UPSC DAILY CURRENT 11-03-2019

जीव विज्ञान और पर्यावरण

इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री ने नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (India Cooling Action Plan-ICAP) जारी किया।

इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) क्या है?

  • विश्व ओज़ोन दिवस (16 सितंबर) के अवसर पर सरकार, उद्योग, उद्योग संघ और सभी हितधारकों के बीच सक्रिय सहयोग पर बल देते हुए पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा कूलिंग एक्शन प्लान पर दस्तावेज़ जारी किया गया।
  • उल्लेखनीय है कि भारत पहला देश है जिसने शीतलता कार्ययोजना पर दस्तावेज़ तैयार किया है।

उद्देश्य

  • ICAP का उद्देश्य पर्यावरण और सामाजिक-आर्थिक लाभों को हासिल करने के लिये कार्यों में तालमेल का प्रयास करना है।
  • समाज को पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रदान करते हुए सभी के लिये स्थायी शीतलन और उष्मीय सहूलियत प्रदान करना।

प्रमुख लक्ष्य

  • अगले 20 वर्षों तक सभी क्षेत्रों में शीतलता से संबंधित आवश्यकताओं से जुड़ी मांग तथा ऊर्जा आवश्यकता का आकलन।
  • शीतलता के लिये उपलब्ध तकनीकों की पहचान के साथ ही वैकल्पिक तकनीकों, अप्रत्यक्ष उपायों और अलग प्रकार की तकनीकों की पहचान करना।
  • सभी क्षेत्रों में गर्मी से राहत दिलाने तथा सतत् शीतलता प्रदान करने वाले उपायों को अपनाने के बारे सलाह देना।
  • तकनीशियनों के कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करना।
  • घरेलू वैकल्पिक तकनीकों के विकास हेतु ‘शोध एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र’ को विकसित करना।
  • वर्ष 2037-38 तक विभिन्न क्षेत्रों में शीतलक मांग (Cooling Demand ) को 20% से 25% तक कम करना।
  • वर्ष 2037-38 तक रेफ्रीजरेंट डिमांड (Refrigerant Demand) को 25% से 30% तक कम करना।
  • वर्ष 2037-38 तक शीतलन हेतु ऊर्जा की आवश्यकता को 25% से 40% तक कम करना।
  • वर्ष 2022-23 तक कौशल भारत मिशन के तालमेल से सर्विसिंग सेक्टर के 100,000 तकनीशियनों को प्रशिक्षण और प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराना।

लाभ

  • इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी।

स्रोत – PIB

वन सर्वेक्षण

चर्चा में क्यों?

हाल ही में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा गठित एक समिति ने वन आच्छादित क्षेत्र का आकलन करने के लिये वन सर्वेक्षण के अंतर्गत वनों में और वन क्षेत्र से बाहर उगने वाले पेड़ों (निजी/सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण या ग्रीनलैंड) के अलग-अलग सर्वेक्षण की सिफारिश की है।

प्रमुख बिंदु

  • भारत सरकार प्रत्येक दो वर्षों में वन सर्वेक्षण करवाती है जिसमें भारत के भौगोलिक क्षेत्र में वनों से आच्छादित हिस्से का आकलन किया जाता है।
  • इसके अंतर्गत जंगल में और जंगलों से बाहर उगने वाले पेड़ों को शामिल किया जाता है।
  • आलोचक काफी समय से इस बात की आलोचना करते रहे हैं कि दोनों क्षेत्रों के पेड़ों को एक ही श्रेणी में शामिल करना पारिस्थितिक रूप से बेहतर नहीं है, लेकिन सरकारी समिति द्वारा इस तरह की सिफारिश करने का यह पहला उदाहरण है।
  • इंडिया स्टेट ऑफ़ फॉरेस्ट रिपोर्ट (SFR), 2017, जो फरवरी 2018 में जारी की गई, के अनुसार, भारत में 2015 और 2017 के बीच वन क्षेत्र में 0.21% की वृद्धि दर्ज़ की गई।
  • दस्तावेज़ में कहा गया है कि भारत में लगभग 7,08,273 वर्ग किमी. वन आच्छादित क्षेत्र है जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का 21.53% (32,87,569 वर्ग किमी.) है।
  • 1988 से सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य भारत में वन आच्छादित क्षेत्र को देश के भौगोलिक क्षेत्र का 33% करना रहा है।

forest survey

  • SFR के विभिन्न संस्करणों में वन आच्छादित क्षेत्र का प्रतिशत 21 से नीचे ही रहा है, अत: सरकार अपने मूल्यांकन में वनों के रूप में निर्दिष्ट क्षेत्रों, जैसे निजी/सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण या ग्रीनलैंड को भी शामिल करती है।

स्रोत: द हिंदू

 

शहीद कोश

चर्चा में क्यों?

हाल ही में प्रधानमंत्री ने भारत के स्वाधीनता संग्राम के शहीदों के नामों के कोश का विमोचन किया।

प्रमुख बिंदु

संस्कृति मंत्रालय द्वारा 1857 के विद्रोह की 150वीं वर्षगाँठ के अवसर पर भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) को भारत के स्वाधीनता संग्राम के शहीदों के नामों का संकलन ‘डिक्शनरी ऑफ मार्टर्स तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी।

इस शब्दकोश में ‘शहीद’ को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिनकी स्वंतंत्रता संग्राम के दौरान मृत्यु हो गई अथवा जो हिरासत में मारे गए थे अथवा जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिये राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया और मृत्युदंड के शिकार हो गए।

इसमें आईएनए के उन सैनिकों या पूर्व-सैन्यकर्मियों को भी शामिल किया गया है जो अंग्रेजों से लड़ते हुए मारे गए थे।

इसमें 1857 का विद्रोह, जलियाँवाला बाग नरसंहार (1919), असहयोग आंदोलन (1920-22), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), भारत छोड़ो आंदोलन (1942-44), क्रांतिकारी आंदोलनों (1915-34), किसान आंदोलन, आदिवासी आंदोलन, रियासतों में ज़िम्मेदार सरकार के लिए आंदोलन (प्रजामंडल), इंडियन नेशनल आर्मी (INA, 1943-45), रॉयल इंडियन नेवी अपसर्ज (RIN, 1946) आदि के शहीदों को शामिल किया गया है। इन संस्करणों में करीब 13,500 शहीदों के बारे में जानकारी दी गई है।

इसे निम्नलिखित पाँच खंडों (क्षेत्रवार) में प्रकाशित किया गया है:

‘डिक्शनरी ऑफ मार्टर्स : इंडियाज़ फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947)’, खंड 1, भाग एक और भाग दो- इस खंड में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के 4,400 से अधिक शहीदों को सूचीबद्ध किया गया है।

‘डिक्शनरी ऑफ मार्टर्स : इंडियाज़ फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947)’, खंड 2, भाग एक और भाग दो- इस खंड में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के 3,500 से अधिक शहीदों को सूचीबद्ध किया गया है।

‘डिक्शनरी ऑफ मार्टर्स : इंडियाज़ फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947)’, खंड 3- इस खंड में शामिल शहीदों की संख्या 1,400 से अधिक है। इस खंड में महाराष्ट्र, गुजरात और सिंध के शहीदों को शामिल किया गया है।

‘डिक्शनरी ऑफ मार्टर्स : इंडियाज़ फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947)’, खंड 4- इस खंड में शामिल शहीदों की संख्या 3,300 से अधिक है। इस खंड में बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा के शहीदों को शामिल किया गया है।

‘डिक्शनरी ऑफ मार्टर्स : इंडियाज़ फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947)’, खंड 5- इस खंड में शामिल शहीदों की संख्या 1,450 से अधिक है। इस खंड में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के शहीदों को शामिल किया गया है।

स्रोत: PIB