Daily Current(28/11/2017) For UPSC IAS CDS CAPF UPPSC MPPSC RAS

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NEWS PAPER EDITORIAL

 विश्व व्यापार संगठन और कृषि पर मंडराता खतरा(केसी त्यागी, वरिष्ठ जद-यू नेता )

चंद रोज बाद अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में आयोजित विश्व व्यापार संगठन की 11वीं मंत्रीस्तरीय बैठक भारत के लिए कई मायने में अहम है। एक तरफ जहां देश अपने किसानों की आत्महत्याओं, एमएसपी बढ़ाने और कर्ज-माफी जैसे मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन व असंतोष का दंश झेल रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसे कई तरह के वैश्विक दबावों का सामना भी करना पड़ रहा है। यह सम्मेलन उस समय हो रहा है, जब देश भर के किसान फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग के साथ नई दिल्ली के संसद मार्ग पर आंदोलनरत हैं। इस स्थिति में केंद्र सरकार के साथ धर्मसंकट है कि वह देश के किसानों और विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित करे? एक तरफ अपने किसानों की रक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मंच को संतुष्ट करने की प्रतिबद्धता भी है। विश्व व्यापार संगठन की आगामी बैठक भारत और विकासशील व अल्प विकसित राष्ट्रों के लिए चुनौतीपूर्ण इसलिए है, क्योंकि इससे स्थानीय जनसंख्या के सबसे बड़े तबके के सरोकार जुड़े हुए हैं और उन पर अंतरराष्ट्रीय फैसला थोपे जाने का खतरा भी मंडरा रहा है। वर्ष 2001 के दोहा डेवलपमेंट एजेंडा के तहत वर्ष 2013 तक निर्यात पर दी जाने वाली सब्सिडी यानी ‘एक्सपोर्ट सब्सिडी’ और अन्य सहयोग समाप्त करने जैसे विषय पर सहमति थोपी गई थी, लेकिन भारत ने कृषि को यहां का जीवन माध्यम बताकर अपना मजबूत पक्ष रखते हुए विकासशील देशों द्वारा कृषि के अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वाणिज्य व्यवस्था को विकृत करने की अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लिया था।

एक बड़ा सच यह है कि विश्व व्यापार संगठन में विकसित देशों का नीतिगत वर्चस्व है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी बड़ी भागीदारी होने के कारण वे तीसरी दुनिया के मुल्कों पर अपना उत्पाद थोपने हेतु बाजार की तलाश में हैं। उनका प्रचार रहा है कि विश्व व्यापार संगठन व क्षेत्रीय व्यापार समझौतों के बाद खुली आयात की स्वतंत्रता होगी, जिससे खान-पान की वस्तुओं की कीमतों में कमी आएगी। यूरोपीय देशों की इस मंशा के पीछे भारतीय व अविकसित राष्ट्रों के बाजारों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास है। पिछले 22 वर्षों के इतिहास में विश्व व्यापार संगठन के कृषि संबंधी समझौतों ‘एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर’ का विकसित देशों द्वारा सिर्फ अपने हित में इस्तेमाल किया गया है। हैरानी है कि अमेरिका व अन्य औद्योगिक राष्ट्र आर्थिक संपन्नता के बावजूद अपने किसानों को भारी कृषि सब्सिडी देते हैं, जबकि इसके इतर भारत जैसे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए किसान विरोधी कानून बनाने का दबाव डालते आ रहे हैं। आंकड़े दर्शाते हैं कि विकसित देशों द्वारा किसानों को दी जाने वाली कृषि सब्सिडी में इजाफा होता रहा है। इस दिशा में भारत-चीन ने संयुक्त प्रस्ताव रखा है कि यूरोपीय संघ व अमेरिका जैसे राष्ट्र पहले अपने यहां से 160 बिलियन डॉलर की सब्सिडी देना बंद करें, जबकि इस बीच भारत में उर्वरक, सिंचाई और बिजली पर सब्सिडी जारी है।

भारत पहले से ही साधन-संपन्नता की श्रेणी में पीछे है। यहां 95 फीसदी से ज्यादा भू-स्वामी या तो गरीब हैं या फिर साधनविहिन। कुल कृषि भूमि की आधे से ज्यादा भूमि गैर सिंचित है। पिछले 21 वर्षों में 3,18,528 किसानों ने आत्महत्या की है। प्रति वर्ष औसतन 15,168 किसान आत्महत्या को मजबूर होते हैं। ज्यादातर मामलों में आत्महत्या का कारण बैंकों से मिला कर्ज है। वर्तमान एमएसपी किसानों को घाटे की ओर ले जा रही है, जिसे बढ़ाने के लिए किसान निरंतर संघर्षरत हैं। कई राज्यों में धान में नमी की मात्रा बताकर एमएसपी से भी कम कीमत दिए जाने की शिकायतें हैं। गन्ना उत्पादकों के साथ भी ऐसी ही समस्या है। मौसमी फल, सब्जी समेत कई उत्पादों पर एमएसपी का प्रावधान नहीं है। इस स्थिति में उत्पादन के समय कीमतें शून्य और बाद में गगनचुंबी हो जाती हैं। उपज कौड़ी के भाव बिकती है, जिसका सीधा नुकसान किसान को होता है। बाद में वही टमाटर 100 रुपये प्रति किलो के भाव बिकता है। जरूरत है कि भारत खाद्य सुरक्षा और किसानी के मुद्दों पर पिछले अवसरों की तरह न सिर्फ अडिग रहे, बल्कि बढ़ती महंगाई के समवर्ती सुधार के नए प्रस्ताव भी रखे। (हिंदुस्तान )
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

बढ़ता चीन और बदलते दलाई लामा

(शशांक, पूर्व विदेश सचिव )

तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा का हालिया बयान कई तरह से महत्वपूर्ण है। उन्होंने पिछले हफ्ते गुरुवार को एक कार्यक्रम में कहा था कि हम स्वतंत्रता नहीं मांग रहे हैं, चीन के साथ रहना चाहते हैं, हम और विकास चाहते हैं। सवाल यह है कि जो नेता पहले तिब्बत की स्वतंत्रता की बात किया करता था, उसने बाद में स्वायत्तता और अब विकास का गीत गाना क्यों शुरू कर दिया? मौजूदा परिदृश्य इस सवाल का जवाब दे रहा है। असल में, बीते अक्तूबर में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना ने जब 19वीं पार्टी कांग्रेस का आयोजन किया था, तो उसमें ऐसी नीतियों पर आगे बढ़ने को लेकर सहमति बनी, जो 2050 तक चीन को सैन्य व आर्थिक मामलों में दुनिया का सिरमौर बना सकें। इस योजना की सफलता तभी संभव है, जब देश के तमाम पिछडे़ इलाकों में आर्थिक विकास के कामों में तेजी लाई जाए। जाहिर है, तिब्बत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। इस कयास को इसलिए भी बल मिल रहा है, क्योंकि तमाम विरोधाभासों के बावजूद चीन में बौद्ध विचारधारा को बढ़ावा दिए जाने की खबरें भी आ रही हैं। ‘वल्र्ड बुद्धिज्म कांग्रेस’ में चीन भाग लेने तो लगा ही है, खुद अपने यहां इसे आयोजित करने के प्रयास भी कर रहा है। नतीजतन, तिब्बत से आए शरणार्थी और उनके नेता यह उम्मीद पालने लगे हैं कि तिब्बत में अब आर्थिक समृद्धि लौटने वाली है। ऐसे में, अगर उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता मिल जाती है, तो वे वापस लौट सकते हैं। दलाई लामा का बदला रुख इसी का संकेत है।

दलाई लामा के साथ चीन की सरकार की सीधी बातचीत अब तक परवान नहीं चढ़ सकी है। चीन अब भी इन्हें तिब्बती अलगाववादी नेता मानता है, पर उसे यह भी डर है कि यदि दलाई लामा का फिर से कायांतरण हो गया, तब क्या होगा? यह सवाल चीन को असहज कर रहा है। दलाई लामा का गुरुवार का बयान बताता है कि उन्होंने अपनी तरफ से एक नरम रुख का संकेत भेज दिया है। अगर चीन बातचीत को लेकर गंभीर होता है, तो इस तनाव के सुलझने की उम्मीद बंध सकती है। माना यह जा रहा है कि भारत में 1.5 लाख तिब्बती शरणार्थी मौजूद हैं। संख्या के हिसाब से देखें, तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद इतनी बड़ी संख्या में किसी अन्य देश के शरणार्थी भारत नहीं पहुंचे हैं। शरणार्थियों को पनाह देने के मामले में पश्चिम के मुकाबले पूर्वी देशों का रुख अपेक्षाकृत नरम रहा है। संभवत: इसलिए दलाई लामा ने पहले स्वायत्तता की बात कही थी। मगर बदलते वक्त में इस पर संशय मंडराने लगा है कि स्वायत्तता पर सहमति बन सकेगी। इसलिए हालात की गंभीरता को दलाई लामा पढ़ने लगे हैं। दलाई लामा के रुख में आए इस बदलाव की एक बड़ी वजह उनकी कमजोर पड़ती सेहत और तिब्बतियों में उभर रही हिंसक प्रवृत्ति भी है। भारत में शरण पाए तिब्बतियों में इसलिए यह प्रवृत्ति नहीं दिखती, क्योंकि वे दलाई लामा का अनुसरण करते हैं और अहिंसा की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। मगर तिब्बत में ऐसा नहीं है। दलाई लामा की मुश्किल यह है कि अगर उन्हें कुछ होता है, तो पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे देशों की सीमा से लगते शिनजियांग का हिंसक माहौल तिब्बत को अपनी गिरफ्त में ले सकता है? यह तिब्बतियों के हित में नहीं होगा। हालांकि यह डर चीन को भी है। अगर उसके इन दोनों हिस्सों में तनाव फैलता है, तो चीन का करीब 40 फीसदी क्षेत्रफल तनावग्रस्त हो जाएगा। इसीलिए वह भी सुलह का रास्ता ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा है।

कहा जा रहा है कि तिब्बत पर दलाई लामा के नए रुख का असर अरुणाचल प्रदेश में भारत के दावे पर पड़ेगा। चीन यहां कड़ा रुख दिखा सकता है। मगर मैं इन तर्कों से इत्तफाक नहीं रखता। भारत ने हमेशा सुलह-समझौतों का स्वागत किया है। रही बात अरुणाचल प्रदेश की, तो यहां के बौद्ध विहार तिब्बत के बौद्ध विहारों के करीब हैं और खासतौर से तवांग का मठ तिब्बत के बौद्धों के लिए दूसरा सबसे बड़ा पवित्र स्थल है। मगर दलाई लामा ने खुद इसकी घोषणा की है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है और तवांग भारतीय बौद्ध विहार है। फिर डोका-ला विवाद का जिस तरह से हल निकला है, वह भी यही संकेत देता है कि चीन अब शायद ही कोई ऐसी हरकत करे। दोनों देशों ने मान लिया है कि अगर उन्हें आगे बढ़ना है, तो मिल-जुलकर रहना होगा। किसी तनाव को न्योता देना उनके हित में नहीं है। मगर हां, इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत अपनी ताकत न बढ़ाए। अगर अगले 30-35 वर्षों में चीन खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क बनाने की ओर बढ़ चला है, तो हमें भी यह सोचना ही चाहिए कि हम तब कहां होंगे? हमने जिस तरह से सीमावर्ती इलाकों में इन्फ्रास्ट्रक्चर के कामों पर जोर दिया है, उसे आगे लगातार बढ़ाते रहने की दरकार होगी।

दलाई लामा का नया रुख यह जरूर बताता है कि वह अब तिब्बत मसले का हरसंभव हल निकालने को तत्पर हैं, पर यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी कि वह वापस तिब्बत जाने में सफल हो पाएंगे। हालांकि उनका वापस लौटना भारत के लिए अच्छा ही होगा, और सुलह-समझौतों के बाद उन्हें वापस लौट जाना भी चाहिए। भारत के नरम रुख का यह अर्थ नहीं कि तमाम शरणार्थियों को यह जगह दे। अभी जिस तरह रोहिंग्या शरणार्थियों को पनाह देने का मसला उभरा था, वह भी यही बताता है कि शरणार्थियों की समस्या को भारत को जल्द सुलझाना होगा। देश के कुछ हिस्सों में अगर शरणार्थियों की वजह से मनमुटाव बढ़ता है या किसी तरह का तनाव पसरता है, तो यह हमारे हित में नहीं है।(हिंदुस्तान )
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

नए क्षितिज पर भारतीय कूटनीति

(अवधेश कुमार)

भारत के न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी का अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी आइसीजे में न्यायाधीश के तौर पर दोबारा चुना जाना कोई सामान्य घटना नहीं है। भारत के लोगों की नजर इस चुनाव पर इसलिए भी टिकी थी कि उन्हें लगता था कि अगर हमारे देश का कोई न्यायाधीश होगा तो कुलभूषण जाधव के मामले में सहायता मिल सकती है। इस नाते हर भारतीय दलवीर भंडारी को उनकी जगह पर दोबारा देखना चाहता था। जिस तरह से ब्रिटेन अपने उम्मीदवार क्रिस्टोफर ग्रीनवुड के पक्ष में हरसंभव कूटनीतिक दांव चल रहा था और सुरक्षा परिषद के शेष चार स्थाई सदस्य उसके साथ थे उसमें यह असंभव लग रहा था। इस नाते देखा जाए तो यह भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है। यह भारत की सघन कूटनीतिक सक्रियता का ही परिणाम था कि ब्रिटेन को आखिरी क्षणों में अपने उम्मीदवार को चुनाव से हटाने को विवश होना पड़ा। हालांकि ब्रिटेन ने बयान में कहा है कि भारत उसका मित्र देश है, इसलिए उसके उम्मीदवार के दोबारा न्यायाधीश बनने पर उसे खुशी है, पर उसने अंत-अंत तक अपने उम्मीदवार को विजीत कराने के लिए सारे दांव आजमाए। जब उसे यह अहसास हो गया कि भारत के पक्ष को कमजोर करना उसके वश में नहीं तो उसके पास पीछे हटने के अलावा कोई चारा नहीं था। ऐसा नहीं होता तो संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे पर अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो जाती। महासभा बनाम सुरक्षा परिषद का यह टकराव भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता था। इसलिए सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों ने भी संभव है ब्रिटेन को अंत में यह सुझाव दिया होगा कि वह अपने उम्मीदवार को हटा ले ताकि टकराव की स्थिति समाप्त हो जाए।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने 1946 में कार्य करना आरंभ किया था तब से आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ जब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उसका कोई न्यायाधीश न रहा हो। इस तरह 1946 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ब्रिटेन की सीट नहीं होगी। यही नहीं यह भी पहली बार है जब सुरक्षा परिषद के किसी एक स्थाई सदस्य का कोई न्यायाधीश वहां नहीं होगा। इससे इस घटना का महत्व समझा जा सकता है। भारत ने अपने उम्मीदवार के पक्ष में जोरदार प्रचार आरंभ किया था। इसी का परिणाम था कि पहले 11 दौर के चुनाव में भंडारी को महासभा के करीब दो तिहाई सदस्यों का समर्थन मिला था, लेकिन सुरक्षा परिषद में वह ग्रीनवुड के मुकाबले 4 मतों से पीछे थे। अंतिम परिणाम में संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में हुए चुनाव में भंडारी को महासभा में 193 में से 183 वोट मिले, जबकि सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्यों का मत मिला। ऐसा यूं ही नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन के स्थाई प्रतिनिधि प्रतिनिधि मैथ्यू रेकॉफ ने 12वें चरण के मतदान से पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद दोनों सदनों के अध्यक्षों को संबोधित करते हुए एकसमान पत्र लिखा। दोनों के अध्यक्षों के सामने पढ़े गए पत्र में रेकॉफ ने कहा कि उनके प्रत्याशी न्यायाधीश क्रिस्टोफर ग्रीनवुड ने अपना नाम वापस लेने का फैसला किया है। आखिर जो व्यक्ति अंत-अंत तक उम्मीदवारी में डटा था उसने अचानक यह फैसला क्यों किया? इसलिए कि महासभा में वह भारत के समर्थन को कम करने में कामयाब नहीं हुआ और भारत किसी तरह दलवीर भंडारी का नाम वापस लेने को तैयार नहीं था। रेकॉफ की ओर से लिखी गई चिट्ठी में कहा गया था कि ब्रिटेन इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि अगले दौर के चुनाव के साथ सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र महासभा का कीमती समय बर्बाद करना सही नहीं है। यानी उसे आभास हो गया था कि भारत की कूटनीति के सामने वह कमजोर पड़ गया है।

नीदरलैंड के हेग स्थित संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं। हर तीन साल बाद आइसीजे में पांच न्यायाधीशों का 9 वर्ष के कार्यकाल के लिए चुनाव होता है। आरंभ के चार चक्रों के मतदान के बाद फ्रांस के रूनी अब्राहम, सोमालिया के अब्दुलकावी अहमद युसूफ, ब्राजील के एंटोनियो अगुस्टो कैंकाडो, लेबनान के नवाफ सलाम का आसानी से चुनाव हो गया। इन चारों को संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में आसानी से बहुमत मिल गया था। इसके बाद आखिरी बची सीट पर भारत और ब्रिटेन के बीच कड़ा मुकाबला था।

यह चुनाव कितना बड़ा मुद्दा बन गया था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी मीडिया में भारत को महासभा में मिल रहे समर्थन को न केवल ब्रिटेन, बल्कि सुरक्षा परिषद में शामिल विश्व की महाशक्तियों के लिए खतरे की घंटी तक कह दिया गया। कहा गया कि इससे कोई ऐसी परिपाटी विकसित न हो जाए जो भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो। वास्तव में भारत जिस तरह से ब्रिटेन को आमसभा में पीछे धकेलने में कामयाब हो रहा था वह अनेक पर्यवेक्षकों के लिए अप्रत्याशित था। एक समय ब्रिटेन ने संयुक्त सम्मेलन व्यवस्था का सहारा लेने पर भी विचार किया। इसमें महासभा एवं सुरक्षा परिषद की बैठक एक साथ बुलाई जाती है तथा सदस्यों से खुलकर समर्थन और विरोध करने को कहा जाता है। इसमें समस्या हो सकती थी। संभव था कई देश जो भारत को चुपचाप समर्थन कर रहे थे वे खुलकर ऐसा न कर पाते। माना जा रहा था कि चारों स्थाई सदस्यों से मशविरा करने के बाद ही ब्रिटेन ने संयुक्त अधिवेशन के विकल्प पर विचार किया था। रूस, अमेरिका, चीन व फांस को भी यह चिंता थी कि आज ब्रिटेन जहां फंस रहा है कल वहां वह खुद भी हो सकते हैं। इसलिए वे ब्रिटेन के साथ खड़े थे।

सच यही है कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में भारत के मजबूत आधार को देख ब्रिटेन परेशान था। भारत ने अपने उम्मीदवार दलवीर भंडारी के सम्मान में जो भोज दिया उसमें दुनिया के 160 देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने उसे चौंका दिया। इसके बाद उसने औपचारिक चुनाव प्रक्रिया रोकने तक की कोशिश की। इसके लिए उसने सुरक्षा परिषद के सदस्यों से अनौपचारिक बातचीत शुरू की। इस तरह देखें तो यह हर दृष्टि से भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी कूटनीतिक जीत दिखाई देगी। पहली बार सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों में टूट हुई एवं उन्हें मन के विपरीत मतदान करना पड़ा।(DJ)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

सेना के आधुनिकीकरण का बीड़ा उठाए मोदी

(शेखर गुप्ता )

इतिहास में बोफोर्स ही ऐसी तोप है जिसने अपने दम पर चुनाव जीता। इसमें वीपी सिंह का भी कोई कम योगदान नहीं था। उन्होंने 1988 के इलाहाबाद उपचुनाव के साथ राजीव गांधी को राजनीतिक रूप से खत्म करने की चुनौती दी थी। ग्रामीण इलाहाबाद के मैदानों में मोटरसाइकिल पर घूम-घूमकर उन्होंने प्रचार किया।

उनका संदेश सरल सा होता : आपके घर में सेंध लगी है। कैसे? जब आप बीड़ी या माचिस खरीदते हैं तो आप जो पैसे देते हैं उसका कुछ हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार के पास जाता है। इसी से सरकार अस्पताल, स्कूल चलाती है और आपकी सेना के लिए हथियार खरीदती है। यदि यही पैसा कोई चुरा ले तो क्या अाप इसे सेंध लगाना नहीं कहेंगे? यहां तक तो बहुत अच्छा था पर वे दो चीजें और जोड़ते। एक, बोफोर्स चोरों के नाम मेरे कुर्ते की जेब में हैं, इसलिए मेरे सत्ता में अाने का इंतजार कीजिए। दो, जवान तो हक्के-बक्के रह गए। उन्हें ऐसी तोप दी गई जो पीछे वार करती है और शत्रु के बजाय उन्हें मार देती है। इससे कोई मूर्ख नहीं बनता था पर भीड़ का खूब मनोरंजन होता। तीस साल हो गए बोफोर्स दलाली में तो कोई पकड़ा गया किसी को सजा हुई। तोप ने करगिल में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। यह आर्टिलरी की मुख्य तोप बनी हुई है। इन 30 वर्षों में एक भी बोफोर्स और नहीं खरीदी गई, बनाई गई फिर चाहे हाल ही में ‘धनुष’ नामक प्रोटोटाइप आजमाया गया। ऐसा दाग लगा है कि और बोफोर्स खरीदी गईं, कोई कल-पूर्जे, गोला-बारूद और कोई अन्य तोपें नहीं, किसी से दलाली वसूल नहीं की और किसी को जेल भेजा। भारत का रक्षा खरीद रिकॉर्ड प्याज चुराते पकड़े गए गांव के मूर्ख व्यक्ति की कहानी जैसा है। पंचायत ने उसे सजा सुनाते हुए कहा, ‘या तो सौ जूते खा लो या सौ प्याज।’ उसने प्याज चुने और 10 खाने के बाद जूते की सजा चुनी। उसमें भी 10 जूते के बाद फिर प्याज पर लौट आया। नतीजा यह हुआ कि उसे दोनों की सजा भुगतनी पड़ी। 1977 के बाद भारत ने रक्षा खरीद में यही किया है। 1977 में पहली गैर-कांग्रेस सरकार चुनी गई थी और उसी साल केवल सोवियत सैन्य उपकरण खरीदने की परम्परा बदली गई।

जनता सरकार ने एंग्लो-फ्रेंच जेगुआर आजमाया। प्रतिद्वंद्वी एजेंटों ने पत्रकारों में खबरें फैलाईं और दलाली का शोर मचा। इस रक्षा खरीद की रिपोर्टिंग में ‘ग्रीनहाउस’ पत्रकारिता आई। जेगुआर विवादित हो गया और वह शुरू में सोची गई संख्या तक कभी नहीं पहुंचा। वह कितना अच्छा था यह इससे साबित होता है कि 40 साल बाद वायुसेना के पास 100 जेगुआर हैं। इसके बाद इंदिरा गांधी फिर सोवियत संघ की ओर मुड़ी। बाद में राजीव गांधी ने पूरा समीकरण ही बदल दिया। आज यह कहना बोफोर्स पीढ़ी के गुस्से का शिकार बनना है लेकिन, हमारे इतिहास में तीनों सेनाओं का पूरे संकल्प के साथ आधुनिकीकरण इंदिरा-राजीव के युग में हुआ। रक्षा बजट जीडीपी के चार फीसदी से ऊपर ले जाया गया, जबकि यह तब तक दो फीसदी या इससे नीचे होना आम था। उन्होंने फ्रांस से मिराज 2000, स्वीडन से बोफोर्स, मिलन मैत्रा मिसाइल ( फ्रेंच) और टाइप-209 पनडुब्बियां जर्मनी से खरीदीं। हर सौदा घोटाला बन गया(या बनाया गया)। हर खरीद शुरुआती दौर में रही। सैन्य क्षमता अधिकतम संभव क्षमता तक पहुंची। राजीव ने सोवियत उपकरण भी बड़े पैमाने पर खरीदे। बीएमपी बख्तरबंद वाहन, नई पनडुब्बियां और लीज पर एक परमाणु पनडुब्बी (चक्र) ली। सत्ता गंवाकर उन्होंने इसकी कीमत चुकाई। इसमें दलाली घोटाले होंगे लेकिन, कटु सत्य यही है कि आज यदि युद्ध हो तो मैदान में बहुत सारी सैन्य सामग्री वह होगी जिसे इंदिरा-राजीव ने या उनके बाद नरसिंह राव ने खरीदा।

रक्षा खरीद में भाजपा सरकारों का प्रदर्शन खराब है। ताबूत घोटाले (पूरी तरह काल्पनिक) का सामना करने वाली वाजपेयी सरकार ने युद्धकाल के अलावा ज्यादा खरीदी नहीं की। मोदी से बहुत अपेक्षा थी पर अब तक सिर्फ 36 राफेल विमानों का ऑर्डर दिया है, जबकि यूपीए सरकार ने 126 के लिए बातचीत की थी। वैसी ही सावधानी बरी जा रही है जैसी एके एंटोनी बरतते थे। मेक इन इंडिया और जाने किस-किस की बात हो रही है। मजे की बात है कि भाजपा को बोफोर्स जैसे घोटाले के डर ने रोक रखा है। रक्षा पर समझौता करना और हथियारों की कमी दूर करना नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार के मुख्य वादे थे। साढ़े तीन साल बाद झोली खाली है। डर, अनिर्णय और फोकस का अभाव इससे स्पष्ट है कि मोदी सरकार में चार रक्षा मंत्री हो चुके हैं। अब राफेल सौदे में मोदी की परीक्षा है। क्या वे कहेंगे कि मैं और मेरी सरकार ने कुछ गलत नहीं किया है। खरीद पर कायम रहेंगे बल्कि इसे विस्तार देंगे? वरना भारतीय वायु सेना मामूली ताकत रह जाएगी। एसयू-30 भी अब 20 साल पुराने हो चुके हैं। तीनों सेनाओं पर ध्यान देना होगा वरना इतिहास में मोदी का कमजोर आकलन होगा। राफेल पर पुरानी बातें दोहराई जाने लगी हैं। सबसे मूर्खतापूर्ण है टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण। छह दशकों में एचएएल और रक्षा उपक्रमों ने टेक्नोलॉजी हस्तांतरण से आयातित सिस्टम असेंबल किए हैं पर हेलिकॉप्टर छोड़ दें तो वे इससे कोई उपयोगी चीज बना नहीं सके हैं। हम आज भी इन्फेंट्री राइफलों जैसे बुनियादी उपकरणों के ऑर्डर दे रहे हैं, कैंसल कर रहे हैं फिर ऑर्डर दे रहे हैं। क्या मोदी में वह बात है कि देश वह खरीदें जो इसे खरीदने की जरूरत है और ‘बनाना रिपब्लिक’ (हमको ये भी बनाना है) की बातें बंद करें?
या तो वह राजीव की तरह जोखिम लेकर रक्षा आधुनिकीकरण का बीड़ा उठाए या सेना की घटती ताकत के चलते शी जिनपिंग और जनरल कमर बाजवा को बुलाकर अरुणाचल कश्मीर का मसला सुलझा लें, फिर भारत में जो बचा हो उसकी रक्षा के लिए अमेरिका/नाटो से संधि कर ले और जैसा जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किया था भारत का रक्षा बजट जीडीपी के एक फीसदी तक सीमित रखने का वादा कर लें। तब एक फीसदी भी क्यों? क्योंकि उसकी जरूरत माओवादियों से लड़ने में हो सकती है। कुछ गणतंत्र-दिवस की परेड और वीकेंड पर सैन्य ठिकानों में मंत्रियों को फोटो खिंचवाने के लिए। (DB)
( ये लेखक के अपने विचार है।)

Sink your differences: on the executive-judiciary relationship

A touch of pragmatism is what the judiciary and the executive need at this juncture

It is disconcerting that differences between the executive and the judiciary are emerging often in the public domain these days. By raising the question whether the judiciary does not trust the Prime Minister to make fair judicial appointments, and harping on the need to maintain the balance of power between the executive and the judiciary, representatives of the Union government have risked the impression that they are putting the judiciary on the defensive. Read between the lines and the executive’s profound dissatisfaction with the state of play in relations between the two wings is evident. Union Law Minister Ravi Shankar Prasad is undoubtedly entitled to hold the view that the Supreme Court’s 2015 verdict striking down the law creating the National Judicial Appointments Commission (NJAC) reveals the judiciary’s distrust in the Prime Minister and the Law Minister. His question whether an audit is needed to determine what has been lost or gained since the collegium system was created in 1993 is not without merit. However, it is debatable whether these issues should have been raised in public, that too in the presence of the Chief Justice of India and his fraternity. Chief Justice Dipak Misra seemed coerced into responding that the judiciary reposes the same trust that the Constituent Assembly had in the Prime Minister, and that the judiciary indeed recognised and respected the separation of powers enshrined in the Constitution. There was really no need for such a public affirmation of first principles in a democracy.

However, it does not mean that major concerns over whether there is real separation of powers, whether public interest litigation has become an interstitial space in which judges give policy directives, and whether the country needs a better system than the present one in which judges appoint judges should be brushed aside. The present collegium system is flawed and lacks transparency, and there is a clear need to have a better and more credible process in making judicial appointments. It is clear that differences over formulating a fresh Memorandum of Procedure for appointments are casting a shadow on the relationship. It is best if both sides take a pragmatic view of the situation and sink their differences on the new procedure, even if it involves giving up a point or two that they are clinging to. For a start, they could both disclose the exact points on which the two sides differ so that independent experts will also have a chance to contribute to the debate. If it is the right to veto a recommendation that the government wants on some limited grounds, the Collegium must not be averse to considering it. Resolution of this matter brooks no further delay.

 

IMPORTANT NEW ARTICLE

 1.आधार संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई अभी नहीं• सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संविधान पीठ द्वारा दिल्ली-केन्द्र विवाद की सुनवाई पूरी कर लिए जाने के बाद वह विभिन्न सेवाओं को अनिवार्य रूप से आधार से जोड़े जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा।
• इस बीच, केन्द्र ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अजय खानिवलकर, धनंजय चन्द्रचूड की बेंच को बताया कि वह विभिन्न योजनाओं से आधार को अनिवार्य रूप से जोड़ने की अंतिम तिथि को बढ़ाकर 31 मार्च, 2018 करने का इच्छुक है। बेंच ने कहा कि संविधान पीठ एक अंतरिम आदेश जारी करेगी।
• आधार योजना को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को अनिवार्य रूप से आधार से जोड़ने के सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने को लेकर लगातार दबाव बना रहे हैं।
• फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ दिल्ली सरकार की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है।
• दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दिल्ली एक राज्य नहीं है और उपराज्यपाल इसके प्रशासनिक प्रमुख हैं।चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने 30 अक्टूबर को कहा था कि उसके समक्ष आए आधार संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन किया जाएगा।
• मोबाइल फोन के नंबरों को आधार से जोड़ने को चुनौती देने वाली याचिका को अस्वीकार करते हुए 13 नवंबर को अदालत ने कहा था कि इससे मिलती-जुलती कई याचिकाएं उसके समक्ष लंबित हैं। वर्तमान में आधार को बैंक खातों से जोड़ने की अंतिम तारीख 31 दिसंबर, 2017 है।

2. केंद्र को दार्जिलिंग से केंद्रीय बल हटाने की मिली अनुमति:-
• मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ का निर्देश1जागरण न्यूज नेटवर्क, कोलकाता1सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को दार्जिलिंग व कालिंपोंग में तैनात केंद्रीय सुरक्षा बल की चार और कंपनी वापस लेने की अनुमति दे दी।
• सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, न्यायाधीश एएम खानविलकर व न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने यह निर्देश दिया।
• सोमवार को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अदालत में कहा कि उक्त जिलों में स्थिति अभी नियंत्रण में है। सिक्किम जाने वाले राजमार्ग पर यातायात और माल ढुलाई सामान्य है, इसलिए केंद्र पृथक राज्य गोरखालैंड की मांग पर चल रहे बंद व विरोध-प्रदर्शन का मुकाबला करने के लिए वहां तैनात तमाम केंद्रीय बलों को वापस लेना चाहता है।
• वहीं पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से इस याचिका का विरोध करते हुए कहा गया किकेंद्र अकेले वहां की जमीनी स्थिति का आकलन कर सुरक्षा व्यवस्था के लिए तैनात केंद्रीय बलों को हटाने का फैसला कैसे कर सकता है? इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश व अन्य जगहों पर होने वाले चुनाव को देखते हुए केंद्र को केंद्रीय बल की सात कंपनी वापस लेने की अनुमति दी थी।
• केंद्र ने कलकत्ता हाई कोर्ट केफैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें गोरखा आंदोलन खत्म होने के बाद दार्जिलिंग व कालिंपोंग जिलों से सुरक्षा बल वापस लेने की अनुमति देने की अपील की गई थी। गोरखालैंड की मांग पर 100 दिनों से अधिक समय तक उत्तर बंगाल का पहाड़ी क्षेत्र अशांत था।
• गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के लगातार बंद ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया था। इस आंदोलन के दौरान कई लोगों की जानें भी गई थीं। राज्य सरकार गोरखालैंड की मांग के खिलाफ है। आंदोलन के दौरान स्थिति को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से सुरक्षा बल की मांग की थी।
• केंद्र द्वारा पर्याप्त सुरक्षा बल नहीं भेजने पर राज्य सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद 15 कंपनी केंद्रीय बल की तैनाती की गई थी। आंदोलन खत्म होने के बाद जब स्थिति सामान्य होने लगी तो पिछले माह केंद्र ने केंद्रीय बल वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की थी।
• इसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने फिर से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो हाई कोर्ट ने केंद्रीय बल वापस लेने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

3. रंग लाने लगा केंद्रीय वार्ताकार का मिशन कश्मीर
• केंद्रीय वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा का मिशन कश्मीर रंग लाने लगा है। वार्ताकार के सुझाव व केंद्र के निर्देश पर पत्थरबाजों को रिहा करने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद अब कश्मीर के हर वर्ग के लोग खुलकर वार्ताकार से मिलने आगे आ रहे हैं।
• सोमवार को श्रीनगर में मंत्रियों व अधिकारियों से लेकर छात्रों, पूर्व पत्थरबाजों व पूर्व आतंकियों समेत लगभग 30 प्रतिनिधिमंडलों ने दिनेश्वर शर्मा से मुलाकात की। सभी ने कश्मीर मुद्दे पर दिल-खेलकर बात की और अपने सुझाव भी दिए। शर्मा मंगलवार को अनंतनाग दौरे पर जा सकते हैं।
• केंद्रीय वार्ताकार से मिलने आए प्रतिनिधिमंडलों ने सरहद पार से परिजनों संग लौटे पूर्व आतंकियों के पुनर्वास, कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान के लिए हुर्रियत समेत सभी संबंधित पक्षों से बातचीत, नौजवानों पर दर्ज मामलों को वापस लेने से लेकर स्थानीय विकास और प्रशासन से जुड़े मुद्दे उठाए।
• कोई भी मुलाकात के बाद कश्मीर में शांति बहाली को लेकर नाउम्मीद नजर नहीं आया। जो मिलकर लौटा, उसने कहा कि धीरे-धीरे हालात पूरी तरह बदल जाएंगे, सब ठीक हो जाएगा।
• कश्मीर समस्या के सर्वमान्य हल व स्थायी शांति बहाली के लिए रोडमैप तैयार करने में जुटे केंद्रीय वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा अपने कश्मीर मिशन के दूसरे चरण के तहत गत शुक्रवार से राज्य में हैं।
• इस बार उन्होंने अपने कश्मीर मिशन की शुरुआत जम्मू संभाग से की। रविवार को उन्होंने कश्मीर पहुंचने के बाद दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में स्थानीय संगठनों से कश्मीर मुद्दे पर चर्चा की थी।
• सोमवार को वार्ताकार ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में ही रहे। उन्होंने सरकारी गेस्ट हाउस हरि निवास में खेल एवं युवा मामलों के मंत्री इमरान रजा अंसारी, भाजपा एमएलसी सुरेंद्र अंबरदार और मंडलायुक्त कश्मीर बसीर अहमद खान से मुलाकात की। इसके बाद उनसे कश्मीर विश्वविद्यालय के अध्यापक, कश्मीर विवि के छात्र व कश्मीर विवि के स्कॉलरों के प्रतिनिधिमंडल मिले।
• विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत कर्मियों का प्रतिनिधिमंडल, संविदा कर्मियों का प्रतिनिधिमंडल, पीस फोरम कश्मीर का दल, बांडीपोर के पूर्व पत्थरबाजों का दल, सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल, रेडियो कश्मीर के कर्मियों का दल, पीस फ्रंट कुपवाड़ा, जेके खादी ग्रामोद्योग फेडरेशन, बीबी कैंट शॉपकीपर्स एसोसिएशन, सेनसस कंसल्टेंट एसोसिएशन, शिया वेलफेयर फोरम का दल भी मिलने पहुंचा।
• इन प्रतिनिधिमंडलों के अलावा हब्बाकदल की महमूदा बेगम अपने पुत्र संग, पूर्व आतंकी अरशद सलीम, पत्रकार माजिद हैदरी, जेके पीपुल्स एलायंस पार्टी के इमरान शेख और गुलाम कश्मीर से नेपाल के रास्ते सपरिवार लौटे पूर्व आतंकी मोहम्मद यूसुफ अपनी पत्नी के साथ केंद्रीय वार्ताकार से मिले।
• जेके पीस फ्रंट के मंजूर अहमद ने केंद्रीय वार्ताकार से मुलाकात के बाद कहा कि केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर मसले के हल के लिए उठाए गए कदम अब रंग दिखाने लगे हैं। लोगों में इस प्रक्रिया के प्रति विश्वास बढ़ रहा है और वह ज्यादा से ज्यादा संख्या में आगे आ रहे हैं। सभी चाहते हैं कि बातचीत की प्रक्रिया में सभी पक्ष शामिल हों और उसका एक आशाजनक हल निकले।
• पीस फ्रंट की सदस्या हनीफा बानो ने कहा कि दिनेश्वर शर्मा की सिफारिश पर पत्थरबाजों की माफी का फैसला स्वागतयोग्य है। हमने हालात सामान्य बनाने व सभी संबंधित पक्षों को बातचीत की प्रक्रिया में शामिल करने के लिए कुछ सुझाव भी दिए हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि कश्मीर मसला जल्द ही सर्वमान्य तरीके से हल होगा और यहां जारी खून खराबा पूरी तरह बंद हो जाएगा।

3. भारत, रूस ने आतंकवाद रोधी समझौते पर किए हस्ताक्षर

• भारत और रूस ने आतंकवाद से लड़ने में एक दूसरे की मदद करने पर सोमवार को सहमति जताई और दोनों रणनीतिक साझेदारों ने एक अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि अच्छा या बुरा आतंकी नहीं होता और इस बुराई से संयुक्त रूप से लड़ने की भी बात कही।
• सभी तरह के आतंकवाद से निपटने के इरादे से दोनों देशों में सहयोग के लिए समझौते पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह और रूस के गृह मंत्री व्लादिमीर कोलोकोत्सेव ने यहां हस्ताक्षर किए। इससे पहले उन्होंने व्यापक वार्ता की।
• भारतीय दूतावास द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि मंत्रियों ने इस बात का जिक्र किया कि आतंकवाद, चरमपंथ और कट्टरपंथ से लड़ने में सहयोग मजबूत करने के लिए इस द्विपक्षीय संबंध का एक अहम पहलू सुरक्षा में सहयोग करना है।
• बयान के अनुसार दोनो पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि आतंकवाद से अवश्य ही एकजुट होकर लड़ा जाए और अच्छा या बुरा आतंकी नहीं होता है।सिंह ने समझौते पर हस्ताक्षर के बाद ट्वीट किया, भारत के गृह मंत्रालय और रूस के गृह मंत्रालय के बीच हुआ यह समझौता अक्तूबर 1993 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते की जगह लेगा।
• यह समझौता आतंरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सहयोग मजबूत करने और इसे विस्तारित करने में मदद करेगा। भारतीय दूतावास के बयान में कहा गया है कि दोनों नेता नई चुनौतियों से निपटने में सहयोग करने, सूचना का आदान प्रदान बढ़ाने, एक डाटाबेस बनाने और पुलिस एवं जांच एजेंसियों के प्रशिक्षण में सहयोग करने को लेकर सहमत हुए।
• भारत और रूस के प्रतिनिधियों ने नार्कोटिक्स द्वारा पेश किए जा रहे खतरे का मुकाबला करने के लिए एक संयुक्त कार्य योजना पर भी हस्ताक्षर किए। यह समझौता इस क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग के लिए कानूनी ढांचा मुहैया करेगा। इस पर रूस में नियुक्त भारत के राजदूत पंकज शरन और रूसी संघ के आतंरिक मामलों के उप मंत्री इगोर जुबोव ने दोनों देशों के गृह मंत्रियों की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए।
• आतंरिक सुरक्षा पर समझौता सूचना एवं प्रौद्योगिकी अपराधों, जाली नोटों, मादक पदार्थो की तस्करी, मानव तस्करी, आर्थिक अपराधों, बौद्धिक संपदा, सांस्कृतिक संपत्ति एवं अन्य विषयों से जुड़े अपराधों सहित सुरक्षा से जुड़े मुद्दों में मदद के लिए एक व्यापक रूख मुहैया करेगा।
• बैठक के दौरान दोनों मंत्रियों ने भारत और रूस के बीच संबंध को मजबूत करने पर जोर दिया, जो पिछले 70 बरसों में सभी क्षेत्रों में आगे बढ़े हैं। गौरतलब है कि रूस के लिए रवाना होने से पहले सिंह ने कहा था कि भारत और रूस एक विशेष संबंध रखते हैं जो दशकों से वक्त की कसौटी पर खरा उतरता आया है।

4. टीबी के प्रभावशाली टीके की जगी उम्मीद

• दुनिया की सबसे जानलेवा संक्रामक बीमारियों में से एक टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस को निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने एक अहम खोज की है। वैज्ञानिक टीबी का टीका बनाने की दिशा में एक कदम और नजदीक पहुंचते हुए मानव शरीर में पाई जाने वाली एक खास तरह की कोशिका को प्रतिरोधक के रूप में तैयार करने पर विचार कर रहे हैं।
• दुनियाभर में हर साल करीब 17 लाख लोगों की होती है मौत : कर्ताओं के मुताबिक, टीबी के कारण हर वर्ष दुनियाभर में करीब 17 लाख लोगों की मौत होती है। किसी अन्य संक्रमण की तुलना में टीबी के कारण मरने वालों लोगों की संख्या सर्वाधिक है।
• कर्ताओं का कहना है कि इस घातक संक्रमण के उपचार मौजूद हैं, लेकिन कोई भी शत प्रतिशत कारगर नहीं है। इसी के चलते दुनियाभर के वैज्ञानिक इसका असरदार और कारगर उपचार तलाशने में प्रयासरत हैं।
• खत्म हो रहा है एंटीबायोटिक्स का असर : वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस वायु जनित बीमारी पर एंटीबायोटिक्स का असर खत्म होता जा रहा है। वहीं, दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर 20 वषों से जारी प्रयासों के बावजूद कोई भी प्रभावशाली टीका विकसित नहीं हो पाया है।
• वैज्ञानिकों ने इस पर दिया ध्यान : हालिया प्रयासों में संक्रमण से लड़ने के लिए आवश्यक परंपरागत मानवीय टी कोशिका की माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (एमटीबी) में पाए जाने वाले प्रोटीन के अंशों पर प्रतिक्रिया पर ध्यान केंद्रित किया गया।

5. शक्तिकांत दास बने जी-20 के शेरपा

• सरकार ने वित्त मंत्रलय के आर्थिक कार्य विभाग के पूर्व सचिव और वरिष्ठ नौकरशाह शक्तिकांत दास को जी-20 में वार्ता के लिए भारत का शेरपा नियुक्त किया है। दास इस पद पर 31 दिसंबर 2018 तक रहेंगे। 1जी-20 में शेरपा के रूप में दास ‘डवलपमेंट ट्रैक’ यानी विकास संबंधी वार्ताओं में देश का पक्ष रखेंगे।
• जी-20 में दरअसल फाइनेंस ट्रैक और डवलपमेंट ट्रैक की बातचीत होती है। फाइनेंस ट्रैक की वार्ताओं में वित्त मंत्रलय के आर्थिक कार्य विभाग के सचिव की अहम भूमिका होती है जबकि डवलपमेंट ट्रैक का जिम्मा एक शेरपा के पास होता है।
• आर्थिक कार्य विभाग इस संबंध में शेरपा को पूरी मदद मुहैया कराएगा। इससे पहले नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पानगड़िया और तत्कालीन योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया इस पद पर रह चुके हैं।
• पानगड़िया के इस्तीफा देकर अमेरिका लौटने के बाद जी-20 में भारत के शेरपा का पद खाली था। दास इसी साल वित्त मंत्रलय के आर्थिक कार्य विभाग में सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

6. एनके सिंह होंगे 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष
• अधिसूचना के अनुसार वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों के पूर्व सचिव शक्तिकांत दास, पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अशोक लाहिड़ी, नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद व जार्जटाउन विविद्यालय में प्रोफेसर अनूप सिंह आयोग के सदस्य बनाए गए हैं।
• आयोग अपनी रपट अक्टूबर, 2019 तक सौंपेगा। आयोग केंद्र व राज्य सरकारों के वित्त, घाटे, ऋण स्तर व राजकोषीय अनुशासन प्रयासों की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करेगा।
• यह मजबूत राजकोषीय प्रबंधन के लिए राजकोषीय स्थिति मजबूत करने की व्यवस्था पर सुझाएगा।

7. दक्षिण अफ्रीका की डेमी पीटर्स बनीं मिस यूनिवर्स
• महिलाओं को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देने वालीं दक्षिण अफ्रीका की डेमी लीग नेल पीटर्स ने रविवार को यहां वर्ष 2017 का मिस यूनिवर्स खिताब अपने नाम किया। भारत का प्रतिनिधित्व कर रहीं श्रद्धा शशिधर प्रतियोगिता में अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहीं। वह अंतिम सोलह प्रतिभागियों में भी जगह नहीं बना सकीं।
• हाल में मिस वल्र्ड खिताब भारत की झोली में डालने वालीं मानुषी छिल्लर के बाद देश को श्रद्धा से भी काफी उम्मीदें थीं।
• नार्थ-वेस्ट यूनिवर्सिटी से पूरी की है बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई : दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी केप प्रांत की रहने वालीं 22 वर्षीय डेमी को पिछले वर्ष की मिस यूनिवर्स फ्रांस की आइरिस मितेनेयर ने ताज पहनाया। डेमी ने हाल में नार्थ-वेस्ट यूनिवर्सिटी से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी की है।
• इस सवाल के जवाब ने जीता ज्यूरी का दिल : प्रतियोगिता में डेमी से पूछा गया कि वह अपने किस गुण पर सबसे अधिक गर्व करती हैं और अपनी इस खूबी को वह मिस यूनिवर्स के रूप में किस तरह प्रयोग करेंगी?
• डेमी का जवाब था, ‘मिस यूनिवर्स की तरह आपको खुद के व्यक्तित्व पर विश्वास होना चाहिए। मिस यूनिवर्स वह महिला है जिसने अपने सभी डर पर काबू पा लिया हो और वह दुनियाभर की अन्य सभी महिलाओं को भी उनके डर का सामना करने की प्रेरणा दे।’

8. स्वामी चिदानंद को मिला गांधी पीस एंड सर्विस पुरस्कार

• हरिजन सेवक संघ की ओर से शांति एवं सेवा के लिए दिया जाने वाला लाइफ टाइम महात्मा गांधी पीस एंड सर्विस पुरस्कार सोमवार को परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज को दिया गया।
• राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने स्वामी चिदानंद को यह पुरस्कार प्रदान किया।
• परमार्थ निकेतन के प्रवक्ता के अनुसार, दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में हरिजन सेवक संघ एवं ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस से जुड़े विभिन्न संतों ने भाग लिया।
• इस मौके पर राष्ट्रपति ने मां गंगा की आरती को याद करते हुए कहा कि वह मां गंगा की भव्य आरती में परमार्थ निकेतन गए हैं और वहां रहे हैं। मां गंगा के तट पर जाकर मन दिव्यता से ओतप्रोत हो जाता है।
• वह आरती शांति प्रदान करने वाली होती है। इस मौके पर स्वामी चिदानंद ने राष्ट्रपति को तीर्थनगरी आगमन का निमंत्रण भी दिया। इस अवसर पर हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष शंकर कुमार सान्याल, उपाध्यक्ष नरेश यादव, जीवा की अंतरराष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती, उलमा-ए-हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी, आर्कबिशप डॉ. अनिल कुटु उपस्थित थे।

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