UPSC DAILY CURRENT 24-09-2018

JOIN TELEGRAM CHANNEL FOR DAILY UPDATE

Join

[1]

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. हाल ही में इस अभयारण्य में 10 से अधिक एशियाई शेरों की मौत हो गई।
  2. दक्षिणी अफ्रीका के अलावा विश्व का यही ऐसा एकमात्र स्थान है जहाँ शेरों को अपने प्राकृतिक आवास में देखा जा सकता है।
  3. वर्ष 1969 में इसे अभयारण्य का दर्जा प्रदान किया गया था।
उपर्युक्त कथन निम्नलिखित में से किस अभयारण्य से संबंधित है?
A) कैमूर वन्यजीव अभयारण्य
B) नल सरोवर अभयारण्य
C) पंचमढ़ी अभयारण्य
D) गिर वन्यजीव अभयारण्य

 उत्तर : (d)
व्याख्या :

  • हाल ही में गुरात के गिर वन्यजीव अभयारण्य में 10 से अधिक एशियाई शेरों की मौत हो गई।  वन अधिकारियों के अनुसार, इनमें से अधिकांश शेरों की मौत फेफड़ों के संक्रमण के कारण हुई जबकि कुछ की मौत आपस में लड़ाई में लगी चोटों के कारण हुई है।
  • गिर अभयारण्य को एशियाई शेरों की अंतिम शरणस्थली माना जाता है। दक्षिणी अफ्रीका के अलावा विश्व का यही ऐसा एकमात्र स्थान है जहाँ शेरों को अपने प्राकृतिक आवास में देखा जा सकता है। यहाँ स्तनधारी जीवों की 30 प्रजातियाँ, सरीसृप वर्ग की 20 प्रजातियाँ और कीड़े-मकोड़ों तथा पक्षियों की भी अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • गिर वन्यजीव अभयारण्य ‘बाघ संरक्षित क्षेत्र’ है, जो ‘एशियाई बब्बर शेर’ के लिये विश्व प्रसिद्ध है।  यह अभयारण्य लगभग 1400 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है जिसमें 258 किलोमीटर का क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान के रूप में संरक्षित है।  एशियाई शेर को बचाने के लिये सरकार ने 18 सितंबर, 1965 को सासन गिर की बड़ी भौगोलिक सीमा को वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया। वर्ष 1969 में इसे अभयारण्य का दर्जा प्रदान किया गया था।  1975 में इसके 140.4 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
[2]

 बांध पुनःस्थापन और सुधार परियोजना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. इस योजना में केवल 20 बड़ी बांध परियोजनाओं के पुन:स्थापन का प्रावधान है।
  2. व्यापक प्रबंधन प्रणाली के साथ संस्थागत मज़बूती के लिये इस परियोजना में विश्व बैंक वित्तीय सहायता देगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

 उत्तर : (b)
व्याख्या :

  • बांध पुनःस्थापन और सुधार परियोजना (DRIP) में 198 बांध परियोजनाओं के पुन:स्थापन का प्रावधान है। ये परियोजनाएँ भारत के 7 राज्यों– केरल, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, झारखंड (दामोदर घाटी निगम) तथा उत्तराखंड (उत्तराखंड जल विद्युत निगम लि.)  में स्थित हैं। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • यह परियोजना च‍यनित वर्तमान बांधों की सुरक्षा और संचालन प्रदर्शन में सुधार लाएगी तथा जोखिम को कम कर निचले इलाकों की आबादी और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।  इस परियोजना से प्राथमिक रूप में जलाशय पर निर्भर शहरी और ग्रामीण समुदाय तथा निचले इलाके के समुदाय लाभान्वित होंगे। निचले इलाकों में रहने वाले लोग बांध के विफल होने या संचालन विफलता के कारण सर्वाधिक जोखिम में रहते हैं। अतः कथन 2 सही है।
[3]

 प्रहार मिसाइल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. हाल ही में भारत ने रूस से आयातित और हवा से हवा में मध्यम दूरी तक मार करने वाली  बैलिस्टिक मिसाइल प्रहार का सफलतापूर्वक परीक्षण किया।
  2. इस मिसाइल का परीक्षण राजस्थान स्थित पोखरण टेस्टिंग रेंज से किया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

 उत्तर : (d)
व्याख्या :

  • हाल ही में भारत ने स्वदेशी तकनीक से विकसित जमीन से जमीन तक मार करने वाली कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल ‘प्रहार’ का ओडिशा के तट से सफल परीक्षण किया। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित प्रहार, बहु बैरल रॉकेट सिस्टम ‘पिनाका’ और मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल ‘पृथ्वी’ के बीच के अंतर को भरने में सक्षम है। यह विभिन्न दिशाओं में कई लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • परिष्कृत मिसाइल को चांदीपुर में इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) के लॉन्च पैड -3 से मोबाइल लॉन्चर द्वारा लॉन्च किया गया था। यह एक ठोस-ईंधन वाली कम दूरी की मिसाइल है जो हर मौसम में, हर क्षेत्र में अत्यधिक सटीक और सहयोगी तरकीबी हथियार प्रणाली से युक्त है।अतः कथन 2 सही नहीं है।
[4]

नासा के बलून मिशन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. बलून मिशन द्वारा ली गई तस्वीरों का वैज्ञानिकों द्वारा विश्लेषण किया जा रहा है जो वायुमंडल उत्पन्न होने वाले विक्षोभों के साथ ही महासागरों, झीलों और अन्य ग्रहों के वायुमंडल को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेंगे।
  2. नासा बलून कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य वैज्ञानिक और तकनीकी जाँचों के लिये उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक बलून प्लेटफॉर्म स्थापित करना है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

 उत्तर : (c)
व्याख्या :

  • 8 जुलाई, 2018 को नासा के PMS टर्बो मिशन ने सतह से 50 मील की ऊँचाई पर PMCs का अध्ययन करने के लिए एक विशाल गुब्बारे को लॉन्च किया था। अपनी पाँच दिन की उड़ान के दौरान इस विशाल गुब्बारे पर लगे कैमरे ने उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली 6 मिलियन तस्वीरें लीं जिनमें से अधिकांश तस्वीरें में PMCs में विक्षोभों की प्रक्रियाओं को प्रकट कर रही थीं। बलून मिशन द्वारा ली गई तस्वीरों का वैज्ञानिकों द्वारा विश्लेषण किया जा रहा है जो वायुमंडल उत्पन्न होने वाले विक्षोभों के साथ ही महासागरों, झीलों और अन्य ग्रहों के वायुमंडल को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेंगे और इसके विश्लेषण से प्राप्त परिणाम मौसम पूर्वानुमान में सुधार करने सहायता कर सकता है। अतः कथन 1 सही है।
  • नासा बलून कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य वैज्ञानिक और तकनीकी जाँचों के लिये उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक बलून प्लेटफॉर्म स्थापित करना है। इन जाँचों में मूलभूत वैज्ञानिक खोजें शामिल हैं जो पृथ्वी, सौरमंडल एवं ब्रह्मांड को और अधिक बेहतर तरीके से समझने में योगदान देती हैं। अतः कथन 2 सही है।
[5]

 जीपीएस मॉड्यूल UTraQ से संबंधित निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सही है?

A) चीन द्वारा विकसित यह जीपीएस मोड्यूल चीनी सेना को ख़ुफ़िया जानकारी उपलब्ध कराएगा।
B) अमेरिका द्वारा विकसित यह मोड्यूल पाकिस्तान को भारत पर नज़र रखने के लिये उपलब्ध कराया गया है।
C) इज़रायल द्वारा विकसित यह जीपीएस मोड्यूल भारत को सैन्य उपयोग के लिये प्रदान किया गया है।
D) भारत द्वारा विकसित यह जीपीएस मोड्यूल भारत की क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) और NavIC की मदद से काम करेगा तथा वास्तविक लोकेशन के बारे में बताएगा।

 उत्तर : (d)
व्याख्या :

  • हाल ही में भारत ने अपना पहला स्वदेशी जीपीएस मॉड्यूल UTraQ लॉन्च किया है। यह जीपीएस मोड्यूल भारत की क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) और NavIC की मदद से काम करेगा तथा वास्तविक लोकेशन के बारे में बताएगा। इन मॉड्यूल्स का उपयोग लोकेशन के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अलाव रेंज का पता लगाने, कमांड देने, कंट्रोल करने और समय बताने जैसे अन्य कार्यों के लिये भी किया जा सकता है।

 

बैलिस्टिक मिसाइल ‘प्रहार’

Ballistic Missile

हाल ही में भारत ने भारी वर्षा के बीच ओडिशा के चांदीपुर परीक्षण स्थल स्थित लॉन्चिंग कॉम्पलेक्स-III से ज़मीन से ज़मीन पर मार करने वाली मिसाइल ‘प्रहार’ का सफल परीक्षण किया।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी 350 किमी. से 500 किमी. तक मारक क्षमता वाले प्रहार मिसाइल का सफलता पूर्वक परीक्षण किया जा चुका है।

प्रहार की विशेषताएँ

  • इसकी लंबाई 7.32 मीटर और व्यास 420 मिमी. है।
  • इसका वज़न लगभग 1.28 टन है।
  • 200 किग्रा. तक हथियार ले जाने में सक्षम है।
  • इसमें ठोस प्रणोदक का प्रयोग हुआ है और इसकी गति 2 मैक है।
  • बेहतर सटीकता।
  • लॉन्चर विभिन्न लक्ष्यों के लिए अलग-अलग प्रकार के हथियारों वाले छह मिसाइलों को ले जा सकता है
  • अलग-अलग दिशाओं में एक साथ छः मिसाइल छोड़ने की क्षमता।
नासा का बलून मिशन

NASA

हाल ही में नासा के बलून मिशन ने इलेक्ट्रिक ब्लू क्लाउड की तस्वीरें ली है।

  • बलून मिशन द्वारा ली गई तस्वीरों का वैज्ञानिकों द्वारा विशेलेषण किया जा रहा है जो वायुमंडल उत्पन्न होने वाले विक्षोभों के साथ ही महासागरों, झीलों और अन्य ग्रहों के वायुमंडल को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेंगे और इसके विश्लेषण से प्राप्त परिणाम मौसम पूर्वानुमान में सुधार करने सहायता कर सकता है।
  • 8 जुलाई, 2018 को नासा के PMS टर्बो मिशन ने सतह से 50 मील की ऊँचाई पर PMCs का अध्ययन करने के लिए एक विशाल गुब्बारे को लॉन्च किया था।
  • अपनी पाँच दिन की उड़ान के दौरान इस विशाल गुब्बारे पर लगे कैमरे ने उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली 6 मिलियन तस्वीरें लीं जिनमें से अधिकांश तस्वीरें में PMCs में विक्षोभों की प्रक्रियाओं को प्रकट कर रही थीं।
  • वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिये दशकों से गुब्बारों का उपयोग किया जाता है। उन्हें दुनिया के किसी भी स्थान से लॉन्च किया जा सकता है और यह वैज्ञानिक अवलोकनों के लिये एक कम लागत वाली विधि है।
  • नासा बलून कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य वैज्ञानिक और तकनीकी जाँचों के लिये उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक बलून प्लेटफॉर्म स्थापित करना है।
  • इन जाँचों में मूलभूत वैज्ञानिक खोजें शामिल हैं जो पृथ्वी, सौरमंडल एवं ब्रह्मांड को और अधिक बेहतर तरीके से समझने में योगदान देती हैं।
भारत का पहला स्वदेशी जीपीएस मॉड्यूल UTraQ

GPS

हाल ही में भारत ने अपना नया जीपीएस मॉड्यूल UTraQ लॉन्च किया है।

  • यह जीपीएस भारत की क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) और NavIC की मदद से काम करेगा तथा वास्तविक लोकेशन के बारे में बताएगा।
  • इन मॉड्यूल्स का उपयोग लोकेशन के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अलाव रेंज का पता लगाने, कमांड देने, कंट्रोल करने और समय बताने जैसे अन्य कार्यों के लिए भी किया जा सकता है।
कमलेश नीलकंठ व्‍यास

Kamlesh Nilkanth

हाल ही में मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के निदेशक कमलेश नीलकंठ व्‍यास की परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव तथा परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्‍यक्ष पद पर नियुक्ति को मंज़ूरी दी।

  • कमलेश व्‍यास 64 वर्ष की आयु (03.05.2021) तक या अगले आदेश तक, इनमें से जो भी पहले हो, इस पद पर बने रह सकते हैं।
  • नव नियुक्त अध्यक्ष कमलेश नीलकंठ व्यास ने ऑस्ट्रिया के वियना में शेखर बसु से पदभार का ग्रहण किया।

परमाणु उर्जा विभाग

  • परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) की स्थापना 3 अगस्त, 1954 को की गई थी।
  • परमाणु ऊर्जा विभाग में भारत सरकार का सचिव, परमाणु ऊर्जा आयोग (Atomic Energy Commission-AEC) का पदेन (ex-officio) अध्यक्ष होता है।
  • DAE नाभिकीय विद्युत/अनुसंधान रिएक्टरों के अभिकल्पन, निर्माण एवं प्रचालन तथा सहायक नाभिकीय ईंधन चक्र प्रौद्योगिकियों जिनमें नाभिकीय खनिजों का अन्वेषण, खनन एवं प्रसंस्करण, भारी पानी का उत्पादन, नाभिकीय ईंधन संविरचन, ईंधन पुनर्संस्करण तथा नाभिकीय अपशिष्ट प्रबंधन शामिल हैं, के कार्य में लगा हुआ है।
  • परमाणु ऊर्जा विभाग की स्वतंत्र इकाई के रूप में BRIT स्वास्थ्य देखभाल, उद्योग, कृषि एवं अनुसंधान क्षेत्रों के लिये विकिरण एवं आइसोटोप पर आधारित विभिन्न उत्पाद एवं सेवाएँ उपलब्ध कराता है।

 

चक्रवाती तूफान ‘डे’ (DAYE)

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-1 : भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज।
(खंड- 12 : भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान- अति महत्त्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं (जल-स्रोत और हिमावरण सहित) और वनस्पति एवं प्राणिजगत में परिवर्तन तथा इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रभाव)

flood-risk

चर्चा में क्यों?

हाल ही में बंगाल की खाड़ी से उत्पन्न चक्रवाती तूफान ओडिशा के तट पर पहुँचा। उल्लेखनीय है कि ‘डे’ (DAYE) नामक यह चक्रवाती तूफ़ान इस साल बंगाल की खाड़ी में उठने होने वाला पहला तूफान है जिसका नामकरण किया गया है और इसका यह नाम म्यांमार ने रखा है।

चक्रवात 

  • चक्रवात कम वायुमंडलीय दाब के चारों ओर गर्म हवाओं की तेज़ आँधी को कहा जाता है। दोनों गोलार्द्धों के चक्रवाती तूफानों में अंतर यह है कि उत्तरी गोलार्द्ध में ये चक्रवात घड़ी की सुइयों की विपरीत दिशा में (Counter-Clockwise) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों की दिशा (Clockwise)  में चलते  हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इस इसे हरिकेन, टाइफून आदि नामों से जाना जाता है।

भारत में आते हैं उष्णकटिबंधीय चक्रवात 

  • भारत में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से ही अधिकांश तूफानों की उत्पत्ति होती है, जिन्हें उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहा जाता है।
  • भारतीय उपमहाद्वीप के आस-पास उठने वाले तूफान घड़ी चलने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
  • उष्णकटिबंधीय चक्रवात एक तूफान है जो विशाल निम्न दबाव केंद्र और भारी तड़ित-झंझावतों के साथ आता है और तीव्र हवाओं व घनघोर वर्षा की स्थिति उत्पन्न करता है।
  • उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति तब होती है जब नम हवा के ऊपर उठने से गर्मी पैदा होती है, जिसके फलस्वरूप नम हवा में निहित जलवाष्प का संघनन होता है।
  • ऐसे चक्रवात मुख्यतः 30° उत्तरी एवं 30° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य आते हैं क्योंकि इनकी उत्पत्ति हेतु उपरोक्त दशाएँ यहाँ मौजूद होती हैं।
  • भूमध्य रेखा पर निम्न दाब के बावजूद नगण्य कोरिओलिस बल के कारण पवनें वृत्ताकार रूप में नहीं चलतीं, जिससे चक्रवात नहीं बनते।
  • दोनों गोलार्द्धों में 30° अक्षांश के बाद ये पछुआ पवन के प्रभाव में स्थल पर पहुँचकर समाप्त हो जाती हैं।
  • वृहद् समुद्री सतह जहाँ तापमान 27°C से अधिक हो, कोरिओलिस बल का होना, उर्ध्वाधर वायु कर्तन (Vertical Wind Shear) का क्षीण होना, समुद्री तल तंत्र का ऊपरी अपसरण आदि इनकी उत्पत्ति एवं विकास के लिये अनुकूल स्थितियाँ हैं।

चक्रवातों का नामकरण

  • हिंद महासागर क्षेत्र के आठ देश (बांग्लादेश, भारत, मालदीव, म्याँमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा थाइलैंड) एक साथ मिलकर आने वाले चक्रवातों के नाम तय करते हैं।
  • जैसे ही चक्रवात इन आठों देशों के किसी भी हिस्से में पहुँचता है, सूची से अगला या दूसरा सुलभ नाम इस चक्रवात का रख दिया जाता है।
  • इस प्रक्रिया के चलते तूफ़ान को आसानी से पहचाना जा सकता है और बचाव अभियानों में भी मदद मिलती है। किसी नाम का दोहराव नहीं किया जाता है।
  • नामकरण करने वाला शासी निकाय क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्र (Regional Specialised Meteorological Centre- RSMC), नई दिल्ली में स्थित है।
  • प्रत्येक देश उन दस नामों की एक सूची तैयार करता है जो उन्हें चक्रवात के नामकरण के लिये उपयुक्त लगते हैं। शासी निकाय अर्थात् RSMC प्रत्येक देश द्वारा सुझाए गए नामों में आठ नामों को चुनता है और उसके अनुसार आठ सूचियाँ तैयार करता है जिनमें शासी निकाय द्वारा अनुमोदित नाम शामिल होते हैं।
  • वर्ष 2004 से चक्रवातों को RSMC द्वारा अनुमोदित सूची के अनुसार नामित किया जाता है।

चक्रवातों के नामकरण का इतिहास

  • 1900 के मध्य में समुद्री चक्रवाती तूफान का नामकरण करने की शुरुआत हुई ताकि इससे होने वाले खतरे के बारे में लोगों को समय रहते सतर्क किया जा सके, संदेश आसानी से लोगों तक पहुँचाया जा सके तथा सरकार और लोग इसे लेकर बेहतर प्रबंधन और तैयारियाँ कर सकें, लेकिन तब नामकरण की प्रक्रिया व्यवस्थित नही थी।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, नामकरण की विधिवत प्रक्रिया बन जाने के बाद से यह ध्यान रखा जाता है कि चक्रवाती तूफानों का नाम आसान और याद रखने लायक होना चाहिये इससे स्थानीय लोगों को सतर्क करने, जागरूकता फैलाने में मदद मिलती है।
  • 1950 के मध्य में नामकरण के क्रम को और भी क्रमवार ढंग से सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विशेषज्ञों ने इसकी बेहतर पहचान के लिये इनके नामों को पहले से क्रमबद्ध तरीके से रखने हेतु अंग्रेज़ी वर्णमाला के शब्दों के प्रयोग पर ज़ोर दिया।
  • 1953 से मायामी नेशनल हरीकेन सेंटर और वर्ल्ड मेटीरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन (WMO) तूफानों और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के नाम रखता आ रहा है। WMO जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ की एक संस्था है।
  • पहले उत्तरी हिंद महासागर में उठने वाले चक्रवातों का कोई नाम नहीं रखा जाता था क्योंकि ऐसा करना विवादास्पद काम था। इसके पीछे कारण यह था कि जातीय विविधता वाले इस क्षेत्र में सावधान और निष्पक्ष रहने की जरूरत थी ताकि यह लोगों की भावनाओं को ठेस न पहुँचाए।