UPSC DAILY CURRENT 17-05-2018

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अटल पेंशन योजना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. अटल पेंशन योजना के तहत असंगठित क्षेत्र के उन कामगारों पर फोकस किया जाता है।
  2. अटल पेंशन योजना की लॉन्चिंग के तीन साल पूरे होने पर पीएफआरडीए ने वित्त मंत्रालय के सहयोग से ‘एपीवाई निर्माण दिवस’ के नाम से एक अभियान आयोजित किया है।
  3. अटल पेंशन योजना के तहत 70 साल की उम्र पूरी होने पर निर्धारित गारंटीड न्‍यूनतम पेंशन मिलेगी।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 और 2
D) 1, 2 और3

व्याख्या


उत्तर (C)

हाल ही में अटल पेंशन योजना (एपीवाई) के 3 साल पूरे होने पर इस स्‍कीम के तहत लाभार्थियों की संख्‍या 1 करोड़ से अधिक हो गई है।

अटल पेंशन योजना (एपीवाई)

  • एपीवाई का शुभारंभ प्रधानमंत्री ने 9 मई, 2015 को कोलकाता में आयोजित एक समारोह में किया था। वर्तमान में इस योजना के सदस्‍यों की संख्‍या कुल मिलाकर 1.10 करोड़ है।
  • भारत सरकार द्वारा देश के नागरिकों के लिये  घोषित की गई गारंटीड पेंशन वाली इस स्‍कीम अर्थात् अटल पेंशन योजना के तहत असंगठित क्षेत्र के उन कामगारों पर फोकस किया जाता है, जिनकी हिस्‍सेदारी कुल श्रम बल में 85 प्रतिशत से भी अधिक है।
  • अटल पेंशन योजना के तहत 60 साल की उम्र पूरी होने पर प्रति माह 1000 रुपये या 2000 रुपये अथवा 3000 रुपये या 4000 रुपये अथवा 5000 रुपये की गारंटीड न्‍यूनतम पेंशन मिलेगी जो सदस्‍यों द्वारा किए जाने वाले अंशदान पर निर्भर करेगी।
  • संबंधित सदस्‍य की पत्‍नी/पति भी पेंशन पाने का हकदार है और नामित व्‍यक्ति को संचित पेंशन राशि दी जाएगी।
  • अटल पेंशन योजना की लांचिंग के तीन साल पूरे होने के अवसर पर पेंशन कोष नियामक विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के सहयोग से देश भर में ‘एपीवाई निर्माण दिवस’  के नाम से एक व्‍यापक पहुँच अभियान का आयोजित किया, ताकि बैंकों और डाक विभाग द्वारा एपीवाई में नामांकन में वृद्धि की जा सके ।
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हाल ही में नालको और भारत सरकार के मध्य वित्त वर्ष 2018-19 के लिये हुए समझौते  के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. समझौता ज्ञापन में 100 प्रतिशत क्षमता उपयोग का लक्ष्य तय किया गया है।
  2. समझौते के तहत ऑनलाइन मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली लागू करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

व्याख्या
उत्तर (C)

हाल ही में अल्यूमीनियम क्षेत्र की प्रमुख और सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न कंपनी राष्ट्रीय अल्यूमीनियम कंपनी लिमिटेड (नालको) ने वित्त वर्ष 2018-19 के लिये 9,350 करोड़ रुपए का राजस्व लक्ष्य तय करते हुए भारत सरकार के साथ समझौता ज्ञापन किया है।

समझौते से संबंधित प्रमुख बिंदु 

  • यह राजस्व लक्ष्य पिछले वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है।
  • यह समझौता ज्ञापन सार्वजनिक उद्यम विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप है और इसे अंतर-मंत्रालय समिति और खान मंत्रालय दोनों के साथ विचार-विमर्श के बाद अंतिम रूप दिया गया।
  • समझौता ज्ञापन में 2.1 मिलियन टन अल्यूमीनियम उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है, जिसमें 100 प्रतिशत क्षमता उपयोग का लक्ष्य तय किया गया है। अतः पहला कथन सत्य है ।
  • उत्पादन क्षमता में सुधार के हिस्से के रूप में कुल कार्बन खपत में कमी लाने का लक्ष्य भी तय किया गया है।
  • इसके अतिरिक्त समझौते में अनुसंधान और विकास उत्पादों के वाणिज्यिकरण पर बल दिया गया है।
  • कंपनी ने वर्ष 2018-19 के लिये  1,100 करोड़ रुपये का कैपेक्स लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • यह राशि एक मिलियन टन की क्षमता वाली पाँचवीं रिफाइनरी, उत्कल-डीएंडई कोयला ब्लॉकों, पवन ऊर्जा परियोजनाओं, संयुक्त उद्यम की परियोजनाओं तथा संयंत्र उपकरणों के आधुनिकीकरण और उन्नयन पर खर्च की जाएगी।
  • मानव संसाधन के क्षेत्र में रणनीतिक कदम उठाते हुए जनक्षमता परिपक्वता, मॉडल (पीसीएमएम) के माध्यम से कर्मचारियों के मूल्यांकन और ऑनलाइन मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली लागू करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अतः दूसरा कथन भी सत्य है।
  • इन लक्ष्यों से नई कॉरपोरेट परियोजना के अनुरूप कंपनी को कार्यबल और कौशल में तालमेल बिठाने में मदद मिलेगी।
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हाल ही में किस संस्था द्वारा ‘राज्‍य स्‍टार्ट-अप रैंकिंग फ्रेमवर्क’ लॉन्च किया गया है?

A) नीति आयोग
B) औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग
C) ब्रिक्स बैंक
D) रिज़र्व बैंक

व्याख्या
उत्तर (B)

हाल ही में औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) द्वारा 6 फरवरी, 2018 को ‘राज्‍य स्‍टार्ट-अप रैंकिंग फ्रेमवर्क’ लॉन्च किया गया था। अतः विकल्प (B) सही है।

संबंधित प्रमुख बिंदु 

  • प्रतिस्‍पर्धी क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने-अपने स्‍टार्ट-अप पारितंत्रों को बढ़ावा देने और सक्रियतापूर्वक कार्य करने हेतु प्रेरित करना था।
  • इसके तहत राज्‍यों/केंद्र शासित प्रदेशों को एक-दूसरे से अच्‍छी प्रथाएं अथवा तौर-तरीके सीखने के लिये उन्‍हें प्रेरित करना था।
  • इसके तहत डीआईपीपी ने राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों के साथ अपना जुड़ाव बढ़ाया है, ताकि ‘राज्‍य स्‍टार्ट-अप रैंकिंग’ कवायद से जोड़ने में उनकी मदद की जा सके।
  • मार्च और अप्रैल, 2018 में सभी राज्‍यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के साथ डीआईपीपी द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से  दो आयोजन किए गये।
  • अपने-अपने क्षेत्रों में स्‍टार्ट-अप पारितंत्र विकसित करने की प्रक्रिया के बारे में राज्‍यों/केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकारियों को अवगत कराने के लिये  तीन ज्ञान आदान-प्रदान कार्यशालाएँ देश भर में फैले प्रमुख इन्‍क्‍यूबेटरों में आयोजित की गईं।
  • ये कार्यशालाएँ 9 अप्रैल, 2018 को हैदराबाद स्थित टी-हब में, 11 अप्रैल, 2018 को अहमदाबाद स्थित आईक्रिएट में और 16 अप्रैल, 2018 को विशाखापत्तनम स्थि‍त सनराइज इन्‍क्‍यूबेशन टावर में आयोजित की गईं।
  • राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने प्रथम ‘राज्‍य स्‍टार्ट-अप रैंकिंग’ कवायद में बड़े उत्‍साह के साथ भाग लिया है।
  • कुल मिलाकर 30 राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इसमें शामिल हुए थे तथा जिसके लिये आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 30 अप्रैल थी।
  • ‘राज्‍य स्‍टार्ट-अप रैंकिंग फ्रेमवर्क’ की लॉन्चिंग से राज्‍यों की सक्रियता काफी बढ़ गई है और इसके परिणामस्‍वरूप देश भर में स्‍टार्ट-अप मुहिम को काफी बढ़ावा मिल रहा है।
  • इस संदर्भ में विभिन्‍न राज्‍य सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों में से कुछ का उल्‍लेख नीचे किया गया है:
    ♦ स्‍टार्ट-अप नीति की घोषणा।
    ♦ महिलाओं की अगुवाई वाले स्‍टार्ट-अप के लिये  राज्‍यों की स्‍टार्ट-अप नीति में विशेष प्रोत्‍साहनों की शुरुआत।
    ♦ राज्‍य स्‍टार्ट-अप प्रमुख टीम का गठन।
    ♦ राज्‍यों के इन्‍क्‍यूबेटरों को वित्तीय सहायता देने का प्रावधान करना।
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. इसका प्राधिकरण का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005  के तहत किया गया था।
  2. भारत के राष्ट्रपति द्वारा इस प्राधिकरण की अध्यक्षता की जाती है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य नहीं है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

व्याख्या
उत्तर ( B)

हाल में आए आंधी-तूफान के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने देश के विभिन्न हिस्सों में बेहतर प्रारंभिक चेतावनी एवं तैयारी की स्थिति की समीक्षा की।

  • हाल की घटनाओं में हुए विनाश एवं नुकसान का आकलन करते हुए बैठक में भविष्य में ऐसे घटनाओं के प्रभाव को कम करने के तरीकों पर भी चर्चा की गई।
  • एनडीएमए ने राज्यों से उनके द्वारा शुरू किए गए राहत कदमों पर भी एक रिपोर्ट साझा करने को कहा। इस बैठक में आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, झारखंड, त्रिपुरा, चंडीगढ़, पंजाब, राजस्थान, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह, दिल्ली एंव पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
  • इस अवसर पर गृह मंत्रालय राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ), आईएमडी, केन्द्रीय जल आयोग एवं दूरदर्शन के प्रतिनिधि भी शामिल थे।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए)
National Disaster Management Authority (NDMA)

  • यह भारत में आपदा प्रबंधन के लिये एक सर्वोच्च निकाय है, जिसका गठन ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005’ के तहत किया गया था। अतः पहला कथन सही है।  
  • यह आपदा प्रबंधन के लिये नीतियों, योजनाओं एवं दिशा-निर्देशों का निर्माण करने के लिये ज़िम्मेदार संस्था है, जो आपदाओं के वक्त समय पर एवं प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करता है।
  • भारत के प्रधानमंत्री द्वारा इस प्राधिकरण की अध्यक्षता की जाती है। अतः दूसरा कथन सही नहीं है। 
  • उद्देश्य इस संस्था का उद्देश्य एक समग्र, प्रो-एक्टिव, प्रौद्योगिकी ड्रिवेन टिकाऊ विकास रणनीति के माध्यम से एक सुरक्षित और डिज़ास्टर रेसिलिएंट भारत का निर्माण करना है, जिसमें सभी हितधारकों को शामिल किया गया है।
  • यह आपदा की रोकथाम, तैयारी एवं शमन की संस्कृति को बढ़ावा देता है।

 

 

क्या ग्लोबल वार्मिंग को धीमा करना संभव है? 

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव-विविधता , पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड-14 : संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।)

global-warming

संदर्भ
पेरिस समझौते पर प्रगति करने के लिये यह एक महत्त्वपूर्ण वर्ष है, जिस पर दिसंबर 2015 में आयोजित  यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के अंतर्गत आयोजित पार्टियों के सम्मेलन-21 (COP-21) नामक बैठक में चर्चा की गई थी। पेरिस समझौता नवंबर 2016 से लागू हुआ था। हाल ही में पेरिस समझौते के क्रियान्वयन के लिये आवश्यक दिशा-निर्देशों पर चर्चा करने के लिये और उन पर सहमति बनाने के लिये पार्टियों की जर्मनी के बॉन में दो सप्ताह लंबी बैठक (30 अप्रैल -10 मई) आयोजित की गई।

प्रमुख बिंदु 

  • यह यूएनएफसीसीसी की सब्सिडरी बॉडी फॉर इंप्लीमेंटेशन (SBI) और सब्सिडरी बॉडी फॉर साइंटिफिक एंड टेक्नोलॉजिकल एडवाइस (SBSTA) की 48वीं बैठक थी, जिसे SB48 कहा गया।
  • लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर हुई अपर्याप्त प्रगति को देखते हुए दिसंबर 2018 में पोलैंड में आयोजित होने वाली COP-24 से पहले एक और अंतिम बैठक प्रस्तावित की गई है।
  • आदर्श रूप से, इन दिशा-निर्देशों से देशों को अगले स्तर के राष्ट्रीय अभिप्रेत योगदान (Nationally Determined Contributions) के लक्ष्य निर्धारण में सहायता मिलने की उम्मीद है।
  • समृद्ध देशों से धन का एक नियमित और विश्वसनीय प्रवाह भी होना चाहिये, ताकि विकासशील देशों में जलवायु कार्यवाहियों (climate action) का कार्यान्वयन किया जा सके।

बाधाएँ 

  • बॉन मीटिंग में जिन बाधाओं का अनुमान लगाया गया था, वे उचित प्रतीत होती हैं।
  • एनडीसी के मामले में नियम-पुस्तिका (rulebook) के संदर्भ में विवाद था। विकासशील देश चाहते थे कि नियम-पुस्तिका में शमन लक्ष्य, अनुकूलन और कार्यान्वयन के साधनों को कवर किया जाए, जबकि विकसित देश नियम-पुस्तिका को शमन (mitigation) और ग्रीनहाउस गैसों के न्यूनीकरण तक सीमित रखना चाहते थे।
  • लेकिन, चूँकि अधिकांश विकासशील देशों को अनुकूलन कार्यक्रमों (adaptation programmes) की आवश्यकता है और उन्हें अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को लागू करने के लिये समर्थन की आवश्यकता होती है, अतः इन्हें भी नियम-पुस्तिका में शामिल किया जाना चाहिये।
  • कोपेनहेगन सम्मलेन में इस बात पर सहमति जताई गई थी, कि 2020 से विकसित देश गरीब और विकासशील देशों को प्रतिवर्ष कम-से-कम $100 बिलियन धनराशि प्रदान करेंगे। लेकिन इन फंडों के प्राप्त होने की बहुत कम संभावना नज़र आ रही है।
  • वित्तीयन पर विचार-विमर्श करने की बजाय चर्चा को इस और मोड़ दिया गया, कि कैसे उन दानदाताओं की संख्या को बढ़ाया जाए जो फंड प्रदान करेंगे, किन देशों को इन फंडों से बाहर रखा जाए आदि।
  • यूएनएफसीसीसी की आम लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों (common but differentiated responsibilities) के सिद्धांत के अनुसार, जहाँ एक और कार्यवाहियों (actions) के उत्साहपूर्ण होने की आवश्यकता है, वहीं दूसरी और इसके लिये समुचित मात्रा में वित्तीयन की भी आवश्यकता है।
  • हानि और क्षति (loss and damage) से संबंधित मुद्दे भी वार्ता में एक बड़ी बाधा है।
  • एलएंडडी उन गरीब देशों को सहायता प्रदान करने का माध्यम है, जो जलवायु परिवर्तन से गंभीर प्रभाव का अनुभव करते हैं, लेकिन वार्मिंग और इसके प्रभावों के लिये जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों में इनका बहुत कम योगदान होता है।
  • यह उन अल्प विकसित देशों और छोटे द्वीपीय देशों के लिये यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो पहले ही समुद्र स्तर की वृद्धि का शिकार हैं।
  • बैठक में किसी भी महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर कोई समझौता नहीं हो सका। अतः बैठक के बाद पेरिस समझौते के पूर्ण कार्यान्वयन हेतु दिशा-निर्देशों पर कोई मसौदा दस्तावेज तैयार नहीं किया जा सका।

आगे की राह 

  • अतः सितंबर में आयोजित होने वाली चर्चा बहुत महत्त्वपूर्ण है जहाँ बॉन मीटिंग में अधूरे रह गए कार्यों को पूरा करने पर जोर दिया जाएगा।
  • लगभग उसी समय संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि के प्रभावों पर रिपोर्ट जारी किये जाने की उम्मीद है।
  • दो दशकों से चली आ रहीं जलवायु संबंधी वार्ताओं के बाद भी अभी तक की प्रगति निराशाजनक ही रही है । ऐसे में युवाओं द्वारा देशों की सरकारों पर दबाव बनाया जाना अति महत्वपूर्ण है।
  • जब तक ये युवा अपनी सरकारों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास नहीं कराएंगे, तब तक ग्लोबल वार्मिंग को सुरक्षित स्तर तक रख पाना मुश्किल होगा।

स्रोत : द हिंदू 

 

नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में महिलाओं हेतु नौकरियों की संभावना

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2: शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
(खंड-13 : स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।)

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संदर्भ
हाल ही में मैककिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार ऐसी संभावना व्यक्त की गई है कि यदि भारत अपने कर्मचारियों के रूप में महिलाओं की भागीदारी को और अधिक सक्षम बनाता है, तो वर्ष 2025 तक अपने जीडीपी को 60% तक बढ़ा सकता है। इसी संदर्भ में वर्तमान भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र को महिला रोज़गार की संभावित क्षमताओं की दृष्टि से और अधिक विकसित करने पर ज़ोर दिया जा रहा है।

महिलाओं की कम भागीदारी के कारण 

  • भारत में महिलाओं की कम श्रम भागीदारी से संबंधित समस्याएँ और अवसर एक दूसरे जुड़े हुए हैं अर्थात् इसमें स्पष्ट कार्य-कारण सिद्धांत कार्य करता है।
  • भारत में महिला भागीदारी की कमी का प्रमुख कारण गरीबी है।
  • विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 270 मिलियन से अधिक लोग गरीबी में रहते हैं।
  • इसके अलावा, एक स्वायत्त अंतर सरकारी संगठन, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी द्वारा किए गये अध्ययन से पता चलता है कि भारत में 240 मिलियन लोग बुनियादी बिजली सेवाओं की कमी में जीवन यापन करते हैं।
  • गौरतलब है कि सरकार ने वर्ष 2022 तक अक्षय ऊर्जा के 175 गीगावाट क्षमता को स्थापित करने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है और इनमें से कई प्रतिष्ठान ग्रामीण इलाकों में स्थापित किए जाएंगे जहाँ बड़ी संख्या में गरीब रहते हैं।
  • अब प्रश्न यह है कि क्या स्थापित किये जाने वाले ये प्रतिष्ठान महिलाओं की भागीदारी को लक्षित करेंगे।
  • वर्तमान में, भारत में अन्य क्षेत्रों के साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग क्षेत्र में, महिलाओं की भागीदारी कम है। विश्व बैंक के मुताबिक महिला श्रम बल भागीदारी के मामले में 131 देशों में 120 महिलाएँ ही कार्यरत हैं।
  • वर्तमान में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में कार्यरत अधिकांश महिलाएँ परियोजना स्थल पर सिविल चिनाई जैसे कार्य करती हैं, जो भविष्य में विकास के लिये अस्थायी और श्रम-केंद्रित साधन है।
  • इसके अलावा, कई साइटों पर काम करने की स्थितियाँ हमेशा महिलाओं के लिये उपयुक्त नहीं होती हैं, क्योंकि वे सुरक्षा और समर्थन प्रणाली जैसी मूलभूत सुविधाओं से रहित हैं।
  • इसके साथ ही जहाँ अधिक कुशल या अर्द्ध कुशल श्रम की आवश्यकता है वहाँ औपचारिक शिक्षा और प्रशिक्षण के मौजूदा बाधाओं के कारण बहुत कम महिलाएँ अपनी भागीदारी दे पाती हैं।
  • एक प्रमुख समस्या यह भी है कि तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान उन आवेदकों का आवेदन स्वीकार नहीं करते हैं, जिन्होंने कक्षा 12 या स्नातक नहीं किया है और यहाँ तक कि जब वे प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश की पूर्व शर्तों को पूरा भी करती हैं तो, प्रशिक्षण संस्थान दूर कस्बों और शहरों में स्थित होते हैं, जिससे ग्रामीण महिलाओं का प्रभावी ढंग से भाग लेना मुश्किल हो जाता है।
  • खासकर यह समस्याएँ तब और बढ़ जाती हैं, जब उनसे अन्य घरेलू ज़िम्मेदारियों को पूरा करने की भी उम्मीद होती है।
  • परिणामतः नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में उत्पादन, सुविधाओं तथा संचालन और रखरखाव की भूमिका में बहुत कम महिलाएँ ही भागीदारी निभा पाती हैं।

मौजूदा प्रणाली को कैसे बेहतर बनाया जाए?

  • यह सर्वविदित है कि नौकरियाँ किस प्रकार गरीबी के टैग को दूर करती हैं किन्तु अहम यह है कि कैसे मौजूदा प्रणालियों में रोज़गार सृजित किये जाएँ।
  • यदि इस दृष्टिकोण से देखें तो विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र तथा ऑफ-ग्रिड ऊर्जा क्षेत्र के विकास के साथ ही विशेष रूप से कार्यबल में स्थानीय महिलाओं को शामिल करने की मह्त्त्वपूर्ण संभावना है।
  • यदि सरकार, स्वच्छ ऊर्जा उद्यम प्रशिक्षण संस्थान और नागरिक समाज को मिलकर काम करते हैं, तो भारत अच्छी गुणवत्ता वाले रोज़गार के अवसर पैदा कर सकता है जो अधिक श्रमबल में महिलाओं की अधिक भागीदारी को सुमिश्चित कर सकते हैं।
  • लेकिन इस प्रकार की पहल से पूर्व ज़रूरी है कि महिलाओं को केंद्र में रखते हुए व्यापक रूपरेखा तय की जाए।
  • इसके साथ ही प्रशिक्षण संस्थान प्रवेश हेतु पूर्व शर्तों को कम कर सकते हैं, जिससे कम औपचारिक रूप से शिक्षित महिलाओं को नए कौशल सीखने और प्रशिक्षण प्राप्त करने की अनुमति मिल सकेगी।
  • इसके अलावा प्रशिक्षण को विशिष्ट आवश्यकताओं जैसे कि स्थान, व्यस्तता के घंटे, सम्मान के लिये सुरक्षा और स्वच्छता को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • दूरस्थ प्रशिक्षण क्षेत्रों में महिलाओं के छोटे समूहों को प्रशिक्षित करने हेतु मोबाइल प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए जा सकते हैं।
  • प्रशिक्षण संस्थानों और नागरिक समाज संगठनों को प्रशिक्षित महिलाओं की सहायता हेतु स्वच्छ ऊर्जा उद्यमों के साथ सहयोगात्मक संबंधों को अधिक मज़बूत करना चाहिए।महिलाओं की विशिष्ट ज़रूरतों के प्रति उनकी संवेदनशीलता नवीकरणीय कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि करने में मदद कर सकती है। यदि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र महिलाओं को ऐसी नौकरियाँ में, खासकर गरीब समुदायों में, लाने के लिये एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो भारत में स्वच्छ ऊर्जा के द्वारा महिलाओं और उनके परिवारों के लिये जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

निष्कर्ष
भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार आवश्यक है। सरकार के वर्ष 2022 तक अक्षय ऊर्जा के 175 गीगावाट क्षमता को स्थापित करने के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ महिला रोज़गार की संभावनाएँ तलाशना सही दिशा में उठाया गया एक मह्त्त्वपूर्ण कदम है क्योंकि इससे गरीबी, रोज़गार, स्वच्छता तथा सशक्तीकरण संबंधी तमाम समस्यायों को एक साथ साधा जा सकता है। परंतु इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो तथा वे स्वयं को भारतीय समाज से विलग न समझकर इसका ही एक हिस्सा समझें। उल्लेखनीय है कि भारतीय समाज में आज भी कई ऐसी महिलाएँ हैं जो कुशल होने के बावजूद भी हर क्षेत्र में पिछड़ जाती है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि इन महिलाओं को परिवर्तन की मुख्यधारा में लाया जाए और भारत को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बनाया जाए।

स्रोत: द हिंदू 

 

यौन अपराधियों की रजिस्ट्री संकलित करेंगे ठेकेदार 

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 2 : शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
(खंड-12 : केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।)

registry

चर्चा में क्यों ?
गृह मंत्रालय प्रस्तावित यौन अपराधियों की रजिस्ट्री (sex offenders’ registry) के निर्माण का कार्य निज़ी क्षेत्र को आउटसोर्स करने की योजना बना रहा है। निजी ठेकेदार इस डाटाबेस को डिजाइन करेंगे तथा इसे आधार के साथ एकीकृत किया जाएगा।

प्रमुख बिंदु 

  • हाल ही में गृह मंत्रालय ने यौन अपराधियों की राष्ट्रीय रजिस्ट्री के विकास और कार्यान्वयन के लिये  प्रस्ताव दस्तावेज (proposal document) जारी किया है, जिसमें डाटाबेस के डिजाइन, विकास, सप्लाई, कार्यान्वयन, संचालन, और रख-रखाव के लिये ‘सिस्टम इंट्रीग्रेटर’ के चयन की बात कही गई है।
  • मंत्रालय के एक दस्तावेज में कहा गया है कि इस डाटाबेस में उन लोगों के ब्यौरे भी शामिल होंगे जो ‘समुदाय के लिये निम्न स्तरीय खतरा’ उत्पन्न कर सकते हैं। हालाँकि ,ऐसे लोग सामान्यतः आपराधिक यौन कृत्यों में शामिल होने की संभावना नहीं रखते।
  • गृह मंत्रालय का कहना है कि अपराधियों का वर्गीकरण उनके आपराधिक इतिहास के आधार पर किया जाएगा। ऐसा इस बात की पुष्टि हेतु किया जाएगा कि क्या ये लोग ‘समुदाय के लिये गंभीर खतरा पैदा करते हैं’ ।
  • जो अपराधी निम्न स्तरीय खतरा उत्पन्न करने की संभावना रखते हैं, उनका डाटा 15 वर्षों के लिये संगृहीत किया जाएगा, जबकि मध्यम स्तरीय खतरा उत्पन्न कर सकने वाले अपराधियों का डाटा 25 वर्षों के लिये संगृहीत किया जाएगा।
  • अभ्यस्त अपराधियों, हिंसक अपराधियों, गैंग रेप और कस्टोडियल रेप के मामलों में दोषी पाए गए अपराधियों के डाटा को आजीवन संगृहीत रखा जाएगा।
  • गिरफ्तार किये गए अपराधियों और ऐसे अपराधियों जिनकी चार्जशीट दाखिल की जा चुकी होती है, से संबंधित डाटा केवल कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिये उपलब्ध होगा।
  • दोषी ठहराए जा चुके अपराधियों का डाटा आम जनता के लिये उपलब्ध होगा और इन्हें कई पैरामीटरों यथा- राज्य, ज़िला, पुलिस स्टेशन, यहाँ तक कि इनकी कार्यप्रणाली (modus operandi) के आधार पर सर्च किया जा सकेगा।
  • डाटाबेस में पूरे भारत के अपराधियों का रिकॉर्ड शामिल किया जाएगा, जिसमें अपराधियों की फोटोग्राफ और फिंगरप्रिंट जैसी जानकारियाँ भी सम्मिलित की जाएंगी।
  • इस डाटाबेस में ज़िला नोडल अधिकारियों की रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया किशोर अपराधियों (juvenile offenders)  बाल यौन शोषण में लिप्त पाए अपराधियों का रिकॉर्ड भी शामिल किया जाएगा।
  • इस डाटाबेस में ज़िला नोडल अधिकारी और पुलिस स्टेशन द्वारा अपडेट की गई अपराधी की वर्तमान स्थिति भी शामिल होगी।
  • गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि निजी ठेकेदार केवल इस प्लेटफॉर्म का विकास करेंगे और डाटा की गोपनीयता बरकरार रखी जाएगी।

स्रोत : द हिंदू