Daily Current(27/11/2017) For UPSC IAS CDS CAPF UPPSC MPPSC RAS

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NEWS PAPER EDITORIAL

मकसद से भटकीं जनहित याचिकाएं

(विराग गुप्ता)

उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिकाओं यानी पीआइएल के दुरुपयोग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए एक याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। न्यायाधीश पहले भी इस पर अनेक बार पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं और इस बारे में विस्तृत नियम भी हैं, फिर भी पीआइएल का दुरुपयोग क्यों नहीं रुक पा रहा है? संविधान के अनुसार संसद को कानून बनाने, सरकार को रोजमर्रा के काम करने और अदालतों को न्याय देने का कार्य-विभाजन किया गया है। सरकार और संसद की विफलताओं की चर्चा आम है, परंतु अदालतों के सुस्त रवैये से त्रस्त करोड़ों परिवार के दर्द पर शायद ही कभी चर्चा होती हो? उ च्चतम न्यायालय ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए बनाए गए न्यायिक आयोग को रद कर दिया, लेकिन कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार और भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई न्यायिक पहल नहीं हुई। जनता को जल्द न्याय के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए अदालतों को अपना घर ठीक करने की जरूरत है। इस मोर्चे को दुरुस्त किए जाने के बजाय पीआइएल के माध्यम से अदालतों द्वारा ‘वाचडॉग’ बनने की बढ़ती प्रवृत्ति देश के लिए घातक है। फिर यह किसी विषय विशेष तक ही सीमित भी नहीं है। पर्यावरण और प्रदूषण का ही उदाहरण लें। यदि प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए अदालती सख्ती के चलते निवेशक देश में निवेश करने से ही कतराने लगें तो फिर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और मूडी द्वारा ग्रेडिंग सुधार का अर्थव्यवस्था को कैसे लाभ मिलेगा? तमाम अन्य कारणों से प्रदूषण बढ़ रहा है जिसे सरकारी समस्या मानकर अदालती आदेशों से कैसे ठीक किया जा सकता है? इसी तरह से गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अपराध जैसे देशव्यापी मर्ज पीआइएल के जादुई मंत्र से कैसे दूर हो सकते हैं? यदि पीआइएल ही प्रत्येक मर्ज की दवा है तो फिर अदालतें यह सपाट आदेश पारित कर दें कि अब सभी नेता और अधिकारी ईमानदारी से कानून के अनुसार काम करेंगे।
स्वर्गीय कपिला हिंगोरानी जो खुद वकील थीं, ने 1979 में पीआइएल के प्रभावी इस्तेमाल से जेलों में बंद चालीस हजार कैदियों को मुक्त कराया था। देश में चार लाख लोग जेलों में बंद हैं जिनमें से अधिकांश गरीब, अनपढ़ और वंचित वर्ग से ताल्लुक रखने वाले हैं जिनके पास जमानत या वकील के लिए पैसे नहीं हैं। उच्चतम न्यायालय ने जेलों में बेवजह बंद लोगों को रिहा करने के लिए अनेक आदेश पारित किए हैं जिन पर अमल के बजाय अब एक्टिविस्टों द्वारा बेवजह के मामलों से जुड़ी पीआइएल की शिगूफेबाजी पर ही ज्यादा जोर दिया जाता है। रागदरबारी के दौर से मीटिंग और टूर में व्यस्त रहते अफसरों पर जब पीआइएल का बोझ भी आ जाता है तो निरीह जनता के मामले सबसे निचले पायदान पर पहुंच जाते हैं। देश की अदालतों में तीन करोड़ लंबित मुकदमों में औसतन यदि तीन पक्षकार हों तो लगभग 10 करोड़ परिवार या एक तिहाई आबादी मुकदमेबाजी से पीड़ित हो सकती है। पीआइएल के बढ़ते चलन से अदालतों में पुराने मुकदमों का बोझ और बढ़ जाता है जिसकी सबसे ज्यादा मार ग्रामीण, गरीब और बेबस जनता पर ही पड़ती है। अदालतों में जल्द न्याय न मिलने से कुंठित गरीब लोगों के हिंसा, अपराध और नक्सलवाद की गिरफ्त में आने की आशंका बनी रहती है।
संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के तहत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में याचिका (रिट पिटिशन) के व्यक्तिगत अधिकार को जनहित याचिका में तब्दील करने का श्रेय पूर्व न्यायाधीश पीएन भगवती को दिया जाता है। पीआइएल के माध्यम से अनेक महत्वपूर्ण मामले उठाए गए, परंतु धीरे-धीरे राजनीतिक प्रचार और निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा इनका दुरुपयोग होने लगा। पीआइएल के दुरुपयोग को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2010 में विस्तृत आदेश पारित किए जिन्हें भंडारी गाइडलाइंस कहा जाता है। सात साल बाद भी तमाम उच्च न्यायालयों ने भंडारी गाइडलाइंस के अनुसार अभी तक पीआइएल संबंधी नियम ही नहीं बनाए हैं। उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया, एचएल दत्तू और अभी हाल के फैसले में न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि जो लोग खुद अपने अधिकारों की रक्षा करने में असमर्थ हों, उनके लिए पीआइएल की व्यवस्था बनाई गई थी। राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों द्वारा पीआइएल के दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति पर उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई तमाम सख्त टिप्पणियों के बावजूद नेताओं द्वारा पीआइएल का दुरुपयोग के लिए अदालतें भी बराबर जिम्मेदार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अनेक फैसलों में यह कहा है कि सरकार के रोजमर्रा के कार्यो में अदालती दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। रोजमर्रा के मामलों में बड़ी अदालतों के दखल से अब छोटी अदालतों के आदेश का नौकरशाही पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। अब तो उच्चतम न्यायालय के अनेक आदेशों का सरकारी अधिकारी गंभीर अनुपालन नहीं करते, जब तक उनके खिलाफ अवमानना की कारवाई शुरू नहीं की जाए। इस बात की पुष्टि एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से होती है जिसके अनुसार प्रशासनिक और पुलिसिया मामलों में पीआइएल के बढ़ते चलन से निचली अदालतों और नियामकों का ह्रास हो रहा है। उच्चतम न्यायालय ने एक पीआइएल में सरकार से यह जवाब मांगा है कि दिल्ली एनसीआर में 24 घंटे बिजली आपूर्ति क्यों नहीं होनी चाहिए? यह अच्छी पहल है, परंतु सवाल यह है कि पूरे देश में निर्बाध बिजली क्यों नहीं होनी चाहिए? ऐसी पीआइएल के माध्यम से याचिकाकर्ता, वकील और जज हीरो भले ही बन जाएं, पर इससे समस्याओं का समाधान या जनहित का असली मकसद कैसे पूरा हो पाएगा?
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने एक मामले में अमेरिकी न्यायविद् बेंजामिन एन काडरेजो के कथन को उद्धृत करते हुए जजों को अति न्यायिक सक्रियता के नायकत्व से बचते हुए कानून के दायरे में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की सलाह दी। छुटपुट मामलों पर अखबारी खबरों के आधार पर पीआइएल की सुनवाई से सर्वोच्च अदालत का क्षेत्रधिकार भी एनसीआर के दायरे में सिमट कर लुटियंस थाने के प्लेटफॉर्म जैसा हो रहा है। अदालती नियमों के अनुसार पीआइएल अदालत की संपत्ति होती है जिसे याचिकाकर्ता द्वारा बाद में वापस नहीं लिया जा सकता है। अदालतें यदि पीआइएल को स्वीकार कर लें तो प्रतिस्पर्धा आयोग के सक्षम अधिकारी की तर्ज पर न्यायमित्रों की नियुक्ति का प्रावधान होना चाहिए जो अदालतों के क्षेत्रधिकार के साथ मामलों को जनहित की कसौटी पर कस सकें। इस कदम से मामलों के सभी पक्षों पर पूरी जांच, एक मामले में कई पीआइएल पर रोक और याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत हितों पर भी नकेल कसी जा सकेगी। बंबई उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा कि पीआइएल के 80 फीसद मामलों में निहित स्वार्थ या ब्लैकमेलिंग होती है। सात साल पहले भंडारी गाइडलाइंस में स्वार्थपूर्ण मामलों के प्राइवेट या पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन पर सख्त जुर्माने के नियम बनाए गए थे। इसके बावजूद पब्लिक इंटरेस्ट के नाम पर पीआइएल के गोरखधंधे पर अदालतों की रोजमर्रा नोटिस क्या न्यायिक त्रसदी नहीं है? (DJ)
(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं)

दुनिया में भारत के उदय का प्रमाण

(हर्ष वी पन्त)

क्या पुरानी विश्व व्यवस्था ध्वस्त हो रही है और नई विश्व व्यवस्था आकार ले रही है? अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आइसीजे) में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर संयुक्त राष्ट्र में हुए हालिया निर्वाचन का घटनाक्रम तो यही इंगित कर रहा है। यहां मुख्य मुकाबला पुरानी विश्व शक्ति ब्रिटेन और उभर रही विश्व शक्ति भारत के बीच ही था। चुनाव में दोनों ने अंत तक मजबूती से अपने-अपने पांव जमाए रखे, लेकिन अंतत: ब्रिटेन को अपने कदम पीछे खींचने को मजबूर होना पड़ा। इस प्रकार ब्रिटेन द्वारा चुनाव से अपने प्रत्याशी क्रिस्टोफर ग्रीनवुड का नाम हटाने के बाद भारत के जस्टिस दलवीर भंडारी नौ वर्ष के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के तौर पर पुन: निर्वाचित हो गए। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का मुख्य वैधानिक निकाय है। इसकी स्थापना 1945 में हुई थी। इसमें 15 जज होते हैं। इसका काम विभिन्न देशों के बीच हुए विवादों का अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार निपटारा करना होता है।

निर्वाचन के दौरान दोनों के बीच आखिर तक मुकाबला बेहद नजदीकी बना रहा। पहले 11 दौर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दो तिहाई सदस्यों के भंडारी के पक्ष में मतदान करने के बावजूद सुरक्षा परिषद में ब्रिटेन की उम्मीद जिंदा थी। उसमें भंडारी को पांच के मुकाबले ब्रिटेन के ग्रीनवुड को बाकी सदस्यों के वोट मिलते रहे। हालांकि कानूनी प्रावधान ब्रिटेन के खिलाफ होने के बावजूद कुछ लोगों का मानना था कि ब्रिटेन अपने उम्मीदवार की जीत के लिए ‘ज्वाइंट कांफ्रेंस व्यवस्था’ का सहारा लेगा, लेकिन आखिर में उसने अपने प्रत्याशी का नाम वापस ले लिया और इस तरह से भारत के लिए आगे की राह आसान बना दी। दरअसल उसको इस बात का डर था कि बहुमत के फैसले को नजरअंदाज करना उसके खिलाफ जा सकता है। जर्मनी और फ्रांस जैसे उसके यूरोपीय सहयोगियों के अलावा अमेरिका ने भी उसे आगाह किया कि भारतीय उम्मीदवार के बढ़ते समर्थन के कारण उसका उम्मीदवार हार सकता है और उसकी छवि को भारी नुकसान पहुंच सकता है। इस प्रकार चुनाव में भंडारी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। देखा जाए तो न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में हुए निर्वाचन में भंडारी को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 में से 183 वोट मिले और सुरक्षा परिषद के भी सभी 15 वोट हासिल हुए। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भंडारी को बधाई दी और उनके पुनर्निर्वाचन को भारत के लिए गौरव का क्षण बताया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट किया-‘वंदे मातरम, भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के चुनाव को जीत लिया है। जय हिंद।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘यह विदेश मंत्रलय की पूरी टीम की कड़ी कोशिशों का नतीजा है। संयुक्त राष्ट्र में हमारे स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन इसके लिए विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं।’

चुनाव खत्म होने के बाद संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन के स्थाई प्रतिनिधि मैथ्यू रेकॉफ ने कहा, ‘चूंकि चुनाव में ब्रिटेन नहीं जीत सका, फिर भी हमें खुशी है कि हमारे नजदीकी मित्र भारत को इसमें सफलता हासिल हुई। हम भारत के साथ संयुक्त राष्ट्र में और विश्व स्तर पर सहयोग जारी रखेंगे।’ बहरहाल भारत की इस जीत के महत्व को नजरअंदाज नहीं कर सकते। ब्रिटेन द्वारा अपने कदम वापस खींचना बताता है कि संयुक्त राष्ट्र न्यायालय में 71 वर्षो में पहली बार ब्रिटेन का कोई न्यायाधीश नहीं होगा। इसके साथ ही हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के इतिहास में भी यह पहली बार है कि सुरक्षा परिषद के एक स्थाई सदस्य के उम्मीदवार की एक अस्थाई सदस्य के उम्मीदवार के हाथों हार हुई हो। ब्रेक्जिट के बाद चौतरफा उथल-पुथल के दौर में घिरे ब्रिटेन के लिए फिलहाल यह कोई बड़ा मुद्दा भले न हो, लेकिन दीर्घकाल में उस पर इसके व्यापक नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेंगे। दरअसल विश्व स्तर पर ब्रिटेन की छवि कमजोर होती जा रही है और लग नहीं रहा है कि वह इन चुनौतियों से पार पाने के लिए आने वाले कुछ दिनों के दौरान कड़े फैसले लेगा। अभी बीते हफ्ते ही यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (ईएमए) ने अपने दफ्तर को लंदन से हटाकर एम्सटर्डम और यूरोपियन बैंकिंग अथॉरिटी (ईबीए) ने पेरिस ले जाने का निर्णय किया। इसके बाद से ही वहां के वित्तीय तंत्र में बड़ी मात्र में नौकरियां खत्म होने पर बहस छिड़ी हुई है। हालांकि ब्रिटेन में बहुत से ऐसे लोग हैं जो ‘वैश्विक ब्रिटेन’ का नया दौर लाना चाहते हैं, लेकिन बाकी दुनिया अभी भी उसे संशय की नजर से देख रही है और उसे ऐसे देश के तौर पर पा रही है जो तेजी से आत्मकेंद्रित होता जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ब्रिटेन को अपने उम्मीदवार का नाम वापस लेने के लिए विवश होना पड़ा तो इसका श्रेय भारत की चुस्त और आक्रामक कूटनीति को भी जाता है। भारतीय कूटनीतिज्ञों और शीर्ष नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया में न सिर्फ गहरी रुचि ली, बल्कि अपनी कूटनीतिक सूझबूझ का कहीं बेहतर तरीके से इस्तेमाल भी किया। मेरे विचार में यह कुछ ऐसा ही था जैसे कि ब्रिटेन उस दौर में ऐसी कूटनीति करता था जब दुनिया में उसकी तूती बोलती थी। अब यह भारत का समय है। भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह चाहता है कि जहां कहीं भी जरूरत हो या संकट का समय आए उसे इसकी क्षमता के अनुसार अवसर मिले। पहले भारत में ऐसी भूख नहीं थी, लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी योग्यतानुसार संघर्ष में विश्वास करता है। अर्थात जिस क्षेत्र में वह समर्थ है उसमें वह बड़ी भूमिका निभाने का इच्छुक है। बहरहाल नई दिल्ली यह मुकाबला जीतना चाहती थी और इसके लिए उसने हर परिस्थितियों का फायदा उठाया। भारतीय कूटनीति में यह आक्रामकता एक तरह से ताजातरीन है।

हालांकि यह हमेशा काम नहीं करती है या कहें कि प्रभावी नहीं होती है। जैसे कि अपनी विदेश नीति के शीर्ष एजेंडे में रखने और तमाम कोशिशों के बावजूद भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल होने में सफल नहीं हो पा रहा है। परंतु जब यह काम करती है जैसे कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के मामले में, तो बताता है कि वास्तव में विश्व मंच पर एक नया भारत उभर रहा है। अब यह जोखिम से भागने वाला देश नहीं रहा है, बल्कि उसका खुलेआम सामना करना चाहता है। कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में हुए निर्वाचन के दौरान भी दुनिया इस बात की साक्षी रही कि विश्व शक्तियों के उत्थान और पतन से किस तरह विश्व व्यवस्था अपना स्वरूप बदलती है।(DJ)
(लेखक लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर हैं)

भारतीय सिनेमा की सशक्त पटकथा में पद्मावती प्रकरण

क्या जाने भी दो यारों (1983), सुजाता (1959), मुगल-ए-आजम (1960) या बॉम्बे (1995) जैसी फिल्म आज के भारत में बन सकती थी? आखिर भारतीय फिल्म उद्योग विरोध से निपटने में इतना बेअसर क्यों साबित होता है? पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं के बाद ऐसे सवाल खड़े होने लाजिमी हैं। वायकॉम18 स्टूडियो की नई फिल्म पद्मावती को लेकर हंगामा बरपा हुआ है। विरोधियों का कहना है कि एक ‘काल्पनिक’ रानी की कहानी उनकी भावनाओं को आहत कर सकती है। नेता भी फिल्म को देखे बगैर ही इसकी मुखालफत कर रहे हैं।

ब्राह्मïणों के एक संगठन ने राष्ट्रीय पुरस्कार-प्राप्त मराठी फिल्म दशक्रिया पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी लेकिन बंबई उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी है। ब्राह्मïणों का कहना था कि इस फिल्म में उन्हें गलत तरीके से पेश किया गया है। इसी तरह भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के ठीक पहले एस दुर्गा और न्यूड फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक का फरमान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से जारी किया गया। इस आदेश से नाराज तीन ज्यूरी सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया।
अत्यधिक रूढि़वादिता के चलते मची आपाधापी से फिल्म स्टूडियो अब परेशान हो चले हैं। फिल्म उद्योग का 14,230 करोड़ रुपये का आकार उसे टेलीविजन उद्योग की तुलना में चौथाई स्थान पर ला खड़ा करता है। फिल्म उद्योग के पास न तो गोलबंदी और न ही दूसरों पर दबाव डालने की ताकत है और उसकी छवि भी काफी ‘नरम’ रही है। हरेक फिल्म के निर्माण में 200 से लेकर करीब 400 लोगों को सीधे तौर पर रोजगार मिलता है। फिल्मों के प्रदर्शन से हजारों करोड़ रुपये का राजस्व भी मिलता है। हालांकि अर्थव्यवस्था, समाज और लोकतंत्र में फिल्मों के योगदान के बारे में कोई विधिवत अध्ययन नहीं हुआ है। किसी उभरती अर्थव्यवस्था में फिल्मों की सॉफ्ट पावर को हासिल बढ़त पर भी गौर नहीं किया गया है। इसी तरह किसी ने इसका अध्ययन नहीं किया है कि चीन में 3ईडियट्स और दंगल फिल्मों ने वहां की नौकरशाही को किस कदर परेशानी में डाला था। मोशन पिक्चर एसोसिएशन ऑफ अमेरिका या ब्रिटेन की क्रिएटिव इंडस्ट्रीज काउंसिल विदेशों में अपनी फिल्मों के असर के बारे में पर्याप्त जानकारी रखती हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय फिल्म उद्योग अचंभित होने के लिए मजबूर है। उसके पास तर्कशील बातें करने वाले चुनिंदा लोगों पर आश्रित रहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं रह जाता है।
भारतीय फिल्म उद्योग की तारीफ न सिर्फ उसकी चमक-दमक के चलते की जानी चाहिए बल्कि लचीलेपन के लिए भी अहमियत मिलनी चाहिए। सरकारी मदद या संस्थागत फंडिंग न होते हुए भी फिल्म उद्योग हॉलीवुड के वर्चस्व वाले मनोरंजन जगत में पिछले 100 वर्षों से अपनी दमदार मौजूदगी बनाए हुए है। अगर मुखर राष्ट्रवाद मौजूदा दौर की परिपाटी बना है तो भारतीय फिल्म उद्योग ने भी इसमें बेहतरीन भूमिका निभाई है। इसने भारतीय दर्शकों को भारत में बनी फिल्मों से जोड़कर रखने का काम किया है और किसी आयात कोटा, सरकारी संरक्षण या तरजीही उपाय के बगैर ऐसा हुआ है। यही वजह है कि भारत की अपनी जमीन से जुड़ी कहानियां दिखाने की आजादी को बनाए रखना जरूरी है। अगर हम भारतीय फिल्मकारों को उनके पसंदीदा विषय पर फिल्म बनाने की इजाजत नहीं देंगे तो जल्द ही हम पाकिस्तान बन जाएंगे जहां कोई फिल्म उद्योग ही नहीं बचा है। या फिर हमारी हालत चीन जैसी हो जाएगी जो हॉलीवुड की गिरफ्त में आ चुका है।
भारतीय सिनेमा ने हमेशा उन तस्वीरों को पेश करने का काम किया है जिनसे होकर देश गुजर रहा होता है। मसलन 1950 और  1960 के दशक में प्रगतिशील सोच के प्रभाव के चलते हमें कुछ शानदार फिल्में देखने को मिली थीं। यह सोचकर अचरज होता है कि उस समय उन फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति मिल गई थी। विमल रॉय की फिल्म सुजाता (1959) में एक अछूत कन्या की कहानी पेश की गई है जिसकी परवरिश एक ब्राह्मण दंपती करता है। उस समय निचली जाति की एक लड़की के ब्राह्मण युवक से शादी करते हुए दिखाने पर भी भला कोई हंगामा क्यों नहीं हुआ था? इसी तरह यश चोपड़ा की फिल्म धर्मपुत्र (1960) एक ऐसे उन्मादी युवक की कहानी है जो विभाजन के दौरान मुस्लिमों को मारने पर उतारू हो जाता है। लेकिन उसके पिता बताते हैं कि वह असल में उनका दत्तक पुत्र है और एक मुस्लिम परिवार में ही उसका जन्म हुआ था। हालांकि धर्मपुत्र की रिलीज के बाद कुछ नारेबाजी हुई थी लेकिन सुजाता की तरह यह फिल्म भी कई पुरस्कार जीतने में कामयाब रही थी। नव-स्वाधीन देश की सरकार ने भी इन फिल्मों को अपना पूरा समर्थन दिया था।
संदेश एकदम साफ था। भारत एक प्रगतिशील देश बनने की राह पर चल रहा था और जाति एवं धर्म जैसे पश्चवर्ती प्रभावों को जन्म देने वाले कारकों को दूर देने के लिए प्रतिबद्ध था। आम तौर पर सभी सरकारें इस अवधारणा का ही पालन करती रही हैं। वर्ष 2003 में आई फिल्म ‘पांच’ जरूर इसका अपवाद रही जो कभी रिलीज नहीं हो पाई। सामान्य तौर पर अच्छी, बुरी और औसत सभी तरह की फिल्में सिनेमाघरों का मुंह देखने में सफल रहीं। संजय लीला भंसाली की पिछली फिल्म बाजीराव मस्तानी (2015) की तरह पद्मावती भी निरर्थक हो सकती है लेकिन उसे रिलीज होने का अधिकार तो है ही। सेंसर बोर्ड की मंजूरी मिल जाने पर लोगों के पास इसे देखने या न देखने की आजादी होगी।
अच्छी-बुरी हर तरह की भारतीय फिल्में भाषाओं, विचारों और विश्वासों की विविधता को पेश करती हैं। नया दौर और मदर इंडिया (1957) से लेकर अनारकली ऑफ आरा (2017), पिंक (2016) या बजरंगी भाईजान (2015) तक हमने हर उस आवाज को पूरी गंभीरता से सुना है जो भारत देश के निर्माण में लगी रही है। चलिए, हम उस राह पर कायम रहें।

नेट रहे निरपेक्ष

भारत नेट निरपेक्षता पर अपनी नीति को अंतिम रूप देने से पहले अमेरिका में इसे लेकर घट रही घटनाओं पर करीबी निगाह रखे हुए है। गत सप्ताह अमेरिका के संघीय संचार आयोग (एफसीसी) ने प्रस्ताव रखा कि अमेरिका को हल्के फुल्के नियामकीय ढांचे की ओर लौटना चाहिए जिसके अधीन तकरीबन 20 वर्ष तक मुक्त और खुला इंटरनेट फलाफूला। यह प्रस्ताव रखने वाले एफसीसी के चेयरमैन अजित पई ने दलील दी कि यह एक ढांचे के रूप में आवश्यक है क्योंकि इससे उपयोगकर्ताओं और सेवाप्रदाताओं को एक दूसरे से जुडऩे के लिए भुगतान करना होगा। इससे हासिल होने वाली राशि ब्रॉडबैंड का बुनियादी ढांचा विकसित करने में मददगार होगी। आयोग आगामी 14 दिसंबर को इस विषय पर मतदान करेगा। डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के आलोचकों का कहना है कि मौजूदा नियम बदलकर एफसीसी नेट निरपेक्षता की व्यवस्था को खत्म करने का प्रयास कर रहा है। नेट निरपेक्षता के अधीन सेवा प्रदाता इस स्थिति में नहीं रहेंगे कि जानबूझकर किसी खास वेबसाइट या ऑनलाइन सामग्री को बंद करें,  धीमा करें या उसके लिए पैसे वसूल सकें।

हालांकि भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) प्राय: अपनी अनुशंसाओं में विदेशी समकक्षों की बात का पालन करता रहा है लेकिन इस विषय पर उसका विचार अलग होना चाहिए। नेट निरपेक्षता एक ऐसा मुद्दा है जिसे लेकर सरकार नीतिगत दिशानिर्देश तय करने से पहले उसकी राय का इंतजार कर रही है। शुरुआती संकेत उत्साहवर्धक हैं क्योंकि नियामक और सरकार दोनों ने कहा है कि इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को ऑनलाइन सामग्री में कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए। नियामक ने गत वर्ष नेट निरपेक्षता के पक्ष में अपना रुझान स्पष्ट कर दिया था। उसने दूरसंचार कंपनियों के अलहदा डाटा मूल्य वाले कंटेट सेवा पैकेजों के खिलाफ फैसला दिया था और देश में जीरो-रेटिंग प्लेटफॉर्म का अंत कर दिया था जिसके तहत चुनिंदा वेबसाइटों को नि:शुल्क इस्तेमाल किया जा सकता था। उसे अपने रुख पर कायम रहना चाहिए लेकिन भ्रम की स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि ऐसे संकेत दिखे कि ट्राई स्वास्थ्य और वित्त जैसी प्राथमिकता वाली और आपातकालीन सेवाओं के लिए उच्च गति वाले इंटरनेट को प्राथमिकता दे। अवधारणा के स्तर पर यह अच्छा प्रतीत होता है लेकिन सेवाओं का निर्धारण आपातकालीन के रूप में कैसे होगा और क्या इस भेदभाव के साथ नेट निरपेक्षता सही साबित होगी, यह देखना होगा।
मुक्त बाजार की दलील में कुछ दम है लेकिन ट्राई भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था की डिजिटल खाई जैसी हकीकतों की अनदेखी नहीं कर सकता। देश में नेट निरपेक्षता से जुड़ी बहस करीब दो साल पहले शुरू हुई थी जब भारती एयरटेल ने एयरटेल जीरो नामक पेशकश की थी। यह खुले बाजार का मंच था जहां उपभोक्ता कई ऐप्लिकेशन का नि:शुल्क लाभ ले सकते थे। इसका डाटा शुल्क ऐप्लिकेशन बनाने वाली कंपनी वहन करती। विरोध प्रदर्शन के चलते इसे बहुत जल्दी खत्म करना पड़ा।
यहां अहम मुद्दा यह है कि कोई भी दूरसंचार सेवा प्रदाता यह निर्धारित नहीं कर सकता कि लोग किन ऐप्स का इस्तेमाल करेंगे और किनका नहीं। इसके अलावा सेवा प्रदाता भला यह कैसे तय कर सकता है कि उपभोक्ता कौन सी वेबसाइट पर जाए और किस पर नहीं। नेट निरपेक्षता के हिमायती कहते हैं कि इंटरनेट सेवाएं उस ऑक्सीजन की तरह हैं जिसमें हम सांस लेते हैं। यह एकदम बिजली और पानी की तरह है। सेवा प्रदाता कंपनियां उपभोक्ताओं से उपयोग के आधार पर शुल्क लेती हैं, न कि खपत के उद्देश्य के आधार पर। यही नेट निरपेक्षता का आधार है और इससे समझौता नहीं किया जाना चाहिए, भले ही एफसीसी कुछ भी निर्णय ले। नेट निरपेक्षता का मूल सिद्धांत यह है कि इंटरनेट सबके लिए समान हो।

Desert storm: the chaos in Egypt

The chaos in the region makes Egypt’s counter-terror task even more challenging

The murderous attack on Friday at a Sufi mosque in the Sinai Peninsula that killed at least 305 people is a grim reminder of the threats Egypt faces from a stronger and more brutish Islamist militancy. Over the past three years, groups operating from the Sinai peninsula, particularly a local arm of the Islamic State, have carried out several terror attacks. The ease with which dozens of militants, carrying the IS’s black flags, unleashed the assault on the mosque in Bir al-Abed, surrounding it with vehicles and attacking devotees with bombs and guns, has set alarm bells ringing in Cairo. This is the bloodiest attack in modern Egypt’s history. President Abdel Fattah el-Sisi, the general who had captured power through a coup in 2013 promising stability and security, has vowed to respond with “brutal force”. General Sisi had made similar promises after terrorist strikes in the past, including when a Coptic church in the mainland was bombed by the IS on the Palm Sunday this year, killing at least 45 people. With the Bir al-Abed mosque attack, the terrorists have now raised the stakes and also called into question General Sisi’s counter-insurgency strategy.

The IS’s strategy in Egypt is similar to that in Syria and Iraq. The group is targeting Christians, who make up about 10% of the Egyptian population, and minority sects within Islam. It makes no secret of its plan to deepen the sectarian divisions in societies and then exploit these divisions to win over hardline Sunni segments. Egypt’s Sinai, a region historically neglected by Cairo and with a vast terrain of desert, mountain and long coasts, is an ideal operational base for the IS. For the same reasons, counter-insurgency in the Sinai is a challenging task even for a formidable military force. The Egyptian military has also been under strain on account of regional developments since the fall of Muammar Qadhafi’s regime in Libya in 2011 and the resulting chaos in North Africa. The black market trade in weapons from Qadhafi-era depots has strengthened militant groups, including those in the Sinai. Besides, it is suspected that following the more recent collapse of IS networks in Iraq and Syria, Egyptian Islamists who were fighting in those countries have returned home and joined local networks. This poses a daunting challenge to President Sisi. The battle before Cairo is not just a counter-insurgency mission. It has to defeat the militants and disrupt the supply of weapons, which is a huge challenge given the difficult terrain of the Sinai. But the Egyptian government also needs to take steps to address the long-term grievances of the Sinai’s population and deny militants local sympathy or support.

Memo to the World Bank

Pop the champagne and pass the mithai — for it is, indeed, the epoch of belief, the season of light in the world’s largest democracy. After languishing in the World Bank’s league tables, India is, finally, getting its due: It has been admitted to the top 100 nation club for Ease of Doing Business. Prime Minister Narendra Modi is one giant step closer to fulfilling every Indian’s dream.

It is now time to plot the next big move — to break into the top 80 nations club. With all the hard work already behind us, this next step should be a piece of cake. Here is how.

I hope someone is taking notes.

The first thing to remember about climbing up the ladder of the World Bank league tables is that it is not accomplished through some theory of globalisation or “win-win” mumbo-jumbo. You win by beating others. What India’s policymakers need to focus on next is to take down some of the countries above it on the list. Find their weaknesses and make a strong case to press for India’s competitive advantage the next time the WB’s bean counters come into town.

Let’s see, there is the Dominican Republic, Dominica, Malta, Puerto Rico, Samoa, Seychelles, St. Lucia, Tonga and Vanuatu. A review of the map instantly reveals the gross unfairness to which India has been subjected all these years. These so-called nations are all located on islands with turquoise waters lapping up against them and heavenly breezes that blow away even the slightest whiff of carbon monoxide, sulphur dioxide or particulate matter of any consequence.

I would have advocated for a detailed complaint to the World Bank. But these irrelevant island nations basking in their elevated league table status above India can have their ocean breezes as much as they want; lethal air will not stop India’s relentless march up into the rarified altitudes of the rankings.

While we are on the topic of tiny island nations, allow me to bring up a more serious instance of unfairness that India has to contend with; and this, most certainly ought to be the subject of a detailed memo. The World Bank bases its analysis on surveys focusing on the major city in a country. In India’s case, it covers Delhi and Mumbai, with 53 per cent and 47 per cent weights applied to each city respectively. You would think that Mumbai being the business capital would get a higher weight, but no — the World Bank insists on its own formula regardless of the country’s rich history of separating the bureaucracy from business.

To get a sense of what patriotic Indian officials have to endure, consider an example. Apparently, in the last round of evaluation, the survey team from the World Bank felt that the cost of getting a building permit in Mumbai was too high compared with the country’s per capita income. Thank goodness for the patriots, who also know that Mumbai is home to 46,000 millionaires and 28 billionaires. The clueless visitors from the Bank were eventually convinced to apply the per capita income of Mumbai, and not of the entire country — which would have included the hoi polloi of Chhattisgarh, Nagaland, Manipur and Arunachal Pradesh, and Bihar — as the appropriate denominator.

You can see what I am talking about in terms of the memo that must be urgently drafted before the World Bank starts the next iteration on its survey. Imagine answering pesky questions like the one above and negotiating over every tiny point for two cities. In the meantime, the cosy island club occupying the slots above India are probably places where the deal is settled over a nice pina colada and the per capita income is juiced by tourists or people looking to park money in a nice tax haven (think: Dominica, Samoa, Vanuatu).

Now let’s consider the next category of targets. I am talking about the likes of Bosnia and Herzegovina, Zambia, Malta, Kyrgyz Republic, Bhutan, El Salvador, Jamaica, Albania and Mongolia. Yes, folks, you read that right. India has to compete with Bhutan — Bhutan! — for a higher ranking and for precious foreign investment. Fortunately, many of those investors making a beeline for Bhutan would have to fly in through India, so we can just make sure that their connecting flights do not take off because of the smog. I think each of the other countries en route to the top 80 club can similarly be dealt with using a customised competitive strategy.

More generally, there are broader injustices that should be addressed in the memo to the World Bank. Have the mandarins from the Bank given any consideration to the fact that India which used to be famous for the stack of paper files that the babus would hold onto for ransom is a country where the talk today is all about the “India Stack” — layers of digitally turbo-charged services from identity to payments; the stack gets stronger from some shock therapy. Surely, Bank mandarins have noticed the hundreds of pre-fab tweets that sent the Demonetisationsuccess hashtag trending recently. This is a shame, since demonetisation was such a boost to doing business in India by taking care of the corruption and trust problem once and for all.

Speaking of trust and the digitally powered India Stack, at Tufts’ Fletcher School, we recently did a study of digital trust around the world — how users feel and the actual digital experience of users across 42 countries. To facilitate comparisons, we created two indices. One index is based on surveys that span a wide range of questions: How do users feel about the digital environment? Do they trust and find value in their transactions and interactions? Do they trust the leaders of major technology companies? Do they trust their governments to keep their data secure?

The second is an index that compares the speed and ease of use when transacting online, drawing upon data on multiple sources of friction — regulatory, infrastructural, and identity and interface-related. We use this second index as a proxy for the quality of the users’ digital experience in a country.

Using the first index, which is, in essence, a digital user attitudes measure — India ranked 13th out of 42 countries. In other words, in terms of sheer attitude, the Indian user is quite positively disposed and willing to be trusting of the system. On the second index, which reflects the quality of the actual user experience, India ranked 41st out of 42 countries. The country it beat? Pakistan.

Thank goodness, we are still better than Pakistan. On Ease of Doing Business, Pakistan came out 47 ranks below India. Another notch on the belt in that long-running friendly intra-sub-continental rivalry. These are, indeed, the best of times.

Now if someone gets that memo to the World Bank before it gets down to doing its mysterious calculations. Even better days — achhe din — are ahead.

 

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 1.विदेश के लिए रेमिटेंस में आठ गुने का इजाफा

• करीब ढाई साल में देश से बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा में बेहद तेजी आई है। इस दौरान विदेश यात्रा और पढ़ाई के नाम पर एलआरएस के माध्यम से बाहर जाने वाला यह रेमिटेंस लगभग आठ गुना बढ़ गया है।
• लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) में जून, 2015 में किए गए बदलाव के चलते यह संभव हुआ है। तब भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआइ ने एलआरएस के तहत विदेश के लिए विदेशी मुद्रा रेमिटेंस की सीमा को सीधे 10 गुना बढ़ाकर 2,50,000 डॉलर सालाना कर दिया था।
• वैसे, आरबीआइ पहले भी इस सीमा को समय-समय पर बढ़ाता रहा है। एक रिपोर्ट से यह जानकारी सामने आई है।
• केंद्रीय बैंक की ओर से इस आउटबाउंड रेमिटेंस की राशि बढ़ाए जाने से पहले यानी जून, 2015 में एलआरएस के तहत करोड़ डॉलर की राशि विदेश गई थी।
• अगर इस साल सितंबर का आंकड़ा देखें तो अब रेमिटेंस की रकम करोड़ डॉलर पर पहुंच गई है। इस तरह करीब ढाई साल में आउबाउंड फॉरेक्स रेमिटेंस आठ गुना बढ़ गया है। सीमापार डिजिटल भुगतानों से जुड़ी सिंगापुर की फर्म इंस्टारेम ने यह रिपोर्ट तैयार की है।
• इस रिपोर्ट के मुताबिक नई एलआरएस लागू होने के बाद वर्ष 2016 में भारत से विदेश के लिए कुल रेमिटेंस की राशि 460 करोड़ डॉलर रही। साल 2015 में बाहर के लिए फॉरेक्स रेमिटेंस की राशि 160 करोड़ डॉलर थी। इस लिहाज से एलआरएस के जरिये विदेश जाने वाली विदेशी मुद्रा राशि में 250 फीसद से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
• देश से बाहर जाने वाली रकम में आई इस तेजी में सबसे ज्यादा योगदान विदेश यात्रओं का रहा। इस मद की कुल फॉरेक्स रेमिटेंस में 31.43 फीसद हिस्सेदारी है। वल्र्ड ट्रैवेल एंड टूरिज्म काउंसिल की मानें तो भारत से विदेश यात्राओं पर निकलने वालों का कुल खर्च वर्ष 2024 तक बढ़कर 1,60,000 करोड़ रुपये हो जाएगा। विदेश यात्र के बाद विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों के खर्चो के लिए भेजी गई राशि का हिस्सा 26.55 फीसद रहा। इस रेमिटेंस में विदेश में पढ़ाई के मद की हिस्सेदारी 18.8 फीसद रही।
• बच्चों को विदेश पढ़ने भेजने वाले अभिभावकों ने एलआरएस का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। वे इसका उपयोग अपने बच्चे की फीस और रहने-खान के खर्च का भुगतान करने के लिए करते हैं। आउटबाउंड रेमिटेंस का तेजी से बढ़ता एक क्षेत्र विदेश में प्रॉपर्टी की खरीदारी का भी है।
• चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों (अप्रैल-अगस्त) के दौरान भारतीयों ने विदेश में 2.35 करोड़ डॉलर की संपत्ति खरीदी है। निवेशकों इस स्कीम का इस्तेमाल लंदन, न्यूयॉर्क और दुबई में प्रॉपर्टी खरीदने के एक मौके के तौर पर कर रहे हैं।
• डॉलर के मुकाबले रुपये में आई मजबूती ने भी विदेश में मकान समेत अन्य संपत्तियां खरीदना आसान बनाया है।

2. नेपाल में ऐतिहासिक चुनाव के लिए हुआ मतदान
• नेपाल में संसदीय और सात प्रांतीय विधानसभाओं के ऐतिहासिक चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान रविवार को संपन्न हुआ।
• दो चरणों में होने वाले चुनाव के अंतिम चरण के लिए सात दिसंबर को वोट डाले जाएंगे। नेपाल में सितंबर 2015 में लागू हुए नए संविधान के तहत पहली बार संसदीय और विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं। लोगों को इन चुनावों के बाद नेपाल में राजनीतिक स्थिरता आने की उम्मीद है।
• इन चुनावों को नेपाल के संघीय लोकतंत्र में बदलने के अंतिम कदम के रूप में देखा जा रहा है। पहले चरण में उत्तरी नेपाल के पहाड़ी इलाकों के 32 जिलों में कड़ी सुरक्षा के बीच वोट डाले गए।
• मतदाताओं ने 37 संसदीय और 74 प्रांतीय विधानसभा सीटों के लिए 702 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला किया। मतदान स्थानीय समयानुसार सुबह सात बजे शुरू हुआ और शाम पांच बजे खत्म हुआ।
• नेपाल में कुल 1.54 करोड़ मतदाता हैं जिनमें पहले चरण के 31.9 लाख मतदाता हैं। शेष मतदाता दूसरे चरण में सात दिसंबर को अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
• इस चरण में काठमांडू घाटी और तराई के नाम से जाने जाने वाले दक्षिण के मैदानी इलाकों समेत नेपाल के 45 जिले शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि देश के चुनाव भारत के साथ रिश्ते भी तय करेंगे।

3. मर्केल का जर्मनी में फिर चुनाव कराने से इन्कार
• जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने नया चुनाव कराने से इन्कार किया है। उन्होंने कहा कि वह जल्द ही नई सरकार का गठन करना चाहती हैं। 1न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, मर्केल ने कहा कि वह नहीं चाहतीं कि चुनाव नतीजे को लेकर अगर हम कुछ नहीं कर सके तो लोगों से फिर मतदान के लिए कहा जाए।
• उन्होंने कहा कि जर्मनी में एक स्थिर सरकार होनी चाहिए। वह शनिवार को अपनी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन के सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं।
• 12 साल से सत्ता संभालने वाली मर्केल को सबसे गंभीर राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि 24 सितंबर को हुए संघीय चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला।
• 19 नवंबर को सरकार गठन को लेकर फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी और ग्रीन्स के साथ उनकी बातचीत विफल हो गई थी। जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रैंक-वाल्टर स्टीनमियर ने मर्केल, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता मार्टिन शुल्ज और बेवेरियन क्रिश्चियन सोशल यूनियन के नेता हॉस्र्ट सीहोफर को महागठबंधन बनाने को लेकर चर्चा के लिए अगले सप्ताह बुलाया है।
• उल्लेखनीय है कि देश में हाल ही में हुए चुनाव से पहले विभिन्न सर्वेक्षणों में उन्हें दुनिया की शक्तिशाली महिलाओं में शुमार किया जाता रहा है। तमाम पत्रिकाओं ने अपनी सालाना सूची में मर्केल को दुनिया की बेहद शक्तिशाली महिला होने का खिताब दिया।
• अपनी नीतियों को लेकर उन्हें देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम नेता बड़ी इज्जत देते हैं। भारत के साथ भी उनके बेहतर संबंध रहे हैं।

4. पाक के पास परमाणु अस्त्र होना क्षेत्र के लिए खतरनाक
• पाकिस्तान के परमाणु हथियार न सिर्फ क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खतरनाक हैं बल्कि इससे युद्ध के निश्चित तौर पर नाभिकीय युद्ध के स्तर तक पहुंचने का खतरा है। यह बात अमेरिका के एक थिंकटैंक की रिपोर्ट में कही गई है।
• अटलांटिक काउंसिल ने अपनी रिपोर्ट एशिया इन सेकेंड न्यूक्लियर एज में कहा है कि ऐसा मालूम पड़ता है कि पाकिस्तान ने अभी तक अपनी रणनीतिक परमाणु हथियार योजना का संचालन शुरू नहीं किया है।
• इस महीने जारी रिपोर्ट में कहा गया है, पाकिस्तान का रणनीतिक परमाणु हथियार कार्यक्र म रक्षा और सुरक्षा के कारणों से खतरनाक है और इसलिए भी खतरनाक है कि वह पारंपरिक युद्ध को नाभिकीय युद्ध के स्तर तक निश्चित तौर पर ले जाएंगे।
• बहरहाल ऐसा मालूम नहीं होता है कि पाकिस्तान ने अभी तक अपनी रणनीतिक परमाणु हथियार योजना का संचालन शुरू किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षेत्र में सबसे बड़ा खतरा बड़े, अत्याधुनिक और विविध परमाणु हथियारों से नहीं है बल्कि यह खतरा उन लोगों से है जो उनकी सुरक्षा में संलग्न हैं।
• इसमें कहा गया है, इस संबंध में, भविष्य में पाकिस्तान की स्थिरता का कयास लगाना आसान नहीं है। पिछले चार दशकों में चरमपंथी जिहादी राज्येतर तत्वों के माध्यम से अफगानिस्तान और भारत में अशांति फैलाने के पाकिस्तान के प्रयासों से उसे खुद ही तगड़ा झटका लगा है।
• रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की सरकार और नागरिक समाज दोनों आतंकवादी हमले का निशाना बने हैं और कुछ हमले अंदर के लोगों के सहयोग से संवेदनशील सैन्य ठिकानों पर भी हुए हैं जहां परमाणु हथियारों के रखे जाने की आशंका है।
• रिपोर्ट में कहा गया है, पाकिस्तान के नाभिकीय हथियारों के चुराए जाने की आशंका या पाकिस्तान की सेना में फूट से नाभिकीय कमान एवं नियंतण्रके विफल होने का खतरा उतना काल्पनिक नहीं है जितना पहले माना जाता था।

5. राष्ट्रीय विधि दिवस पर बोले मोदी : न्यू इंडिया के संकल्प पर जोर
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कहा कि 21वीं सदी में ‘‘ न्यू इंडिया’ बनाने के लिए हम सभी को संकल्प लेना होगा। हम गरीबी, गंदगी, बीमारी और भूख मुक्त देश बनाना चाहते हैं। इसके लिए हम सबको संकल्प लेना होगा। देश एक बड़े मिशन पर चल रहा है, इस मिशन के लिए हर वर्ग से समर्थन मिलेगा। मोदी ने कहा, सोच भी आत्मविास से भरी होनी चाहिए। हम रहें, न रहें लेकिन देश तो रहने वाला है।
• मोदी ने कहा, हम रहें, न रहें लेकिन जो व्यवस्था हम देश को देकर जाएंगे वह सुरक्षित, स्वाभिमानी और स्वावलंबी भारत की व्यवस्था होनी चाहिए।
• राष्ट्रीय विधि दिवस पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 68 वर्षों में हमारे संविधान ने हर परीक्षा को पार किया और हर आशंका को गलत साबित किया है लेकिन स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी आंतरिक कमजोरी दूर नहीं हुई है। ऐसे में अब बदले हुए हालात में कैसे आगे बढ़ा जाए, इस बारे में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों ही स्तर पर मंथन किए जाने की जरूरत है।
• देश में आत्मविास का माहौल : मोदी ने साथ ही कहा कि यह समय तो भारत के लिए स्वर्ण काल की तरह है। देश मेंआत्मविश्वास का ऐसा माहौल बरसों के बाद बना है। निश्चित तौर पर इसके पीछे सवा सौ करोड़ भारतीयों की इच्छाशक्ति काम कर रही है। इसी सकारात्मक माहौल को आधार बनाकर हमें ’ न्यू इंडिया’ के रास्ते पर आगे बढ़ते चलना है।
• संविधान को अभिभावक बताया : प्रधानमंत्री ने कहा कि पांच साल बाद हम सब स्वतंत्रता के 75 वर्ष का पर्व मनाएंगे। हमें एकजुट होकर उस भारत का सपना पूरा करना है, जिस का सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। 68 वर्षो में संविधान ने एक अभिभावक की तरह हमें सही रास्ते पर चलना सिखाया है।
• संविधान ने देश को लोकतंत्र के रास्ते पर बनाए रखा, उसे भटकने से रोका है। इसी अभिभावक के परिवार के सदस्य के तौर पर हम उपस्थित हैं। सरकार, न्यायपालिका, नौकरशाही हम सभी इस परिवार के सदस्य ही तो हैं।
• कोर्ट परिसरों में लगें न्याय घड़ियां : मोदी ने देश की बेहतरीन अदालतों की रैंकिंग के लिए विभिन्न अदालत परिसरों में न्याय घड़ियां लगाने का सुझाव दिया ताकि जजों के बीच मामलों के निपटारे की प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिले।

6. कम प्रति व्यक्ति आय आर्थिक वृद्धि में बाधक

• वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंर्डड एंड पुअर्स (एसएंडपी) के अनुसार कम प्रति व्यक्ति आय भारत की आर्थिक वृद्धि की राह में बड़ा रोड़ा बन गया है और उसने इसे देश की रेटिंग नहीं बढ़ाए जाने की मुख्य वजह बताया है।
• रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने सप्ताह भर पहले ही भारत की रेटिंग बढ़ा दी थी लेकिन एसएंडपी ने इस रेटिंग को सबसे निचली निवेश श्रेणी ‘‘बीबीबी-’ पर ही स्थिर रखा है।
• उसने बड़े राजकोषीय घाटा, सरकार पर भारी कर्ज और कम प्रति व्यक्ति आय को इसकी वजह बताया है। एसएंडपी ने एक बयान में कहा, भारत की रेटिंग निम्न संपत्ति स्तर की वजह से रुकी हुई है जिसकी गणना प्रति व्यक्ति आय के आधार पर की जाती है।
• हमारे आकलन के हिसाब से यह 2017 में दो हजार डालर के आस-पास रहा जो हमारे द्वारा रेटिंग किए जाने वाले निवेश योग्य देशों में सबसे कम है। प्रति व्यक्ति आय किसी भी शहर, राज्य या देश में किसी विशिष्ट वर्ष के दौरान वहां के लोगों की औसत कमाई है।
• इसका इस्तेमाल संबंधित क्षेत्र के निवासियों की जिंदगी की गुणवत्ता तथा रहन-सहन के स्तर का पता लगाने में होता है। हालांकि एसएंडपी ने मध्यम अवधि के लिए देश की वृद्धि की संभावनाओं के प्रति सकारात्मकता व्यक्त की है।
• उसने माल एवं सेवा कर (जीएसटी), बैंकों का पुनर्पूंजीकरण, दिवाला शोधन संहिता जैसे भारत सरकार के हालिया सुधारों का स्वागत किया।
• उसने देश की प्रति व्यक्ति आय पर चिंता जाहिर की। एसएंडपी के अनुसार, भारत की प्रति व्यक्ति आय 1948.69 डालर है। चीन की प्रति व्यक्ति आय 8876.84 डालर, रूस की प्रति व्यक्ति आय 10478.74 डालर, ब्राजील की प्रति व्यक्ति आय 9867.03 डालर और दक्षिण अफ्रीका की प्रति व्यक्ति आय 6129.64 डालर है।
• जाने माने बैंकर उदय कोटक ने भी देश की प्रति व्यक्ति आय के कम स्तर को सुधारने पर जोर दिया। उन्होंने हाल ही में ट्वीट कर कहा, समय आ गया है कि भारत गति पकड़े। हमें 20 साल तक प्रति व्यक्ति आय में आठ से नौ प्रतिशत की दर से वृद्धि की जरूरत है।

7. यूरिया उत्पादन तीन लाख टन घटने का अनुमान

• कुछ कारखानों में मरम्मता का काम चलने के बीच देश का यूरिया उत्पादन मौजूदा वित्त वर्ष में 3,00,000 टन घटकर 2.41 करोड़ टन रहने का अनुमान है। उर्वरक मंत्रालय में एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी।
• उन्होंने कहा, कुल यूरिया उत्पादन कम रहेगा क्योंकि कुछ कारखाने बंद हैं और उर्जा बचत के लिहाज से उनका जीर्णोद्धार किया जा रहा है और वे कुछ समय से बंद है। इसी कारण उत्पादन तीन लाख टन कम रहेगा। वित्त वर्ष 2016-17 में देश में यूरिया का उत्पादन 2.44 करोड़ टन रहा था।
• अधिकारी ने कहा कि यूरिया उत्पादन में उक्त कमी अस्थायी रहेगी। देश में यूरिया का उत्पादन बीते दो साल से लगातार बढ़ा है लेकिन यह लगभग 3.2 करोड़ टन की सालाना मांग से अब भी कम है।
• कुछ मांग को अब भी आयात से पूरा किया जाता है।यूरिया कारखानों की क्षमता का पूरी तरह उपयोग हो रहा है तथा रुग्ण इकाइयों का पुनरोद्धार जारी है।
• अधिकारी ने कहा कि सरकार यूरिया की खपत घटाने की कोशिश कर रही है क्योंकि देश में इसकी कीमत अन्य मृदा पोषकों की तुलना में कम है।

8. कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण प्रणाली से कम होगा प्लास्टिक का खतरा

• वैज्ञानिकों ने एक ऐसा उपकरण विकसित किया है, जो प्रकाश संश्लेषण की तरह ही क्रि या कर सकता है और इथिलीन गैस के उत्पादन के लिए सूर्य की रोशनी, पानी और कार्बन डाई ऑक्साइड का उपयोग करता है।
• पॉलीइथिलीन बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली इथिलीन गैस का उपयोग प्लास्टिक, रबर एवं फाइबर बनाने में किया जाता है। नई पण्राली से प्लास्टिक का खतरा भी कम किया जा सकता है।
• नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के शोधार्थियों द्वारा की गई इस खोज से इथिलीन उत्पादन की वर्तमान विधि का पर्यावरण के अनुकूल एवं टिकाऊ विकल्प मिलने की उम्मीद जगी है।
• वर्ष 2015 में दुनिया भर में 17 करोड़ टन से अधिक इथिलीन का उत्पादन किया गया। वर्ष 2020 तक इसकी नियंतण्र मांग बढ़कर 22 करोड़ टन होने का अनुमान है।
• नई विधि से कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्पादन भी कम होता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान की आशंका कम हो जाती है।

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