UPSC DAILY CURRENT 12-05-2018

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लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (LPAI) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. यह एक सांविधिक निकाय है।
  2. यह पोत परिवहन मंत्रालय के अंतर्गत आता है।
  3. इसकी स्थापना स्थल सीमा के प्रवेश बिंदुओं से होने वाले व्यापार को बढ़ावा देने के लिये किया गया है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 और 3
D) 1, 2 और 3
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उत्तरः (c)
व्याख्याः

लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया

LPAI

  • लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की स्थापना, लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया एक्ट, 2010 के तहत की गई है। इसलिये यह एक सांविधिक निकाय है। अतः पहला कथन सत्य है।
  • लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है। अतः दूसरा कथन असत्य है।
  • अफगानिस्तान, चीन, बांग्लादेश, भूटान, म्याँमार नेपाल तथा पाकिस्तान के साथ भारत 15000 किमी. अंतर्राष्ट्रीय स्थल सीमा साझा करता है। व्यक्तियों, वस्तुओं और वाहनों के सीमा-पार आवागमन के लिये कई नामित प्रवेश (Designated entry) और निकास बिंदु हैं। इन बिंदुओं पर विभिन्न कार्यों के लिये मौजूदा आधारभूत संरचना न तो पर्याप्त है और न ही समन्वयित। तथा सीमा पर सुरक्षा आप्रवासन (Immigration), सीमा शुल्क, पौधों और पशुओं के अवैध व्यापार के लिये कोई भी कोई सरकारी एजेंसी जिम्मेदार नहीं है। इसी को ध्यान में रखते हुए 2011 में लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया नामक एक अलग निकाय की स्थापना की गई।
  • इस निकाय का मुख्य उद्देश्य स्थल सीमा के प्रेवश बिंदुओं के माध्यम से होने वाले व्यापार को बढ़ावा देना है। अतः तीसरा कथन सत्य है।
[2]

“लेप्टोस्पायरोसिस” बीमारी के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

  1. यह बीमारी गर्म तथा उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में अधिक पाई जाती है।
  2. यह एक जीवाणु जनित रोग है।

कूटः

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2
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उत्तरः (c)
व्याख्याः

हाल ही में गुजरात जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र, गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने एक महत्त्वपूर्ण पेप्टाइड (Peptide) की पहचान की है जिसे लेप्टोस्पायरोसिस (Leptospirosis) के खिलाफ एक नया निवारक टीका विकसित करने के लिये उपयोग किया जा सकता है।

लेप्टोस्पायरोसिस एक दुर्लभ और संक्रामक, जीवाणु संक्रमण है जो लिप्टोस्पाइरा जीनस जीवाणु के कारण होता है।

लेप्टोस्पायरोसिस सबसे अधिक गर्म, उष्णकटिबंधीय परिस्थितियों में फैलता है और शरीर के किसी भी भाग को प्रभावित कर सकता है। इसके जीवाणु यदि एक बार शरीर में प्रवेश कर लेता है तो यह रक्त के प्रवाह के माध्यम से पूरे शरीर में फ़ैल जाता है तथा पूरे शरीर को संक्रमित कर देता है। अतः दोनों कथन सत्य है।

ताजे पानी, गीला या नम मिट्टी या पौधों से संक्रमित होने के बाद लेप्टोस्पायरोसिस हो सकता है जो कि संक्रमित जानवरों के मूत्र से दूषित हो गए हों। जब इसका संपर्क संक्रमित सामग्री के साथ होता है तो बैक्टीरिया खुले घाव, त्वचा पर घाव या श्लेष्म झिल्ली के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं। लोगों में संक्रमित पशुओं के मूत्र से दूषित पानी पीने से भी लेप्टोस्पायरोसिस हो सकता हैं।

[3]

हाल ही में किस संस्था ने एशिया और प्रशांत क्षेत्र हेतु एक नई दीर्घकालिक रणनीति ‘रणनीति-2030’ तैयार करने की घोषणा की है?

A) विश्व बैंक
B) एशियाई विकास बैंक
C) ब्रिक्स बैंक
D) रिज़र्व बैंक
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उत्तरः (b)
व्याख्याः

एशियाई विकास बैंक “रणनीति-2030” तैयार कर रहा है। तेजी से विकसित एशिया और प्रशांत क्षेत्र में आए परिवर्तनों की समीक्षा तथा प्रतिक्रिया हेतु इसकी यह नई दीर्घकालिक रणनीति है।

यह नई रणनीति 2014 की मध्यवर्ती समीक्षा पर अपनी वर्तमान रणनीति 2020 की समीक्षा करती है।

यह 2030 तक विकासशील देशों के साथ एडीबी की भागीदारी के लिये एक रूपरेखा तैयार करती है।

यह सतत विकास लक्ष्यों, जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते तथा अन्य वैश्विक प्रतिबद्धताओं के साथ जुड़ी है। रणनीति 2030 की निम्नलिखित प्राथमिकताएँ तय की गई हैं:

  • क्षेत्रीय सहयोग व एकीकरण को मजबूत बनाना।
  • 1990 के दशक से मध्य एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र में उप-क्षेत्रीय सहयोग के अब तक के अनुभवों के आधार पर आगे की रणनीति तय करना।
  • एडीबी बैंक द्वारा ईंधन सुरक्षा, शिक्षा, पर्यटन और वित्तीय स्थिरता के मामले में क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाए जाने को प्रोत्साहित किया जाना।
  • बैंक द्वारा इन मामलों में पहले से चल रही और नई शुरू की जा रही वैश्विक एवं क्षेत्रीय पहल की मदद करना।

“रणनीति-2030” के तहत, एडीबी गरीबी उन्मूलन के प्रयासों को बनाए रखेगा, क्षेत्र के गरीबी के एजेंडे को देखते हुए समृद्ध, समावेशी, लचीला और टिकाऊ एशिया और प्रशांत क्षेत्र बनाने हेतु अपने कार्यों का विस्तार करेगा।

एशियाई विकास बैंक की स्थापना सन 1966 में संयुक्त राष्ट्र एशिया और सुदूर पूर्व के लिये आर्थिक आयोग (United Nations Economic Commission for Asia and the Far East) द्वारा एक संकल्प के माध्यम से की गई। इसकी कल्पना एशिया और दुनिया के सबसे गरीब क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग और विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। भारत इसका संस्थापक सदस्य है और वर्तमान में चौथा बड़ा शेयरधारक है।

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“भारत-संयुक्त राष्ट्र विकास साझेदारी निधि” के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. इसे दक्षिण-दक्षिण सहयोग हेतु संयुक्त राष्ट्र कोष के अंतर्गत स्थापित किया गया है।
  2. यह मुख्य रूप से कम विकसित देशों (LDC) और लघु द्वीप विकासशील देशों में स्थायी विकास परियोजनाओं पर केंद्रित है।
  3. इस निधि का उपयोग 2030 तक प्राप्त किये जाने वाले “एजेंडा-17” के तहत सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये किया जाएगा।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

A) केवल 1 और 2
B) केवल 2
C) केवल 1 और 3
D) 1, 2 और 3
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उत्तरः (d)
व्याख्याः

भारत-संयुक्त राष्ट्र भागीदारी कोष
(INDIA-UN Development Partnership Fund)

UN

भारत ने साउथ-साउथ कोऑपरेशन के दौरान भारत-संयुक्त राष्ट्र भागीदारी (साझेदारी) कोष में 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर की अतिरिक्त राशि प्रदान की है। यह साउथ-साउथ सहयोग हेतु संयुक्त राष्ट्र कोष के अंतर्गत स्थापित एक समर्पित सुविधा है। इसका निर्माण 2017 में किया गया।

दक्षिण-दक्षिण  सहयोग के लिये संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (United Nations Office for South-South Cooperation-UNOSSC) द्वारा प्रबंधित यह फंड विकासशील देशों के दक्षिणी स्वामित्व और नेतृत्व, मांग-चालित एवं परिवर्तनकारी स्थाई विकास परियोजनाओं का समर्थन करेगा।

इस निधि का उपयोग 2030 तक प्राप्त किये जाने वाले “एजेंडा-17” के तहत सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये किया जाएगा। कम विकसित देशों (Least Developed Countries -LDCs) और लघु द्वीप विकासशील राज्यों (Small Island Developing States) पर ध्यान केंद्रित करते हुए संयुक्त राष्ट्र एजेंसियाँ भागीदार सरकारों के निकट सहयोग से फंड की परियोजनाओं को लागू करेंगी। इसका उद्देश्य गरीबी और भूख को कम करना, स्वास्थ्य में सुधार करना, शिक्षा और समानता तथा स्वच्छ पानी एवं ऊर्जा तक पहुँच का विस्तार करना है। अतः तीनों कथन सत्य है।

UNOSSC के बारे में

  • दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिये संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (United Nations Office for South-South Cooperation-UNOSSC) को विश्व स्तर पर और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के भीतर दक्षिण-दक्षिण और त्रिकोणीय सहयोग को बढ़ावा देने समन्वय और समर्थन करने के लिये स्थापित किया गया था।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1974 से UNOSSC का आयोजन किया जा रहा है।
  • UNOSSC को दक्षिण-दक्षिण सहयोग की उच्च स्तरीय समिति के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा और इसके सहायक निकाय द्वारा नीति निर्देश और मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है।
  • UNOSSC द्वारा अनुमोदन और धन के लिये अपने रणनीतिक फ्रेमवर्क को यूएनडीपी (United Nations Development Programme), यूएनएफपीए  (United Nations Population Fund –UNFPA) और यूएनओपीएस (United Nations Office for Project Services -UNOPS) कार्यकारी बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
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निम्नलिखित में से कौन-सी जैव उपचार की तकनीक है?

  1. ऑयल जैपर
  2. ऑयलिवोरस-एस
  3. फुनारिया हाइग्रोमेट्रिका

कूटः

A) केवल 1 और 2
B) केवल 1 और 3
C) केवल 2 और 3
D) उपरोक्त सभी।
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उत्तरः (d)
व्याख्याः

जैव उपचार तकनीक

ऑयल जैपर

  • यह अनिवार्य रूप से पाँच अलग बैक्टीरियल स्ट्रेन का मिश्रण है जिन्हें स्थिर करके वाहक सामग्री (चूर्णित कॉर्नकॉब) के साथ मिश्रित किया जाता है।
  • ये कच्चे तेल और तैलीय गाद में मौजूद हाइड्रोजन यौगिकों का भक्षण करते हैं और उन्हें हानिरहित co2 और जल में परिवर्तित कर देते हैं।

ऑयलिवोरस-एस

  • यह ऑयल जैपर से भिन्न एक टैड (tad) है। इसमें एक अतिरिक्त बैक्टीरियल स्ट्रैन होता है जो इसे उच्च-सल्फर युक्त गाद और कच्चे तेल के विरूद्ध ऑयल जैपर की तुलना में अधिक प्रभावशाली बनाता है।
  • ऑयल जैपर और ऑयलिवोरस-एस दोनों स्व-स्थाने (in-situ) प्रयोग किये जा सकते हैं, जो प्रभावित स्थान से बड़ी मात्रा में दूषित कचरे को स्थानान्तरित करने की आवश्यकता को समाप्त कर देते हैं। इस प्रक्रिया में पर्यावरण को कम जोखिम रहता है।

फुनारिया हाइग्रोमेट्रिका (Funariya hygrometrica)

  • जापान के वैज्ञानिकों ने फाइटोरेमेडिएशन आधारित रिमूवल विधि के लिये एक मॉस (फुनारिया हाइग्रोमेट्रिका) की पहचान की है। ऐसा माना जाता है कि यह मॉस अपने विकास के प्रोटोनेमा (protonema) चरण में उन स्थानों पर अत्यधिक वृद्धि करता है जो तांबा, जस्ता और लेड द्वारा संदूषित होते हैं।
  • यह 3 से 9 के बीच pH मान पर लेड का भली-भाँति अवशोषण करता है जो कि महत्त्वपूर्ण है क्योंकि धातु-संदूषित जल की अम्लता भिन्न-भिन्न हो सकती है।

 

मेंढकों पर हमला करने वाले कवक की उत्पत्ति पूर्वी एशिया में
(Fungus that attacks frogs originated in East Asia)

Fungus

  • चयत्रीड कवक (chytrid fungus) (जिसके कारण दुनिया भर में उभयचरों की संख्या में कमी आई है) की उपस्थिति भारत में भी दर्ज की गई है।
  • पहली बार इनकी उपस्थिति 1997 में दक्षिण अमेरिका के मेंढकों में दर्ज़ की गई थी, ये हत्यारे कवक पश्चिमी घाटों के मेंढकों की कुछ प्रजातियों में भी पाए गए हैं।
  • भारत में इनकी पहली उपस्थिति 2011 में दक्षिणी केरल की पोनमुडी पहाड़ियों में दर्ज़ की गई।
  • अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका “साइंस” के अनुसार, संभवतः इसकी उत्पत्ति पूर्वी एशिया में हुई थी।
  • चयत्रीड कवक ने दुनिया भर के लगभग 700 मिलियन उभयचरों की प्रजाति को प्रभावित किया है तथा इसके कारण मेंढकों की संख्या में काफी कमी आई है, यहाँ तक कि कई क्षेत्रों में ये लुप्त होने की कगार पर पहुँच गए हैं।
  • वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र से बाहर चयत्रीड से जुड़े जोखिम के कारण एशिया से उभयचरों के व्यापार पर रोक लगाने की सलाह दी है।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार चयत्रीड कवक के कारण होने वाली बीमारी (chytridiomycosis) पश्चिमी घाट के सभी स्थानीय तथा संकटापन्न उभयचरों में तेजी से फैल सकती है।
  • विश्व की 38 संस्थाओं के वैज्ञानिकों ने Batrachochytrium dendrobatidis (Bd जिसे चयत्रीड के नाम से भी जाना जाता है) के नमूनों को एकत्र किया तथा इस कवक के मूल का पता लगाने के लिये इन रोगजनकों में से 234 के ज़ीनोम का अध्ययन किया।
सूक्ष्म जीवाश्म आवरणों से प्राचीन पृथ्वी पर जलवायु के संकेत
(Tinny fossil shells give clues to climate on ancient Earth)

tinny-fossil

  • वैज्ञानिकों ने कुछ सूक्ष्म जीवाश्म आवरणों (Shell) की खोज की है जो पृथ्वी पर लगभग 50 लाख साल पूर्व की जलवायु के संदर्भ में जानकारी प्रदान करते हैं।
  • शोध के अनुसार, प्राचीन जानवरों ने जलवायु के अनुसार स्वयं को विविध रूपों में ढाल लिया था।
  • वैज्ञानिकों ने इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिये, जलवायु प्रतिरूपों तथा लगभग 1 मिमी. लंबे जीवाश्म के रासायनिक विश्लेषण का प्रयोग किया।
  • जानवरों के संघों में उस समय के दौरान हुए अचानक विस्तार को, कैम्ब्रियाई विस्तार या  कैम्ब्रियाई विस्फोट (Cambrian explosion) कहते हैं।
  • उस समय के जीवधारियों के समूह में पहली बार आवरण धारण करने वाले जीव शामिल हैं।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रारंभिक कैम्ब्रियन काल पृथ्वी पर जलवायु के इतिहास के संदर्भ में ग्रीनहाउस अंतराल का समय था (ऐसा समय जब कोई स्थायी ध्रुवीय बर्फ की चादर नहीं थी)।
  • जीवाश्म आवरण तथा नए जलवायु मॉडल दर्शाते हैं कि उच्च अक्षांशों वाले समुद्रों में अधिकतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस था।
  • इस अध्ययन में, ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात (oxygen isotope ratio) का प्रयोग किया गया जो कि आम तौर पर प्रयोग किया जाने वाला प्राचीन थर्मामीटर है।
  • वैज्ञानिकों ने श्रॉपशायर, ब्रिटेन के 515 से 510 मिलियन साल पहले निर्मित चूनापत्थर के ब्लॉक से 1 मिमी. लंबे जीवाश्म को निकालने के लिये एसिड का प्रयोग किया।
  • कुछ आवरणों में विद्यमान गुणधर्म, कैम्ब्रियाई समुद्र की सतह पर विकसित होने के समय से अब तक परिवर्तित नहीं हुए हैं।
मलेशिया के नए प्रधानमंत्री महातिर बने दुनिया के सबसे बुजुर्ग निर्वाचित नेता
(Mahatir, 92, sworn in as Malasiya PM, becomes world’s oldest elected leader)

PM

  • महातिर मोहम्मद ने मलेशिया के सातवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
  • महातिर की पाकातान हारापन पार्टी ने पिछले 60 सालों से सत्ता में बनी बारिसन नेशनल (BN) गठबंधन को हराया। गौरतलब है कि महातिर पूर्व में BN पार्टी से भी जुड़े हुए थे।
  • 70 वर्षों से अधिक के अपने राजनीतिक करियर में महातिर ने 1981-2003 तक प्रधानमंत्री का पद संभाला था।
  • वह इस पद पर सबसे अधिक समय तक बने रहने वाला व्यक्ति बना।
  • प्रधानमंत्री के रूप में उसके कार्यकाल के दौरान मलेशिया में आर्थिक विकास ने तेजी से विकास किया।
  • उसे मलेशिया के तेजी से आधुनिकीकरण का श्रेय भी दिया जाता है तथा “आधुनिक मलेशिया के जनक” के रूप में जाना जाता है।
  • महातिर ने अपना राजनीतिक कॅरियर मलेशिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी यूनाइटेड मलेशिया नेशनल ऑर्गनाइज़ेशन (UMNO) से प्रारंभ किया था।
  • UMNO से निष्कासित किये जाने से पूर्व महातिर ने एक कार्यकाल तक सेवा की थी।
ऑस्ट्रेलिया के 104 वर्षीय वैज्ञानिक डेविड गूडाल ने दुनिया को अलविदा कहा

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अपना जीवन खत्म करने के लिये स्विट्जरलैंड पहुंचे 104 वर्षीय ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक डेविड गूडाल ने एक्जिट इंटरनेशनल  फाउंडेशन की मदद 10 मई को  आत्महत्या के जरिये दुनिया को अलविदा कहा|

  • स्वीटजरलैंड के लाइफ साइकल क्लीनिक में बॉर्बीट्युरेट स्तर के इंजेक्शन नेम्बुटल (इस तरह की आत्महत्या के लिये इस्तेमाल की जाने वाली दवा) के जरिये वैज्ञानिक ने दम तोड़ा|
  • ऑस्ट्रेलिया के मशहूर पर्यावरणविद् और वनस्पति विज्ञानी डेविड गूडाल को उनके अपने देश में किसी गंभीर बीमारी के नहीं होने से इच्छा मृत्यु के लिये मदद लेने से रोक दिया गया था|
  • उनका मानना था कि वे अपनी जिंदगी का बेहतरीन हिस्सा जी चुके हैं और अब मरना चाहते हैं|

डेविड गूडाल का योगदान 

  • प्रथम विश्व युद्ध से कुछ माह पूर्व अप्रैल 1914 में लंदन में जन्मे  गूडाल और उनका परिवार ऑस्ट्रेलिया में बस गए|
  • विख्यात वनस्पतिविद और पारिस्थितिक विज्ञानी गूडाल ने यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया भर में अकादमिक पदों पर काम किया।
  • 1979 में सेवानिवृत्ति के बाद, गुडाल ने 500 से अधिक लेखकों द्वारा लिखित “ecosystems of the world” नामक पुस्तक के 30 खंडों का संपादन किया|
  • 2016 में गूडाल को प्रतिष्ठित ऑर्डर ऑफ ऑस्ट्रेलिया मेडल से सम्मानित किया गया था।

स्रोत: द हिंदू एवं द इंडियन एक्सप्रेस 

 

भारत के लिए ईरान समझौते से अमेरिका की वापसी के मायने

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 : शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध 
(खंड-17 : भारत एवं इसके पड़ोसी-संबंध।)

Iran

चर्चा में क्यों?
हाल ही में अमेरिका ने ईरान के साथ एक परमाणु समझौते से स्वयं को अलग कर लिया है। इसका कहना है कि इस समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, 2025 के अलावा परमाणु गतिविधियों तथा यमन और सीरिया में जारी संघर्षों में इसकी भूमिका को शामिल नहीं किया था।

क्या है वो परमाणु समझौता जिसे  अमेरिका ने रद्द कर दिया है?

  • आधिकारिक तौर पर इसे संयुक्त कार्रवाई व्यापक योजना (Joint Comprehensive Plan Of Action-JCPOA) तथा अनौपचारिक रूप से ‘ईरान परमाणु समझौता’ कहा जाता है।
  • वियना में 14 जुलाई, 2015 को ईरान तथा P5 (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य- अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस तथा ब्रिटेन) के साथ-साथ जर्मनी एवं यूरोपीय संघ द्वारा इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।
  • इस समझौते का उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना था जिसमें इसके परमाणु कार्यक्रमों पर रोक लगाने के बदले में तेहरान पर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाना शामिल था।
  • इस समझौते पर अमेरिकी कार्रवाई के खिलाफ भारत ने कैसे जवाब दिया है?

भारत इस समझौते के प्रति बहुत बड़ा समर्थक रहा है। भारत ने हमेशा यह प्रतिबद्धतता जाहिर की है कि ईरान के परमाणु मसले को वार्ता तथा कूटनीति के द्वारा शांतिपूर्वक ढंग से हल किया जाना चाहिए। भारत का कहना है कि सभी पार्टियों को ईरान परमाणु समझौते से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिए सक्रिय रूप से एक साथ आना चाहिए।

यह कथन बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं पर भारत की स्थिति के साथ किस प्रकार तालमेल बैठाता है?

  • भारत अंतर्राष्ट्रीय नियम-आधारित कार्यविधि का एक सक्रिय समर्थक रहा है।
  • ट्रंप द्वारा जून, 2017 में समझौते से अमेरिका के अलग होने की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद भारत ने दक्षिण चीन सागर और पेरिस जलवायु समझौता, 2015 पर अपनी प्रतिबद्धता को दुहराया।
  • हालांकि, नई दिल्ली ने ट्रंप की इस घोषणा के बाद कि अमेरिका इजरायल में अपने दूतावास को यरूशलेम में स्थानांतरित करेगा, और उस शहर को देश की राजधानी के रूप में पहचान देगा पर भी अपनी स्थिति को स्पष्ट नहीं किया।
  • ईरान समझौते से अमेरिका के अलग होने पर, भारत वर्तमान में अपने दांवों को छुपा रहा है; हालांकि, नई दिल्ली, जो हाल ही में तीन बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण शासनों (MTCR, वासनेर व्यवस्था, ऑस्ट्रेलिया समूह) का सदस्य बनी है, यदि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) में भी शामिल होना चाहती है तो JCPOA  के प्रति प्रतिबद्धता की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति से उसे यूरोपीय, विशेष रूप से फ्रांस से मदद मिलेगी।
  • फ्रांस की तरह, अमेरिका भी भारत की NSG सदस्यता की दावेदारी का एक मजबूत समर्थक है।

ऊर्जा व्यापार पर भारत के लिए अनुमान क्या है?

  • इराक तथा सऊदी अरब के बाद ईरान भारत के लिए तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है जिसने 2017-18 के वित्तीय वर्ष में भारत को प्रथम 10 माह (अप्रैल, 2017 से जनवरी, 2018 तक) में 18.4 मिलियन टन कच्चे तेल की आपूर्ति की।
  • 2010-11 तक ईरान भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था लेकिन अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण यह एक स्थान नीचे आ गया।
  • 2013-14 तथा 2014-15 में भारत ने ईरान से क्रमशः 11 मीट्रिक टन तथा 10.95 मीट्रिक टन तेल खरीदा। उसके आगे आने वाले साल में यह बढ़कर 12.7 मीट्रिक टन तथा 2016-17 में बढ़कर 27.2 मीट्रिक टन हो गया।

क्या ईरान के चाबहार में भारत द्वारा किए जाने वाले रणनीतिक निवेश को कोई खतरा है?

  • यह भारत के लिए वित्तीय तथा रणनीतिक दोनों प्रकार का निवेश है।
  • पिछले तीन सालों में चाबहार पर भारत तथा ईरान के बीच के संबंधों में तेजी आई है तथा यह कार्य जुलाई तक पूरा होने और भारतीय अधिकारियों को सौंपे जाने की संभावना है।
  • हालांकि यह निर्धारित तिथि दबाव में आ सकती है- शायद साल के अंत तकमीसको बढ़ाया जा सकता है- यदि अमेरिकी स्वीकृति चाबहार में आधारभूत संरचना के विकास पर प्रहार करती है।
  • भारत के पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं यदि इस समझौते के अन्य हस्ताक्षरकर्ता इस पर कायम रहते हैं। यदि चाबहार परियोजना धीमी होती है तो इसके परिणामस्वरूप ट्रंप प्रशासन के निवेदन पर शुरू की गई अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण प्रक्रिया में भारत द्वारा दी जाने वाली 1 बिलियन डॉलर की सहायता तथा 100 छोटी परियोजनाओं पर किया जाने वाला कार्य भी प्रभावित होगा।
  • चाबहर भारत के हित के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान चीन जैसे अन्य देशों जो कि पहले से ही पाकिस्तान में ग्वाडर बंदरगाह का विकास कर रहा है, को भी यह बंदरगाह प्रस्तावित कर रहा है।

पश्चिम एशिया में विशेष रूप से भारतीय दृष्टिकोण  से क्या प्रभाव हो सकता है?
ईरान को लक्षित करने के लिए ट्रंप की चाल, और इसके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों सऊदी अरब और इज़राइल के साथ,  इस क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है जहां 8 मिलियन से अधिक भारतीय प्रवासी रहते हैं और काम करते हैं। पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव ने अतीत में भी भारत को अपने नागरिकों को वहाँ से हटाने के लिए विवश किया है; हालांकि ऐसा करने के लिए नई दिल्ली की क्षमता सीमित है।

ट्रंप के इस कदम के भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्या मायने हैं?
ट्रंप के अनुसार यह संबंध यह केवल लेनदेन वाला रहा है। अमेरिका पाकिस्तान के प्रति सख्त रहा है लेकिन इसने भारत को चीन पर नजर रखने के साथ-साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सक्रिय रहने के लिए कहता रहा है। हालांकि इन दोनों स्थितियों में हितों की ही पूर्णता रही है, भारतीय प्रतिष्ठान हिंद-प्रशांत रणनीति के प्रति अधिक प्रतिबद्ध रहा है। इसके अलावा रूस के साथ अपने संबंधों के चलते भारत और अमेरिक के बीच दूरियाँ बढ़ी है- नई दिल्ली इन असहमतियों के पार्टी सजग है तथा ईरान रणनीति विश्व के सबसे बड़ी तथा प्राचीन लोकतन्त्र के बीच इस “रणनीतिक साझेदारी” की स्थिरता का परीक्षण करेगा।

भारत-ईरान संबंध का भविष्य कैसा होगा?
इन दोनों देशों के बीच अपने संबंधों को स्थिर तथा मजबूत बनाए रखने के लिए रणनीतिक महत्व है, तथा प्रतिबंधों के बावजूद यव इन संबंधों को बनाए रखना चाहेंगे।

  • कई विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को रुपया-रियाल व्यापार प्रक्रिया तथा दोनों देशों के बीच धन के प्रवाह तथा आय को बनाए रखने के लिए भारत में ईरानी बैंकों की स्थापना जैसे विकल्पों की तरफ ध्यान देना चाहिए।
  • वर्तमान संकट नई दिल्ली तथा तेहरान को भविष्य में भी ऐसी परिस्थितियों के लिए योजना बनाए के लिए विवश कर सकता है।

स्रोत- द इंडियन एक्सप्रेस