UPSC DAILY CURRENT 19-02-2019

भारतीय अर्थव्यवस्था

सकल घरेलू ज्ञान उत्पाद (GDKP) पर कार्यशाला का आयोजन

चर्चा में क्यों?

 

हाल ही में केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation-MoSPI) ने कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान (Indian Statistical Institute-ISI) के साथ मिलकर सकल घरेलू ज्ञान उत्पाद (Gross Domestic Knowledge Product-GDKP) के उभरते क्षेत्र पर नई दिल्ली में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया।

 

सकल घरेलू ज्ञान उत्पाद (Domestic Knowledge Product-GDKP)

 

दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उम्बेर्टो सुलपास्सो (Umberto Sulpasso) द्वारा GDKP के विचार को प्रस्तुत किया गया।

सकल घरेलू ज्ञान उत्पाद ज्ञान आधारित अर्थव्यस्था के निम्नलिखित चार बुनियादी स्तंभों के माध्यम से किसी राष्ट्र के विकास और भविष्य की माप करता है –

नॉलेज आइटम्स (Knowledge items-Ki) – अलग-अलग श्रेणियों में आधुनिक और स्थानीय दोनों वर्गों की अलग-अलग संस्कृतियों की सूचना सामग्रियों की पहचान करना।

कंट्री नॉलेज प्रोड्यूसिंग मैट्रिक्स (Country’s Knowledge Producing Matrix-CKPM) – सरकार, निजी संस्थानों और परिवारों द्वारा उत्पादित ज्ञान में विभेद करते हुए GDP प्रभाव के लिये इनकी तुलना करना।

कंट्री नॉलेज यूज़र मैट्रिक्स (Country’s Knowledge User Matrix-CKUM) – व्यक्तियों और निजी कंपनियों द्वारा अपने आधुनिकीकरण के प्रयासों को मापने के लिये स्वीकृत ज्ञान का मूल्य।

कॉस्ट ऑफ लर्निंग (Cost of Learning) – युवा नागरिकों को समर्थन देने के लिये शिक्षा परिवार बॉण्ड, शिक्षा क्रेडिट कार्ड आदि के माध्यम से सरकार के बजटीय निर्णयों (राजनीतिक संदर्भ) में उपयोग की जाने वाली वर्तमान लागत के समान।

भारत के लिये सकल घरेलू ज्ञान उत्पाद

 

यह राष्ट्रीय संस्कृति से संबंधित विशिष्ट ज्ञान सामग्रियों के मूल्य की गणना करने और इन सामग्रियों में समय के साथ परिवर्तन की अनुमति देगा।

उदाहरण के तौर पर, भारत में इन विशिष्ट ज्ञान सामग्रियों के अंतर्गत सांस्कृतिक और धार्मिक शिक्षणों (योग, वेद और नृत्य विद्यालय), धार्मिक त्योहारों एवं फसल त्योहारों के प्रसार को शामिल किया गया है।

सकल घरेलू ज्ञान उत्पाद एक राष्ट्रीय ज्ञान शिक्षा मंच के निर्माण की सुविधा भी प्रदान कर सकता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाने के साथ-साथ जीडीपी और निजी निवेश की उचित भूमिका को बढ़ावा देगा।

यह देश में ज्ञान आधारित अर्थव्यस्था को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण योगदान देगा।

स्रोत – PIB

 

भूगोल

पृथ्वी की सतह के नीचे मिले विशालकाय पर्वत

हाल ही में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के केंद्र में बड़े पैमाने पर पर्वतों जैसे ऊँचे-नीचे स्थानों की खोज की है। पृथ्वी की सतह अर्थात भूपर्पटी (Crust) से 660 किमी. नीचे स्थित परत मेंटल (Mantle) पर यह स्थलाकृति पाई गई है जो हमारे ग्रह की उत्पत्ति एवं विकास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।crust

 

महत्त्वपूर्ण बिंदु

 

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के मेंटल क्षेत्र (मध्य भाग) में बड़े पैमाने पर पर्वतों की खोज की है जो हमारे ग्रहों के प्रति समझ को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

पृथ्वी की संरचना को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जाता है – क्रस्ट (Crust), मेंटल (Mantle) और कोर (Core)। क्रस्ट पृथ्वी का बाहरी क्षेत्र, मेंटल मध्य क्षेत्र और कोर आतंरिक क्षेत्र है। इन तीनों की संरचना में भिन्नता के आधार पर इनका वर्गीकरण किया गया है।

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की आतंरिक संरचना के प्राप्त आँकड़ों के आधार पर ही इन पहाड़ों की जानकारी दी है।

जर्नल साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, वैज्ञानिकों ने बोलीविया में एक बड़े भूकंप के दौरान लिये गए आँकड़े का उपयोग किया, जिससे पृथ्वी की सतह से 660 किमी. नीचे स्थित क्षेत्र में पहाड़ों एवं अन्य स्थलाकृतियों की जानकारी प्राप्त हुई।

वैज्ञानिकों ने इस सीमा को जहाँ पर उबड़-खाबड़ एवं समतल भाग पाए गए हैं, को ‘660 किलोमीटर की सीमा’ नाम दिया है।

उन्होने 660 किमी. की सीमा के इस भाग पर पृथ्वी की सतह से भी ज़्यादा ऊँचा-नीचा स्थान प्राप्त होने का अनुमान लगाया। इन ऊँचे-नीचे भागों को उन्होने रॉकी और अप्लेशियन पर्वत से भी मज़बूत एवं कठोर होने का अनुमान लगाया।

हालाँकि शोधकर्ताओं ने मेंटल के मध्य भाग (410 किमी.) पर भी जानकारी एकत्र की लेकिन उन्हें वहाँ कोई भी उबड़-खाबड़ स्थान नहीं प्राप्त हुआ।

660 किलोमीटर की सीमा पर खुरदरेपन की उपस्थिति हमारे ग्रह की उत्पत्ति एवं विकास को समझने में वैज्ञानिकों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

अमेरिका में प्रिंसटन विश्वविद्यालय (Princeton University) और चीन में इंस्टीट्यूट ऑफ जियोडेसी एंड जियोफिजिक्स (Institute of Geodesy and Geophysics) के वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की गहराई की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिये ग्रह पर सबसे शक्तिशाली तरंगों का इस्तेमाल किया, जो बड़े पैमाने पर भूकंप से उत्पन्न होते हैं।

पृष्ठभूमि

 

वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में आँकड़े प्राप्त करने हेतु 1994 में बोलीविया में आए भूकंप (8.2 तीव्रता) को आधार बनाया जो अब तक का रिकॉर्ड किया गया दूसरा सबसे बड़ा और गहरा भूकंप है।

इस प्रयोग के अंतर्गत 7.0 या उससे अधिक की तीव्रता वाले भूकंपों के आँकड़े प्राप्त करने के लिये सभी दिशाओं में भेदी तरंगों को प्रेषित किया गया जिनकी क्षमता पृथ्वी के आतंरिक भागों से आगे तक जाने में सक्षम थी।

वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक कंप्यूटरों के माध्यम से इन जटिल आँकड़ों का अध्ययन किया। इसमें बताया गया कि जैसे प्रकाश तरंगें किसी दर्पण या प्रिज़्म से टकराकर प्रकाश को परावर्तित करती हैं, ठीक उसी प्रकार भूकंपीय तरंगें समरूप चट्टानों में निर्बाध चलती हैं, लेकिन मार्ग में किसी भी उबड़-खाबड़ या खुरदरेपन के कारण ये तरंगे भी परावर्तित हो जाती हैं।

स्रोत – द हिंदू

 

कृषि

वर्षा आधारित कृषि के खिलाफ नीतिगत पूर्वाग्रह

चर्चा में क्यों?

 

हाल ही में भारत में एक वर्षा आधारित कृषि मानचित्र तैयार किया गया। इसके अंतर्गत वर्षा आधारित क्षेत्रों में व्याप्त कृषि जैव विविधता और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का विवरण देते हुए नीतिगत पूर्वाग्रहों का दस्तावेज़ीकरण करने का प्रयास किया गया है।

 

महत्त्वपूर्ण बिंदु

 

हाल ही में जारी कृषि मानचित्र में वर्षा आधारित क्षेत्रों में व्याप्त कृषि जैव विविधता और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के साथ-साथ उन नीतिगत पूर्वाग्रहों का दस्तावेज़ीकरण किया गया है, जो इन क्षेत्रों में लोगों को खेती करने में असफल बना रहे हैं।

भारत में पाँच में से तीन किसान सिंचाई के बजाय वर्षा जल का उपयोग कर फसलों का उत्पादन करते हैं। हालाँकि इस तरह से उनका अपनी भूमि में प्रति हेक्टेयर सरकारी निवेश 20 गुना तक कम हो सकता है।

ऐसे किसानों की फसलों की सरकारी खरीद प्रमुख सिंचित भूमि की फसलों का सिर्फ एक भाग है और सरकार की कई प्रमुख कृषि योजनाएँ उन्हें लाभान्वित करने के अनुरूप नहीं हैं।

सरकार की नीतियाँ

 

राष्ट्रीय वर्षा क्षेत्र प्राधिकरण के CEO जो वर्तमान में किसानों की आय दोगुनी करने हेतु बनाई गई सरकारी समिति के प्रमुख भी हैं, इन्होने बताया कि वर्षा आधारित क्षेत्रों के किसानों की अधिक उपेक्षा हुई है जो इन क्षेत्रों में किसानों की कम आय का महत्त्वपूर्ण कारण है।

एक सम्मेलन के दौरान इन्होंने स्पष्ट किया कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में किसानों को सिंचित क्षेत्रों वाले किसानों की तुलना में लगभग 40% कम आय प्राप्त होती है।

रिवाइटलाइजिंग रेनफेड एग्रीकल्चर (Revitalising Rainfed Agriculture-RRA) नेटवर्क के समन्वयक जिन्होंने यह मानचित्र प्रकाशित किया है ने किसानों की आय में असमानता के लिये सरकार की नीति और उसके व्यय में भेदभाव होना बताया है।

सिंचित भूमि वाले क्षेत्रों में बड़े बांधों और नहर नेटवर्क के माध्यम से प्रति हेक्टेयर 5 लाख का निवेश प्राप्त होता है, जबकि वर्षा आधारित भूमि में वाटरशेड प्रबंधन का खर्च केवल 18,000-25,000 है। जो यह दर्शाता है कि उपज में अंतर निवेश के अंतर के अनुपात में नहीं है।

इसी प्रकार जब उपज की खरीद देखी गई तो पाया गया कि सरकार ने 2001-02 तथा 2011-12 के दशक में गेहूं और चावल पर 5.4 लाख करोड़ रुपए खर्च किये। जबकि मोटे अनाज जो वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाए जाते हैं की खरीद पर उसी अवधि में 3,200 करोड़ रुपए खर्च किये गए।

बीज, उर्वरक सब्सिडी और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी फ्लैगशिप सरकारी योजनाओं को सिंचित क्षेत्रों के लिये ही बनाया गया है जो कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में भी बिना किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखे विस्तृत कर दिया गया है।

उदाहरण के लिये सरकार योजना द्वारा अधिसूचित बहुत से संकर बीजों को उच्च पैदावार प्राप्त करने के लिये समय पर पानी, उर्वरक और कीटनाशक पदार्थों की बहुत आवश्यकता होती है जिसका वर्षा आधारित किसानों के लिये कोई महत्त्व नही हैं। सरकार द्वारा अब तक स्वदेशी बीजों को प्राप्त करने या जैविक खाद को सब्सिडी देने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है।

निष्कर्ष

 

वर्षा आधारित क्षेत्र के किसानों के लिये अनुसंधान और प्रौद्योगिकी पर ध्यान देने तथा उत्पादन हेतु समर्थन प्रदान करने के लिये सिंचित क्षेत्रों वाले किसानों से ज़्यादा संतुलित दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है।

वर्तमान समय में किसानों की मदद करने के लिये आय समर्थन महत्वपूर्ण है, साथ ही भविष्य के लिये बेहतर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में हर कोई खेती करने के बजाय व्यवसाय करने में सहज महसूस करता है। आने वाले समय में यदि वर्षा आधारित क्षेत्रों में बीज, मिट्टी, पानी की समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता है तो किसान कृषि कार्य छोड़ देंगे।

स्रोत – द हिंदू

 

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

डार्क वेब: साइबर अपराध की काली दुनिया

चर्चा में क्यों?

 

इंटरनेट के सदुपयोग और दुरुपयोग की बहस में डार्क वेब हमेशा से चर्चा का बिंदु रहा है। पिछले दिनों जब हैकरों ने कुछ वेबसाइटों के डेटा हैक कर लिये तब यह पुनः चर्चा में आ गया।

 

क्या है डार्क नेट?

 

इंटरनेट पर ऐसी कई वेबसाइटें हैं जो आमतौर पर प्रयोग किये जाने वाले गूगल, बिंग जैसे सर्च इंजनों और सामान्य ब्राउज़िंग के दायरे से परे होती हैं। इन्हें डार्क नेट या डीप नेट कहा जाता है।

सामान्य वेबसाइटों के विपरीत यह एक ऐसा नेटवर्क होता है जिस तक लोगों के चुनिंदा समूहों की पहुँच होती है और इस नेटवर्क तक विशिष्ट ऑथराइज़ेशन प्रक्रिया, सॉफ्टवेयर और कन्फिग्यूरेशन के माध्यम से ही पहुँचा जा सकता है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 देश में सभी प्रकार के प्रचलित साइबर अपराधों को संबोधित करने के लिये वैधानिक रूपरेखा प्रदान करता है। ऐसे अपराधों के नोटिस में आने पर कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ इस कानून के अनुसार ही उचित कार्रवाइयाँ करती हैं।

एक्सेस (Access) के संदर्भ में इंटरनेट को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जाता है-

  1. सरफेस वेब (Surface Web)

 

यह इंटरनेट का वह भाग है जिसका आमतौर पर हम दिन-प्रतिदिन के कार्यों में प्रयोग करते हैं।

जैसे गूगल या याहू पर कुछ भी सर्च करते हैं तो हमें सर्च रिज़ल्ट्स प्राप्त होते हैं और इसके लिये किसी विशिष्ट अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।

ऐसी वेबसाइटों की सर्च इंजनों द्वारा इंडेक्सिंग की जाती है। इसलिये इन तक सर्च इंजनों के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।

  1. डीप वेब (Deep Web)

 

इन तक केवल सर्च इंजन के सर्च परिणामों की सहायता से नहीं पहुँचा जा सकता।

डीप वेब के किसी डॉक्यूमेंट तक पहुँचने के लिये उसके URL एड्रेस पर जाकर लॉग-इन करना होगा, जिसके लिये पासवर्ड और यूज़र नेम का प्रयोग करना होगा।

जैसे-जीमेल अकाउंट, ब्लॉगिंग वेबसाइट, सरकारी प्रकाशन, अकादमिक डेटाबेस, वैज्ञानिक अनुसंधान आदि ऐसी ही वेबसाइट्स होती हैं जो अपने प्रकृति में वैधानिक हैं किंतु इन तक पहुँच के लिये एडमिन की अनुमति की आवश्यकता होती है।

  1. डार्क वेब (Dark Web)

 

डार्क वेब अथवा डार्क नेट इंटरनेट का वह भाग है जिसे आमतौर पर प्रयुक्त किये जाने वाले सर्च इंजन से एक्सेस नहीं किया जा सकता।

इसका इस्तेमाल मानव तस्करी, मादक पदार्थों की खरीद और बिक्री, हथियारों की तस्करी जैसी अवैध गतिविधियों में किया जाता है।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के रिकॉर्ड के अनुसार, 2015 से 2017 की अवधि में विभिन्न दवा कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा चार मामले दर्ज किये गए थे जिनमें नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक पदार्थों की बिक्री तथा खरीद के लिये ‘डार्क नेट’ का इस्तेमाल किया गया था।

डार्क वेब की साइट्स को टॉर एन्क्रिप्शन टूल की सहायता से छुपा दिया जाता है जिससे इन तक सामान्य सर्च इंजन से नहीं पहुँचा जा सकता।

इन तक पहुँच के लिये एक विशेष ब्राउज़र टॉर (TOR) का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके लिये ‘द ऑनियन राउटर’ (The Onion Router) शब्द का भी प्रयोग किया जाता है क्योंकि इसमें एकल असुरक्षित सर्वर के विपरीत नोड्स के एक नेटवर्क का उपयोग करते हुए परत-दर-परत डेटा का एन्क्रिप्शन होता है। जिससे इसके प्रयोगकर्त्ताओं की गोपनीयता बनी रहती है।

समग्र इंटरनेट का 96% भाग डार्क वेब से निर्मित है, जबकि सतही वेब केवल 4% है।

सिल्क रोड मार्केटप्लेस नामक वेबसाइट डार्क नेटवर्क का एक प्रसिद्ध उदाहरण है जिस पर हथियारों सहित विभिन्न प्रकार की अवैध वस्तुओं की खरीद और बिक्री की जाती थी।

स्रोत : पी.आई.बी. एवं द हिंदू

 

विविध

 

  • पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से आयात होने वाली वस्तुओं पर बेसिक सीमा शुल्क बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया है। पाकिस्तान से भारत को होने वाला कुल निर्यात 2017-18 में लगभग 3482 करोड़ रुपए था। पाकिस्तान से प्रमुखतः ताज़े फल, सूखे मेवे, सीमेंट, खनिज एवं अयस्क, तैयार चमड़ा, प्रसंस्कृत खाद्य, अकार्बनिक रसायन, कच्चा कपास, मसाले, ऊन, रबर उत्पाद, प्लास्टिक, डाई और खेल का सामान भारत आता है। पाकिस्तान से आने वाले दो सामानों, फल और सीमेंट पर अभी क्रमश: 30-35% और 7.5% ड्यूटी ही लगती थी। आयात शुल्क को 200 फीसदी बढ़ाने की वज़ह से पाकिस्तान से भारत को होने वाला आयात लगभग बंद हो जाएगा। भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2017-18 में 2.41 अरब डॉलर रहा, जो 2016-17 में 2.27 अरब डॉलर था। भारत ने 2017-18 में 48.85 करोड़ डॉलर का सामान पाकिस्तान से आयात किया, जबकि 1.92 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया गया।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार 2018 में दुनियाभर में खसरे के कुल 2,29,068 मामले दर्ज किये गए, जो 2017 की तुलना में लगभग दोगुने हैं। चूँकि खसरे का उन्मूलन नहीं हो पा रहा, ऐसे में यह हर किसी की ज़िम्मेदारी है कि टीकाकरण में हो रही चूक को सुधारने का प्रयास करे। एक व्यक्ति के संक्रमित होने से 9-10 लोगों में इसके विषाणु फैलने का खतरा बढ़ जाता है। हालाँकि 2000 के बाद से खसरे से होने वाली मौतों में 80 फीसदी तक कमी आई है जिससे संभवत: दो करोड़ 10 लाख लोगों की जान बची है। लेकिन खसरा भौगोलिक या राजनीतिक सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खसरे के प्रकोप को रोकने एवं उसके उन्मूलन के लिये खसरे के टीके की दो डोज़ देकर उच्च टीकाकरण कार्यक्रम चलाते रहने की विभिन्न देशों से अपील की है।
  • भारतीय रेलवे देश में पहला रेल परीक्षण ट्रैक बनाने की योजना पर काम कर रहा है। राजस्थान के नावां शहर में सांभर झील के पास देश के पहले रेलवे टेस्ट ट्रैक के लिये काम शुरू किया जा चुका है। इस पर अनुमानित 353.48 करोड़ रुपए की लागत आएगी। यह देश में नई ट्रेनों के प्रयोग और परीक्षण का पहला ट्रैक होगा। इस टेस्ट ट्रैक का उपयोग करके कई नए परीक्षण और रोलिंग स्टॉक तथा इसके घटकों, रेलवे पुलों एवं भू-तकनीकी क्षेत्र से संबंधित नई तकनीकों का भी परीक्षण संभव होगा। इस ट्रैक के निर्माण के बाद भारत उन देशों में शामिल हो जाएगा जिनके पास अपना रेलवे टेस्ट ट्रैक है। अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जापान आदि देशों में ट्रायल के लिये टेस्ट ट्रैक का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हमारे देश में अभी तक मौजूदा रेलवे लाइनों पर ही टेस्ट होता है। इस योजना के पहले चरण में 25 किलोमीटर और दूसरे चरण में 20 किलोमीटर लंबी लाइन बिछाई जाएगी। लखनऊ स्थित रिसर्च डिज़ाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइज़ेशन (RDSO) ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। गौरतलब है कि RDSO भारतीय रेलवे की तकनीकी ज़रूरतों के लिये काम करने वाला अनुसंधान संगठन है।
  • देश में किलोग्राम का नया मानक 20 मई से लागू होगा। केंद्रीय उपभोक्ता मंत्रालय किलोग्राम की नई परिभाषा के मुताबिक इसका नया प्रोटोटाइप अर्थात् मूल नमूना तैयार करेगा। नए नमूने से ही पूरे देश में किलोग्राम का वज़न तय किया जाएगा। इससे किलोग्राम के वज़न में मामूली बदलाव आ सकता है, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। गौरतलब है कि अभी तक किलोग्राम का मानक इसके द्रव्यमान पर आधारित था। पूरी दुनिया में किलोग्राम का वजन फ्रांस के इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ वेट्स एडं मेजर्स की तिजोरी में रखे सिलेंडरनुमा एक बाट से तय किया जाता है। यह 90 फीसदी प्लेटिनम और 10 प्रतिशत इरिडियम से बना है। यह 1889 से तिजोरी में बंद है। 130 साल बाद किलोग्राम के मानक में बदलाव किया जा रहा है। किलोग्राम की नई परिभाषा भौतिक स्थिरांक पर आधारित है। इसमें वज़न तय करने के लिये धातु के बजाय विद्युत धारा (करंट) को आधार बनाया गया है। नई परिभाषा के ज़रिये किलोग्राम के 10 करोड़वें हिस्से को भी मापा जा सकता है।
  • देश में इलेक्ट्रिकल वाहनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिये केंद्र सरकार ने कुछ दिशा-निर्देश जारी किये हैं। इनमें इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों को सड़क या राजमार्ग के दोनों तरफ हर 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित करने की सिफारिश की गई है। सरकार ने आदर्श इमारत उपनियम-2016 और शहरी क्षेत्र विकास योजना रूपरेखा और अनुपालन दिशा-निर्देश-2014 में संशोधन कर ई-वाहन चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने के प्रावधान किये हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों और बुनियादी ढाँचे के लिये उपनियम बनाने में ये दिशा-निर्देश राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिये परामर्श देने का काम करेंगे। इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि लंबी दूरी तक जाने में सक्षम या भारी इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये राजमार्गों के दोनों तरफ प्रत्येक 100 किलोमीटर पर कम-से-कम एक ई-वाहन चार्जिंग स्टेशन बनाया जाना चाहिये। आवासीय क्षेत्रों में चार्जिंग स्टेशन बनाने का ज़िक्र भी दिशा-निर्देशों में है। सरकार को उम्मीद है कि 2030 तक सड़क पर चलने वाले कुल वाहनों में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी ई-वाहनों की होगी।
  • मौजूदा चैम्पियन साइना नेहवाल ने ओलंपिक रजत पदक विजेता पी.वी. सिंधु को हराकर  83वीं सीनियर राष्ट्रीय बैडमिंटन चैम्पियनशिप का महिला एकल खिताब जीत लिया। फाइनल में सिंधु को पराजित कर साइना ने लगातार दूसरी बार यह खिताब अपने नाम किया। पुरुष एकल में सौरभ वर्मा ने युवा खिलाड़ी लक्ष्य सेन को हराकर खिताब जीता। पुरुष युगल में प्रणव जैरी चोपड़ा और चिराग शेट्टी की जोड़ी ने अर्जुन एम.आर. और श्लोक रामचंद्रन की जोड़ी को हराकर चैम्पियन बनने का गौरव हासिल किया।
  • अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल में भारत की ओर से सबसे ज़्यादा गोल करने वाले फुटबॉलर सुनील छेत्री को इस खेल के विकास में सहयोग देने के लिये ‘फुटबॉल दिल्ली’ ने पहले फुटबॉल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया। 34 वर्षीय सुनील छेत्री को सरकार पद्मश्री से सम्मानित कर चुकी है। आपको बता दें कि ‘फुटबॉल दिल्ली’ इस खेल का दिल्ली में संचालन करती है। सुनील छेत्री को कैप्टन फैंटास्टिक के नाम से भी जाना जाता है। वह सक्रिय खिलाड़ियों के बीच क्रिस्टियानो रोनाल्डो के बाद अंतर्राष्ट्रीय मैचों में दूसरे सबसे अधिक गोल करने वाले फुटबॉलर हैं।
  • राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हरियाणा सरकार द्वारा सोनीपत ज़िले के गन्नौर में आयोजित चौथे कृषि नेतृत्व शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया और हरियाणा किसान रत्न पुरस्कार और हरियाणा कृषि रत्न पुरस्कार  प्रदान किये। इस सम्मेलन का उद्देश्य कृषि में आधुनिक, 21वीं शताब्दी की प्रौद्योगिकियों का अनुसरण करने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना था। राष्ट्रपति ने कृषि को एक व्यापक उद्यमशील परिप्रेक्ष्य में देखने तथा पारंपरिक कृषि को कृषि मूल्य श्रृंखला के साथ जोड़ने की अपील की।
  • 18 फरवरी को नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सांस्कृतिक सद्भाव के लिये वर्ष 2014, 2015 और 2016 हेतु टैगोर पुरस्कार क्रमशः राजकुमार सिंहाजीत सिंह (मणिपुरी नृत्य), छायानट (बांग्लादेश का एक सांस्कृतिक संगठन) और राम वनजी सुतार (प्रख्यात मूर्तिकार) को प्रदान किया। उल्लेखनीय है कि सांस्कृतिक सद्भाव के लिये टैगोर पुरस्कार की शुरुआत भारत सरकार ने 2012 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती के अवसर पर की थी। यह पुरस्कार वर्ष में एक बार दिया जाता है जिसके तहत एक करोड़ रुपए नकद (विदेशी मुद्रा में विनिमय योग्य), एक प्रशस्ति पत्र, धातु की मूर्ति और एक उत्कृष्ट पारंपरिक हस्तशिल्प/हस्तकरघा वस्तु दी जाती है।