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बैंकों में जान फूंकने की कड़ी कवायद

(जयंतीलाल भंडारी)

24 अक्टूबर को सरकार द्वारा घोषित आर्थिक पैकेज के तहत बट्टाखाता की समस्या से जूझ रहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रुपये का निवेश उनमें नई जान फूंकने और अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने में मददगार साबित होगा। सरकारी बैंकों में पुनर्पूंजीकरण (रीकैपिटलाइजेशन) का कदम निश्चित रूप से एक बड़ा बैंकिंग सुधार है। इससे सरकारी बैंकों को दोबारा सही तरीके से काम करने का मौका मिलेगा, जिससे बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होगी और निवेश में इजाफा होगा। सरकारी बैंकों की लगातार बढ़ती गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) ने अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चिंता खड़ी की है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार सरकारी बैंकों का कुल फंसा हुआ कर्ज जून 2017 के आखिर तक 9.5 लाख करोड़ रुपये के रेकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। साथ ही इनकी क्रेडिट ग्रोथ भी कई दशकों के निचले स्तर पर आ गई है।

तीसरी कोशिश

ऐसे में सरकार बैंकों के फंसे हुए कर्ज की समस्या से अंतिम तौर पर निपटने के लिए पिछले हफ्ते बैंकिंग निवेश की नई व्यवस्था के ऐलान के साथ आगे बढ़ी है। लेकिन अभी तक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के जो पैकेज घोषित हुए हैं वे खास कारगर नहीं हो पाए हैं। मोदी सरकार ने वर्ष 2014-15 में 14,000 करोड़ रुपए बैंकों को पुनर्पूंजीकरण के लिए दिए। फिर वर्ष 2016-17 के बजट के तहत बैंकों में सुधार की इंद्रधनुष योजना के तहत सरकार ने बैंकों को 25,000 करोड़ रुपए उपलब्ध कराए। साथ ही यह लक्ष्य भी रखा गया कि इंद्रधनुष योजना के तहत बैंकों में पुनर्पूंजीकरण के लिए मार्च 2019 तक 70 हजार करोड़ रुपए निवेश किए जाएंगे। साफ है कि पिछले वर्षों में सरकारी बैंकों में नई पूंजी तो डाली गई है, लेकिन इसके लिए उपयुक्त प्रदर्शन को मानक नहीं बनाया गया। अच्छे-बुरे सभी बैंकों को समान तरीके से नई पूंजी दे दी गई।

इस बार यह ध्यान रखना जरूरी होगा कि दिए गए पैकेज से बैंकों के इंद्रधनुष लक्ष्य को पाने में सफलता मिले, दूसरी ओर सुदर्शन चक्र के लिए भी अच्छा आधार तैयार हो। रिजर्व बैंक के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य का कहना है कि सरकारी बैंकों को मजबूत बनाने के लिए 2015 में शुरू की गई इंद्रधनुष योजना अच्छी थी, लेकिन भारत में बैंकिंग क्षेत्र में बदलाव के लिए और ताकतवर योजना बनानी होगी। अब सरकारी बैंकों में सुधार के लिए सुदर्शन चक्र जरूरी है। यानी एक ऐसा नजरिया, जिसमें हर कदम के क्रियान्वयन के लिए उचित पद्धति हो। इंद्रधनुष के लक्ष्य भी प्राप्त हों और बैंकों के उपयुक्त विलय के साथ अन्य बैंकिंग सुधार भी हों। वित्त मंत्रालय के प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने पिछले दिनों भारत आर्थिक सम्मेलन में कहा कि सरकार की पहली प्राथमिकता डूबे कर्ज की समस्या से निपटना है। उसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एकीकरण होगा। सान्याल ने कहा कि अभी 21 सरकारी बैंक हैं, जिनकी संख्या एकीकरण के बाद घटकर 10 से 15 रह जाएगी।

उल्लेखनीय है कि इंद्रधनुष योजना में चार अहम लक्ष्य थे। एक, सरकारी बैंकों के कामकाज की निगरानी और उनको सरकारी हस्तक्षेप से दूर रखने के लिए बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो की स्थापना। दो, इन बैंकों में निजी पूंजी निवेश कर उनकी पूंजी पर्याप्तता में सुधार। तीन, निजी क्षेत्र की प्रतिभाओं को सरकारी बैंकों के साथ जोड़ना। चार, बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार के लिए नई व्यवस्था करना। बीते दो सालों में इन लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई, हालांकि बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना जल्दी हो गई और उसने निजी क्षेत्र के कुछ प्रबंधकों को सरकारी बैंकों में नियुक्त करने का काम भी शुरू भी कर दिया। बैंक प्रबंधन को सरकारी हस्तक्षेप से बचाना प्रमुख लक्ष्य था, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई खास काम नहीं हो सका है।

चूंकि सरकार किसी सरकारी बैंक को विफल नहीं होने देना चाहती है, इसलिए वह उन्हें जरूरी पूंजी मुहैया कराने की डगर पर आगे बढ़ी है। इससे पूंजी की किल्लत से परेशान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को जल्द राहत मिलेगी। लेकिन दिसंबर 2017 से दिवालिया प्रक्रिया में शामिल होने के बाद रिजर्व बैंक के दिशा निर्देशों के मुताबिक बैंकों को 50 फीसदी नुकसान की प्रॉविजनिंग करनी होगी। 1 अप्रैल, 2018 से भारतीय बैंकों को इंटरनैशनल फाइनैंशल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड (आईएफआरएस) का अनुपालन करना होगा। इन वजहों से भी बैंकों को अधिक पूंजी देना जरूरी है। लेकिन सरकारी बैंकों में सुधार के लिए सरकार और आरबीआई मिलकर जिस तरह फंसे हुए कर्ज की समस्या से निपटने की दिशा में काम कर रहे हैं, वही प्रक्रिया पुनर्पूंजीकरण में भी अपनाई जानी चाहिए। सरकारी बैंकों पर यह दबाव बनाया जाए कि वे अपने बेहतर वित्तीय स्थिति वाले अनुषंगी बैंकों की बिक्री करें और उससे अर्जित पूंजी प्रवर्तक बैंक में डालें।

हिस्सेदारी घटाएं

सरकार को इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 33 फीसदी करने पर भी विचार करना चाहिए। सुदर्शन चक्र के रूप में सरकारी बैंकों के निजीकरण के लिए व्यापक योजना भी सरकार को घोषित करनी चाहिए। बैंकों को दी गई भारी-भरकम नई पूंजी के आवंटन की उपयोगिता और प्रासंगिकता आखिरकार इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक इसका इस्तेमाल कितने प्रभावी ढंग से करते हैं और फंसे हुए कर्ज से वे कैसे निपटते हैं। यह भी देखना होगा कि बैंकों के पुनर्पूंजीकरण से देश की दोहरी बैलेंस शीट की समस्या कितनी हल होती है। इसके साथ ही बैंकों से संबंधित प्रशासनिक सुधारों पर भी सरकार को पूरा ध्यान देना होगा। इसके बाद ही बैंकों को दी गई नई पूंजी के सार्थक उपयोग का परिदृश्य दिखाई देगा

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