UPSC DAILY CURRENT 10-05-2018

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हाल ही में पंजाब सरकार ने डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर सिंधु नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन (Indus Dolphin) की गणना आरंभ की है। इस संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. सिंधु डॉल्फिन केवल भारत में पाई जाती है।
  2. भारत में यह डॉल्फिन केवल ब्यास नदी में पाई जाती है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2
Hide Answer –

उत्तरः (b)
व्याख्याः 

 सिंधु डॉल्फिन (Indus Dolphin)

fish

  • हाल ही में सिंधु डॉल्फिन (Indus Dolphin) के संरक्षण के उद्देश्य से पंजाब सरकार ने डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर इसकी गणना का कार्य शुरू किया है। यह विश्व की विलुप्तप्राय  स्तनधारी प्रजाति है।
  • सिंधु नदी में पाई जाने वाली यह डॉल्फिन केवल भारत और पाकिस्तान के मध्य 185 किलोमीटर के क्षेत्र में डॉल्फिन तलवाडा तथा हरिके पत्तन के बीच पाई जाती है। सिंधु डॉल्फिन सिंधु नदी के में पाए जाने वाली नदी डॉल्फ़िन की एक उप-प्रजाति है। अतः पहला कथन असत्य है।
  • यह भारत की पहली संगठित डॉल्फिन गणना है जिसे पाँच वर्ष की अवधि में पूरा किया जाना है। पंजाब सरकार के वन एवं वन्यजीव संरक्षण विभाग तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया इस कार्य को मिलकर पूरा करेंगे।
  • भारत में इस प्रजाति की सिंधु डॉल्फिन की संख्या बहुत कम है जो कि केवल ब्यास नदी में पाई जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, सदियों पहले इस प्रजाति की डॉल्फिन सतलुज नदी में भी पाई जाती थी। सतलुज में हुए प्रदूषण एवं शहरीकरण के कारण इस नदी की सभी डॉल्फिन विलुप्त हो गईं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) के अनुसार वर्ष 1944 से अब तक इस क्षेत्र में पाई जानी वाली डॉल्फिन की संख्या में 50 प्रतिशत की कमी आई है। अतः दूसरा कथन सत्य है।
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ग्रीष्म लहर (हीट वेव) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. यह असामान्य रूप से अधिकतम ताप की वह अवधि है जो भारत के उत्तर पश्चिमी भागों में ग्रीष्म ऋतु में होती है।
  2. ग्रीष्म लहर के लिये पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तथा मैदानी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक होना चाहिये।

उपरोक्त में से  कौन सा/से कथन सत्य है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2
Hide Answer –

उत्तर (a) 
व्याख्या:

  • ग्रीष्म लहर असामान्य रूप से अधिक तापमान की वह अवधि है, जिसमें सामान्यतः अधिकतम तापमान से अधिक तापमान रहता है। यह परिघटना उत्तर-पश्चिमी भारत में ग्रीष्म ऋतु (मार्च-जून) में देखी जाती है। अतः कथन 1 सही है।
  • भारतीय मौसम विभाग की परिभाषा के अनुसार किसी स्थान का तापमान (मैदानी क्षेत्रों में 40 डिग्री सेल्सियस तथा पहाड़ी क्षेत्रों में 30 डिग्री सेल्सियस) से अधिक होने पर उसे ग्रीष्म लहर की संज्ञा दी जाती है। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • इसके अतिरिक्त यदि किसी स्थान का सामान्य तापमान ही 40 डिग्री से अधिक हो, तो ऐसे स्थान में ग्रीष्म लहर को तापमान के सामान्य से 4 से 7 डिग्री तक अधिक होने के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • यदि किसी स्थान का अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है, तो वहाँ के सामान्य तापमान का विचार किये बिना ग्रीष्म लहर की घोषणा कर दी जानी चाहिये।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण ग्रीष्म लहर की घटनाओं की आवृत्ति काफ़ी अधिक हो गई है।
  • ग्रीष्म लहर के परिणामस्वरूप स्वास्थ्य पर हीट क्रैम्प्स, थकान , हीट स्ट्रोक इत्यादि जैसे प्रभाव हो सकते हैं।
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कैसल डॉक्ट्रिन (Castle doctrine) क्या है?

A) यह अपराधी द्वारा मंशा के अतिरिक्त किये गए अन्य अपराध को दी गई संज्ञा है।
B) यह दो देशों के बीच एक प्रकार का शांति समझौता है।
C) यह अपने घर के बचाव में प्रयुक्त हिंसा के लिये प्रयुक्त विधिक शब्द है।
D) यह किसी गवर्नर जनरल द्वारा भारतीय शासकों पर आरोपित एक नियम है।
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उत्तर (c)
व्याख्या:

कैसल डॉक्ट्रिन अपने घर के बचाव में प्रयुक्त हिंसा के लिये प्रयुक्त विधिक शब्द है। सामान्य विधि परंपरा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपने आवास अथवा कार्यस्थल जैसे स्थान जो उसकी निजी संपत्ति हो, वहाँ किसी अतिक्रमी के विरुद्ध हिंसा का प्रयोग करे तो उसे कानूनन दंडरक्षा (इम्युनिटी) प्राप्त होती है। ऐसे में हिंसा का प्रयोग करने  वाले व्यक्ति को उपयुक्त साक्ष्यों के साथ अपने कार्य को न्यायसंगत सिद्ध करना होगा तथा यह बतलाना होगा कि उस स्थिति में अपने द्वारा बलप्रयोग एक उचित तथा तर्कसंगत प्रतिक्रिया थी। अपराधी द्वारा मंशा के अतिरिक्त किये गए अन्य अपराधों को एक्टस रियस (actus reus) कहा जाता है।
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“थोलू बोम्मलता” (Tholu Bommalata) के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सत्य हैं?

  1. यह तमिल नाडु की कठपुतली कला है, जिसमें छड़ तथा धागा कठपुतली-दोनों की तकनीक का प्रयोग किया जाता है।
  2. इसमें चमड़े के बनी कठपुतलियाँ प्रयुक्त होती हैं।
  3. इसके विषय रामायण, महाभारत तथा पुराणों से प्रेरित होते हैं।

कूट:

A) केवल 1 और 2
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 और 3
D) उपर्युक्त सभी।
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उत्तर (b)
व्याख्या:

थोलू बोम्मलता” (Tholu Bommalata)

tholu-bommalata

  • थोलू बोम्मलता आंध्र प्रदेश की छाया कठपुतली कला है। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • इसमें चमड़े के बनी कठपुतलियाँ प्रयुक्त होती हैं। अतः कथन 2 सही है।
  • ये कठपुतलियाँ आकार में बड़ी होती हैं तथा दोनों ओर रंगी हुई होती हैं। इस कारण ये पर्दे पर रंगीन छाया बनाती हैं।
  • इसका संगीत, इस क्षेत्र के शास्त्रीय संगीत से प्रेरित होता है।
  • इसके विषय रामायण, महाभारत तथा पुराणों से प्रेरित होते हैं। अतः कथन 3 सही है।
  • इसमें कठपुतलियाँ धागों से जुडी होती हैं जिसे पीछे से छालों के मदद से नचाया जाता है।
  • कुछ कठपुतलियों के हाथ और पैर भी जुड़े होते हैं।
  • यह कठपुतली कला दिखाने वाले ज्यादातर घुमक्कड़ होते हैं तथा वर्तमान में इनकी संख्या काफी कम रह गई है।

नोट: ‘बोम्मलता’ तमिल नाडु की कठपुतली कला है, जिसमें छड़ तथा धागा कठपुतली दोनों की तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

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स्वयं (SWAYAM) पोर्टल संबंधित है:

A) शिक्षा से
B) स्वास्थ्य से
C) व्यापार से
D) कृषि से
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उत्तर: (a)
व्याख्या:

स्वयं (SWAYAM-Study Webs of Active Learning for Young Aspiring Minds) पोर्ट

  • मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने समावेशी उच्च शिक्षा तक पहुँच को आसान बनाने के लिये स्वयं वेब पोर्टल की शुरुआत की है। इस योजना का पूरा नाम ‘स्टडी वेब्स ऑफ एक्टिव लर्निंग फॉर यंग इंस्पायरिंग माइंड्स’ यानी स्वयं है। इस वेब पोर्टल को स्पेशियली ज़्यादा-से-ज़्यादा स्टूडेंट्स को ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल प्रोवाइड करवाने के लिये लॉन्च किया गया है।
  • पहुँच, गुणवत्ता और समता जैसे सिद्धांतों पर आधारित स्वयं पोर्टल सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के इस्तेमाल से ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के लिये समर्पित एकीकृत प्लेटफॉर्म है। यह उच्च शिक्षा के सभी विषयों और कौशल क्षेत्रों को कवर करता है।
  • इस वेब पोर्टल में विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिये आवेदन और स्टडी मैटेरियल प्राप्त करने का रास्ता आसान होगा। यह वेब पोर्टल विभिन्न ऑनलाइन कोर्स के लिये एक ओपन प्लेटफॉर्म होगा, जहाँ स्टूडेंट्स को उपलब्ध कोर्सेस के बारे में सूचना मुहैया कराई जाएगी। यदि स्टूडेंट किसी कोर्स के लिये अपनी पात्रता की जाँच करता हैं, तो वह वेब पर उपलब्ध ‘स्वयं फ्लो चार्ट’ की मदद ले सकता है।

 

तमिलनाडु में मानसूनी बारिश के लिये पश्चिमी घाट के जंगल का महत्त्व

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हाल ही शोधकर्त्ताओं की एक टीम ने पाया कि पश्चिमी घाटों के घने वन ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान तमिलनाडु में होने वाली बारिश का निर्धारण करते है।

  • पश्चिमी घाट के घने वन सामान्य मानसून वाले वर्ष में तमिलनाडु में होने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी बारिश में 40% तक आर्द्रता का योगदान करते हैं।
  • इन वनों का औसत योगदान लगभग 25% से 30% तक होता है लेकिन मानसून की कमी वाले वर्ष में यह योगदान 50% तक बढ़ जाता है।
  • पश्चिमी घाट अगस्त और सितंबर के दौरान तमिलनाडु के अधिकांश स्थानों पर प्रतिदिन 3 मिमी. तक तथा जून तथा जुलाई के दौरान प्रतिदिन 1 मिमी. बारिश में योगदान देते हैं।
  • अध्ययन में यह भी पाया गया है कि पश्चिमी घाटों में निर्वनीकरण के कारण पूरे राज्य के तापमान में लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है।
  • दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी बारिश में नमी की आपूर्ति के लिये पश्चिमी घाट वनस्पति क्षेत्र की भूमिका का अध्ययन करने हेतु पश्चिमी घाट का वन क्षेत्र के साथ तथा वन क्षेत्र के बिना योगदान का प्रयोग किया गया।
  • पश्चिमी घाटों से वन क्षेत्र को हटाने पर प्रतिदिन बारिश में 1 से 2.5 मिमी. तक की महत्त्वपूर्ण कमी पाई गई, जो तमिलनाडु की कुल मानसूनी बारिश में औसतन 25% परिवर्तन कर देती है।
  • हालाँकि,शोधकर्त्ताओं ने मानसून की कमी वाले तीन वर्षों के अध्ययन में पाया गया कि तमिलनाडु ने पश्चिमी घाटों से लाभ प्राप्त किया है।
  • घाटों में वन क्षेत्र तमिलनाडु में नमी आपूर्ति के लिये संधारित्र की तरह काम करता है। मानसून काल में निवर्तन के दौरान या जब बारिश में तेजी से कमी आती है या लगातार तीन दिनों तक बारिश नहीं होती है, उस समय तमिलनाडु की बारिश पर घाटों में निर्वनीकरण का प्रभाव मानसून अवधि के नम काल की तुलना में अधिक होता है।
  • जहाँ निवर्तन अवधि के दौरान वर्षा में गिरावट राज्य भर में व्याप्त होती है, वहीं वृष्टि काल  के दौरान घाटों में वनस्पति का योगदान ज्यादातर राज्य के दक्षिणी हिस्से में होता है और यह 25 से 30% तक होता है।
घरेलू सीवेज से पृथक किये गए जीवाणुओं ने ऑर्गेनोफास्फोरस कीटनाशक को हटाया 

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हाल ही में भारतीय शोधकर्त्ताओं ने घरेलू सीवेज से पृथक किए गये तीन जीवाणुओं का प्रयोग करके पानी तथा मिट्टी दोनों से क्लोरपाइरीफोस (Chlorpyrifos) कीटनाशक को हटाने में सफलता प्राप्त की है।

  • क्लोरपाइरीफोस एक ऑर्गेनोफास्फोरस कीटनाशक है, जो सामान्य रूप से मानव के लिये विषाक्त होता है।
  • क्लोरपाइरीफोस के कारण उत्पन्न विषाक्तता केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, कार्डियोवेस्क्युलर सिस्टम तथा श्वसन प्रणाली को प्रभावित करती है।
  • इस शोध के तहत जीवाणुओं की तीन प्रजातियों का प्रयोग करके, मिट्टी में लंबे समय तक बने रहने वाले किसी भी प्रकार के विषाक्त कण को छोड़े बिना कीटनाशक को पूर्ण रूप से हटाया गया।
  • घरेलू सीवेज में पाए जाने वाले जीवाणु नियमित रूप से इस कीटनाशक के निम्न स्तर के संपर्क में आते रहते हैं।
  • इस प्रकार ये जीवाणु जीवित रहने के लिये  स्वयं को कीटनाशकों के अनुकूल बना लेते हैं, इसी वजह से वैज्ञानिकों ने घरेलू सीवेज से पृथक होने जीवाणुओं का प्रयोग किया।
  • ऐसे जीवाणुओं को पृथक करने के लिये जो कीटनाशकों को अवशोषित कर सके, घरेलू सीवेज में पाए जाने वाले जीवाणुओं को पोषक माध्यम के साथ-साथ कीटनाशकों के अलग-अलग सांद्रण में डाला गया।
  • जीवाणुओं की क्षमता की जाँच कीटनाशक के 500मिग्रा./मिली. उच्च सांद्रण में की गई। जल में मिले हुए कीटनाशक के मामले में सभी तीनों जीवाणु अकेले तथा मिश्रित दोनों तरीकों से तीन दिन में 90% से अधिक कीटनाशक को हटाने में सक्षम रहे।
  • मिट्टी में 300मिग्रा./किग्रा. कीटनाशक के मामले में, जीवाणुओं का मिश्रित समूह 30 दिन में 50% कीटनाशक को कम कर सका। केवल एक प्रजाति की अपेक्षा तीनों जीवाणुओं के मिश्रित समूह ने बेहतर तरीके से कीटनाशकों को कम करना प्रदर्शित किया।
  • ये अध्ययन जीवाणुओं के अंदर कीटनाशकों के संचय की पुष्टि करने के लिये तथा ये कहाँ पाए जाते हैं।
  • अध्ययन में पाया गया कि कीटनाशक कोशिका के अंदर जैविक रूप से एकत्रित होता है, साथ ही यह कोशिका की सतह से जुड़ा रहता है।
  • चूँकि जीवाणु मिट्टी या जल में तेजी से वृद्धि करते हैं, मृत सूक्ष्म जीवों द्वारा मुक्त कीटनाशक को नए उत्पन्न जीवाणुओं द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। इसलिये  ये संभव है कि मिट्टी या जल कीटनाशकों से मुक्त हो जाएगा।
15वाँ एशिया मीडिया शिखर सम्मेलन

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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा नई दिल्ली में 10 से 12 मई, 2018 तक 15वें एशिया मीडिया शिखर सम्मेलन (Asia Media Summit-AMS) का आयोजन किया जाएगा। इस सम्मेलन का आयोजन मंत्रालय द्वारा भारतीय जनसंचार संस्थान (Indian Institute of Mass Communication-IIMC) और ब्रॉडकास्ट इंजीनियरिंग कंसलटेंटस इंडिया लिमिटेड (Broadcast Engineering Consultants India Limited-BECIL) के साथ संयुक्त रूप से किया जाएगा।

  • एएमएस 2018, कुआलालंपुर स्थित एशिया-पैसेफिक इंस्टिट्यूट ऑफ़ ब्रॉडकास्टिंग डेवलेपमेंट (Asia Pacific Institute for Broadcasting Development – AIBD) का एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिये  प्रतिष्ठित शिखर सम्मेलन है और भारत में पहली बार इसका आयोजन किया जा रहा है।
  • इस शिखर सम्मेलन का केंद्र बिंदु “Telling Our Stories – Asia and More” है। इसका आयोजन दो भागों में किया जाएगा। इसमें शिखर सम्मेलन से पहले 8 और 9 मई को कार्यशाला और 10 से 12 मई, 2018 तक शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जाना है।
  • इस शिखर सम्मेलन में एशिया क्षेत्र में सूचना एवं प्रसारण संबंधी मंत्रालय, अंतर्राष्ट्रीय संगठन जैसे यूनेस्को, एफएओ और संयुक्त राष्ट्र संघ, नियामक, सरकारी व निजी टीवी एवं रेडियो प्रसारण कंपनी, टेलीविजन चैनल तथा नेटवर्क, संचार के क्षेत्र में शैक्षणिक संस्थान, मीडिया अनुसंधान, सामुदायिक रेडियो संगठन, पत्रकार, मीडिया और प्रसारण उपकरण निर्माता भाग लेंगे।
  • शिखर सम्मेलन से क्षेत्रीय और द्विपक्षीय विचार-विमर्श को प्रोत्साहन मिलेगा और प्रसारण क्षेत्र के सामने आ रही चुनौतियों पर सहयोग को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • शिखर सम्मेलन में 39 देशों के 200 विदेशी प्रतिनिधि भी भागीदारी करेंगे। इनमें सार्क (अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका); आसियान (कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्याँमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम); पूर्वी-एशिया (कोरिया, हॉन्गकॉन्ग, जापान); अफ्रीका (मॉरीशस, नाईजीरिया, सेशल्स, दक्षिण अफ्रीका, सूडान, ट्यूनीशिया); ओशेनिया (ऑस्ट्रेलिया, फिजी, न्यूजीलैंड, पापुआ न्यू गिनी); यूरोप (फ्रॉन्स, जर्मनी, नीदरलैंड, स्वीडन, ब्रिटेन); सीरिया, उज्बेकिस्तान, अमेरिका और चीन के प्रतिनिधि शामिल हैं।
कश्मीर घाटी में पहली बार दर्ज़ की गई एफिड की उपस्थिति

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हाल ही में आक्रामक एफिड (द्रुमयूका) की उपस्थिति भारी संख्या में भारत की फलों की कटोरी कहे जाने वाले कश्मीर घाटी में दर्ज की गई है। ध्यातव्य है कि ब्राउन पीच एफिड एक कीट है जो समशीतोष्ण क्षेत्रों में पाए जाने वाले फलों के वृक्षों पर हमला करते हैं और पहली बार इस क्षेत्र में पाए गए हैं।

  • भारत में इसकी उपस्थिति पहली बार 1970 के दशक में हिमाचल प्रदेश तथा पंजाब में दर्ज़ की गई थी और लगभग 40 साल बाद, कश्मीर घाटी में पुनः यह कीट सामने आए हैं।
  • एफिड कीट पौधों के रस से भोजन प्राप्त करते हैं और पौधों के उन ऊतकों पर हमला करते हैं जो पौधे के विभिन्न भागों को भोजन पहुँचाते  हैं। इस एफिड का प्रसार स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, जो काफी हद तक फलों के वृक्षों पर आधारित है।
  • ब्राउन पीच एफिड (Pterochloroides persicae) आड़ू (Peach) तथा बादाम (Almond) के लिये एक कुख्यात कीट है।
  • सूक्ष्म (लगभग 3मिमी. लंबा) एफिड सबसे अधिक अप्रैल, मई, सितंबर तथा अक्तूबर माह के दौरान पनपते हैं।
  • हालाँकि, 20 से 22 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान इनके लिये सबसे अधिक अनुकूल होता है फिर भी भूरे तथा सफ़ेद धब्बे वाले ये कीट 3 डिग्री सेल्सियस तक के निम्न तापमान में भी सक्रिय रहते हैं।
  • लार्वा (अंडों से निकलने वाले छोटे एफिड) एक माह में लैंगिक परिपक्वता प्राप्त कर लेते हैं तथा और अधिक एफिड पैदा करना प्रारंभ कर देते हैं।
  • केवल एक साल में ही एफिड के 6 से 8 पीढ़ियों का निर्माण हो जाता है।

नियंत्रण

  • प्राकृतिक रसायनों के कई संयोजन तथा सांद्रण जिनमें नीम के पौधे का रस तथा लैवेंडर के तेल भी शामिल हैं, एफिड की संख्या को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं।
  • लाल चींटियाँ भोजन के लिये एफिड से रस प्राप्त करती हैं, जबकि ततैया (Wasp) तथा अन्य कई परजीवी भी एफिड का शिकार करते हैं।
  • यदि इनके संक्रमण को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आक्रामक एफिड तेजी से फैल सकते हैं। निश्चित रूप से ये कश्मीर घाटी की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

स्रोत: द हिंदू ,पी.आई.बी.

 

इंडो-बांग्ला भूमि व्यापार सीमाएँ अवैध कैसे? 

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 : शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध
(खंड-17 : भारत एवं इसके पड़ोसी-संबंध)

Indo-Bangla

चर्चा में क्यों?
हाल ही में, भारत से निर्यात किया गया माल ले जा रहे एक ट्रक में बांग्लादेश के बेनपोल भूमि बंदरगाह क्षेत्र में आग लग गई, जो पश्चिम बंगाल के पेट्रोपोल में भारतीय सीमावर्ती क्षेत्र के उस पार स्थित है। हालाँकि, यह घटना पश्चिम बंगाल के बोंगाँव में हुई थी।

बांग्लादेश और भारत के मध्य भूमि व्यापार संबंधी प्रमुख मुद्दे

कार-पास (Car-Pass) का दुरुपयोग 

  • ‘कार-पास’ चालक और सह-चालक को आव्रजन औपचारिकताओं के बिना बांग्लादेश में प्रवेश करने की अनुमति देता है। इस प्रकार के प्रवेश और निकास का रिकॉर्ड सीमा शुल्क प्राधिकरणों द्वारा अनुरक्षित किया जाता है।
  • सीमा शुल्क प्राधिकरणों द्वारा जारी ‘कार-पास’ के आधार पर, किसी भी तरफ के ट्रक के माल को  उतारने के लिये पार करने की अनुमति है।
  • दोनों देशों के वित्त मंत्रालयों की सहमती के साथ इसके लिये किसी बीमा कवर का प्रावधान नहीं है।
  • नियमों के मुताबिक, ट्रक को उसके चालक और उसके सह-चालक के साथ 24 घंटों के भीतर वापस आ जाना चाहिये, लेकिन भारतीय ट्रक को बांग्लादेश में तीन-चार दिन (यहाँ तक कि सप्ताह भर) के लिये हिरासत में ले लिया जाता है।
  • इसका मतलब है कि ट्रक मालिक के पास बीमा होने के बावजूद, विदेशी भूमि में ज़रूरत से अधिक समय तक रुकने की वजह से बीमा कवर खो देता है।
  • इसके अलावा क्षतिग्रस्त वाहन को आधिकारिक चैनल के माध्यम से वापस लाना भी मुश्किल है।
  • यह कहना व्यर्थ नहीं होगा कि वहाँ  रिश्वत की मांग अधिक है।

सुरक्षा से समझौता 

  • हालाँकि, ड्राइवरों को वाहनों का कई बार प्रवेश कराने पर  बेनापोल में हिरासत में लिये जाना आम बात है।
  • एक व्यापारिक एजेंट के मुताबिक, “सीमा पर बांग्लादेश की ओर से सुविधाओं और कानून हीनता के कारण, हमारे चालक रात को अपने ट्रकों को छोड़कर ठहरने के लिये भारत लौट जाते हैं”।
  • व्यापार से जुड़े लोग दावा है कि भारतीय कार-पास बांग्लादेश में अच्छी कीमत पर बेचे और खरीदे जाते हैं, जो भारत की सुरक्षा दीवार को लांघकर भारत में प्रवेश करने का एक आसान विकल्प प्रदान करते हैं।
  • हालाँकि, कार-पास एकमात्र मुद्दा नहीं है। दो साल पहले, एक भारतीय ट्रक के चालक पर पेट्रोपोल गोदाम में चोरी का आरोप लगाया गया था। जाँच के बाद पाया गया कि, वह दोनों देशों का ड्राइविंग लाइसेंस रखने वाला बांग्लादेशी था।
  • यह कोई अपवाद नहीं है। हर दिन बांग्लादेश में प्रवेश करने वाले 450 वाहनों में से 350 को बोंगाँव क्षेत्र के ड्राइवरों द्वारा संचालित किया जाता है।
  • इनमें लगभग 200 स्थानीय ट्रक बोंगाँव से बांग्लादेश में गोदामों से सामान ले जाते हैं। इन तथाकथित ‘स्थानीय’ ड्राइवरों में से कम से कम 200 बांग्लादेशी होते हैं।

सामाजिक-आर्थिक कारण

  • हालाँकि, इसका सामाजिक-आर्थिक कारण भी है। बांग्लादेश में लंबे समय से हिरासत और ज़बरन वसूली बड़े पैमाने पर प्रचलित है, जबकि पश्चिम बंगाल में  कमाई के लिये अपेक्षाकृत बेहतर अवसर मौजूद हैं।
  • इस कारण स्थानीय चालक निर्यात व्यापार में भाग लेने के प्रति अनिच्छुक बने रहते हैं।
  • इस अंतर को कम भुगतान वाले अवैध अप्रवासियों द्वारा भरा जाता  है जिन्हें स्थानीय गिरोह द्वारा लाइसेंस और अन्य कागजात उपलब्ध कराए जाते हैं।

स्रोत: द हिंदू

 

बढ़ती तेल कीमतें कर सकती हैं भारत की समष्टि स्थिरता को प्रभावित  

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3 : प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड-1 : भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।)
(खंड-9 : बुनियादी ढाँचा : ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।)

Oil

चर्चा में क्यों ?
अप्रैल माह के प्रारंभ से ही कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतें $70 प्रति बैरल (ब्रेंट) से भी अधिक पर बनी हुई हैं। इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें से वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापक आधार पर सुधार, दिसंबर 2018 तक ओपेक देशों द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन पर प्रतिबंधों का विस्तार, अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंधों का अंदेशा, अन्य तेल उत्पादक देशों में भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारण प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं।

प्रमुख बिंदु 

  • अमेरिकी शैल तेल अभी भी वैश्विक तेल भंडारण को बढ़ाने में अपेक्षित योगदान नहीं दे पाया है।
  • आईएमएफ के अप्रैल 2018 के ‘वर्ल्ड इकोनोमिक आउटलुक’ में भी कच्चे तेल की कीमतों में पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष औसतन 18 प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना व्यक्त की गई है।
  • विश्व बैंक के अप्रैल 2018 के ‘कमोडिटी मार्केट आउटलुक’ के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में इस वर्ष औसतन 22.6 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।
  • ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें तो अप्रैल के दूसरे सप्ताह में ही अपेक्षित औसत स्तर से ऊपर जा चुकी हैं।
  • हाल में हुई तेल की कीमतों में वृद्धि जहाँ तेल निर्यातकों के लिये अनुकूल साबित हो रही है, वहीं भारत जैसे आयातक देशों के लिये यह परेशानी का सबब बन सकती है।
  • यदि कच्चे तेल की कीमतें स्थायी आधार पर अधिक बनी रहती हैं, तो भारत के लिये समष्टि स्थिरता को बनाए रखना मुश्किल होगा।
  • क्योंकि, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का भारत के मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटा, विनिमय दर आदि  समष्टि स्तरीय बुनियादी तत्त्वों पर व्यापक असर होता है, अतः नीति निर्माताओं को इसके नकारात्मक असर को बेअसर करने हेतु कई मोर्चों पर सजग रहने की आवश्यकता है।
  • वर्तमान में , भारत में मुद्रास्फीति में चार कारणों से वृद्धि हो सकती है । ये हैं : कृषि उत्पादों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्यों (एमएसपी) में संभावित वृद्धि, राज्य सरकारों द्वारा हाउस रेंट अलाउंस  (एचआरए) में बढ़ोतरी का कार्यान्वयन, केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर 2018-19 के वित्तीय लक्ष्यों के पूरा न हो पाने की संभावना, कच्चे तेल के वैश्विक स्तर पर दामों में वृद्धि।
  • पहले तीन कारण घरेलू परिस्थितियों के अनुसार नियंत्रित होते हैं, जो प्राधिकारियों को मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने हेतु कुछ स्वतंत्रता प्रदान करते हैं।
  • लेकिन, कच्चे तेल के दामों में उतार-चढ़ाव सरकार/आरबीआई के नियंत्रण से पूरी तरह से बाहर होते हैं।
  • चावल और गेहूँ जैसी प्रमुख फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागत से लगभग डेढ़ गुना अधिक है। अतः इन फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करने का कोई अनिवार्य कारण प्रतीत  नहीं होता।
  • आरबीआई के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा एचआरए में वृद्धि के मुद्रास्फीति पर पड़ने वाले प्रभाव को सांख्यिकीय आँकड़ों के आधार पर देखा जा सकता है।  केंद्र के इस कदम द्वारा मुद्रास्फीति में 35 आधार अंकों (basis points) की मामूली वृद्धि हुई है, जिसके दिसंबर 2018 तक वापस नियंत्रण में आ जाने की उम्मीद व्यक्त की जा रही है। लेकिन, यदि सभी राज्य सरकारें 2018 में एचआरए में एक साथ वृद्धि कर देती हैं, तो यह प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से 100 आधार अंकों का होगा।
  • कोर सीपीआई मुद्रास्फीति भारत में पहले से ही अधिक है। इनपुट लागत लगातार बढ़ रही है। साथ ही शीर्ष मुद्रास्फीति में तेज़ी से बढ़ोतरी हो सकती है और यह तेल कीमतों में वृद्धि के कारण अपेक्षित स्तर से ऊपर जा सकती है।
  • सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में बाहरी चालू खाता घाटा (current account deficit) में 2017 -18 में 2 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। जबकि 2016-17 में यह बढ़ोतरी 1 प्रतिशत से भी कम थी।
  • यदि 2018-19 में कच्चे तेल के दाम अधिक ही बने रहते हैं तो चालू खाता घाटा में और अधिक वृद्धि हो सकती है।
  • रुपया पहले से ही दबाव में बना हुआ है और चालू खाता घाटा में वृद्धि की वजह से इसके 2018-19 में भी दबाव में बने रहने की संभावना है।

आगे की राह 

  • जब कच्चे तेल के दामों में तेज़ गिरावट हुई थी, तो सरकार ने इसका सारा लाभ उपभोक्ताओं को हस्तांतरित नहीं किया था और पेट्रोलियम उत्पादों पर कई कर या शुल्क आरोपित कर दिये थे। उस समय यह माना जा रहा था कि जब तेल के दामों में पुनः वृद्धि होगी, तो सरकार इन करों या शुल्कों को कम कर देगी।
  • यदि $70 प्रति बैरल की कीमत पर सरकार के राजस्व लक्ष्यों की पूर्ति हो पा रही है, तो तेल कीमतों में इस स्तर से अधिक वृद्धि होने के दशा में सरकार को  तेल पर आरोपित करों में कटौती करके कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास करना चाहिये।
  • पेट्रोलियम उत्पादों पर करों का निर्धारण इस तरह से किया जाना चाहिये कि उपभोक्ताओं के हितों को भी हानि न पहुँचे और सरकार के राजस्व लक्ष्यों पर भी नकारात्मक असर न पड़े।
  • सरकार को इस संबंध में त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता है, क्योंकि ज़्यादातर समष्टि स्तरीय आर्थिक मानक दाँव पर लगे हुए हैं।
  • पेट्रोल/डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाना, पेट्रोल/डीज़ल पर करों का अधोगामी (downward) समायोजन जैसे कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। ऐसा न कर पाने की स्थिति में देश की समष्टि स्तरीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।

स्रोत : द हिंदू