावॉट बिजली उत्पादन का लक्ष्य है। इसके मुकाबले भारत पांच साल में दो लाख मेगावॉट अक्षय ऊर्जा उत्पादन करने लगेगा। सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरणों आयात शुल्क लगाने के सवाल पर सिंह ने कहा कि इसके लिए इस क्षेत्र में घरेलू उद्योग के आत्मनिर्भरता के स्तर तक पहुंचने का इंतजार करना होगा।4>>कुल 21 गीगावॉट की परियोजनाओं में से पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी 3,000 से 4,000 मेगावॉट की होगी14>>साल 2022 तक विंड पावर की क्षमता होगी 60,000 मेगावॉट

 

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