UPSC DAILY CURRENT 02-07-2018

चुनावी बॉण्‍ड योजना, 2018

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हाल ही में भारत सरकार ने चुनावी बॉण्ड योजना, 2018 को अधिसूचित किया है। योजना के प्रावधानों के अनुसार, चुनावी बॉण्‍ड की खरीद ऐसे व्‍यक्ति/संस्था द्वारा की जा सकती है, जो भारत का नागरिक हो या भारत में निगमित या स्‍थापित हो।

  • व्‍यक्ति विशेष के रूप में कोई भी व्‍यक्ति एकल या अन्‍य व्‍यक्तियों के साथ संयुक्‍त रूप से चुनावी बॉण्‍डों की खरीद कर सकता है।
  • केवल वैसी राजनीतिक पार्टियाँ, जो जन-प्रतिनिधित्‍व अधिनियम, 1951 (1951 का 43)  के अनुच्‍छेद 29ए के तहत पंजीकृत हैं और जिन्होंने आम लोकसभा चुनाव या राज्‍य विधानसभा चुनावों  में डाले गए मतों का कम-से-कम एक प्रतिशत मत प्राप्त किये हों, चुनावी बॉण्‍ड प्राप्‍त करने की पात्र होंगी।
  • चुनावी बॉण्‍डों को किसी योग्‍य राजनीतिक पार्टी द्वारा केवल अधिकृत बैंक के किसी बैंक खाते के माध्‍यम से ही भुनाया जा सकेगा।
  • बिक्री के चौथे चरण में भारतीय स्‍टेट बैंक को अपनी 11 अधिकृत शाखाओं (सूची संलग्‍न) के माध्‍यम से 02 जुलाई, 2018 से 11 जुलाई, 2018 तक चुनावी बॉण्‍डों को जारी करने तथा भुनाने के लिये अधिकृत किया गया है।

उल्लेखनीय है कि चुनावी बॉण्‍ड जारी करने की तारीख से 15 दिनों के लिये वैध होंगे। वैधता की अवधि समाप्त होने के बाद जमा किये गए चुनावी बॉण्‍डों पर राजनीतिक दल को कोई भुगतान नहीं किया जाएगा। राजनीतिक दल द्वारा जमा किये गए चुनावी बॉण्‍डों की राशि को उसी दिन उनके बैंक खाते में जमा कर दिया जाएगा।

हायाबुसा 2

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जापानी एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी ने जीवन की उत्पत्ति के रहस्य से पर्दा उठाने हेतु जानकारी एकत्रित करने के लिये दिसंबर 2014 में हायाबुसा-2 नामक एक अभियान लॉन्च किया था, जो कि साढ़े तीन साल की यात्रा के बाद पृथ्वी से 30 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित क्षुद्रग्रह ‘रायगु’ (वैज्ञानिक नाम 162173 JU3) पर पहुँच गया है। इस अभियान का संचालन छह वर्षों के लिये किया जाएगा। इसका नाम फाल्कन पक्षी के नाम पर रखा गया है जिसे जापानी भाषा में हायाबुसा कहा जाता है।

  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, सौरमंडल के विकास के शुरुआती चरण में ही क्षुद्रग्रह का निर्माण हो गया था। इसी आधार पर उन्होंने ‘रायगु’ पर जैविक पदार्थ, पानी और जीवन की उत्पत्ति के लिये ज़रूरी मूलभूत तत्त्वों के बड़ी मात्रा में उपलब्ध होने की संभावना व्यक्त की है।

हायाबुसा – 2 की विशेषताएँ

  • यह आकार में एक बड़े फ्रिज के बराबर है, इसकी सबसे ख़ास बात यह है कि इसमें सोलर पैनल लगे हैं।
  • हायाबुसा-2 में गाइडेंस नेविगेशन सिस्‍टम के अलावा एल्‍टीट्यूड कंट्रोल सिस्‍टम लगा है।
  • सबसे पहले हायाबुसा – 2 ‘रायगु’ से 20 किलोमीटर ऊपर रहकर उसका चक्कर लगाएगा और सतह पर उतरने से पहले उसका नक्शा तैयार करेगा।
  • इसके बाद क्षुद्रग्रह के एक क्रेटर को ब्लास्ट कर मलबा जमा किया जाएगा। शेष समय में (18 महीने) एस्टरॉइड के नमूने एकत्रित कर 2020 के अंत तक यह पृथ्वी पर लौट आएगा।

पृष्ठभूमि

  • उल्लेखनीय है कि इससे पहले हायाबुसा-1 लॉन्च किया गया था लेकिन यह बहुत अधिक नमूने नहीं जुटा पाया, हालाँकि किसी क्षुद्रग्रह से पृथ्वी पर नमूने लाने वाला यह अपनी तरह का पहला अभियान था। हायाबुसा-1 अपने सात साल के लंबे सफर के बाद 2010 में समाप्त हो गया था।
  • हायाबुसा-2 को सबसे पहले 30 नवंबर, 2014 में लॉन्‍च किया जाना था, लेकिन कुछ तकनीकी गड़बड़ी के कारण इसे 3 दिसंबर, 2014 को लॉन्‍च किया गया।
Re unite एप

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केंद्रीय वाणिज्य एंव उद्योग मंत्रालय ने ‘रीयूनाइट’ (Re unite) नामक एक मोबाइल एप लॉन्च किया है। इस एप की सहायता से देश में खोए हुए बच्चों का पता लगाने में सहायता मिलेगी। इस एप को विकसित करने में स्वयंसेवी संगठन ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ और ‘कैपजेमिनी’ (Capgemini) ने सहायता की है।

  • खोए हुए बच्चों को उनके माता-पिता से मिलाने का यह प्रयास, तकनीक के उत्कृष्ट उपयोग को दर्शाता है। यह एप जीवन से जुड़ी सामाजिक चुनौतियों से निपटने में मदद करेगा।
  • इस एप के माध्यम से माता-पिता बच्चों की तस्वीरें, बच्चों का विवरण जैसे- नाम, पता, जन्म चिन्ह आदि अपलोड कर सकते हैं, पुलिस स्टेशन को रिपोर्ट कर सकते हैं तथा खोए बच्चों की पहचान कर सकते हैं।
  • खोए हुए बच्चों की पहचान करने के लिये एमेजन रिकोगनिशन (Amazon Rekognition), वेब आधारित फेशियल रिकोगनिशन जैसी सेवाओं (web facial recognition service) का उपयोग किया जा रहा है। यह एप एंड्राएड और आईओएस दोनों ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

बच्चों की सुरक्षा के संदर्भ में ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ (Bachpan Bachao Andolan -BBA) भारत का सबसे बड़ा आंदोलन है। बीबीए ने बच्चों के अधिकारों के संरक्षण से संबंधित कानून निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह आंदोलन 2006 के निठारी मामले से शुरू हुआ है।

शनि ग्रह के उपग्रह इंसेलेडस पर मिले जीवन के संकेत

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अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के कैसिनी अंतरिक्ष यान द्वारा एकत्रित डाटा का अध्ययन करने के बाद शनि के उपग्रह इंसेलेडस पर जीवन की संभावना के संकेत मिले हैं। शोधकर्त्ताओं के अनुसार, इंसेलेडस की बर्फीली सतह पर कई दरारें पाई गई हैं, जिनमें जैविक कार्बनिक अणुओं की खोज की गई है

  • इन अणुओं की खोज से शनि के उपग्रह पर जीवन होने का संकेत और भी प्रबल हो गया है।
  • इस शोध से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इन जैविक कार्बनिक अणुओं का निर्माण उपग्रह की पथरीली कोर और वहाँ उपस्थित महासागर के गर्म पानी के बीच हुई रासायनिक प्रक्रिया के कारण हुआ है।
  • शनि के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिये नासा ने इटली और यूरोप की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ मिलकर संयुक्त रूप से कैसिनी अभियान को शुरू किया था। यह अभियान सितंबर 2017 में समाप्त हो गया था।
  • इससे पहले शोधकर्त्ताओं ने इंसेलेडस पर कुछ कार्बन परमाणु वाले आर्गनिक अणुओं की खोज की थी। इस बार जिन अणुओं की खोज हुई है वह मीथेन से भी दस गुना अधिक भारी हैं।
  • इस खोज के पश्चात् यह उपग्रह पृथ्वी के बाद जीवन की संभावना हेतु ज़रूरी सभी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने वाला पहला खगोलीय पिंड बन गया है।

इससे पहले वहाँ  महासागर होने के भी सबूत मिले थे। पृथ्वी के महासागरों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों को हाइड्रोजन से ही रासायनिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इस आधार पर माना जा रहा है कि शनि के उपग्रह पर भी सूक्ष्मजीव हो सकते हैं।

 

सांगली की हल्दी को मिला जीआई टैग

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3 : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड-13 : सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टेक्नोलॉजी, बायो-टेक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरूकता)

Sangali Turmeric

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय पेटेंट कार्यालय ने महाराष्ट्र स्थित सांगली की हल्दी को ज्यॉग्राफिकल इंडेक्स (जीआई) रैकिंग प्रदान की। सांगली में हल्दी की खेती करने वाले किसान लंबे समय से ‘सांगली ची हलद’ यानी सांगली की हल्दी को जीआई टैग देने की मांग कर रहे थे।

जीआई टैग का लाभ

इस उपलब्धि के चलते सांगली की हल्दी को ‘सांगली’ ब्रांड के नाम से पूरे भारत के साथ-साथ विदेश में भी बेचा जा सकेगा। कोई भी अन्य संस्थान, कंपनी अथवा व्यक्ति ‘सांगली हलद’ के नाम से इसकी बिक्री नहीं कर सकेगा। इसे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में सांगली ब्रांड के नाम से पहचान प्राप्त होगी।

सांगली की हल्दी

  • यह फसल यहाँ के किसानों के लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
  • माना जाता है कि सांगली के किसानों द्वारा लगभग 200 साल पहले हल्दी के उत्पादन तथा भंडारण का एक विशिष्ट तरीका खोजा गया था।
  • इस तरीके के तहत किसान हल्दी को ज़मीन के नीचे काफ़ी गहराई में दबा देते थे ऐसा करने से ऑक्सीजन हल्दी तक नहीं पहुँच पाती थी तथा शीघ्र ख़राब भी नहीं होती थी।
  • इस तकनीक के प्रयोग से न केवल हल्दी की पैदावार में वृद्धि हुई बल्कि इसकी गुणवत्ता तथा स्वाद में भी वृद्धि हुई जिसके कारण यह पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गई।

सांगली 

सांगली महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों में से एक है। यह शहर पश्चिम-दक्षिण महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के तट पर अवस्थित है। यह शहर पूर्व में सांगली राज्य (1761-1947) की राजधानी था। इसके आस-पास का क्षेत्र कृषि उत्पादन के लिये प्रसिद्ध है। यहाँ की मुख्य फसलें ज्वार, गेहूं तथा दलहन हैं। अंगूर भी इस क्षेत्र में विशेष रूप से उगाई जाती है तथा इसका भी एक बड़ा बाज़ार है। गन्ना इस क्षेत्र की मुख्य सिंचित फसल है जिसने कई चीनी मिलों के विकास में सहायता की है।

 

साइंस स्टार्ट-अप इन्क्यूबेशन को बढ़ावा देगा IISC

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3 : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड-13 : सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टेक्नोलॉजी, बायो-टेक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरूकता)

IISC

चर्चा में क्यों?

वर्ष 1909 में जमशेदजी टाटा और मैसूर के पूर्व महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science) की स्थापना की थी। अपनी स्थापना के बाद से संस्थान ने विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में बहुत-सी उपलब्धियाँ हासिल की है। आईआईएस, साइंस टेक कंपनियों को विकसित करने हेतु अगले तीन वर्षों में बंगलरू में एक शोध पार्क खोलने की योजना बना रहा है।

कॉर्पोरेट सहयोग

  • इस कार्य को सुचारु रूप से पूरा करने के लिये आईआईएस द्वारा टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़, वोल्वो, गूगल इंक, जनरल मोटर्स, माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च, आईबीएम रिसर्च, बोइंग, रॉबर्ट बॉश फाउंडेशन और प्रैट एंड व्हिटनी जैसी कंपनियों का भी सहयोग लिया जा रहा है।
  • इसके अलावा यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (Aeronautical Development Agency) और सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (Centre for Development of Advanced Computing) के साथ मिलकर काम कर रहा है।
  • इसके अतिरिक्त सोसाइटी फॉर इनोवेशन एंड डेवलपमेंट आर्म (एक अंतर अनुशासनिक निकाय) के अंतर्गत शामिल लगभग 12 कंपनियों द्वारा एंडोस्कोपी के लिये उपयोग किये जाने वाले सिमुलेटर, कम लागत पर इंटरनेट की पहुँच सुनिश्चित करने हेतु माइक्रोसाइटेलाइट्स, एक मेडिकल डायग्नोस्टिक किट और चंदन से तेल निकालने हेतु एक सुपरवेव तकनीक को शामिल किया गया है।

प्रमुख उपलब्धियाँ

पाथशोध (Pathshodh) क्या है?

  • यह सुपरवेव प्रौद्योगिकी का उपयोग करने वाला एक उपकरण है। इसकी सहायता से मरीज़ को बिना सुई लगाए दवा दी जा सकती है।
  • इसके अलावा संस्थान ने खुले दूषित [नमूना] जल को साफ जल में परिवर्तित करने में सफलता हासिल की है।
  • इसी प्रकार वैज्ञानिकों द्वारा एक वातानुकूलित कंबल का भी आविष्कार किया गया है। यह बहुत-सी परतों वाला एक कंबल है जो कि व्यक्तिगत एयर कंडिशनर के रूप में कार्य करता है। इसके लिये पूरे कमरे को ठंडा करने की ज़रूरत नहीं होती है।

रॉबर्ट बॉश सेंटर (Robert Bosch Centre)

  • साइबर-भौतिक प्रणालियों (Cyber-Physical Systems) के लिये 2011 में रॉबर्ट बॉश सेंटर की स्थापना की गई। साइबर-भौतिक प्रणालियों में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिये इसे एक अंतःविषय अनुसंधान (interdisciplinary research) और अकादमिक केंद्र के रूप में स्थापित किया गया।

एंडोस्कोपी सिम्युलेटर (Endoscopy Simulator)

  • संस्थान से संबद्ध मिमिक मेडिकल सिम्युलेशन (Mimyk Medical Simulations) ने गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट (gastroenterologists) के लिये एंडोस्कोपी सिम्युलेटर (Endoscopy Simulator) विकसित किया है।
  • इसके अलावा इंटरनेट ऑफ थिंग्स पर आधारित एक भौतिक नेटवर्क के संबंध में काम किया गया है जहाँ एक डिवाइस दूसरे डिवाइस से बात कर सकती हैं।
  • इसके साथ-साथ रोबोटिक्स (robotics) और स्वायत्त प्रणाली (autonomous systems) जैसी व्यवस्थाओं के संबंध में अनुसंधान प्रगति पर हैं।
  • इन सबके अलावा भविष्य की परियोजनाओं में सबसे महत्त्वाकांक्षी परियोजना फ्लाइंग कार यानी उड़ने वाली कार की है। इस कार्य के संबंध में अनुसंधान प्रगति है, साथ ही विभिन्न स्रोतों से फंडिंग भी प्राप्त हो रही है।