UPSC DAILY CURRENT 19-05-2018

बौद्धिक संपदा के शुभंकर ‘आईपी नानी’ का शुभारंभ

IPR

  • वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बौद्धिक संपदा (आईपी) का शुभंकर – ‘आईपी नानी’लॉन्च किया।
  • इस शुभंकर को राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार नीति के सम्मेलन में जारी किया गया था।
  • राष्ट्रीय आईपीआर नीति 2016 का पहला और सबसे प्रमुख उद्देश्य “आईपीआर जागरूकता: आउटरीच एंड प्रमोशन” है।
  • ध्यातव्य है कि शुभंकर आईपी नानी एक तकनीक-प्रेमी दादी है, जो अपने पोते “छोटू” यानी आदित्य की मदद से आईपी अपराधों का मुकाबला करने में सरकार और प्रवर्तन एजेंसियों की मदद करती है।
  • आईपी शुभंकर लोगों के बीच बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) के महत्त्व के बारे में जागरूकता का प्रसार करेगा, खासकर बच्चों के बीच।
  • आईपीआर प्रमोशन एंड मैनेजमेंट (सीआईपीएएम) के लिये एक पेशेवर निकाय ने औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) के तहत एनिमेटेड वीडियो की एक श्रृंखला को बनाने हेतु यूरोपीय संघ बौद्धिक संपदा कार्यालय (ईयू-आईपीओ) के साथ सहयोग किया है।
उत्तम पछरने ललित कला अकादमी के नियमित अध्‍यक्ष्‍ा नियुक्‍त

Sarabhai

  • राष्‍ट्रपति ने श्री उत्तम पछरने को ललित कला अकादमी का नियमित अध्‍यक्ष नियुक्‍त किया है। श्री पछरने मशहूर कलाकार और मूर्तिकार हैं।
  • इस समय वह कला अकादमी, गोवा की सलाहकार समिति के सदस्‍य और जन सेवा सहकारी बैंक बोरीवली के निदेशक तथा पी.एल. देशपांडे राज्‍य ललित कला अकादमी के सलाहकार सदस्‍य हैं।
  • उन्‍हें 1985 में राष्‍ट्रीय ललित कला पुरस्‍कार, महाराष्‍ट्र सरकार से 1985 में महाराष्‍ट्र गौरव पुरस्‍कार, 1986 में जूनियर राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार और प्रफुल्‍ल दहानुकर फाउंडेशन से 2017 में जीवन गौरव पुरस्‍कार मिल चुका है। पछरने पदभार संभालने की तारीख से 3 वर्ष के लिये  इस पद पर रहेंगे।
  • इससे पूर्व मार्च, 2018 में संस्‍कृति मंत्रालय में संयुक्‍त सचिव (शैक्षिक) श्री एम.एल. श्रीवास्‍तव को ललित कला अकादमी का स्‍थायी अध्‍यक्ष नियुक्‍त किया गया था, जिसके कारण नियमित अध्‍यक्ष की नियुक्‍ति लंबित थी।
  • ललित कला अकादमी: ललित कला अकादमी का उद्घाटन तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा 5 अगस्त, 1954 को नई दिल्ली में किया गया था।
  • यह एक केंद्रीय संगठन है तथा विभिन्न कलाओं के विकास के लिये दिल्ली, चेन्नई, भुवनेश्वर, कोलकाता और लखनऊ राज्यों में इसके क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए गये हैं।
अदन की खाड़ी के ऊपर चक्रवाती तूफान ‘सागर’

IITM

  • पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने बताया कि 16 मई, 2018 की शाम में अदन की खाड़ी के ऊपर हवा का दबाव बना जिससे उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति हुई।
  • अदन की खाड़ी में उत्त्पन्न हुए इस उष्णकटिबंधीय चक्रवात को ‘सागर’ नाम दिया गया।
  • दोपहर के आसपास यह 390 किमी की रफ़्तार से पूर्व-उत्तर-पूर्व अदन (यमन) में और सोकोत्रा द्वीप में 560 किमी की रफ़्तार के साथ पश्चिम-उत्तर-पश्चिम में स्थित था।
  • शुरुआत में सागर तूफान पश्चिम की ओर और बाद में पश्चिम-दक्षिण-पश्चिम की तरफ आगे बढ़ा।
  • पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय- 12 जुलाई, 2006 को राष्‍ट्रपति की अधिसूचना के माध्‍यम से नए पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) की स्‍थापना की गई और इसके तहत भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी),  भारतीय उष्‍णदेशीय मौसम विज्ञान संस्‍थान (आईआईटीएम) और राष्‍ट्रीय मध्‍यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (एनसीएमआरडब्‍ल्‍यूएफ) को प्रशासनिक नियंत्रण में लाया गया।
अफगान और पाकिस्तानियों हेतु अमीरात तट पर स्थित कालबा में आजीविका का साधन

United Arab

  • कालबा शहर मछली पकड़ने के पिंजरों के बुनाई शिल्प हेतु एक केंद्र बन गया है, जो अफगानों और पाकिस्तानियों के दर्जनों लोगों को आकर्षित करता है।
  • ध्यातव्य है कि कालबा संयुक्त अरब अमीरात का एक पूर्वी शहर है।
  • यह ओमान के उत्तर में ओमान तट की खाड़ी में स्थित है और दक्षिण में फुजैराह के अमीरात के शारजाह के अमीरात की ओर इसका झुकाव है।
  • मछली पकड़ने के पिंजरे या तार नेट, का उपयोग ओमान की खाड़ी में किया जाता है।
  • अंडाकार आकार के इन नेटों को एक इग्लू की तरह आकार दिया जाता है।

स्रोत: द हिंदू ,पी.आई.बी.

 

भारत और नेपाल की नई यात्रा: रक्सौल-काठमांडू रेल लिंक 

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2: शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
(खंड-17 : भारत एवं इसके पड़ोसी-संबंध।)
(खंड-18 : 
द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।)

India-and-Nepal

संदर्भ

हाल ही में प्रधान नरेंद्र मोदी द्वारा नेपाल यात्रा के दौरान उन वादों को लेकर प्रतिबद्धता जताई गई है, जो उन्होंने नेपाली प्रधान मंत्री ओली की हालिया भारत यात्रा के दौरान प्रस्तावित किये थे। ध्यातव्य है कि इस प्रतिबद्धता में कृषि, रेलवे संबंध और अंतर्देशीय जलमार्ग विकास सहित द्विपक्षीय पहलों को प्रभावी ढंग से लागू करने का संकल्प शामिल था। भारत-नेपाल के संयुक्त बयान के रूप में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति की मज़बूती हेतु दोनों पक्षों ने विशेष रूप से “कनेक्टिविटी की उत्प्रेरक भूमिका” पर जोर दिया है। इस संदर्भ में भारत-नेपाल रेल संबंध का महत्त्व और व्यापक हो जाता है।

प्रमुख बिंदु 

  • समयबद्ध द्विपक्षीय रेल कनेक्टिविटी परियोजनाओं के लिये दोनों प्रधानमंत्रियों की वचनबद्धता वास्तव में एक परिवर्तनकारी निर्णय है।
  • इस निर्णय के तहत भारत बिहार के रक्सौल और नेपाल में काठमांडू के बीच सामरिक रेलवे लिंक का निर्माण करेगा, ताकि लोगों के बीच संपर्क तथा माल के थोक आवागमन को सुविधाजनक बनाया जा सके।
  • इसके अलावा, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पहले चरण के तहत सीमा पार रेल लाइन (जयनगर-जनकपुर/कुर्था और जोगबानी-बिराटनगर) का कार्य वर्ष 2018 में पूरा हो जाए।
  • दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने नई विद्युतीकृत रेल लाइन का निर्माण करने पर सहमति व्यक्त की है, जिसे भारत द्वारा वित्तपोषित किया जाएगा।
  • इसके साथ ही आगामी 3 अन्य रेलवे परियोजनाओं में न्यू जलपाईगुड़ी-ककारभीता, नौतनवा-भैरहावा और नेपालगंज रोड-नेपालगंज शामिल हैं।
  • इस परियोजना के पूरा होने से देश के सीमावर्ती क्षेत्रों का नेपाल की राजधानी से सीधा संपर्क को जाएगा।
  • सीमा पार कनेक्टिविटी दोनों देशों में लोगों से लोगों के संबंधों को बढ़ाने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिये एक महत्त्वपूर्ण कारक है।

भारत हेतु महत्त्वपूर्ण क्यों?

  • भौगोलिक स्थिति के अनुरूप, भारत दक्षिण एशिया में केंद्रीय स्थिति रखता है, जिसमें क्षेत्रफल की दृष्टि से 51 प्रतिशत, आबादी का 71 प्रतिशत और जीडीपी का 40 प्रतिशत हिस्सा शामिल है।
  • भारत के  अधिकांश पड़ोसी देश न केवल भारत के साथ सीमाओं को साझा करते हैं, बल्कि अधिकांश मामलों में ये देश चीन के साथ भी सीमाएँ साझा करते हैं।
  • साथ ही, महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि ये देश क्षेत्रीय व्यापक कनेक्टिविटी के लिये भारत पर निर्भर करते हैं।
  • अतः यह भारत की ज़िम्मेदारी है कि वह क्षेत्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने हेतु आवश्यक कदम बढाए।
  • भारत के चारों तरफ चीन पाँच सार्क देशों के साथ भूमि सीमाओं को साझा करता है और खुद छठे स्थान पर चिकन नैक पर अवस्थित है तथा म्याँमार के साथ लंबी सीमा साझा करता है।
  • इसके साथ ही चीन ने नेपाल और पाकिस्तान को झिंजियांग और तिब्बत में अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के लिये महत्त्वपूर्ण माना है।
  • इन्हीं मामलों को देखते हुए चीन श्रीलंका, म्याँमार, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ‘स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स’ के तहत सड़क और रेल लिंक का एक जाल बनाने में व्यस्त है।
  • अतः यह स्पष्ट है कि चीन दक्षिण एशियाई क्षेत्र में, न केवल भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है, बल्कि समय-समय पर भारत के पड़ोसी देशों को विकास का प्रलोभन देकर इसकी संप्रभुता के लिये भी एक बड़ा खतरा बना हुआ है।
  • हालाँकि, भारत ने दोनों देशों और नेपाल को जोड़ने वाले अंतर-हिमालयी आर्थिक गलियारे के निर्माण के लिये चीन के प्रस्ताव पर एक कठोर प्रतिक्रिया व्यक्त की है, क्योंकि सरकार आधारभूत संरचना और कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर नेपाल के साथ द्विपक्षीय रूप से काम करने की इच्छुक है।
  • इसलिये हाल ही में वुहान शिखर सम्मेलन में प्रधान मंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच इस परियोजना का जिक्र भी किया गया।

आगे की राह

  • कुछ समय से चीन ने नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव में अपनी सक्रियता बढ़ाई है, अतः भारत को पड़ोसी देशों के साथ अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
  • गौरतलब है कि म्याँमार भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाला एकमात्र आसियान देश है। लंबे समय तक, भारत ने म्याँमार के अराकान तट पर सड़क और रेल कनेक्शन तथा एक नए बंदरगाह के निर्माण की बात की थी, लेकिन अपने वादों की पूर्ति के लिये कोई ऊर्जावान कदम अभी तक नहीं उठाया है।
  • देखा भी गया है कि भारत उच्चतम स्तर पर भी किये गये वादों पर समयबद्ध पहुँच सुनिश्चित करने में असफल साबित हुआ है।
  • इस प्रकार के वादों की देरी से भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बिगाड़ रहा है और उधर इस स्थिति का फायदा उठाते हुए चीन भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है।
  • भारत ने रक्सौल-काठमांडू रेल लिंक के निर्माण हेतु एक सराहनीय पहल की है, किंतु अब आवश्यकता  है कि इस अवसर के माध्यम से अपने पड़ोसियों के बीच रिकॉर्ड समय में परियोजना को पूरा करने की तत्परता भी दिखाए। क्योंकि विकास परियोजनाओं के माध्यम चीन भारत के पड़ोसी  देशों में पहुँच स्थापित कर भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ना चाहता।

स्रोत: द हिंदू (बिज़नेस लाइन)

 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अस्तित्व पर संकट एवं संभावित समाधान 

सामान्य अध्ययन प्रश्नप्रत्र – 3 : प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड-01 : भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।)

Public Sector Banks

संदर्भ 

जब पहली बार संकटग्रस्त सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संकीर्ण बैंकों (जो बड़े ऋण प्रदान नहीं कर सकते) में परिवर्तित करने का विचार प्रस्तुत किया गया था, तब इसका कार्यान्वयन नहीं किया गया था तथा इसे एक अनावश्यक और कठोर कदम माना गया था, जो नए क्रेडिट प्रवाह को संकुचित कर सकता था और संवृद्धि को धीमा कर सकता था।

प्रमुख बिंदु

  • नवीनतम वित्तीय परिणामों की घोषणा के साथ एक चुनौतीपूर्ण तस्वीर उभर कर सामने आ रही है।
  • देना बैंक और इलाहबाद बैंक को आरबीआई द्वारा नए ऋण प्रदान करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
  • इन दोनों बैंकों सहित 11 बैंकों को पहले ‘तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई’ (prompt corrective action) के अंतर्गत रखा गया था, जिसने इन्हें प्रभावी रूप से संकीर्ण बैंक बना दिया था।
  • इस बात के कोई भी संकेत दिखाई नहीं देते कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक विवेकपूर्वक ऋण प्रदान करने के संदर्भ में शीघ्र ही जनता का विश्वास हासिल कर पाएंगे, अतः हमें जल्द ही देश के बैंकिंग परिदृश्य में मूलभूत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
  • अंतिम रूप से क्या बदलाव होंगे, यह अभी निश्चित नहीं है, लेकिन बड़े बदलावों की संभावनाएँ प्रबल हैं और इस हेतु कुछ उपाय भी सुझाए जा रहे हैं।
  • एक सुझाव यह हो सकता है कि उन बुनियादी कार्यों की पहचान करें, जिन्हें बैंकों ने अब तक किया है तथा देखें कि उन्हें अलग तरीके से और व्यावहारिक रूप से और आसानी से कौन पूरा कर सकता है।
  • साथ ही बैंकों को कैश का प्राथमिक डिस्पेंसर बने रहने की आवश्यकता नहीं रह गई है और कई बैंकों ने यह कार्य बंद भी कर दिया है।
  • वर्तमान में स्वतंत्र कंपनियों द्वारा ‘व्हाइट लेवल एटीएम’ (white label ATMs) चलाए जा रहे हैं जिनका स्वामित्त्व भी उन्हीं के पास होता है।
  • वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को भी पॉइंट ऑफ सेल मशीनों के माध्यम से कैश प्रदान करने में सक्षम बनाना होगा।
  • यह तरीका खासकर ग्रामीण स्तर पर प्रभावशाली साबित हो सकता है, जहाँ स्थानीय किराना दुकानें कैश डिस्पेंसर का कार्य कर सकती हैं। इस कदम से एटीएम खोजने के लिए ग्रामीणों की काफी दूरी तय करने की आवश्यकता को दूर किया जा सकता है।
  • बैंकों को अब देश की भुगतान प्रणाली का मुख्य आधार होने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (The National Payments Corporation of India) ने इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणाली के प्रसार में काफी मदद की है। साथ ही इसने रुपे कार्ड भी पेश किया है। लगभग 250 मिलियन रुपे कार्ड जारी जा चुके हैं।
  • एनपीसीआई द्वारा संचालित ‘एकीकृत भुगतान इंटरफेस’ (unified payments interface) ने मोबाइल फोन के माध्यम से बैंकों के मध्य त्वरित भुगतान को सक्षम बना दिया है।
  • हालाँकि भुगतान बैंक, जो मूल बैंकिंग प्रणाली को जमीनी स्तर तक पहुँचाने के लिये बनाई गई थीं, वे अच्छी तरह से संचालित नहीं हो पाई हैं।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने धन जमा करने का काम बखूबी निभाया है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपना योगदान दे सकते हैं।

स्रोत : द हिंदू (बिजनेस लाइन)