UPSC DAILY CURRENT 23-01-2019

भारतीय अर्थव्यवस्था

सरकारी ऋण पर स्थिति पत्र 2017-18

चर्चा में क्यों?

हाल ही में आर्थिक कार्य विभाग (Department of Economic Affairs) ने सरकारी ऋण पर स्थिति पत्र 2017-18 (Status Paper on Government Debt 2017-18) जारी किया है। गौरतलब है कि सरकार 2010-11 से सरकारी ऋण पर एक वार्षिक स्थिति पत्र प्रकाशित कर रही है, जो सरकार की ऋण स्थिति का विस्तृत विश्लेषण प्रदान करता है।

प्रमुख बिंदु

  • केंद्र सरकार की ऋण स्थिति के अलावा, स्थिति पत्र के इस 8वें संस्करण में राज्य सरकार के ऋण भी शामिल हैं।
  • केंद्र का कुल ऋण मार्च 2014 के अंत में 56,69,429 करोड़ रूपए से बढ़कर 2017-18 में, 82,35,178 करोड़ रूपए हो गया। अर्थात केंद्र सरकार के ऋण में 45% की वृद्धि हुई।
  • इसी दौरान राज्यों का ऋण 24,71,270 करोड़ रूपए से बढ़कर 40,22,090 करोड़ रूपए हो गया अर्थात् राज्यों के ऋण में भी लगभग 63% की वृद्धि दर्ज़ की गई।
  • यदि ऋण-GDP अनुपात की बात करें तो केंद्र का कुल ऋण 31 मार्च 2014 तक 47.5% से घटकर 2017-18 में 46.5% हो गया अर्थात् ऋण के मुकाबले देश की GDP में बढ़ोत्तरी हुई है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये अच्छा संकेत है।
    हालाँकि, इसी अवधि के दौरान राज्यों का ऋण-GDP अनुपात 2017-18 में बढ़कर 24% हो गया जो 2013-14 के दौरान 22% था।

gdp

  • सरकार द्वारा जारी किये गए आँकड़ों से पता चलता है कि केंद्र सरकार सार्वजनिक ऋण पर एन. के. सिंह समिति की सिफारिशों को पूरा करने के लिये सही दिशा में आगे बढ़ रही है, जबकि राज्य विपरीत दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

क्यों बढ़ा राज्यों पर कर्ज़?

  • इन दो वर्षों में UDAY (Ujwal DISCOM Assurance Yojana) बॉण्ड जारी करने के बाद 2015-16 और 2016-17 के दौरान राज्यों की बकाया देनदारी तेज़ी से बढ़ी है। इसका ही परिणाम है कि ऋण-GDP अनुपात मार्च 2015 के अंत में 21.7% से बढ़कर मार्च 2016 के अंत में 23.4% हो गया और यही आँकड़ा मार्च 2017 के अंत में 23.8% हो गया।
  • ऋण-GDP अनुपात के रूप में कुल बकाया ऋण मार्च 2018 के अंत में 24% था और ऐसा अनुमान लगाया गया है कि मार्च 2019 के अंत में यह बढ़कर 24.3% हो जाएगा।
  • हालाँकि, रिपोर्ट में यह कहा गया है कि राज्यों के पास आने वाले वर्षों में अपना ऋण कम करने के लिये कुछ राजकोषीय ताकत है, जो कि बड़े नकदी अधिशेष के कारण है।

एन. के. सिंह समिति की प्रमुख सिफारिशें

  • समिति ने सरकार के ऋण के लिये GDP के 60 फीसदी की सीमा तय की है यानी केंद्र सरकार का कर्ज़ GDP का 40 फीसदी और राज्य सरकारों का सामूहिक कर्ज़ 20 फीसदी होगा।
  • समिति ने मौजूदा FRBM कानून 2003 और FRBM नियम, 2004 को खत्म कर इसकी जगह नया कर्ज़ और राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून बनाने की सिफारिश भी की है। साथ ही राजकोषीय घाटे का सालाना लक्ष्य तय करने के लिये तीन सदस्यीय राजकोषीय परिषद बनाने का सुझाव भी समिति ने दिया है।
  • समिति ने कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष खतरा होने, युद्ध की स्थिति आने, राष्ट्रीय स्तर की कोई आपदा या फिर खेती बर्बाद होने जिसका कृषि उत्पादन पर गंभीर असर पड़े, इन परिस्थितियों में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में फेरबदल किया जा सकता है।
  • समिति ने यह भी कहा है कि ढाँचागत सुधार वाले प्रयासों (जिनमें कि राजकोषीय प्रभावों का पहले से आकलन नहीं किया जा सकता) के क्रियान्यवयन में राजकोषीय लक्ष्य अनुपालन के रास्ते से हटा जा सकता है। अर्थात राजकोषीय लक्ष्य, विकास के आड़े नहीं आने चाहियें।
  • समिति ने राजस्व घाटे में भी साल दर साल 0.25 प्रतिशत की कटौती करने को कहा है। समिति ने कहा है कि चालू वित्त वर्ष में राजस्व घाटा 2.05 प्रतिशत होना चाहिये, वहीं अगले वित्त वर्ष में इसे घटाकर 1.8 प्रतिशत तथा वित्त वर्ष 2019-20 में कम करके 1.55 प्रतिशत के स्तर पर लाना चाहिये। समिति का कहना है कि वित्त वर्ष 2022-23 में राजकोषीय घाटा कम करके 0.8 प्रतिशत के स्तर पर लाना चाहिये।

क्या है FRBM?

  • उल्लेखनीय है कि देश की राजकोषीय व्यवस्था में अनुशासन लाने के लिये तथा सरकारी खर्च तथा घाटे जैसे कारकों पर नज़र रखने के लिये राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (FRBM) कानून को वर्ष 2003 में तैयार किया गया था तथा जुलाई 2004 में इसे प्रभाव में लाया गया था।
  • यह सार्वजनिक कोषों तथा अन्य प्रमुख आर्थिक कारकों पर नज़र रखते हुए बजट प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। FRBM के माध्यम से देश के राजकोषीय घाटों को नियंत्रण में लाने की कोशिश की गई थी, जिसमें वर्ष 1997-98 के बाद भारी वृद्धि हुई थी।
  • केंद्र सरकार ने राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन कानून की नए सिरे से समीक्षा करने और इसकी कार्यकुशलता का पता लगाने के लिये एन. के. सिंह के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया था।

स्रोत- द हिंदू


शासन व्यवस्था

दवा नियामक प्राधिकरण की भूमिका कमजोर

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा नीति आयोग के अंतर्गत दवाओं के मूल्य नियंत्रण के संबंध में एक समिति गठित की गई।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • नीति आयोग के तहत गठित समिति अब दवाओं पर मूल्य नियंत्रण निर्धारित करेगी, जबकि पहले इसका निर्धारण राष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल्स मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (National Pharmaceuticals Pricing Authority-NPPA) द्वारा किया जाता था।
  • वर्तमान में NPPA एक स्वायत्त निकाय के रूप में कार्यरत है अब तक यह देश की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक दवाओं (National List of Essential Medicines-NLEM) एवं उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित करता था लेकिन इस नये आदेश के आने से दवाओं के मूल्य नियंत्रण पर समस्त शक्तियाँ इस समिति के पास आ गई हैं।

समिति के गठन की घोषणा

  • हाल ही में रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय द्वारा सस्ती दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों पर एक स्थाई समिति(Standing Committee on Affordable Medicines and Health Products-SCAMHP) गठित करने की घोषणा की गई जिसमे नीति आयोग के साथ-साथ वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव, NLEM के उपाध्यक्ष, औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (Department of Industrial Policy & Promotion-DIPP) के संयुक्त सचिव, स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, बायोमेडिकल उपकरणों/फार्मास्यूटिकल्स से संबंधित विशेषज्ञ शामिल होंगे।
  • इस आदेश के अनुसार, SCAMHP दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों की कीमतों के बारे में NPPA के लिये एक सिफारिश निकाय होगी।
  • वर्तमान में स्वास्थ्य मंत्रालय, उचित दवाओं के मूल्य विनियमन के लिये सूची तैयार करता है। तत्पश्चात फार्मास्यूटिकल्स विभाग (DOP) इन आवश्यक दवाओं को राष्ट्रीय सूची के तहत (National List of Essential Medicines-NLEM) ड्रग्स (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO) की अनुसूची 1 में शामिल करता है। इसके बाद NPPA इस अनुसूची में दवाओं की कीमतें तय करता है।
  • NLEM के अंतर्गत सूचीबद्ध दवाओं एवं उपकरणों को NPPA द्वारा निर्धारित मूल्य पर बेचा जाना चाहिए, जबकि गैर-अनुसूचित सूची वाली दवाइयों को वर्ष में अधिकतम मूल्य में 10% वृद्धि की अनुमति है। वर्तमान में भारत में आवश्यक दवाओं की सूची में 750 से अधिक दवाइयाँ शामिल हैं।

पृष्ठभूमि

  • वर्तमान प्रणाली पिछले वर्ष प्रधानमंत्री कार्यालय में नीति आयोग द्वारा दी गई दवाओं के मूल्य निर्धारण प्रक्रिया का अनुसरण करती है, जिसमे दो समितियों के गठन करने का सुझाव दिया गया था पहला आवश्यक दवाओं को सूचीबद्ध करने के लिये और दूसरा इन दवाइयों मूल्य नियंत्रण के तहत लाने के लिये।
  • इस सुझाव के बाद ही स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक के तहत आवश्यक दवाओं पर समिति का गठन किया गया।
  • इस प्रणाली के अनुसार, समिति अपनी इच्छानुसार या DoP, NPPA तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की सिफारिशों पर मूल्य निर्धारण परीक्षण के मुद्दों पर विचार कर सकती है।

पैरा 19 की शक्तिओं के संबंध में

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  • NPPA दिये गए पैरा 19 की शक्तियों का प्रयोग सार्वजानिक हित के लिये करती है।
  • 2013 से सरकार द्वारा NPPA को यह शक्तियाँ प्राप्त हैं जिसका प्रयोग वह अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के मूल्य निर्धारण के संबंध में करती है।
  • 2017 में, NPPA की इन्ही शक्तियों के अंतर्गत कार्डिएक दवाओं (Cardiac Drugs), स्टेंट (Stents) और घुटना प्रत्यारोपण (Knee Implants) की कीमतों में वृद्धि की गई।

औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग

  • इसकी स्थापना 1995 में हुई, 2000 में औद्योगिक विकास विभाग में विलय करके इसका पुनर्गठन किया गया था।
  • यह भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आता है।

नीति आयोग (NITI Aayog)

  • इसका पूरा नाम ‘नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (National Institution for Transforming India-NITI) है।
  • यह एक ‘थिंक टैंक’ है, जिसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत सरकार के सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना है।

स्रोत – लाइव मिंट


सामाजिक न्याय

बुजुर्ग गरीबों, विकलांगों और विधवाओं की मासिक पेंशन में बढ़ोत्तरी का प्रस्ताव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ग्रामीण विकास मंत्रालय (Rural Development Ministry) ने बुजुर्ग गरीबों, विकलांगों और विधवाओं की मासिक पेंशन को बढ़ाने का प्रस्ताव किया है।

क्या है प्रस्ताव?

  • गरीब बुजुर्गों, विकलांगो और विधवाओं की मौजूदा मासिक पेंशन को 200 रुपए से बढ़ाकर 800 रुपए किया जाए।
  • 80 वर्ष से अधिक उम्र वालों के लिये मौज़ूदा मासिक पेंशन को 500 रुपए से बढ़ाकर 1200 रुपए किया जाए।

प्रमुख बिंदु

  • यदि यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो इसके कारण सरकार पर 18,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त वार्षिक खर्च आएगा।
  • योजना द्वारा कवर किये गए लोगों की संख्या को दोगुना करने पर विचार करने के लिये एक अध्ययन भी शुरू किया गया है।
  • कवरेज बढ़ाने के लिये, केंद्र और राज्य पेंशन योजनाओं के विलय संबंधी प्रस्ताव पर भी राज्य सरकारों के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है।
  • वर्तमान में NSAP के तहत आने वाले लोगों की संख्या निर्धारित करने के लिये मानदंड के रूप में गरीबी रेखा से नीचे (Below Poverty Line-BPL) मानदंड का उपयोग किया जाता है।
  • लेकिन राजस्थान, तेलंगाना, बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों ने पहले ही अपनी स्वयं की पेंशन योजनाओं के लिये सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना 2011 (Socio Economic and Caste Census-SECC-2011) के डेटा का उपयोग करते हैं।

पृष्ठभूमि

  • अक्तूबर 2018 में विकलांगता और बुजुर्ग व्यक्तियों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission-NHRC) की एक समिति ने वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिये कुछ उपायों की सिफारिश की थी जो इस प्रकार हैं:

♦ केंद्र को वृद्ध व्यक्तियों के लिये पेंशन योजना में अपना योगदान 200 रुपये से बढ़ाकर 2,000 रुपये प्रति माह कर देना चाहिये।
♦ उन वरिष्ठ नागरिकों, जो अपने परिवार कि सहायता के बिना अकेले रह रहे हैं, की देखभाल के लिये भारत को ‘टाइम बैंक’ योजना का अनुसरण करना चाहिये।
♦ अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित मामलों के निपटान लिये ज़िला स्तर पर एक नोडल पुलिस अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिये।
♦ वृद्धाश्रमों के निर्माण के लिये कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (Corporate Social Responsibility-CSR) निधियों का उपयोग किया जाना चाहिये।

टाइम बैंक योजना (Time Bank Scheme)

  • ‘टाइम बैंक’ योजना के तहत, लोग अपने समय की बचत करते हैं तथा उन बुजुर्गों की मदद के लिये स्वयंसेवक के रूप में कार्य करते हैं जिन्हें मदद की आवश्यकता होती है।
  • बुज़ुर्ग नागरिकों के साथ या उनकी सेवा में ये लोग जितने घंटे का समय व्यतीत करते हैं उस समय को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के व्यक्तिगत खाते में जमा कर दिया जाता है।
  • जब स्वयंसेवक खुद बूढ़े हो जाते हैं और उन्हें किसी की मदद की आवश्यकता होती है, तो ऐसी स्थिति में वे ‘टाइम बैंक’ का उपयोग कर सकते हैं और एक स्वयंसेवक को उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंप दी जाती है।
  • स्विट्जरलैंड (Switzerland) और यूनाइटेड किंगडम (UK) ‘टाइम बैंक’ योजना का अनुसरण कर रहे हैं जबकि सिंगापुर इसे लागू करने पर विचार कर रहा है।
  • दिसंबर, 2018 में सर्वोच्च न्यायलय ने अपने एक आदेश में भारत सरकार से इन पेंशन योजनाओं पर पुनर्विचार करने के लिये कहा था ताकि इन योजनाओं को अभिसारित किया जा सके और बहुलता (एक ही प्रकार की कई योजनाएँ) से बचा जा सके।
  • इसने भारत सरकार और राज्य सरकारों को आदेश दिया कि वे वित्त की उपलब्धता और सरकार की आर्थिक क्षमता के आधार पर बुजुर्गों के पेंशन संबंधी अनुदान को अधिक यथार्थवादी बनाएँ।

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (National Social Assistance Programme)

  • राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा प्रशासित एक कल्याणकारी कार्यक्रम है।
  • इस कार्यक्रम को ग्रामीण के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी लागू किया जा रहा है।

संवैधानिक प्रावधान

  • राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) संविधान के अनुच्छेद 42 और विशेष रूप से अनुच्छेद 41 में दिये गए नीति-निदेशक सिद्धांतों की पूर्ति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व करता है।

♦ अनुच्छेद 41 के अनुसार, राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने, शिक्षा प्राप्त करने और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और नि:शक्तता तथा अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।
♦ अनुच्छेद 42 के अनुसार, राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिये और प्रसूति सहायता के लिये उपबंध करेगा।

  • इस कार्यक्रम की शुरुआत पहली बार 15 अगस्त 1995 को केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में की गई थी। वर्ष 2016 में इसे केंद्र प्रायोजित योजनाओं (CSS) की प्रमुखतम (Core of Core) योजनाओं में शामिल किया गया था।
  • वर्तमान में वर्ष 2019 में, इसके पाँच घटक हैं:
  1. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (Indira Gandhi National Old Age Pension Scheme-IGNOAPS) – इसकी शुरुआत वर्ष 1995 में की गई थी।
  2. राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना (National Family Benefit Scheme-NFBS)- इसकी शुरुआत वर्ष 1995 में की गई थी।
  3. अन्नपूर्णा योजना (Annapurna Scheme)- यह योजना वर्ष 2000 में शुरू की गई।
  4. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (Indira Gandhi National Widow Pension Scheme-IGNWPS) – 2009 में शुरू की गई।
  5. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विकलांगता पेंशन योजना (Indira Gandhi National Disability Pension Scheme) – 2009 में शुरू की गई।
  • राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (National Maternity Benefit Scheme-NMBS), NSAP का हिस्सा थी और बाद में इसे ग्रामीण विकास मंत्रालय से स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में स्थानांतरित कर दिया गया।

केंद्रीय योजनाएँ

  • केंद्रीय योजनाओं को केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं (Central Sector Schemes) और केंद्र प्रायोजित योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes-CSS) में विभाजित किया गया है।

केंद्रीय क्षेत्र की योजनाएँ

  • इन योजनाओं का शत प्रतिशत वित्तपोषण केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है।
  • ये योजनाएँ केंद्र सरकार द्वारा ही लागू की जाती हैं।
  • इन्हें मुख्य रूप से संघ सूची में शामिल विषयों के आधार पर तैयार किया जाता है।
  • उदाहरण- भारतनेट, नमामि गंगे-राष्ट्रीय गंगा योजना इत्यादि।

केंद्र प्रायोजित योजनाएँ

  • केंद्र प्रायोजित योजनाएँ केंद्र द्वारा तैयार की गई योजनाएँ हैं जिनमें केंद्र और राज्यों दोनों की वित्तीय भागीदारी होती है।
  • केंद्र प्रायोजित योजनाओं (CSS) को प्रमुखतम योजनाओं (Core of the Core Schemes), प्रमुख योजनाओं (Core Schemes) और वैकल्पिक योजनाओं (Optional schemes) में विभाजित किया गया है।
  • वर्तमान में प्रमुखतम योजनाओं की संख्या 6 जबकि प्रमुख योजनाओं की संख्या 22 है।
  • इनमें से अधिकांश योजनाएँ राज्यों की विशिष्ट वित्तीय भागीदारी को निर्धारित करती हैं। उदाहरण के लिये, मनरेगा (MGNREGA) के मामले में, राज्य सरकारों को 25% का महत्त्वपूर्ण व्यय करना पड़ता है।

6 प्रमुखतम योजनाएँ हैं-

  1. राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (National Social Assistance Programme)
  2. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Program)
  3. अनुसूचित जाति के विकास के लिये समग्र योजना (Umbrella Scheme for Development of Scheduled Castes)
  4. अनुसूचित जनजाति के विकास के लिये समग्र कार्यक्रम (Umbrella Programme for Development of Scheduled Tribes)
  5. अल्पसंख्यकों के विकास के लिये समग्र कार्यक्रम (Umbrella Programme for Development of Scheduled Tribes)
  6. अन्य अल्पसंख्यक समूहों के विकास के लिये समग्र कार्यक्रम (Umbrella Programme for Development of Other Vulnerable Groups)

भारतीय इतिहास

लोथल…भारत का सबसे पुराना तटीय शहर

हमारे देश में स्कूल में पढ़ चुके बच्चों में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे सिंधु घाटी की सभ्यता के बारे में जानकारी न हो। सिंधु घाटी की सभ्यता को ही हड़प्पा की सभ्यता कहा जाता है। इसे यह नाम इसलिये दिया गया क्योंकि 1920 के दशक में ब्रिटिश पुरातत्वविद् सर मॉर्टिमर व्हीलर ने सबसे पहले हड़प्पा में ही खोदाई का काम शुरू किया था।

हड़प्पा सभ्यता बेहद विशाल थी तथा भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक इसका विस्तार था। हालाँकि, भारत विभाजन के बाद हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के कब्ज़े में चले गए, फिर भी हड़प्पा सभ्यता के कई स्थान भारत में भी मौज़ूद रहे।

कैसा है लोथल?

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  • भारतीय पुरातत्वविदों ने गुजरात के सौराष्ट्र में 1947 के बाद हड़प्पा सभ्यता शहरों की खोज शुरू की और इसमें उन्हें पर्याप्त सफलता भी मिली।
  • पुरातत्वविद एस.आर. राव की अगुवाई में कई टीमों ने मिलकर 1954 से 1963 के बीच कई हड़प्पा स्थलों की खोज की, जिनमें में बंदरगाह शहर लोथल भी शामिल है।
  • हड़प्पा संस्कृति को दो उप-कालखंडों में रखा जा सकता है: 1. 2400-1900 ईसा पूर्व और 2. 1900-1600 ईसा पूर्व।
  • मोहनजोदड़ो की तरह लोथल का भी अर्थ है, मुर्दों का टीला। खंभात की खाड़ी के पास भोगावो और साबरमती नदियों के बीच स्थित है लोथल।
  • अहमदाबाद से एक लंबी और धूल-मिट्टी से भरी यात्रा के बाद सारगवाला गाँव आता है जहाँ लोथल का पुरातात्विक स्थल स्थित है।
  • यहाँ पहुँचते ही ऐसा लगता है कि ये ईंटें हाल-फिलहाल में ही बनाई गई है, किसी भी हालत में 2400 ईसा पूर्व की तो नहीं ही लगतीं।
  • सबसे पहले दिखाई देता है एक आयताकार बेसिन, जिसे डॉकयार्ड कहा जाता था। 218 मीटर लंबा और 37 मीटर चौड़ा यह बेसिन चारों तरफ से पक्की ईंटों से घिरा हुआ है। इसमें स्लूस गेट और इनलेट (Sluice Gate & Inlet) के लिये जगह छोड़ी गई है।

पहला बंदरगाह शहर

चूँकि अभी तक हम सिंधु लिपि को व्याख्याबद्ध (Decode) नहीं कर पाए हैं, इसलिये यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि क्या लोथल वास्तव में देश का पहला बंदरगाह शहर था। इसे लेकर इतिहासकारों में भी मतभेद है। लेकिन यह सच है कि अन्य प्राचीन शहरों में मिली लोथल की मुद्राओं से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि अन्य प्राचीन सभ्यताओं के साथ व्यापार में इसका बेहद महत्त्व था। ऐसे में कहा जा सकता है कि यह डॉकयार्ड हड़प्पा वासियों की समुद्री गतिविधियों की ओर संकेत करता है।

  • 4500 वर्षीय पुराना यह शहर गणितीय तरीके से योजनाबद्ध रूप से बना था। इसमें उचित कोणों पर सड़कों को पार करने की व्यवस्था, जल निकासी प्रणालियाँ और बड़े स्नानागार की व्यवस्था थी।
  • शौचालय और लोटे जैसे जार मिलने से यह पता चलता है कि स्वच्छता पर पर्याप्त ज़ोर दिया जाता था।

The Early Indians

टोनी जोसेफ ने अपनी पुस्तक, The Early Indians: The Story of Our Ancestors and Where We Came From में लिखा भी है कि इस मामले में दक्षिण एशियाई लोगों के तौर-तरीकों में कोई खास बदलाव नहीं आया है। इस पुस्तक से यह भी पता चलता है कि लोथल में हुई खोदाई में एक कलश भी मिला था। इसमें एक घड़े के आगे एक कौए का चित्र बना है, जिसके पीछे एक हिरण दिख रहा है। अपनी इस पुस्तक में टोनी जोसफ ने लिखा भी है…”कुछ किस्से-कहानियाँ जो आज हम अपने बच्चों को बताते हैं, वे शायद वही हैं जो हड़प्पा वासी अपने बच्चों को बताया करते थे।”

  • इसके बाद एक प्राचीन कुआँ और एक भंडारगृह के अवशेष देखने को मिलते हैं। ऐसा लगता है जैसे यह शहर का ऊपरी हिस्सा या नगरकोट (Citadel) है।
  • लोथल शहर दो हिस्सों में बंटा हुआ था: 1. ऊपरी हिस्सा (Upper Town) और 2. निचला हिस्सा (Lower Town)।
  • यहाँ मिलने वाले ईंट की दीवारों के अवशेष, चौड़ी सड़कों, नालियों और स्न्नागारों की ओर इंगित करते हैं।
  • इसके बाद ऐसा स्थान दिखाई देता है, जो मनके बनाने वाली फैक्ट्री की तरह लगता है। लेकिन इसके स्पष्ट चिह्न देखने को नहीं मिलते।
  • हड़प्पा समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र था लोथल। यहाँ पर अर्द्ध-कीमती रत्नों, टेराकोटा, सोने आदि से बने मनके-मोती सुमेर (आधुनिक इराक), बहरीन और ईरान जैसे क्षेत्रों में भी लोकप्रिय थे।

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का संग्रहालय

लोथल में मनके-मोती बनाने वाले बेहद कुशल थे। यहाँ आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के संग्रहालय में लोथल में मिले मोती-मनके रखे गए हैं। यहाँ लगे एक साइनबोर्ड पर लिखा है…निचले शहर में हुई खोदाई में एक मनके-मोती बनाने वाले का घर भी मिला था। इसमें कई कमरे और एक भट्ठी थी। उत्पादन के विभिन्न चरणों में पड़े 800 कॉर्नेलियन मोती वहाँ मिले थे। इनके साथ कई प्रकार के उपकरण और कच्चा माल भी वहाँ से बरामद किया गया था। इसी संग्रहालय में एक यूनीकॉर्न सील (मुद्रा) भी रखी हुई है, जिसके बारे में माना जाता है कि अपनी तरह की यह एकमात्र सील है।

स्रोत: द हिंदू


विविध
  • रेटिंग एजेंसी क्रिसिल द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार, गुजरात और आंध्र प्रदेश सहित सहित कई राज्यों की विकास दर यानी Gross State Domestic Product (GSDP) देश की विकास दर से अधिक है। गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों को पीछे छोड़ते हुए बिहार ने 11.3% की दर हासिल की। 17 राज्यों की इस GDP रैंकिंग में आंध्र प्रदेश को दूसरा (11.2%) और गुजरात (11.1%) को तीसरा स्थान मिला। रिपोर्ट के अनुसार इन राज्यों में तेज़ विकास के बावजूद रोजगार में बढ़ोतरी न होने के कारण ‘जॉबलेस ग्रोथ’ की स्थिति बनी हुई है। इस रेटिंग में विशेष राज्य का दर्जा पाने वाले राज्यों को शामिल नहीं किया गया।
  • Lloyd’s द्वारा जारी वैश्विक कंटेनर पोर्ट्स रैंकिंग में विश्व के 30 शीर्ष कंटेनर पोर्ट्स में भारत का जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट भी शामिल है। अपनी पिछली रैंकिंग में 5 स्थानों का सुधार कर इसे 28वीं रैंकिंग मिली है। नवी मुम्बई स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट को पूर्व में न्हावा शेवा बंदरगाह के नाम से जाना जाता था। यह भारत का शीर्ष कंटेनर पोर्ट है जो भारत में सभी प्रमुख पोर्ट्स का 55 प्रतिशत कंटेनर कार्गों संचालित करता है। इसकी शुरुआत 26 मई, 1989 को हुई थी।
  • चीन की जनसंख्या वृद्धि दर में लगातार गिरावट का क्रम जारी है। 2018 में चीन में 1.53 करोड़ शिशुओं का जन्म हुआ, जो इससे पहले वर्ष की तुलना में 20 लाख कम है। यह पिछले 60 वर्षों में सबसे कम जन्म दर है। वर्तमान में चीन की आबादी 139.5 करोड़ है और जनसंख्या वृद्धि में यदि इसी प्रकार कमी होती रही तो 2030 से चीन की आबादी में गिरावट का क्रम शुरू हो सकता है। गौरतलब है कि चीन ने जनसंख्या दर को बनाए रखने के लिये 2016 में दो बच्चों की नीति अपनाई थी।
  • भारत और चीन ने एक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये हैं, जिससे भारतीय तंबाकू के पत्तों का चीन को निर्यात किया जा सकेगा। चीन फिलहाल 350 मिलियन से अधिक धूम्रपान करने वालों के साथ दुनिया में तंबाकू का सबसे बड़ा उपभोक्ता और उत्पादक देश है। इस प्रोटोकॉल के तहत चीन के बाज़ारों तक भारत की पहुँच बनाने के प्रयास किये जाएंगे। भारत में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप गुणवत्ता वाला तंबाकू प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध है और चीन को भारतीय तंबाकू के निर्यात की अच्छी संभावना है।
  • फेक न्यूज़ और अफवाहों को रोकने के लिये व्हाट्सएप से मैसेज फॉरवर्ड करने की पाबंदी विश्वभर में लागू हो गई है। अब केवल पाँच लोगों को मैसेज फॉरवर्ड करने की सुविधा मिलेगी। इससे पहले व्हाट्सएप का इस्तेमाल करने वाला कोई भी यूज़र 20 ग्रुप्स या लोगों को मैसेज फॉरवर्ड कर सकता था। आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आदेश के बाद भारत में यह पाबंदी पिछले वर्ष जुलाई में ही लागू कर दी गई थी।
  • अमेरिका स्थित नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक अनोखा पैच बनाया है। मनुष्य के शरीर पर चिपक जाने वाला यह पैच पसीने का विश्लेषण कर शरीर में होने वाली पानी की कमी तथा डायबिटीज़ का पता लगाने में सक्षम है। इसके अलावा यह शरीर में मौज़ूद सोडियम, पोटैशियम, कार्बोनेट्स के स्तर पर निगरानी रखने का काम करेगा। इस पैच का इस्तेमाल ब्लड शुगर की मात्रा पर नज़र रखने के लिये भी किया जा सकता है।
  • प्रशांत महासागर में स्थित चार कुरील द्वीपों (Kuril Islands) पर रूस और जापान के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने के लिये जापानी प्रधानमंत्री शिंजो एबी ने मास्को में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। आपको बता दें कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इन चार द्वीपों पर सोवियत संघ की सेना ने कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन जापान इन पर रूस की संप्रभुता मानने को तैयार नहीं है। इस विवाद के चलते द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के इतने साल बाद भी दोनों देशों के बीच शांति संधि नहीं हो पाई है।
  • गुजराती कवि सीतांशु यशचन्द्र को 27वाँ सरस्वती सम्मान दिया गया है। सीतांशु यशचंद्र को 2009 में प्रकाशित उनके संग्रह ‘वखार’ पर वर्ष 2017 के लिये यह सम्मान दिया गया। उन्हें पिछले वर्ष इस पुरस्कार के लिये चुना गया था। के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा दिये जाने वाले इस पुरस्कार की चयन समिति के अध्यक्ष लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष चंद्र कश्यप थे। 1991 में स्थापित सरस्वती सम्मान हर साल किसी भी भारतीय भाषा में लिखित और पिछले 10 वर्षों में प्रकाशित साहित्यक कृति को दिया जाता है। 2016 का सरस्वती सम्मान कोंकणी के उपन्यासकार महाबालेश्वर सैल को दिया गया था। इस सम्मान के तहत 15 लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और फलक प्रदान किया जाता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने भारत के युवा बल्लेबाज रिषभ पंत को 2018 में उनके बेहतरीन प्रदर्शन के मद्देनजर वर्ष का उभरता हुआ क्रिकेटर(Emerging Cricketer of the Year) चुना है। इससे पहले 2004 में इरफान पठान को और 2013 में चेतेश्वर पुजारा को इस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। गौरतलब है कि पिछले वर्ष पाकिस्तान के हसन अली को यह पुरस्कार दिया गया था।
  • हाल ही में तमिलनाडु के पुडुकोट्टई में आयोजित जल्लीकट्टू में सबसे ज्यादा संख्या में सांडों को मैदान में उतारने का विश्व रिकॉर्ड बनाया गया। सांडों को काबू करने वाले इस खेल में 1354 सांडों को शामिल किया गया था और 424 लोग इन पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे। दो साल पहले 647 सांडों को शामिल करके विश्व रिकॉर्ड बनाया गया था। जल्लीकट्टू को ”इरुथाझुवुथल’ के नाम से भी जाना जाता है और यह तमिलनाडु में मट्टू पोंगल के दिन खेला जाता है, जिसमें निहत्थे लोग खुले छोड़ दिये गए सांडों पर काबू करते हैं।