International Relations Chapter-1 भारत की विदेश नीति का विकास

भारत: अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध

विषय प्रवेश: सिविल सेवा के प्रारंभिक, मुख्य तथा साक्षात्कार तीनों चरणों में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। परीक्षा के संदर्भ में, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बारे में ज्ञान की महत्ता विश्व के साथ भारत के पारस्परिक संबंधों से स्थापित की जाती है अर्थात् वे कारक एवं कारण जो इसे अर्थात विश्व के साथ भारत के पारस्परिक संबंधों एवं इसके परिणामों को आकार प्रदान करते हैं एवं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। भारत की विदेश नीति एवं विश्व के साथ इसके संबंधों को समझने का आदर्श तरीका इसके स्रोतों, निर्धारकों, उद्देश्यों, उपकरणों, विधियों, बाधाओं, कारकों, तत्वों, और इसके विकास को समझना है। इस प्रकार, इस सन्दर्भ में अंतर्राष्ट्रीय संबंध को भारत के संबंधों के रूप में समझा जाना चाहिए। ये संबंध भारत की विदेश नीति की प्रमुख विषय वस्तु हैं। इसमें मोटे तौर पर निम्नलिखित विषयों को समाविष्ट किया गया है:

  • भारत की विदेश नीति: निर्धारक तत्व, विकास, उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और महत्वपूर्ण प्रश्न।
  • पड़ोसी देश: बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सार्क समूह के देश।
  • विस्तारित पड़ोस: दक्षिण-पूर्व एशिया (आसियान समूह के देश, म्यांमार, वियतनाम, सिंगापुर); पश्चिम एशिया (खाड़ी सहयोग परिषद: GCC), ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात); पूर्व एशिया और उससे आगे (जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, प्रशांत महासागर-हिन्द-प्रशांत, भारत-प्रशांत द्वीप देशों के लिए फोरम (Forum for India Pacific Island Countries-FIPIC); हिंद महासागर (मॉरीशस, हिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ (Indian Ocean Rim Associationfor Regional Cooperation-IORA-ARC
  • वैश्विक संबंध – महत्वपूर्ण शक्तियाँ: चीन, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, रूम, यूरोपीय संघ, फ्रांस, जर्मनी – और यूनाइटेड किंगडम।
  • क्षेत्रीय संबंध: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका (ब्राज़ील/मर्कोसर)
  • बहुपक्षीय संगठन
  • अंतर्राष्ट्रीय संबंध में प्रमुख मुद्दे

आगे आने वाले अध्यायों में हम भारत की विदेश नीति एवं उसमे अंतर्ग्रथित विषयों पर विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे।

  1. भारत के विदेश संबंध: भारत की विदेश नीति का विकास

(India’s Relations: Evolution of India’s Foreign Policy)

1.1. विदेश नीति एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को समझना (Understanding Foreign Policy And International Relations)

विदेश नीति वैश्विक घटनाओं से संबंधित है। यदि आप राष्ट्र की कल्पना एक व्यक्ति के रूप में करते हैं तो विदेश नीति के विषय में आपको व्यक्ति द्वारा अपने आसपास के वातावरण से सम्बन्ध रखने एवं संचालित होने के रूप में विचार करना होगा। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति पहचान, स्व-परिभाषा एवं स्व-हितों के एक समुच्चय के माध्यम से संचालित होता है और संबंधों (परिवार, मित्रों, प्रतिस्पर्धियों, शत्रुओं आदि) के एक जाल में उलझा हुआ होता है। व्यक्ति की कुछ इच्छाएँ और लक्ष्य होते हैं। इस प्रकार, अपनी क्षमताओं के आधार पर कोई व्यक्ति जीवन पर्यन्त अपने लक्ष्यों और इच्छाओं को प्राप्त करने के लिए अपने संबंध बनाने और उन्हें आकार देने में लगा रहता है। किसी व्यक्ति के लिए ये लक्ष्य और इच्छाएँ प्राय: सुरक्षा, समृद्धि और आत्म-विकास से संबंधित होती हैं।

संप्रभु राष्ट्रों के मामले में इन लक्ष्यों और इच्छाओं को राष्ट्रीय हित कहा जा सकता है। अपने सटीक रूप में राष्ट्रीय हित समय-समय पर परिवर्तित होते रह सकते हैं, लेकिन हमेशा इसके मूल में सुरक्षा (सैन्य तैयारी, आंतरिक और बाह्य सुरक्षा), समृद्धि (आर्थिक कल्याण जैसे कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, व्यापार, निर्धनता उन्मुलन आदि) और राष्ट्र का दर्जा (प्रस्थिति) (वर्तमान विश्व व्यवस्था में राजनीतिक स्थिति जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता) होते हैं। विदेश नीति, इन्हीं हितों की अभिव्यक्ति एवं उन्हें प्राप्त करने की रूपरेखा है। जे. बंदोपाध्याय के अनुसार, यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उद्देश्यों एवं माध्यमों का चुनाव करने की प्रक्रिया होती है। बहुत सरल शब्दों में कहें तो विदेश नीति, अन्य राष्ट्रों के साथ संबंध बनाने और उसे बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल है। इस प्रकार, भारत की विदेश नीति ऐसे विश्व में राष्ट्रीय हितों को परिभाषित, अभिव्यक्त और प्राप्त करने का प्रयास करती है जहाँ ये हित कई प्रकार से राष्ट्र की सीमाओं के बाहर स्थित तत्वों और कारकों पर निर्भर होते हैं।

1.2. निर्धारक: भारत की विदेश नीति को आकार प्रदान करने वाले तत्व और कारक  (Determinants: Actors and Factors Shaping India’s Foreign Policy)

किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति एवं साथ ही इसकी सफलता या असफलता कई कारकों से निर्धारित होती है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

  • इतिहास: राजनीतिक परंपरा और दार्शनिक आधार क्योंकि भारत के मामले में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व एवं गैर-आक्रामकता को इसके इतिहास और संस्कृति के साथ-साथ राजनीतिक परंपरा से जोड़ा जा सकता है।
  • भूगोल: स्थान और संसाधन – भू-राजनीति और भू-रणनीतिः भारत में कई नदियाँ, राष्ट्रों की सीमाओं से परे विस्तारित होने वाली हैं अर्थात भारत सहित कई पड़ोसी राष्ट्रों से होकर भी बहती हैं, उदाहरण के लिए गंगा, ब्रह्मपुत्र, एवं तीस्ता इत्यादि। हिमालय और हिंद महासागर दोनों ही भारत की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • आर्थिक विकास: किसी देश के आर्थिक विकास की आवश्यकताएँ एवं आर्थिक विकास की अवस्था उस देश की विदेश नीति और इनसे सम्बंधित विकल्पों में माध्यमों एवं उद्देश्यों दोनों दृष्टियों से योगदान करती हैं।
  • घरेलू वातावरण: इसमें देश में उपस्थित विभिन्न संस्थाएँ, राजनीतिक वातावरण और राष्ट्रीय हितों पर आम सहमति, आवश्यकताएँ, महत्वाकांक्षाएँ एवं क्षमताएँ, नेतृत्व तथा नौकरशाही इत्यादि शामिल हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय वातावरण: युद्ध, शांति और स्थिरता अर्थात् एक शांतिपूर्ण बाह्य वातावरण आर्थिक वृद्धि और विकास में सहायक होता है।

विदेश नीति के उद्देश्यों की प्राप्ति के साधनों के रूप में राजनयिक, आर्थिक और सैन्य साधनों को रखा जा सकता है। विगत कई वर्षों में भारत की विदेश नीति में हुए विकास को दृष्टिगत रखते हुए उपर्युक्त विमर्श के महत्व को पहचाना जा सकता है।

  1. भारत की विदेश नीति का विकास (Evolution of India’s Foreign Policy)

2.1. 1947-1962: अंतर्राष्ट्रवादी, आदर्शवादी और गुटनिरपेक्ष भारत (1947-1962: Internationalist, Idealist And Non-Aligned India)

स्वतंत्र भारत की विदेश नीति- ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत, द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त की घटनाओं, घरेलू आवश्यकताओं एवं महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे व्यक्तित्वों आदि कई कारकों का सम्मिलित परिणाम थी। यहाँ तक कि भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 51(राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व) के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का संवर्द्धन करने हेतु एक प्रावधान सम्मिलित किया, जिसके अनुसार राज्य निम्नलिखित का प्रयास करेगा:

(a) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का;

(b) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का;

(c) संगठित लोगों के एक दूसरे से व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधियों के प्रति आदर बढ़ाने का; और (d) अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थों द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का।

स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के आरंभिक वर्षों की एक महत्वपूर्ण विशेषता प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का रचनात्मक प्रभाव था जिसने आने वाले वर्षों पर दीर्घस्थायी प्रभाव छोड़ा एवं इसके विशिष्ट स्वरूप को एक दिशा प्रदान की। नेहरू जी की दृष्टि में इतिहास, आकार और क्षमता को देखते हुए भारत की विशेष प्रस्थिति (विश्व व्यवस्था में राजनीतिक स्थिति) थी। दो महाशक्तियों संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के मध्य वर्चस्व की राजनीति वाले शीत युद्ध के युग में यह अन्तर्राष्ट्रवाद, अफ्रीकी-एशियाई एकजुटता, उपनिवेशवाद विरोधी एवं गुटनिरपेक्षता को निर्दिष्ट करने वाली विदेश नीति थी।

भारत के स्वतंत्र होने से पहले ही नई दिल्ली में 23 मार्च से 2 अप्रैल 1947 को एशियाई संबंध सम्मेलन (Asian relations Conference) आयोजित किया गया। नेहरू जी के अनुसार “हम एक युग के अंत और इतिहास की एक नई अवधि की दहलीज पर खड़े हैं… निष्क्रियता के लम्बे अंतराल के बाद, एशिया, विश्व मामलों में अचानक पुन: महत्वपूर्ण हो गया है”

पाकिस्तान के साथ जूनागढ़ विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए जनमत-संग्रह का सुझाव सबसे पहले भारत ने दिया था। पुनः भारत ने 1947 में कश्मीर की स्थिति का समाधान करने के लिए इसी प्रकार का प्रस्ताव दिया। दिसंबर 1947 में कश्मीर में पाकिस्तान की आक्रामकता को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने पर, संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन में अपना विश्वास व्यक्त किये जाने को कई लोग भारत के नेतृत्व की ओर से की गई त्रुटि के रूप में देखते हैं। जे. बंदोपाध्याय के अनुसार, “ कश्मीर के प्रति अपनी नीति में आदर्शवाद और यथार्थवाद दोनों का समन्वय करने के नेहरू के प्रयास ने कश्मीर कूटनीति के कतिपय पहलुओं को प्रभावित किया और यदि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इस मुद्दे को सम्बोधित किया गया होता तो संभवतः इसका स्वरुप भिन्न रहा होता”। हालाँकि, राजीव सीकरी के अनुसार, “1948 में जब जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियाँ बिगड़ती जा रहीं थीं तब नेहरू पाकिस्तान के साथ युद्ध के लिए तैयार थे लेकिन उनके ब्रिटिश सेना प्रमुख ने उनका प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया। भारत के ब्रिटिश गवर्नर जनरल के दबाव में उन्होंने कश्मीर समस्या को संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत किया।”

फिर भी, संयुक्त राष्ट्र में उनके प्रारंभिक अनुभव ने भारत की विदेश नीति में पश्चिमी विश्व के प्रति संदेह

को और भी अधिक सुदृढ़ किया। इसका परिणाम, एशिया और अफ्रीका के नव स्वतंत्र राष्ट्रों को साथ “लेकर चलने वाले एवं तत्कालीन वर्चस्व की राजनीति से समान दूरी बनाए रखने वाला मार्ग (गुटनिरपेक्ष सिद्धांत)-निर्धारित करने के प्रयास के रूप में सामने आया।

इस चरण में भारत की विदेश नीति की तीन प्रमुख विशेषताएँ थीं। पहली, भारत ने बहुपक्षीय संस्थाओं और विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में अहम भूमिका निभाई। दूसरी, यह गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अहम प्रस्तावक के रूप में भी उभरा। तीसरा, गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में इसने उपनिवेशों को समाप्त कर राजनैतिक स्वतंत्रता की दिशा में भी अहम योगदान दिया। और यह अभिलक्षण उस समय भारत की अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी निम्नलिखित रूप में दृष्टिगत होती है :

  • कनाडा और पोलैंड के साथ वियतनाम में इंटरनेशनल कंट्रोल कमीशन (1954),
  • कोरिया में न्यूट्रल नेशंस रिपैट्रिएशन कमीशन (1952-54)
  • बेल्जियन कांगों में संयुक्त राष्ट्र शांति बल (1960-1964)

इस चरण में भारत की सक्रियता निःशस्त्रीकरण, विशेष रूप से परमाणु हथियार संबंधी निःशस्त्रीकरण के मंच पर भी प्रदर्शित हुई। परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (Nuclear Test Ban Treaty) के प्रारंभिक प्रस्तावकों में से एक के रूप में, 1952 में भारत ने आयरलैंड के साथ परमाणु परीक्षणों पर वैश्विक प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पेश किया।

 

2.1.1. पंचशील (Panchsheel)

इस अवधि में विदेशी संबंधों के प्रति भारतीय दृष्टिकोण “शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के पांच सिद्धांतों” से और भी स्पष्ट हुआ, जिन्हें चीन और भारत के बीच 1954 में की गई पंचशील संधि के रूप में जाना जाता है। ये सिद्धांत “चीन के तिब्बत क्षेत्र और भारत के मध्य व्यापार और मेल-जोल (आवागमन) पर समझौते” की प्रस्तावना में निरूपित किए गए थे, जिस पर पीकिंग में 29 अप्रैल, 1954 को हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते ने पंचशील के निम्न पांच सिद्धांतों को अभिव्यक्त किया:

  1. एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और प्रभुसत्ता के लिए पारस्परिक सम्मान।
  2. पारम्परिक गैर-आक्रामकता।
  3. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में पारस्परिक अहस्तक्षेप।
  4. पारस्परिक लाभ के लिए समानता और सहयोग।
  5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।

विदेश नीति का अंतर्राष्ट्रवादी दृष्टिकोण 1955 में बांडुंग (इंडोनेशिया) में आयोजित एशिया-अफ्रीका सम्मेलन में भारत की सक्रिय भागीदारी में भी प्रतिबिंबित हुआ। यह सम्मेलन बांडुंग में अप्रैल 18-24, 1955 को आयोजित किया गया और इसमें दो महाद्वीपों से औपनिवेशिक युग के बाद के नेताओं की पहली पीढ़ी से संबंधित 29 राष्ट्र प्रमुख सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन का उद्देश्य उस समय विद्यमान वैश्विक समस्याओं की पहचान करना, उनका आँकलन करना एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में संयुक्त नीतियों का अनुसरण करना था। बड़े और छोटे राष्ट्रों के मध्य के संबंधों को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों को बांडुंग के दस सिद्धांत” (Ten Principles of Bandung) के रूप में जाना गया और उस सम्मेलन में उनकी घोषणा की गई थी। बांडुंग सम्मेलन ने 1961 में गुट निरपेक्ष आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया।

कराची में 19 सितंबर 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति – अयूब खान द्वारा हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि कूटनीतिक साधनों के माध्यम से विवादास्पद मुद्दों पर की गई प्रगति का एक जीवंत प्रमाण थी। हालांकि, भले ही भारत ने इस समय काल में वैश्विक विवाद सुलझाने के लिए पसंदीदा विकल्प के रूप में कूटनीति के प्रयोग के प्रति आस्था दर्शाई, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर कुछ कठोर कार्रवाइयाँ भी कीं। उदाहरण के लिए, जब पुर्तगाल के अड़ियल रवैये वाले सालाजार शासन के साथ व्यापक कूटनीतिक चर्चा में गतिरोध उत्पन्न हुआ एवं भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू को अफ्रीकी-एशियाईं नेताओं के एक समूह की तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ा, तब भारत ने 1961 में गोवा में पुर्तगालियों को उनके औपनिवेशिक विदेशी अंतःक्षेत्र (एंक्लेव) से बेदखल करने के लिए बल प्रयोग करने का विकल्प चुना।

2.1.2. चीन के साथ असफलता: 1962 (Setback With China: 1962)

गुट निरपेक्षता के विचार पर आधारित विदेश नीति के प्रमुख तत्वों में से एक बढ़ते रक्षा व्यय को सीमित करना था। ऐसी नीति के पालन ने भारत की हार्ड पावर क्षमताओं को कमजोर कर दिया जिसका पता भारत को आगे चलकर चीनी जनवादी गणराज्य के साथ भारतीय संबंधों के परिप्रेक्ष्य में चला। भारत ने 1959 में तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को शरण दी एवं 1960 में चीनी जनवादी गणराज्य के साथ विभिन्न स्तर पर वार्ताएँ विफल हो गईं। परिणामस्वरूप, सुमित गांगुली के शब्दों में कहें तो भारत ने विवादित हिमालयी सीमा के साथ प्रादेशिक यथास्थिति पुनर्स्थापित करने के लिए अभिकल्पित की गई दबाव देने की रणनीति” अपनायी। इसमें हल्के हथियारों से लैस, अल्प सुसज्जित और थोड़ी बहुत तैयारी वाले सैनिकों को पर्याप्त आपूर्ति लाइनों के बिना अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भेजा गया। लेकिन यह रणनीति असफल सिद्ध हुई।

जब 1962 में चीन के जनवादी गणराज्य की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने व्यापक बल के साथ भारत पर आक्रमण किया, तो भारतीय सेना आक्रमण का सामना करने के लिए तैयार नहीं थी। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने भारतीय बलों को पर्याप्त क्षति पहुँचाई। जिन क्षेत्रों में उन्होंने घुसपैठ की थी, उनमें से कुछ क्षेत्रों से वह वापस चले गए लेकिन उन्होंने 14,000 वर्ग मील से अधिक के अक्साई चीन क्षेत्र को खाली नहीं किया, जिस पर उन्होंने आरम्भ में अपना अधिकार किया था और आज भी यह चीन और भारत के संबंधों में विवाद का विषय बना हुआ है।

 

2.1.3. कोलंबो सम्मेलन तथा गुट-निरपेक्ष आंदोलन की सीमाएँ (The Colombo Conference And Limits of Non-Aligned Movement)

भारत तथा चीन की स्वीकार्यता पर आधारित, छह गुट-निरपेक्ष राष्ट्र (मिस्र, बर्मा, कंबोडिया, श्रीलंका, घाना और इंडोनेशिया) 10 दिसंबर, 1962 को कोलंबो में मिले। कोलंबो सम्मेलन के परिणामस्वरूप पारित प्रस्तावों में, भारत द्वारा पीछे हटे बिना, चीन द्वारा स्वयं सीमांकित की गई युद्धविराम रेखा से 20 किमी. पीछे हटना निर्धारित किया गया। यद्यपि मध्यस्थता के प्रयासों को प्रोत्साहित किया गया, लेकिन चीन की स्पष्ट निंदा करने में विफल रहे इन छह राष्ट्रों ने भारत को बहुत निराश किया। तथापि, भारत ने प्रस्तावों को स्वीकार किया, जबकि चीन ने इन प्रस्तावों को समझौता वार्ता आरंभ करने के आधार सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया। लेकिन अंततोगत्वा, यह पहल असफल हो गयी।

इस प्रकार, चीन के साथ 1962 के युद्ध ने भारत की विदेश नीति के प्रथम चरण का अंत किया जिसकी विशेषता आदर्शवाद थी, इसमें भारत को प्रारंभिक सफलता मिली तथा इन विरासतें को भारत आज भी अपनी विदेश नीति में पर्याप्त स्थान प्रदान करता हैं।

 

2.1.4. गुट-निरपेक्ष आंदोलन का एक संक्षिप्त विवरण (A Brief Overview of The Non Aligned Movement)

बांडुंग के छह वर्ष पश्चात्, 1-6 सितंबर, 1961 तक बेलग्रेड में आयोजित प्रथम शिखर सम्मेलन में व्यापक भौगोलिक आधार पर गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों के आंदोलन (NAM) की स्थापना की गई। सम्मेलन में 25 राष्ट्रों ने भाग लिया: अफगानिस्तान, अल्जीरिया, यमन, म्यांमार, कंबोडिया, श्रीलंका, कांगो, क्यूबा, साइप्रस, मिस्र, इथियोपिया, घाना, गिनी, भारत, इंडोनेशिया, इराक, लेबनान, माली, मोरक्को, नेपाल, सऊदी अरब, सोमालिया, सूडान, सीरिया, ट्यूनीशिया तथा यूगोस्लाविया।

1960 में, बांडुंग में हुए निर्णयों की सहायता से, संयुक्त राष्ट्र महासभा के 15वें सामान्य सत्र के दौरान गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों के आंदोलन के विकास को तीव्रता प्रदान की गई, इस दौरान 17 नए अफ्रीकी एवं एशियाई राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता ग्रहण की। इस दौरान तत्कालीन राज्याध्यक्षों एवं शासनाध्यक्षों; मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर, घाना के क्वामे क्रुमा, भारत के जवाहरलाल नेहरू, इंडोनेशिया के अहमद सुकर्णो तथा युगोस्लाविया के जोसिप ब्रोज टीटो द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई, जो बाद में इस आंदोलन के प्रणेता और इसके प्रतीकात्मक नेता बन गए।

बांडुंग सिद्धांतों को बाद में गुट-निरपेक्षता की नीति के मुख्य लक्ष्यों तथा उद्देश्यों के रूप में अपनाया गया था। उन सिद्धांतों की पूर्ति, गुट-निरपेक्ष आंदोलन की सदस्यता के लिए एक आवश्यक मानदंड बन गई; 1990 के दशक के प्रारंभ तक इसे (“बांडुंग के दस सिद्धांत”) “आंदोलन के सारतत्व” के रूप में जाना जाता था। NAM के संस्थापकों ने इसे किसी संगठन के नौकरशाही प्रभावों से बचाने हेतु संगठन के स्थान पर एक आंदोलन के रूप में घोषित करना पसंद किया।

गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों के “प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित थे:

  • आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय स्वतंत्रता तथा राज्यों की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन;
  • रंगभेद नीति का विरोध;
  • बहुपक्षीय सैन्य समझौतों की अवमानना तथा महाशक्ति या गुट प्रभावों एवं प्रतिद्वंद्विता से गुट निरपेक्ष राष्ट्रों की स्वतंत्रता;
  • अपने सभी रूपों तथा अभिव्यक्तियों में साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष;
  • उपनिवेशवाद, नव-उपनिवेशवाद, नस्लवाद, विदेशी अधिग्रहण तथा प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष,
  • नि:शस्त्रीकरण
  • देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना तथा सभी राष्ट्रों के मध्य शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व,
  • अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में बल के उपयोग या उपयोग की चेतावनी को अस्वीकार करना;
  • संयुक्त राष्ट्र का सशक्तिकरण; अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का लोकतंत्रीकरण;
  • समाजिक-आर्थिक विकास तथा अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली का पुनर्गठन; साथ ही समानता के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।

 

2.2. 1962-1991: आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन दृष्टिकोण का दौर (1962-1991: Period of Self Help Approach)

चीन युद्ध के परिणामस्वरूप, नेहरू को अपने ही राष्ट्र में आलोचना का सामना करना पड़ा, हालांकि उस समय घरेलू राजनीति में कोई भी उनसे अधिक प्रभावशाली नेता नहीं था। इस प्रकार, पराजय के पश्चात् भारत के दृष्टिकोण में परिवर्तन भी उनके अधीन ही आरंभ हुआ। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने सैन्य आधुनिकीकरण का महत्वपूर्ण कार्यक्रम आरंभ किया। यह कार्यक्रम में दस नई माउंटेन डिवीजनों के साथ 10 लाख सैनिकों वाली सेना का निर्माण करना था, जो अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में युद्ध के लिए तैयार हो। साथ ही इसके अंतर्गत सुपरसोनिक विमान वाले 45-स्क्वाड्रन से सुसज्जित वायु सेना और नौसेना के सामान्य विस्तार हेतु भी प्रतिबद्ध व्यक्त की गयी।

1964 में नेहरू के निधन के पश्चात् प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल के दौरान भी भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का औपचारिक रूप से परित्याग नहीं किया। परिणामस्वरूप, बातचीत तथा आदशों के स्तर पर गुट-निरपेक्षता भारतीय विदेश नीति की एक विशेषता बनी रही। हालांकि, भारत ने अपनी विदेश नीति के विविध अभिप्रायों में उत्तरोत्तर अधिक यथार्थवादी आधार ग्रहण किया।

इस चरण में एशिया में शीत युद्ध की काली छाया ने भारत को भी प्रभावित किया। इसी काल में पाकिस्तान, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) द्वारा समर्थित सुरक्षा पहलों, जैसे 1954 में माउथ-ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गनाईजेशन (SEATO) और 1955 में सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाईजेशन (CENTO) से जुड़ गया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने पाकिस्तान को अस्त्र-शस्त्र भी प्रदान किए। 1962 के युद्धोपरांत भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य अल्प-अवधि के लिए सैन्य सहयोग रहा परन्तु वियतनाम युद्ध में अत्यधिक व्यस्त हो जाने के कारण 1965 के भारत-पाकिस्तान द्वितीय युद्ध के पश्चात संयुक्त राज्य अमेरिका ने दक्षिण एशिया से अपने कदम पीछे खींच लिए। 1965 के युद्ध के दौरान अमेरिका ने दोनों राष्ट्रों को सैन्य सहायता प्रदान करने पर रोक लगा दी। उपमहाद्वीप से अमेरिका के परे हट जाने के बाद, भारतीय शक्ति को संतुलित करने के लिए पाकिस्तान को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) के साथ अपने सुरक्षा सहयोग के दायरे का विस्तार करने की आवश्यकता महसूस हुयी। इसने भारत के दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के मध्य सुरक्षा गठबंधन बनने में योगदान दिया।

दूसरी ओर, PRC के साथ अपने संबंधों में आने वाले मतभेदों को देखते हुए तथा उपमहाद्वीप में अपने प्रभाव का विस्तार करने के अवसर के रूप में रूस (USSR) ने 1966 में भारत और पाकिस्तान के मध्य ताशकंद समझौते में मध्यस्थता की।

इस चरण में 1966 में जॉनसन प्रशासन के तहत वियतनाम युद्ध की आलोचना करने, कृषि नीति तथा बाजारों को खोलने को लेकर दबाव को छोड़कर, अमेरिका कमोबेश भारत की चिंताओं से अनजान ही  रहा।

 

2.2.1. चीनी परमाणु परीक्षण तथा उसके पश्चात् (The Chinese Nuclear Test and After)

1964 में लॉप नॉर में चीन द्वारा परमाणु परीक्षण करने के पश्चात्, भारतीय संसद में गुट-निरपेक्षता को छोड़ने की मांग की गयी और आग्रह किया गया कि भारत भी परमाणु अस्त्र विकसित करे। प्रधानमंत्री शास्त्री ने संयुक्त राज्य अमेरिका से परमाणु सुरक्षा के लिए निजी तौर पर सहायता की संभावना तलाशी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने (शास्त्री जी ने) यह घोषणा कि भारत स्वयं परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। 1966 में, श्री शास्त्री की उत्तराधिकारी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने महान शक्तियों से परमाणु गारंटी प्राप्त करने का भी निर्णय किया। हालांकि, इस प्रयास को कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई। इसलिए, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के सबटेरेनियन न्युक्लियर एक्सप्लोजन्स प्रॉजेक्ट (SNEP) को आरम्भ किया जिसके परिणामस्वरूप मई 1974 में भारत का प्रथम परमाणु परीक्षण किया गया।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भारत ने पार्शियल टेस्ट बैन ट्रीटी (PTBT) पर हस्ताक्षर किया था जो संधि 1963 में अस्तित्व में आई थी। संभवतः यह आशा की गई थी कि आगे चलकर यह संधि, परमाणु निःशस्त्रीकरण का मार्ग प्रशस्त करेगी। हालांकि ये आशाएँ मात्र आशाएँ ही बनीं रहीं। 1968 में हस्ताक्षर के लिए तैयार की गयी अप्रसार संधि (NPT) ने वैश्विक व्यवस्था की असमानताओं को दर्शाया। भारत ने संप्रभु समानता के मानदंडों का उल्लेख करते हुए संधि का विरोध किया, इसके साथ-साथ भारत के अपने स्वयं के परमाणु विकल्पों पर NPT द्वारा खड़े किए जाने वाले संभावित अवरोध भी महत्वपूर्ण रूप से चिंता के विषय थे।

2.2.2. निरंतरता के साथ परिवर्तन (Changes With Continuity)

इस चरण में, भारत की विदेश नीति को विश्व व्यवस्था के दो प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोणों से सामंजस्य बनाए रखने की आवश्यकता थी। एक ओर, भारत ने तब भी विऔपनिवेशीकरण के अभियान का समर्थन किया तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में कमजोर राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में इनका नेतृत्व जारी रखा। उदाहरण के लिए, यह दक्षिण अफ्रीका के नस्लीय शासन का एक कट्टर विरोधी बना रहा; यह फिलिस्तीनी पक्ष का एक दृढ़ समर्थक था। दूसरी ओर, इसने प्रतिरक्षा तत्परता के महत्व को स्वीकारा तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति के प्रयोग के अपने अधिकारों को सुरक्षित करने में सफलता प्राप्त कर ली।

1971 में गृहयुद्ध के आरंभ के पश्चात्, भारत को पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले लाखों शरणार्थियों का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई द्वारा समर्थित एक राजनीतिक एवं कूटनीतिक पहल करने की रणनीतिक दूरदर्शिता के साथ भारत ने शीघ्रता से निर्णय लिया। इस रणनीति में संभावित चीनी दखल के प्रत्युत्तर में सोवियत संघ के साथ एक सुरक्षा सहमति भी सम्मिलित थी। इस प्रकार, भारत ने अगस्त 1971 में सोवियत संघ के साथ शांति, मैत्री एवं सहयोग की 20 वर्षीय संधि पर हस्ताक्षर किए। राजनीतिक नेतृत्व द्वारा उत्तरी सीमाओं पर अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए, भारतीय सशस्त्र बल तेज़ी से पूर्वी पाकिस्तान में घुसे तथा बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में मुक्ति बाहिनी तथा शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व की सहायता की।

 

2.2.3. शिमला समझौता (The Simla Agreement)

युद्ध के पश्चात भारत ने उदार रवैया अपनाया जैसा कि पाकिस्तान के 91,000 से अधिक युद्ध बंदियों (PoWs) की रिहाई से प्रतिबिंबित होता है और 2 जुलाई 1972 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किये। यह समझौता एक शांति संधि से कहीं अधिक था। यह समझौता 1971 के युद्ध के प्रभावों को समाप्त करने का साधन था। यह भारत और पाकिस्तान के मध्य अच्छे पड़ोसी संबंधों का व्यापक खाका था। इस समझौते के निम्नलिखित सिद्धांत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:

  • प्रत्यक्ष द्विपक्षीय दृष्टिकोण के माध्यम से सभी मुद्दों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए पारस्परिक प्रतिबद्धता।
  • लोगों से लोगों के संपर्क पर विशेष ध्यान देने के साथ सहकारी संबंध का आधार निर्मित करना।
  • जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा की अनुल्लंघनीयता बनाए रखना, यह भारत और पाकिस्तान के बीच सर्वाधिक महत्वपूर्ण CBM और टिकाऊ शांति की कुंजी है।

हालांकि इस समझौते के बाह्य अर्थों में कई लोगों ने गँवाए गए मौके के रूप में इसकी आलोचना की लेकिन इसी समझौते ने वह ढांचा विकसित किया जिससे भारत ने द्विपक्षीय तंत्र के भीतर पाकिस्तान के साथ सभी विवादों को हल करने का आधार स्थापित किया।

इस अवधि की बेहतर समझ के लिए इस तथ्य के पहचान की आवश्यकता है कि जुलाई 1971 में, राष्ट्रपति निक्सन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने पाकिस्तान की यात्रा के दौरान गुप्त रूप से बीजिंग कम दौरा किया और 1972 में निक्सन की चीन यात्रा का आधार तैयार किया। ऐसा चीन-सोवियत मतभेद के परिणामस्वरूप हुआ था। अंततोगत्वा, चीन (PRC) ने संयुक्त राष्ट्र में प्रवेश किया और अक्टूबर 1971 में सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता ग्रहण की।

बृहद अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संदर्भ में, भारत 1964 में स्थापित G-77 का सक्रिय सदस्य बना रहा। यह समूह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन की मांग करने वाले विकासशील राष्ट्रों से मिलकर बना था। इसके अतिरिक्त, इसी वर्ष अरब-इज़राइल युद्ध के चलते 1973 के तेल संकट ने भारत के सामने आर्थिक चुनौती खड़ी कर दी। हालांकि, विकासशील राष्ट्रों के नेता के रूप में भी भारत पेट्रोलियम निर्यातक राष्ट्रों के संगठन (OPEC) से संसाधन-हीन विकासशील राष्ट्र के रूप में कोई सार्थक रियायत प्राप्त करने में विफल रहा। यह एक प्रकार की आर्थिक क्षमता की कमजोरी थी जिसने भारत को 1974 के बाद भी परमाणु हथियार कार्यक्रम का अनुसरण करने से रोका।

1970 के दशक के मध्य में भारत आपातकाल और 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के अंतर्गत जनता पार्टी सरकार के उद्भव के चलते राजनीतिक उथल-पुथल की अवधि से गुजरा। देसाई सरकार की संक्षिप्त अवधि “वास्तविक गुट-निरपेक्षता” की दिशा में बढ़ने सहित भारत की विदेश नीति में परिवर्तन करने वाली कई घोषणाओं की साक्षी बनी। हालांकि, यह अवधि एक संक्षिप्त अंतराल थी लेकिन इस समय भी भारत की विदेश नीति में निरंतरता उल्लेखनीय थी। इस अवधि के प्रमुख घटनाक्रम विदेशमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा और अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर की भारत यात्रा थी।

इस अवधि में शीत युद्ध के प्रभाव वाले विश्व की घटनाओं का भारत पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। इस संदर्भ में 1979 का वर्ष महत्वपूर्ण है क्योंकि तीन महत्वपूर्ण घटनाओं से सिद्ध हुआ कि भारत के राष्ट्रीय हित राष्ट्र के बाहर घटित होने वाले घटनाक्रमों से कितने प्रभावित होते हैं। सर्वप्रथम, फरवरी 1979 में ईरानी क्रांति पश्चिमी एशियाई क्षेत्र में मूलभूत परिवर्तन लाई। द्वितीय, नवंबर और दिसंबर के दौरान सऊदी अरब की ग्रैंड मॉस्क (मस्जिद) के अधिग्रहण से घटित होने वाली घटनाओं ने इस क्षेत्र में एक और उथल-पुथल को जन्म दिया जो भारत के लिए महत्वूपर्ण थीं। तृतीय, दिसंबर में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर धावा बोल दिया। जहां, पहली दो घटनाओं का भारत पर दीर्घकाल में प्रभाव पड़ा, वहीं यह अफगानिस्तान में सोवियत रूस का प्रवेश था जिसने उन घटनाओं का सिलसिला आरंभ किया जिनका आगे चलकर भारत के पड़ोस विशेष रूप से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संदर्भ में महत्वपूर्ण परिणाम निकले।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने सोवियत आक्रमण के बाद पाकिस्तान के साथ सामरिक संबंधों का नवीनीकरण किया। जनरल ज़िया-उल-हक के अधीन पाकिस्तान अफगानिस्तान में सोवियत संघ को उलझाने के अमेरिकी प्रयासों में महत्वूपर्ण बन गया। इसने पाकिस्तान के लिए वित्तपोषण और सैन्य सहायता को उस समय के लिए अपरिहार्य बना दिया जिसे अफ़गानिस्तान में अफगान लड़ाकों के माध्यम से सोवियतों के विरूद्ध भेजा जाना था। परिणामस्वरूप, पाकिस्तान पर अपनी सैन्य श्रेष्ठता बनाए रखने के उद्देश्य से भारत ने सोवियत संघ के साथ निकट सैन्य सहयोग संबंध स्थापित किया। हालांकि, इससे शायद भारत के विदेश नीति के मूल-भूत गुटनिरपेक्षता सिद्धांतों को चोट पहुँची क्योंकि इस समय भारत को अफगानिस्तान में सोवियत कब्जे पर अस्पष्ट रुख बनाए रखने के लिए मजबूर होना पड़ा।”

फिर भी, नई दिल्ली में मार्च 1983 में आयोजित 7वां NAM शिखर सम्मेलन इस बहुपक्षीय मंच का नेतृत्व पुनःसंभालने का अवसर बन गया, जिसका भारत संस्थापक सदस्य था। हालांकि, इस समय तक समूह की सदस्यता बढ़कर लगभग 100 हो गई थी जो कि 1961 में बेलग्रेड में इसके पहले शिखर सम्मेलन में 25 थी। जैसा कि इस युग की एक मीडिया रिपोर्ट में समझदारी भरे ढंग से अवलोकित किया गया था, “यह विरोधाभास है कि NAM ने स्थानिक विस्तार प्राप्त कर लिया है जिसने जवाहरलाल नेहरू सहित इसके संस्थापकों को चकित किया होता; साथ ही, इसने अपनी एकजुटता और उद्देश्यों और प्रयोजनों की एकता खो दी है तथा अविलंब समाधान की मांग करने वाली समस्याओं एवं मुद्दों का मुकाबला करने में यह असमर्थ है।”

1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधान मंत्री राजीव गांधी का कार्यकाल आया। इस अवधि में भारत ने अर्थव्यवस्था और सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की दिशा में कुछ कदम उठाए। 1988 में राजीव गांधी 1954 के बाद चीन की यात्रा करने और डेंग ज़ियाओपिंग के साथ संपर्क स्थापित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। डेंग ज़ियाओपिंग के अधीन चीन ने आर्थिक सुधारों के नए युग में प्रवेश किया था। क्षेत्रीय सहयोग की पहल 1985 में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के गठन के रूप में साकार हुई। यह अवधि-विदेश नीति के सन्दर्भ में पड़ोस में अत्यधिक सहभागिता की साक्षी बनी जिसके अंतर्गत 1989 में पाकिस्तान की यात्रा के दौरान एक-दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला नहीं करने पर पाकिस्तान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किया गया। यह 1960 में नेहरू की यात्रा के बाद किसी भारतीय प्रधान मंत्री की पहली पाकिस्तान यात्रा थी।

1987 में भारत-श्रीलंका शांति समझौता और श्रीलंका में भारतीय शांतिरक्षक बल (IPKF) भेजने का अनुवर्ती निर्णय का इस क्षेत्र पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। पड़ोस में भारत का दावा “ऑपरेशन कैक्टस” से और गहरा हुआ जिसके तहत 1988 में मालदीव में तख्तापलट के विरूद्ध सैन्य कार्रवाई की गयी थी। इस अवधि के अंत में भारत ने बृहद राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता अनुभव की जैसे कि बोफोर्स घोटाला, प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर की अल्पकालिक गठबंधन सरकारों के साथ-साथ भुगतान संतुलन का संकट। अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में बदलाव के साथ इन घटनाक्रमों ने भारत की विदेश नीति के अगले चरण को जन्म दिया।

 

2.3.1991 और उसके बाद: “व्यावहारिक विदेशी नीति का युग (1991 And After: Era of “Pragmatic” Foreign Policy)

सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध के अंत के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में परिवर्तन ने भारत की विदेश नीति को नई दिशा देना अनिवार्य बना दिया। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शीतयुद्धोत्तर युग के आरंभ में, अमेरिका के उत्थान ने विदेश नीति में विचारधारा की प्रासंगिकता के साथ-साथ गुटनिरपेक्षता के विकल्प पर कई प्रश्नचिन्ह लगा दिए। आर्थिक मोर्चे पर राष्ट्र को 1991 के पहले खाड़ी युद्ध के परिणामस्वरूप आंशिक रूप से भुगतान संतुलन के अभूतपूर्व संकट का सामना करना पड़ा। इस स्थिति ने उन विकल्पों को जन्म दिया जिन्होंने नाटकीय रूप से भारत की घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों को बदल दिया। इसमें IMF और विश्व बैंक द्वारा समर्थित वाशिंगटन सहमति का अनुपालन सम्मिलित था। वस्तुतः, इसका अर्थ तत्काल वित्तीय सहायता के बदले बाजार बलों की भूमिका में वृद्धि करने वाले संरचनात्मक सुधार थे। इसका अर्थ भारत की अर्थव्यवस्था रूपांतरित करने के लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) की अत्यधिक आवश्यकता थी। भारत को FDI का आकर्षक गंतव्य बनाने हेतु, इस चरण में कई परिवर्तनों को अपनाया गया, जैसे कि: –

  • आयात-प्रतिस्थापक औद्योगीकरण की रणनीति पर विराम,
  • अपने विशाल सार्वजनिक क्षेत्र का पुनर्गठन करना
  • विनियमन, लाइसेंस, परमिट और कोटा की पिछली व्यवस्थाओं को समाप्त करना।

साथ ही भारत आर्थिक और रणनीतिक लाभ के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर मुड़ा। पूर्व में, शीत युद्ध की अवधि में भारत ने दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को बहुत कम महत्व दिया था। अपने बाजारों को विदेशी निवेश के लिए खोलने और व्यवहार्य निर्यात क्षेत्र के विकास हेतु भारत ने 1991 के बाद “पूर्व की ओर देखो नीति” (लुक ईस्ट पॉलिसी) आरंभ की। जहां ये परिवर्तन जारी थे, वहीं 1992 में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने इजरायल और फिलिस्तीन के बीच ओस्लो समझौते के संदर्भ में, इजरायल के साथ अपने राजनयिक संबंधों का उन्न्यन करके राजदूत स्तर का कर दिया।

चीन के साथ नरसिम्हा राव सरकार ने राजीव गांधी सरकार के दौरान आरंभ की गई प्रक्रिया को जारी रखा। सितंबर 1993 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की चीन यात्रा के दौरान भारत-चीन सीमा पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किये गये इसके बाद 1996 में चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन की भारत यात्रा के दौरान सैन्य क्षेत्र में विश्वास-बहाली उपायों (CBM) पर एक और समझौते पर हस्ताक्षर किया गया।

अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों में परिवर्तन लाने के लिए भारत ने अपनी रणनीति का पुनर्मूल्यांकन किया। पड़ोस को भारत की विदेश नीति के पहले संकेंद्र के रूप में पड़ोसी देशों की पहचान की गयी और नीतिगत रूप से यह 1996 के गुजराल सिद्धांत में प्रतिबिंबित हुआ जिसका नाम तत्कालीन विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल के नाम पर रखा गया था।

 

गुजराल सिद्धांत के पांच प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार थे:

  • पड़ोसियों अर्थात बांग्लाराष्ट्र, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका से भारत को पारस्परिकता (reciprocity) की मांग नहीं करनी चाहिए, बल्कि वह सब देना चाहिए जो कुछ भारत विश्वास के साथ दे सकता है।
  • कोई भी दक्षिण एशियाई राष्ट्र किसी अन्य राष्ट्र के हित के विरूद्ध अपने क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति नहीं देगा।
  • कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  • दक्षिण एशियाई राष्ट्रों को एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए।
  • दक्षिण एशिया के राष्ट्रों को शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से अपने सभी विवादों को सुलझाना चाहिए।

हालांकि, 1990 के दशक के दौरान भारत-पाकिस्तान के साथ संबंध अधिकांशतः विवादित बने रहे। ऐसा मुख्य रूप से दिसंबर 1989 से जम्मू-कश्मीर में फैली आतंकी गतिविधिओं में पाकिस्तान की भूमिका के कारण था। पाकिस्तानी नेतृत्व ने आंतरिक उग्रवाद को वैचारिक रूप से आवेशित छद्म युद्ध में बदलने में सहायता की। पाकिस्तान पोषित उग्रवाद और पकिस्तान के गुप्त परमाणु कार्यक्रम को देखते हुए पारंपरिक सैन्य संतुलन के संबंध में चिंताओं ने भारत की सुरक्षा रणनीति में बड़ी भूमिका निभाई। पाकिस्तानी कारक और चीन द्वारा खड़े किए गए परमाणु खतरे को देखते हुए भारत ने अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को अगले चरण में पहुँचाया। इस परिदृश्य में, 1995 में NPT का सफल विस्तार और 1996 में प्रस्तुत CTBT को सफल बनाने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किए जा रहे प्रयास और भारत द्वारा अपने परमाणु विकल्पों पर गंभीरता से विचार करने का मामला संयोगवश एक-दूसरे से टकरा गए। इस प्रकार, भारतीय नीति निर्माताओं ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु व्यवस्था स्वीकार करने के बढ़ते दबावों को विफल करने के लिए परमाणु परीक्षण करने का निर्णय किया। भारत ने मई 1998 में पोखरण में 5 परमाणु परीक्षणों के बाद अपने आपको पूरी तरह से परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित किया। इसने संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य बड़ी शक्तियों को भारत पर विभिन्न प्रतिबंध लगाने को प्रेरित किया; और बाद के वर्षों में भारत को वास्तविक रूप से परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त किया।

 

2.3.1. एक नए युग का सूत्रपात (Beginning of A New Era)

यह संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ नए संबंधों के युग का आरम्भ भी था, जिसमें अमेरिकी विदेश मामलों के उप-सचिव स्ट्रोब टालबोट और भारत के विदेशमंत्री जसवंत सिंह (1998-2000) के मध्य द्विपक्षीय वार्ता सम्मिलित थी। इसके पश्चात 2000 में राष्ट्रपति क्लिटन की भारत यात्रा हुई। इन संबंधों की परिणति 2005 के सिविल न्यूक्लियर डील के रूप में हुई, जिसने भारत को एक परमाणु शक्ति के साथ-साथ परमाणु अप्रसार पर एक जिम्मेदार देश के रूप में मान्यता दी, इस प्रकार बहुपक्षीय निर्यात नियन्त्रण व्यवस्था (MECR) जैसी प्रौद्योगिकी व्यवस्थाओं से इसके अलगाव की समाप्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

पाकिस्तान के साथ प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की कूटनीति से (जिसमें 1999 में प्रधानमन्त्री की सीमापार बस-यात्रा भी सम्मिलित थी) कुछ अधिक परिणाम प्राप्त नहीं हो सके। फरवरी 1999 की लाहौर घोषणा के पश्चात जम्मू-कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ हुई जिसके परिणामस्वरूप दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच 1999 में सीमित युद्ध हुआ। इस उकसावे के बावजूद भारत ने उल्लेखनीय संयम प्रदर्शित किया और एक संभावित विस्तृत युद्ध को प्रभावी ढंग से टाला। महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की वाशिंगटन यात्रा में गर्मजोशी का नितांत अभाव था। शायद यह भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सम्बन्धों में ही रहे परिवर्तनों का संकेत था।

भारत के लिए सदैव से महत्त्वपूर्ण चुनौती रहा आतंकवाद शीत युद्ध के पश्चात (विशेष रूप से 11 सितम्बर 2001 के आतंकवादी हमलों के पश्चात) वैश्विक राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन कर उभरा, दिसम्बर 2001 में, भारतीय संसद पर आतंकवादी हमले के पश्चात, भारत ने प्रतिरोधी कूटनीतिक (coercive diplomacy) रणनीति का सहारा लिया, जिसके सीमित परिणाम प्राप्त हुए। पाकिस्तान की आतंकवाद को समर्थन देने की रणनीति के विरुद्ध भारत के पास बहुत ही सीमित विकल्प थे क्योंकि पाकिस्तान की परमाणु क्षमता का अर्थ था दोनों देशों के मध्य होने वाले किसी भी युद्ध के परमाणु युद्ध में परिवर्तित होने की अत्यधिक संभावना। और ऐसी स्थितियाँ संयुक्त राज्य अमेरिका के इस क्षेत्र में हस्तक्षेप के लिए खुला आमंत्रण थीं। इसीलिए, भारत आतंकवाद को एक गम्भीर वैश्विक संकट के रूप मान्यता देने की मांग कर रहा है, जिसके विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा एक समेकित कार्यवाही की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के लिए भारत 1996 से संयुक्त राष्ट्र में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक अभिसमय (Comprehensive Convention Against Intemational Terrorism) के लिए प्रयासरत है, यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में मतभेदों के कारण बहुत अधिक सफलता प्राप्त नहीं हुई है। फिर भी, मुम्बई में 2008 के हमलों के पश्चात पाकिस्तान के प्रति एक बड़ा अलगाव प्रदर्शित हुआ तथा भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य घनिष्ठ आतंकवाद विरोधी सहयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ।

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में हुए परिवर्तनों ने भारत के समक्ष कुछ विकल्प प्रस्तुत किये और अनुक्रिया के रूप में कई परिवर्तन किये गये। फिर भी समावेशी विकास और निष्पक्ष विश्व व्यवस्था के प्रति इसकी प्रतिबद्धता इसकी नीति का नियमित पक्ष बना हुआ है। उदाहरण के लिए, WTO वार्ताएँ, विशेष रूप से दोहा विकास दौर में, भारत ने विकासशील राष्ट्रों की चिन्ताओं का नेतृत्व किया। 2001 की दोहा घोषणा, उन मूल्यों का प्रमाण है, जो भारत अभी भी अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में बनाए हुए है। इसी प्रकार, भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए, जलवायु वार्ताओं में अपनी भूमिका में परिलक्षित निष्पक्षता और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों से संकोच नहीं किया है। यहाँ भी भारत ने सामान सोच वाले राष्ट्रों जैसे ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन (BASIC) के साथ एक गठबंधन बनाने से परहेज नहीं किया।

अपने शिक्षित श्रमशक्ति, सैन्य और तकनीकी कौशल के साथ भारत की आर्थिक स्थिति ने 1991 के पश्चात से वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। इन कारकों ने भारत को एक उभरती हुई शक्ति और सम्भावित महाशक्ति के रूप में वर्गीकृत किया है। 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान, भारत ने G-20 जैसे माध्यमों के द्वारा वैश्विक वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि, G-4 के साथ संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की इसकी मुहिम सफल नहीं हुई है। फिर भी, BRICS जैसे समूह के माध्यम से भारत ने बहुपक्षीय प्रयासों के द्वारा वैश्विक व्यवस्था को पुन: आकार देने की अपनी इच्छा व्यक्त की है।

इन उद्देश्यों, चुनौतियों और अवसरों ने 2014 से प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विदेश नीति निर्माण को आकार प्रदान करना जारी रखा है। इस प्रकार, हाल के वर्षों में, पड़ोसी राष्ट्रों को विशेष मान्यता प्राप्त हुई है, इसी प्रकार अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में प्रमुख देशों के साथ नए और घनिष्ठ संबंध बने है। मिसाइल प्रौद्योगिकी नियन्त्रण व्यवस्था (2016), वासेनार व्यवस्था (2017) और आस्ट्रेलिया समूह (2018) की सदस्यता हाल ही के वर्षों की भारत की कुछ उपलब्धियाँ हैं, हालांकि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।

 

उपर्युक्त चर्चा के आधार पर-

  1. इस चरण की कुछ उपलब्धियों की पहचान की जा सकती है:
  • आर्थिक विकास
  • परमाणु क्षमता की मान्यता
  • मुख्य सम्बन्ध: अमेरिका, जापान, रूस, दक्षिण-पूर्व एशिया
  • चीन के साथ सम्बन्धों का प्रबन्धन: सीमा विवाद के बावजूद व्यापार में सुधार।
  • प्रौद्योगिकी व्यवस्था में अलगाव की समाप्ति – MTCR, वासेनार व्यवस्था और आस्ट्रेलिया समूह।
  • वैश्विक व्यवस्था में पारगमन प्रबन्धन और राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए बहुपक्षीयता और बहु-ध्रुवीयता- BASIC, BRICS, IBSA इत्यादि।
  1. प्रमुख चुनौतियाँ जो अभी बाकी हैं:
  • जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग करने के लिए राष्ट्र की आर्थिक विकास दर को बनाए रखना,
  • ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना,
  • संविधान के ढांचे में राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा समस्याओं का समाधान करना,
  • पड़ोसी राष्ट्रों के साथ सम्बन्ध सुदृढ़ बनाना, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे राजनीतिक, आर्थिक रूप से और यहाँ तक कि पारिस्थितिकी रूप से भी सम्पन्न हों।
  1. रणनीतिक रूप से कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर भारत को निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है:
  • पाकिस्तान के साथ विवादास्पद सम्बन्धों को कैसे प्रबन्धित करें?
  • शक्तिशाली होते चीन के प्रति भारत कैसे अनुक्रिया करता है?
  • आने वाले वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ भारत के सम्बन्धों की स्थिति कैसी होगी?
  • वैश्विक शासन (UN, IMF और विश्व बैंक, WTO इत्यादि) की सरंचना को कैसे पुन: आकार दिया जाए?
  • आतंकवाद के खतरे के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन जैसी उभरती हुई चुनौतियों से कैसे निपटा जाए?

हम इस अध्याय में उल्लिखित विचारों और अवधारणाओं पर विशिष्ट सम्बन्धों और संगठनों के सन्दर्भ में अधिक विस्तार में विचार करेंगे।