UPSC DAILY CURRENT 15-02-2019

भारत-विश्व

बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग

चर्चा में क्यों?

 

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग में सहयोग के लिये भारत और फिनलैंड के बीच सहमति पत्र (Memorandum of Understanding-MoU) को अपनी मंज़ूरी दे दी है। इस MoU पर पहले ही 10 जनवरी, 2019 को नई दिल्ली में हस्ताक्षर किये जा चुके हैं।

 

समझौते का महत्त्व

 

हस्ताक्षरित MoU के तहत पृथ्वी के सुदूर संवेदन (Remote Sensing), उपग्रह संचार (Satellite communication), उपग्रह आधारित नौवहन (Navigation), अंतरिक्ष विज्ञान और बाह्य अंतरिक्ष के अन्वेषण (Exploration) के क्षेत्र में नई अनुसंधान गतिविधियों और अनुप्रयोग (Application) से जुड़ी संभावनाओं की तलाश को बढ़ावा दिया जाएगा।

फिनलैंड की सरकार के साथ सहयोग के परिणामस्वरूप मानवता की भलाई के लिये अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के उपयोग के क्षेत्र में एक संयुक्त गतिविधि का विकास संभव हो पाएगा।

किन क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा?

 

सहमति पत्र से निम्नलिखित संभावित क्षेत्रों में सहयोग सुनिश्चित होगा :

 

पृथ्वी का सुदूर संवेदन

उपग्रह संचार और उपग्रह आधारित नौवहन

अंतरिक्ष विज्ञान और ग्रह संबंधी अन्वेषण

अंतरिक्ष उपकरणों (Objects) और ज़मीन आधारित प्रणाली का विकास, परीक्षण एवं परिचालन

भारत के प्रक्षेपण यानों द्वारा फिनलैंड के अंतरिक्ष उपकरणों को प्रक्षेपित करना।

अंतरिक्ष से जुड़े डेटा की प्रोसेसिंग एवं उपयोग करना।

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के उपयोग पर आधारित अभिनव अनुप्रयोगों और समाधानों (Solutions) को विकसित करना।

उभरते नए अंतरिक्ष अवसरों और डेटा पारिस्थितिकी एवं बाह्य अंतरिक्ष के सतत उपयोग के क्षेत्र में सहयोग करना।

कार्यान्वयनकारी रणनीति

 

सभी प्रतिभागी इस MoU के तहत सहकारी गतिविधियों में सामंजस्य स्थापित करने के उद्देश्य से एक-एक समन्वयक को मनोनीत करेंगे। इस MoU के कार्यान्वयन में सुविधा के लिये प्रतिभागी पारस्परिक निर्णय लेने के लिये बारी-बारी से भारत अथवा फिनलैंड में बैठकें करेंगे अथवा वीडियो कॉन्फ्रेंस के ज़रिये निर्णय लेंगे।

प्रतिभागी अथवा उनके द्वारा अधिकृत किये जाने पर कार्यान्वयनकारी एजेंसियां आवश्यकता पड़ने पर उन विशिष्ट सहकारी परियोजनाओं के प्रबंधन के लिये परियोजना टीमों का गठन कर सकती हैं, जिन पर काम कार्यान्वयनकारी व्यवस्थाओं के तहत शुरू किया जाएगा। यह निर्णय अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहयोग के लिये फिनलैंड की सरकार द्वारा दिखाई गई रुचि को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

स्रोत : पी.आई.बी.

 

शासन व्यवस्था

‘अनिवासी भारतीय (प्रवासी) विवाह पंजीकरण विधेयक,  2019’

चर्चा में क्यों?

 

हाल ही में अप्रवासी भारतीयों के विवाह के पंजीकरण पर एक पथ प्रवर्तक विधेयक ‘अनिवासी भारतीय (प्रवासी) विवाह पंजीकरण विधेयक,  2019’ (Registration of Marriage of Non-Resident Indian (NRI) Bill, 2019) राज्यसभा में पेश किया गया।

 

महत्त्वपूर्ण बिंदु

 

इस विधेयक का उद्देश्‍य अधिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ-साथ अप्रवासी भारतीय (Non-Resident Indian: NRI) पति द्वारा भारतीय महिला के शोषण के खिलाफ अधिक सुरक्षा प्रदान करना है।

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, किसी भी NRI द्वारा भारतीय युवती (चाहे वह युवती भारत में रह रही हो अथवा स्वयं भी NRI हो) से विवाह का पंजीयन शादी की तारीख से 30 दिन के भीतर करवाना अनिवार्य होगा।

यह विधेयक अप्रवासी भारतीय की संपत्ति की कुर्की का भी प्रावधान करता है, यदि वह अदालत के सामने पेश नहीं होता है और अदालत द्वारा अपराधी घोषित किया जाता है।

विधेयक पारित हो जाने पर निम्‍नलिखित में आवश्‍यक बदलाव करने होंगे-

♦ पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (Passports Act, 1967) में

♦ धारा 86A को शामिल करते हुए फौजदारी या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Code of Criminal Procedure 1973) में

महत्त्व

 

विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, भारत या विदेश में शादी के 30 दिनों के भीतर विवाह का पंजीकरण किया जाना अनिवार्य है, इस प्रकार विभिन्न पारिवारिक कानूनों के तहत परित्यक्त पति या पत्नी के अधिकारों का बेहतर ढंग से प्रवर्तन संभव होगा।

इसी तरह पासपोर्ट अधिनियम में संशोधन करने से पासपोर्ट प्राधिकरण को उस स्थिति में अप्रवासी भारतीय के पासपोर्ट को ज़ब्त करने या रद्द करने का अधिकार होगा, जब यह ध्यान में लाया जाए कि अप्रवासी भारतीय ने शादी की तारीख से 30 दिनों के भीतर अपनी शादी का पंजीकरण नहीं कराया है।

फौजदारी अथवा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में संशोधन के फलस्‍वरूप अनिवासी भारतीयों से वि‍वाह करने वाली भारतीय महिलाओं को अपेक्षाकृत ज़्यादा संरक्षण मिलेगा। CRPC में संशोधन, 1973 विदेश मंत्रालय के विशेष रूप से नामित वेबसाइट के माध्यम से सम्मन, वारंट जारी करने के लिये न्यायालयों को सशक्त करेगा।

इसके साथ ही यह विधेयक जीवनसाथी का उत्‍पीड़न करने वाले अनिवासी भारतीयों पर लगाम लगाएगा।

निष्कर्ष

 

यह विधेयक विदेश मंत्रालय, महिला और बाल विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय की एक संयुक्त पहल का परिणाम है। विदेश मंत्रालय द्वारा भारतीय नागरिकों, ज़्यादातर महिलाओं जो कि अप्रवासी भारतीय पतियों द्वारा परित्यक्त या उत्पीड़ित की गई हैं, से प्राप्त कई शिकायतों के कारण इस विधेयक का प्रस्तुतीकरण आवश्यक था।

इससे दुनिया भर में अप्रवासी भारतीयों से शादी करने वाली सभी भारतीय महिलाओं को काफी राहत मिलेगी।

स्रोत : पी.आई.बी एवं विदेश मंत्रालय की वेबसाइट

 

अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत-नॉर्वे द्वारा समुद्री प्रदूषण से निपटने हेतु पहल

चर्चा में क्यों?

 

हाल ही में देश के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forests and Climate Change) तथा नॉर्वे के विदेश मंत्रालय (Norwegian ministry of Foreign Affairs) ने संयुक्त रूप से भारत-नॉर्वे समुद्री प्रदूषण पहल (India-Norway Marine Pollution Initiative) के लिये एक समझौते पर हस्‍ताक्षर किये।

 

महत्त्वपूर्ण बिंदु

 

जनवरी 2019 में भारत और नॉर्वे की सरकारों द्वारा महासागरीय क्षेत्रों में मिलकर कार्य करने के लिये एक समझौता ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर किया गया।

जनवरी में नॉर्वे के प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान भारत-नॉर्वे महासागर संवाद (India-Norway Ocean Dialogue) स्थापित किया गया।

ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy) के बारे में सरकारी अधिकारियों, अनुसंधानकर्त्ताओं और विशेषज्ञों के साथ ही निजी क्षेत्र को शामिल करके एक संयुक्‍त कार्यबल की स्‍थापना की गई है।

इसका उद्देश्‍य समुद्र तटीय और समुद्री क्षेत्र के अलावा ऊर्जा क्षेत्र में ब्लू इकोनॉमी का रणनीतिक स्‍थायी समाधान विकसित करना है।

इस भागीदारी में भारत और नॉर्वे अपने अनुभव और क्षमता को साझा करते हुए स्‍वच्‍छ एवं स्वस्‍थ महासागरीय विकास, समुद्री संसाधनों का सतत् उपयोग एवं ब्लू इकोनॉमी के विकास के प्रयासों में सहयोग करेंगे।

दोनों सरकारों के नेतृत्‍व के तहत की गई यह पहली संयुक्‍त पहल (भारत-नॉर्वे समुद्री प्रदूषण पहल) समुद्री प्रदूषण की समस्‍या से निपटने के लिये कार्य करेगी। जो वर्तमान में तेज़ी से बढ़ती हुई पर्यावरणीय समस्या की चिंता का विषय बन गई है।

इस संयुक्‍त पहल पर औपचारिक रूप से भारत में नार्वे के राजदूत और भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर सचिव द्वारा हस्‍ताक्षर किये गए हैं।

समझौते के लाभ

 

इस पहल के माध्‍यम से स्‍थायी अपशिष्‍ट प्रबंधन प्रक्रियाओं को लागू करने, समुद्री प्रदूषण के स्रोतों और संभावनाओं के बारे में जानकारी एकत्र करने एवं विश्‍लेषण करने के लिये प्रणाली विकसित करने तथा निजी क्षेत्र में निवेश में सुधार लाने हेतु स्‍थानीय सरकारों को सहायता प्रदान करने की मांग की जाएगी।

इस पहल से समुद्र तटों की सफाई के प्रयासों, जागरूकता बढ़ाने वाले अभियानों, सीमेंट उद्योग में कोयले की जगह प्‍लास्टिक अपशिष्‍ट को ईंधन के विकल्‍प के रूप में उपयोग करने और जमा योजनाओं के लिये ढाँचा विकसित करने में भी मदद मिलेगी।

समुद्री प्रदूषण – समुद्री प्रदूषण वह प्रदूषण है जिसमे रसायन, कण, औद्योगिक, कृषि और घरेलू कचरा, तथा आक्रामक जीव महासागर में प्रवेश करके समुद्र में हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। समुंद्री प्रदूषण के स्रोत अधिकांशतः  धरातलीय हैं। सामान्यतः यह प्रदूषण कृषि अपवाह या वायु प्रवाह से पैदा हुए अपशिष्ट स्रोतों के कारण होता है।

 

स्रोत – PIB

 

सामाजिक न्याय

अब भी प्रचलित है बाल विवाह

चर्चा में क्यों?

 

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल आपातकालीन कोष (United Nations International Children’s Emergency Fund-UNICEF) ने एक रिपोर्ट, ‘फैक्टशीट चाइल्ड मैरिजेज़ 2019’ जारी करते हुए कहा है कि भारत के कई क्षेत्रों में बाल विवाह का प्रचलन अब भी है।

 

प्रमुख बिंदु

 

पिछले कुछ दशकों के दौरान भारत में बाल विवाह की दर में कमी आई है किंतु कुछ राज्यों जैसे-बिहार, बंगाल और राजस्थान में अब भी यह कुप्रथा बदस्तूर जारी है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, उक्त राज्यों में करीब 40 फीसदी की दर से बाल विवाह का प्रचलन है।

बाल विवाह की यह कुप्रथा आदिवासी समुदायों और अनुसूचित जातियों सहित कुछ विशेष जातियों के बीच प्रचलित है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बालिका शिक्षा की दर में सुधार, किशोरियों के कल्याण के लिये सरकार द्वारा किये गए निवेश व कल्याणकारी कार्यक्रम और इस कुप्रथा के खिलाफ सार्वजनिक रूप से प्रभावी संदेश देने जैसे कदमों के चलते बाल विवाह की दर में कमी देखने को मिली है।

रिपोर्ट की मानें तो 2005-2006 में जहाँ 47 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई थी, वहीं 2015-2016 में यह आँकड़ा 27 फीसदी था।

यूनिसेफ के अनुसार, इस संबंध में सभी राज्यों में एक समान बदलाव दिखाई दे रहा है और बाल विवाह की दर में गिरावट लाए जाने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है किंतु कुछ ज़िलों में बाल विवाह का प्रचलन अब भी उच्च स्तर पर बना हुआ है।

वैश्विक स्थिति

 

वर्तमान में दुनिया भर में करीब 65 करोड़ ऐसी लड़कियाँ/महिलाएँ हैं जिनकी शादी 18 वर्ष की उम्र से पहले ही कर दी गई है, जबकि बचपन में लड़कियों की शादी कर दिये जाने के मामले में यह संख्या प्रतिवर्ष करीब 1.2 करोड़ है।

 

दक्षिण एशिया में बाल विवाह की दर 40 प्रतिशत (वैश्विक दर की) है, जबकि उप-सहारा अफ्रीका में बाल विवाह की दर 18 प्रतिशत (वैश्विक दर की) है।

लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में बाल विवाह की स्थिति में बदलाव नहीं आया है। बाल विवाह की उच्च दर के मामले में 25 साल पहले जैसे हालात अब भी बरकरार हैं।  हालाँकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया भर में बाल विवाह की प्रथा में कमी आई है।

पिछले एक दशक में बाल विवाह की दर में 15 प्रतिशत की कमी आई है जिसके तहत लगभग 2.5 करोड़ बाल विवाह होने से रोके गए हैं।

 

दक्षिण एशिया में लड़की की शादी बचपन में कर दिए जाने के मामले में एक-तिहाई से भी अधिक की गिरावट आई है, यह एक दशक पहले लगभग 50 प्रतिशत थी जो अब वर्तमान में 30 प्रतिशत है।

बाल विवाह के दुष्प्रभाव

 

भारत में बाल विवाह चिंता का विषय है। बाल विवाह किसी बच्चे को अच्छे स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा के अधिकार से वंचित करता है। कम उम्र में विवाह के कारण लड़कियों को हिंसा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

कम उम्र में विवाह किये जाने का लड़के और लड़कियों दोनों पर शारीरिक, बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ता है, शिक्षा प्राप्ति के अवसर कम हो जाते हैं और व्यक्तित्व का विकास सही ढंग से नही हो पाता है।

बाल विवाह के कारण

 

गरीबी

लड़कियों की शिक्षा का निम्न स्तर

लड़कियों को आर्थिक बोझ समझना

सामाजिक प्रथाएँ एवं परंपराएँ

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006

 

बाल विवाह पर रोक संबंधी कानून सर्वप्रथम सन् 1929 में पारित किया गया था। बाद में सन् 1949, 1978 और 2006 में इसमें संशोधन किये गए।

इस समय विवाह की न्यूनतम आयु बालिकाओं के लिये 18 वर्ष और बालकों के लिये 21 वर्ष निर्धारित की गई है।

आगे की राह

 

समाज में जड़ जमा चुकी बाल विवाह की इस कुप्रथा को खत्म करने के लिये विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

बाल विवाह को केवल एक ‘सामाजिक बुराई’ के रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिये बल्कि इसे बच्चों के ‘मौलिक अधिकारों’ के उल्लंघन का एक गंभीर मामला मानते हुए इसके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

 

बाल विवाह के खिलाफ जन जागरूकता फैलाने हेतु देश में युद्ध स्तर पर एक मुहिम चलाई जानी चाहिये।

‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे कार्यक्रमों को ज़मीनी स्तर पर लागू किया जाना चाहिये।

स्रोत- यूनिसेफ

 

भारतीय विरासत और संस्कृति

मैथिली भाषा तथा इसकी लिपियों का संवर्द्धन एवं संरक्षण

चर्चा में क्यों?

 

हाल ही में एक समिति ने मैथिली भाषा तथा इसकी लिपि के संवर्द्धन और संरक्षण (Promotion and Protection of Maithili Language) विषय पर अपनी रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को (Ministry of Human Resource Development) सौंपी। समिति द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में मैथिली भाषा के संवर्द्धन और संरक्षण हेतु कई सिफारिशें की गई हैं।

 

सिफारिशों पर तत्काल कार्रवाई का फैसला

 

मंत्रालय द्वारा रिपोर्ट की जाँच किये जाने के बाद समिति की सिफारिशों में से कुछ पर तत्काल कार्रवाई करने का निर्णय लिया गया है-

 

मिथिलाक्षर के संरक्षण, संवर्द्धन और विकास के लिये दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय या कामेश्वर सह-दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में से किसी एक परिसर में पांडुलिपि केंद्र की स्थापना की जाएगी। मिथिलाक्षर (Mithilakshar) के उपयोग को आसान बनाने के लिये इस लिपि को भारतीय भाषाओं के लिये प्रौद्योगिकी विकास संस्थान (Technology Development of Indian Languages-TDIL) द्वारा जल्द-से-जल्द कंप्यूटर की भाषा (यूनिकोड) में परिवर्तित करने का काम पूरा किया जाएगा। मिथिलाक्षर लिपि को सीखने के लिये श्रव्य-दृश्य/ऑडियो-विज़ुअल (Audio-Visual) तकनीक का विकास किया जाएगा।

संरक्षण एवं संवर्द्धन की आवश्यकता

 

पिछले 100 वर्षों के दौरान इस लिपि के उपयोग में कमी आई है और इसके साथ ही हमारी संस्कृति का भी क्षय हो रहा है।

चूँकि मैथिली भाषा की स्वयं की लिपि का उपयोग नहीं किया जा रहा, इसलिये संवैधानिक दर्जा मिलने के बावजूद भी इसे समग्र रूप से विकसित करने की आवश्यकता है।

इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने मैथिली भाषा और उसकी लिपियों के संवर्द्धन और संरक्षण पर रिपोर्ट तैयार करने के लिये वर्ष 2018 में इस समिति का गठन किया था।

समिति के सदस्य

 

समिति में चार सदस्य शामिल थे- ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के मैथिली विभागाध्यक्ष, प्रो. रमण झा; कामेश्वर सह-दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याकरण विभागाध्यक्ष, डॉ. पं. शशिनाथ झा;, ललित नारायण विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रो. रत्नेश्वर मिश्र व पटना स्थित महावीर मंदिर न्यास के प्रकाशन विभाग के पदाधिकारी पं. भवनाथ झा।

पृष्ठभूमि

 

मिथिलाक्षर या तिरहुत (Mithilakshar or Tirhuta) व्यापक संस्कृति वाली ‘मिथिला’ की लिपि है। मिथिलाक्षर, बांग्ला, असमिया, नेबारी, ओडिया और तिब्बती की लिपियाँ इसी परिवार का हिस्सा हैं।

यह एक अत्यंत प्राचीन लिपि है और व्यापक उत्तर-पूर्वी भारत की लिपियों में से एक है।

मिथिलाक्षार 10वीं शताब्दी तक अपने वर्तमान स्वरूप में आ गई थी।

मिथिलाक्षरों के प्राचीनतम रूपों के प्रयोग का साक्ष्य 950 ई. के सहोदरा के शिलालेखों में मिलता है।

इसके बाद चंपारण से देवघर तक पूरे मिथिला में इस लिपि का उपयोग किया गया।

जापान की बुलेट ट्रेन को भी मिथिला पेंटिंग्स से सजाने पर किया जा रहा है विचार

 

जापान में बुलेट ट्रेन को बिहार के विश्व विख्यात मिथिला पेंटिंग्स से सजाने पर विचार किया जा रहा है। जापान की सरकार ने इस काम के लिये भारत के रेल मंत्रालय से कलाकारों की मांग की है। उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व भारतीय रेल के समस्तीपुर मंडल ने संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस को मिथिला पेंटिंग्स से सजाया था, जिसकी सराहना संयुक्त राष्ट्र ने भी की थी। वैसे जापानी लोग मिथिला पेंटिंग्स से पहले ही से परिचित हैं क्योंकि वहाँ जापान-भारत सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने वाली संस्था ने मिथिला म्यूज़ियम भी बनाया है।

 

विविध

  • 13 फरवरी: विश्व रेडियो दिवस का आयोजन। इस वर्ष रेडियो दिवस की थीम संवाद, सहिष्णुता औरशांति (Dialogue, Tolerance & Peace) रखी गई है। आपको बता दें कि 20 अक्तूबर, 2010 को स्पेनिश रेडियो अकादमी के अनुरोध पर स्पेन ने संयुक्त राष्ट्र में रेडियो को समर्पित विश्व दिवस मनाने के लिये सदस्य देशों से अपील की। इसके बाद UNESCO ने पेरिस में आयोजित 36वीं आमसभा में 3 नवंबर, 2011 को प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने का एलान किया। उल्लेखनीय है कि 13 फरवरी को ही संयुक्त राष्ट्र के ‘रेडियो UNO’ की वर्षगाँठ भी होती है, क्योंकि 1946 में इसी दिन वहाँ रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ था।
  • भारत और मालदीव एक बार फिर सरल वीज़ा प्रणाली लागू करने पर सहमत हो गए हैं। इसके लिये दोनों देशों ने एक समझौते पर दस्तखत किये हैं, जो इसी वर्ष 11 मार्च से लागू होगा। यह समझौता मालदीव में इब्राहिम सोलेह के सत्ता में आने के बाद हुआ है। गौरतलब है कि पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के कार्यकाल में मालदीव की चीन से निकटता काफी बढ़ गई थी और भारत के साथ संबंध पहले जैसे मधुर नहीं रह गए थे।
  • हाल ही में जारी गृह मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2013 से 2016 के बीच देश में मानव तस्करी के मामले बढ़कर दोगुने से अधिक हो गए हैं। 2013 में यह आँकड़ा 3940 था, जो 2014, 2015 और 2016 में बढ़कर क्रमशः 5235, 7143 और 8132 हो गया। इसमें पश्चिम बंगाल का योगदान लगभग एक-तिहाई है। इन चार वर्षों में कुल 24,450 मामले सामने आए, जिनमें से 8115 मामले पश्चिम बंगाल में देखने को मिले। इसके बाद राजस्थान का स्थान रहा।
  • केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का कार्यकाल 31 मार्च, 2019 से आगे 3 साल और बढ़ाने की मंज़ूरी दे दी है। सरकार यह मानती है कि हाथ से सफाई करने की प्रथा का पूरी तरह से उन्मूलन होना चाहिये और इसके लिये इस पर लगातार निगरानी रखने की आवश्यकता है। सरकार ने सफाई कर्मचारियों के उत्थान के लिये अनेक कदम उठाए हैं, लेकिन उन्हें सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से जिस भेदभाव का सामना करना पड़ता है, उसकी समाप्ति अभी दिखाई नहीं दे रही है। इसीलिये इस आयोग का कार्यकाल तीन साल के लिये और बढ़ाया गया है।
  • तमिलनाडु के कुन्नूर में वायरल वैक्सीन बनाने की नई इकाई की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस परियोजना के तहत कुन्नूर के पास्चर इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (PII) में वायरल वैक्सीन (TCA खसरा रोधी, जापानी इंसेफ्लाइटिस आदि) और एंटी सीरम (सर्प विष रोधी और एंटी रैबीज़ सीरम) का उत्पादन किया जाएगा। इससे बच्चों के लिये जीवन रक्षक टीकों के उत्पादन को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ देश में टीकाकरण सुरक्षा कायम होने, टीकाकरण पर लागत घटाने और आयात को घटाने में मदद मिलेगी। फिलहाल इन टीकों का आयात किया जाता है।
  • आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी औषधियों की ऑनलाइन लाइसेंस प्रणाली के लिये ई-औषधि नामक पोर्टल की शुरुआत की है। इस पोर्टल का लक्ष्य पारदर्शिता बढ़ाना, सूचना प्रबंधन सुविधा में सुधार लाना, डेटा के इस्तेमाल में सुधार लाना और उत्तरदायित्व बढ़ाना है। यह पोर्टल लाइसेंस प्रदाता अधिकारी, निर्माताओं और उपभोक्ताओं के लिये मददगार होने के साथ-साथ लाइसेंसशुदा निर्माताओं तथा उनके उत्पादों, रद्द की गई और नकली औषधियों के बारे में जानकारी, शिकायतों के लिये संबंधित अधिकारी के संपर्क-सूत्र भी तत्काल उपलब्ध कराएगा।
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार भारत ने कोपेनहेगन में घोषित 2020 के लक्ष्य को समय से पहले ही हासिल कर लिया है। 2004-14 के बीच देश में कार्बन उत्सर्जन तीव्रता में 21% की कमी आई है, जबकि लक्ष्य 2020 तक इसमें 20-25% कमी लाने का रखा गया था। ये आँकड़े 2014 तक के हैं। गौरतलब है कि UN Climate Change Framework के तहत सदस्य देशों को प्रत्येक दो वर्ष में एक बार अपने जलवायु लक्ष्यों को लेकर किये गए प्रयासों का ब्योरा देना होता है।
  • अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये पंजाब सरकार धान की भूसी से बायो जेट फ्यूल बनाने की योजना पर काम कर रही है। इसके लिये पंजाब सरकार और विरगो कॉर्पोरेशन के बीच समझौता हुआ है। 630 करोड़ रुपए की लगत वाली इस परियोजना के लिये तकनीक अमेरिकी कंपनी हनीवेल उपलध कराएगी। धान की भूसी से बायो जेट फ्यूल बनाने के लिये यह कंपनी रैपिड थर्मल प्रोसेसिंग प्लांट लगाएगी। गौरतलब है कि परीक्षणों के कई दौर के बाद देश में सैन्य विमानों में बायो जेट फ्यूल के इस्तेमाल को मंज़ूरी मिल चुकी है।
  • गुजरात देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जहाँ शेर, बाघ और तेंदुए के मौजूद होने की पुष्टि हो गई है। गुजरात के गिर में बड़ी संख्या में शेरों की मौजूदगी पहले ही से है और अन्य राज्यों की तरह तेंदुए भी पूरे प्रदेश में दिखाई देते हैं। अब राज्य के महिसागर ज़िले के संतरामपुर के जंगलों में बाघ की मौजूदगी की पुष्टि वन विभाग ने की है। माना जा रहा है कि यह बाघ लगभग 500 किमी. की यात्रा कर मध्य प्रदेश से यहाँ आया है।
  • ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बालेश्वर ज़िले में 5000 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले सुबर्णरेखा बंदरगाह की आधारशिला रखी। सभी मौसमों में काम करने वाला वाणिज्यिक सुबर्णरेखा बंदरगाह का विकास संयुक्त रूप से टाटा स्टील और चेन्नई की क्रिएटिव पोर्ट प्राइवेट लि. कर रहे हैं। इसमें टाटा स्टील की 51% तथा क्रिएटिव पोर्ट प्राइवेट लि. की 49% हिस्सेदारी है। इस बंदरगाह से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से 12 हज़ार लोगों को रोजगार मिलने के संभावना है।
  • केंद्र सरकार ने दो साल के अंदर दूसरी बार रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अश्विनी लोहानी को एयर इंडिया का अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक नियुक्त किया है। एयर इंडिया में उनका पहला कार्यकाल अगस्त, 2015 से अगस्त, 2017 तक था। इंडियन रेलवे सर्विस ऑफ मेकेनिकल इंजीनियर्स के 1980 बैच के अधिकारी अश्विनी लोहानी अगस्त, 2017 में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष नियुक्त किये गए थे और वह दिसंबर, 2018 में इस पद से रिटायर हुए थे। वह ITDC के अध्यक्ष और राष्ट्रीय राजधानी में रेल संग्रहालय के निदेशक भी रह चुके हैं।
  • 100 वर्षों में पहली बार अफ्रीका में केन्या के जंगलों में काला तेंदुआ (Black Leopard) दिखाई दिया है। ब्रिटेन के वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर विल बुरार्ड लुकस ने इसे अपने कैमरे में कैद किया है। अभी तक माना जा रहा था कि यह प्रजाति लुप्त हो गई है। इसके लिये विल ने केन्या की लाइकिपिया (Laikipia) काउंटी में वायरलेस मोशन सेंसर, हाई क्वालिटी DSLR कैमरा और तीन फ्लैश लाइट्स की तैनाती की थी। आपको बता दें कि अफ्रीकी तेंदुओं के संरक्षण के लिये इसे संकटग्रस्त जीव माना गया है।
  • अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मंगल ग्रह पर भेजे गए रोवर अपॉर्च्युनिटी को 15 सालों की सेवा के बाद मृत घोषित कर दिया। गौरतलब है कि छह पहियों वाला यह रोवर 2004 में केवल 90 दिनों के लिये मंगल ग्रह पर भेजा गया था, लेकिन यह लंबे समय तक काम करता रहा। पिछले साल जून में आए रेतीले तूफान के चलते अपॉर्च्युनिटी की ट्रांसमिशन क्षमता कमज़ोर हो गई थी। सौर ऊर्जा से संचालित नासा का यह रोवर मंगल ग्रह पर सबसे अधिक समय तक चलने वाला रोवर था। नासा का अगला मार्स रोवर मिशन 2020 में शुरू किया जाना है।