UPSC DAILY CURRENT IN HINDI 03-10-2018

INTERNATIONAL

1.भारत-रूस बैठक : अगले दशक का एजेंडा तय करेगी मोदी-पुतिन की बातचीत
• इस साल जून में सोची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की अनौपचारिक बैठक, फिर चीन में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में द्विपक्षीय चर्चा और अब इन दोनों की अगुआई में सालाना बैठक।
• इस बीच, पिछले तीन हफ्तों के दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ दो द्विपक्षीय मुलाकातें हो चुकी हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग समझौते को आयाम देने वाले आयोग की बैठक भी सितंबर में हुई है। इन सभी बैठकों की तैयारियों के बाद मोदी और पुतिन शिखर बैठक में अगले एक दशक का रक्षा से लेकर विज्ञान तक और कृषि से लेकर ऊर्जा क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग का एजेंडा तैयार करने की कोशिश करेंगे।
• दोनों देशों की तरफ से इस बात के संकेत दिए जा रहे हैं कि रक्षा सहयोग इस बार एजेंडे में काफी महत्वपूर्ण होगा। माना जा रहा है कि मोदी और पुतिन के बीच रूस से एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 खरीदने को लेकर अंतिम समझौता हो जाएगा। भारत पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि यह मिसाइल प्रणाली उसकी सुरक्षा के लिए काफी महत्वपूर्ण है और उसे हासिल करने का उसका इरादा पक्का है।
• रूस पर अमेरिका की तरफ से लगे प्रतिबंधों के बावजूद भारत इस सौदे को लेकर अडिग है। पिछले महीने अमेरिका के साथ ‘टू प्लस टू’ वार्ता में भारत ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट कर दिया था कि यह प्रणाली खरीदने में वह ज्यादा देरी नहीं कर सकता। लेकिन इसके अलावा भी रूस से दो श्रेणी के हेलीकॉप्टरों को खरीदने की बात अंतिम चरण में है। इसमें कामोव 226टी हेलीकॉप्टर और एमआइ-17वी-5 हेलीकॉप्टर है। भारतीय सेना दोनों का अध्ययन काफी पहले कर चुकी है और इसे अपनी जरूरत के मुताबिक मुफीद बता चुकी है।
• अगर सारे समझौते हो जाते हैं तो भारतीय रक्षा क्षेत्र में रूस की धमक और बढ़ जाएगी। भारत अभी भी अपनी कुल रक्षा जरूरत का 60 फीसद रूस से लेता है, जबकि दूसरी तरफ अमेरिका व भारत के बीच सैन्य संबंधी तेजी से बढ़ रहे हैं।1सूत्रों के मुताबिक पिछली पांच शीर्ष सालाना बैठकों में आतंकवाद एक अहम मुद्दा रहा है।
• मोदी की तरफ से रूस की तरफ से पाकिस्तान को दिए जाने वाले सैन्य सहयोग का मुद्दा उठाया जाएगा। जून, 2017 में भी मोदी ने यह मुद्दा उठाया था जिस पर पुतिन ने भारत को बेहद गंभीर आश्वासन दिया था कि पाकिस्तान के साथ उनका सैन्य सहयोग बेहद शुरुआती है, जिसको लेकर कोई चिंता नहीं की जानी चाहिए। यह बात सही है, लेकिन यह भी तथ्य है कि हाल ही में रूस व पाकिस्तान के बीच कुछ दूसरे सैन्य समझौते भी हुए हैं।
• रूस वैसे पाकिस्तान में छिपे आतंकी हाफिज सईद और मौलाना मसूद अजहर के मुद्दे पर भारत का पूरा समर्थन करता है। माना जा रहा है कि मोदी व पुतिन के बीच मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध लगाने को लेकर चर्चा होगी। भारत नए सिरे से इस बारे में संयुक्त राष्ट्र के स्थायी सदस्य देशों की मदद मांग रहा है।
• सूत्रों के मुताबिक भारत और रूस के बीच परमाणु ऊर्जा सहयोग को दूसरे लेवल पर ले जाने का रोडमैप बन चुका है, जिसे मोदी व पुतिन की बैठक में अंतिम रूप दिया जाएगा। कुडनकुलम में रूस के सहयोग से परमाणु ऊर्जा की छह यूनिट लगाने के बाद अब दोनों देशों के बीच एक नई जगह पर प्लांट लगाने की सहमति बनी है। इस नए प्लांट की खासियत यह होगी कि इसमें तकनीक तो रूस की होगी लेकिन इसमें इस्तेमाल होने वाले तमाम उपकरण व कल-पुर्जे भारत में निर्मित होंगे। ताकि घरेलू परमाणु ऊर्जा उद्योग को प्रोत्साहन मिल सके।
• इसके अलावा ऊर्जा क्षेत्र में भारतीय कंपनियों की तरफ से रूस में तेल ब्लाक खरीदने का मसौदा भी है जिस पर बातचीत होगी। भारत और रूस के एजेंडे में कुछ अन्य अहम विषय हैं, जो द्विपक्षीय साङोदारी को नया आयाम देंगे।

2. अमेरिकी उत्पादों पर अधिक शुल्क को लेकर बिफरे ट्रंप : भारत को बताया शुल्कों का राजा
• अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी उत्पादों पर कथित रूप से अधिक शुल्क लगाने को लेकर भारत की आलोचना की है। ट्रम्प ने भारत को ‘‘शुल्कों का राजा’ करार देते हुए सोमवार को कहा, भारत मुझे खुश करने के लिए अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौता करना चाहता है।
• हाल के दिनों में यह दूसरी बार है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर कथित रूप से अधिक आयात शुल्क रखने का आरोप लगाया है। ट्रम्प ने मैक्सिको और कनाडा के साथ नए व्यापारिक समझौते की घोषणा के लिए व्हाइट हाउस में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान भारत पर यह आरोप लगाया। ट्रम्प ने मैक्सिको और कनाडा के साथ नए व्यापारिक समझौते की घोषणा के बाद उन व्यापारिक समझौतों के बारे में बताया जिन पर बातचीत चल रही है।
• उल्लेखनीय है कि अमेरिका की जापान, यूरोपीय संघ, चीन और भारत के साथ व्यापारिक समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। ट्रम्प ने अमेरिकी बाइक हार्ले डेविडसन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने इस बाइक पर 100 प्रतिशत की दर से आयात शुल्क लगाए जाने को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी बात की। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि मोदी ने इस बाइक पर आयात शुल्क की दर कम करने का आश्वासन भी दिया।
• ट्रम्प ने कहा कि भारत ने अमेरिकी मोटरसाइकिलों पर आयात शुल्क की दर कम की है, लेकिन वो पर्याप्त नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय उत्पादों पर भी इसी तरह का आयात शुल्क लगाने की चेतावनी दी है। ट्रम्प ने कहा, भारत के साथ मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं। प्रधानमंत्री मोदी के साथ शानदार रिश्ते हैं। वो इसको लेकर काम करेंगे।
• दरअसल, व्यापार समझौते को लेकर अमेरिका और भारत के बीच चल रही यह वार्ता अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटाइजर आगे बढ़ा रहे हैं। ट्रम्प प्रशासन भारत और अमेरिका के बीच व्यापार के अंतर को कम करने के लिए भारत पर लगातार दबाव बनाता रहा है कि वो अमेरिका से अधिक सामान आयात करे।
• इससे पहले अमेरिका मैक्सिको और कनाडा के बीच नए उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते (नाफ्टा) को लेकर आखिरकार सहमति बन गयी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कनाडा और मेक्सिको के साथ हुए नए व्यापारिक समझौते को अमेरिकी फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए ‘‘नई सुबह’ बताया है। ट्रम्प ने कहा कि इस समझौते के जरिए अमेरिका में नौकरियां वापस आयेंगी।

3. भविष्य का ओपेक होगा सौर गठबंधन: मोदी
• सौर ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग स्थापित करने के लिए 121 देशों के संगठन अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस (आइसा) की पहली बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके भविष्य का एजेंडा तय कर दिया है।
• संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस की उपस्थिति में मोदी कहा कि, ‘आइसा भविष्य में ओपेक (तेल उत्पादक देशों का बेहद प्रभावशाली संगठन) होगा। अभी जो हाल तेल कुंओं का है वही सूरज की किरणों का होगा।’ इसके साथ ही उन्होंने सभी देशों से आह्वान किया है कि अभी से हमें सौर ऊर्जा को एक ही ग्रिड से जोड़ने पर काम शुरू कर देना चाहिए। इसके लिए उन्होंने ‘एक विश्व, एक सूरज और एक सोलर ग्रिड’ का नारा दिया।
• मोदी ने आइसा की पहली बैठक में शामिल होने के लिए आए 41 देशों के प्रतिनिधियों का स्वागत किया और साथ ही अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में स्थापित इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन (आइओआरए) की दूसरी बैठक का भी उद्घाटन किया।
• आइओआरए की यह दूसरी बैठक है।
• नई दिल्ली में अगले तीन दिनों तक अक्षय ऊर्जा व स्वच्छ ऊर्जा के दूसरे विकल्पों पर अंतरराष्ट्रीय विमर्श व प्रदर्शनी का आयोजन होने जा रहा है। दुनिया के विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के अलावा इसमें 10 हजार से ज्यादा विशेषज्ञ भी हिस्सा लेंगे। आइसा संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में गठित पहला ऐसा संगठन है जिसका मुख्यालय भारत में खोला गया है।
• पीएम मोदी ने कहा कि वर्ष 2030 तक भारत अपनी कुल ऊर्जा क्षमता का 40 फीसद अक्षय ऊर्जा स्नोतों से बनाएगा। इस दिशा में तेजी से काम हो रहा है। देश की कुल बिजली क्षमता में अक्षय का हिस्सा अभी 20 फीसद है। वर्ष 2022 तक अक्षय क्षेत्र से 1,75,000 मेगावाट बिजली बनाने का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा।
• पिछले चार वर्षो में भारत ने अक्षय क्षेत्र से ऊर्जा उत्पादन को दोगुना करते हुए 72 हजार मेगावाट कर दिया है। इसमें भी सोलर की क्षमता में नौ गुना बढ़ोतरी हुई है। 15000 मेगावाट बहुत जल्द इसमें और जुटने वाली है। सरकार की घर-घर बिजली पहुंचाने की योजना में भी सोलर की भूमिका काफी अहम होगी।
• सरकार भारत में सोलर ऊर्जा उद्योग से जुड़ी उद्योगों को विकसित करने की नीति को लगातार बढ़ावा दे रही है। इसका असर भी दिख रहा है क्योंकि पिछले चार वर्षो में यहां 42 अरब डॉलर का विदेशी निवेश हुआ है।
• अगले चार वर्षो में भारत के सोलर ऊर्जा उद्योग मे 80 अरब डॉलर तक का कारोबार होगा।

NATIONAL

4. जस्टिस रंजन गोगोई के हाथ न्यायपालिका की कमान
• गंभीर, अनुशासनप्रिय, मितभाषी जस्टिस रंजन गोगोई न्यायपालिका के नए मुखिया होंगे। वह बुधवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद संभालेंगे। व्यवस्थित रहना और सारी चीजें करीने से रखना पसंद करने वाले जस्टिस गोगोई से देश और न्यायपालिका2009को काफी उम्मीदें हैं। अदालतों में लगा करोड़ों मुकदमों का ढेर और न्यायाधीशों के खाली पड़े पद जस्टिस गोगोई के लिए एक होंगे। हालांकि उन्होंने पद संभालने से पहले ही एक बयान में इस ओर चिंता जताते हुए मुकदमों का बोझ खत्म करने के लिए कारगर योजना लागू किये जाने का संकेत दिया है जो कि न्यायपालिका के उज्ज्वल और सकारात्मक भविष्य की ओर इशारा करता है।
• जस्टिस गोगोई बुधवार को जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ के साथ मुख्य न्यायाधीश की अदालत में मुकदमों की सुनवाई करने बैठेंगे। पहले दिन भले ही उनकी अदालत में सुनवाई के लिए कम मुकदमे लगे हों लेकिन देश भर की अदालतों में लंबित 2.77 करोड़ मुकदमे नए मुखिया की नई योजना का इंतजार उनके शपथ लेते ही शुरू कर देंगे।
• इन मुकदमों में 13.97 लाख मुकदमे वरिष्ठ नागरिकों के हैं और 28.48 लाख मुकदमे महिलाओं ने दाखिल कर रखे हैं। इतना ही नहीं उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में लंबित 54000 मुकदमे भी अपने मुखिया की नई कार्यप्रणाली और शीघ्र मुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।
• जस्टिस गोगोई के कुछ फैसलों पर निगाह डालें तो उन्होंने उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास देने का नियम रद कर दिया था और सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला खाली करने का आदेश दिया था। सरकारी विज्ञापनों में ज्यादा से ज्यादा मंत्रियों और नेताओं की फोटो छपने का चलन भी जस्टिस गोगोई के फैसले से खत्म हुआ।
• उन्होंने सरकारी विज्ञापनों में सिर्फ प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के फोटो छापने की इजाजत दी है। हालांकि बाद में राज्यपाल और संबंधित मंत्री की फोटो को भी इजाजत दे दी गई लेकिन थोक में नेताओं की फोटो छपना बंद हो गया।
• जस्टिस गोगोई की चर्चा हो और सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व न्यायाधीश मार्कन्डेय काटजू का प्रकरण न याद किया जाए तो फिर बात अधूरी रह जाती है। सौम्या हत्याकांड में जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ के फैसले पर जस्टिस काटजू ने आलोचनात्मक टिप्पणियां की थीं जिस पर जस्टिस गोगोई ने जस्टिस काटजू को नोटिस जारी कर सुप्रीम कोर्ट में तलब कर लिया था। हाईकोर्ट के जज जस्टिस कर्नन को न्यायालय की अवमानना में जेल भेजने वाली पीठ में जस्टिस गोगोई भी शामिल थे।
• मूलत: असम के रहने वाले जस्टिस गोगोई की पीठ ही असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर केस की सुनवाई भी कर रही है।

ECONOMY

5. करेंसी नोट पर 1969 में पहली बार छपी थी गांधी की तस्वीर
• गांधी की तस्वीर देश के करेंसी नोट पर पहली बार उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित की गई। यह मौका आज से करीब 50 साल पहले आया जब 100 रपए के नोट में राष्ट्रपिता की तस्वीर प्रकाशित की गई।
• हालांकि वर्ष 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद से ही यह महसूस किया गया कि करेंसी नोटों में ब्रिटिश सम्राट के चित्र की जगह महात्मा गांधी की तस्वीर होनी चाहिए, लेकिन सरकार को इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने में काफी समय लग गया। इस बीच, करेंसी नोट में ब्रिटेन सम्राट का स्थान सारनाथ के अशोक चिन्ह ने ले लिया।
• रिजर्व बैंक ने पहली बार वर्ष 1969 में 100 रपए का एक स्मारक नोट जारी किया जिसमें सेवाग्राम आश्रम में बैठे महात्मा गांधी को दिखाया गया था। लेकिन करेंसी नोट में राष्ट्रपिता की तस्वीर को नियमित रूप से प्रकाशित करने का काम 1987 में ही शुरू हो पाया। इस साल 500 रपए के नोट की नई श्रंखला में मुस्कराते हुए महात्मा गांधी का चित्र छापा गया। तब से महात्मा गांधी का चित्र नियमित रूप से विभिन्न मूल्य वर्ग के नोटों में छापा जाने लगा।
• गांधी का चित्र छापने से पहले मुद्रा नोटों में कई डिज़ाइन और छवियों का उपयोग किया गया। वर्ष 1949 में तत्कालीन सरकार ने अशोक स्तंभ के साथ एक रपए का नया नोट जारी किया। वर्ष 1953 में जारी नए नोटों में हिंदी को प्रमुखता के साथ स्थान दिया गया। ¨हदी में रुपया के बहुवचन को लेकर जो बहस उस समय चल रही थी वह अंत में रूपये रपए शब्द पर जाकर समाप्त हुई।
• उच्च मूल्य वर्ग के नोटों (1,000 रपए, 5,000 रपए, 10,000 रपए) को 1954 में जारी किया गया था।

AWARD

6. लेजर तकनीक में बदलाव लाने वाले तीन वैज्ञानिकों को भौतिकी का नोबेल
• लेजर तकनीक में महत्वपूर्ण खोज करने वाले तीन वैज्ञानिकों अमेरिका के आर्थर अश्किन, फ्रांस के जेरार्ड मोउरो और कनाडा की डोना स्टिकलैंड को इस साल के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। इनकी खोज से प्रकाश की किरणों आंखों की सर्जरी से लेकर माइक्रो-मशीनों तक एक उपकरण की तरह इस्तेमाल होने लगीं।
• अमेरिका की बेल लैब से जुड़े अश्किन को आधी पुरस्कार राशि मिलेगी, जबकि बाकी आधी राशि मोउरो और स्टिकलैंड साझा करेंगे। इस पुरस्कार के तहत दस लाख डॉलर (करीब 7.28 करोड़ रुपये) नकद और प्रतीक चिह्न् दिए जाते हैं। कनाडा की वाटरलू यूनिवर्सिटी से जुड़ीं स्टिकलैंड भौतिकी का नोबेल जीतने वाली 55 सालों में पहली महिला हैं।
• रॉयल स्वीडिश अकादमी ऑफ साइंसेज ने मंगलवार को पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहा, ‘इस साल उन खोजों को सम्मानित किया जा रहा है, जिससे लेजर फिजिक्स में क्रांतिकारी बदलाव आया। इससे उन्नत उपकरणों के विकास से अनुसंधान, औद्योगिक और चिकित्सा के ऐसे कई क्षेत्र खुल रहे हैं जो अभी तक अनदेखे थे।
• ’ नोबेल पुरस्कार पाने की जानकारी मिलने पर 59 वर्षीय स्टिकलैंड ने कहा, ‘यकीनन हम महिला भौतिक वैज्ञानिकों को जश्न मनाने की जरूरत है। हमें उम्मीद है कि यह नई शुरुआत है।’
• अश्किन सबसे उम्रदराज नोबेल विजेता : आर्थर अश्किन (96) सबसे उम्रदराज नोबेल विजेता बन गए हैं। इससे पहले अमेरिका के लियोनिद हरविक्ज ने 90 साल की उम्र में अर्थशास्त्र का नोबेल जीता था।

 

 

ताकि वे अपनी पसंद से खरीदें अनाज

(कार्तिक मुरलीधरन, प्रोफेसर, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय)
(साभार हिंदुस्तान )

सस्ते दामों पर राशन का सार्वजनिक वितरण (पीडीएस) भारत की प्रमुख खाद्य सुरक्षा योजना है, लेकिन यह कई जानी-पहचानी समस्याओं से घिरी है। सरकारी एजेंसियों का ही आकलन है कि पीडीएस पर सरकारी खर्च का एक बड़ा हिस्सा उचित लाभार्थियों तक नहीं पहुंचता। इसके चलते, एक विकल्प सामने आया कि क्यों न इस सब्सिडी युक्त अनाज की जगह लाभार्थियों को (खाद्य पदार्थों पर खर्च करने के लिए) सीधा पैसे भेजे जाएं? इस प्रक्रिया का नाम ‘सीधा लाभ हस्तांतरण’ यानी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) है। खुद प्रधानमंत्री का सुझाव है कि पीडीएस के बदले हमें डीबीटी पर आगे बढ़ना चाहिए।

डीबीटी के कुछ फायदे बिल्कुल साफ हैं। हर महीने बैंक खातों में पैसे भेजने से प्रशासनिक लागत में कमी आएगी और इसकी समस्याएं थम सकेंगी। साथ ही लाभार्थियों को अपनी पसंद का अनाज खरीदने का विकल्प भी मिल सकेगा। हालांकि डीबीटी में कुछ जोखिम भी हैं। मसलन, डीबीटी को सोच-समझकर लागू न करने से लाभार्थियों की दशा और खराब हो सकती है। खासकर, बैंक खाते में डाली गई रकम यदि खाद्यान्न की खुदरा कीमत और महंगाई के अनुरूप न हुई, तो वे पैसे अपर्याप्त साबित हो सकते हैं। एक मुश्किल यह भी है कि बैंक, एटीएम और बाजार की पहुंच हर जगह एक जैसी नहीं है। फिर, नकद पैसे का उपयोग लाभार्थी उन गैर-खाद्य वस्तुओं के लिए भी कर सकता है, जो उसकी वरीयता में होगी। जाहिर है, यह कोशिश खाद्य सुरक्षा और पोषण के लक्ष्य को प्रभावित कर सकती है।

इन तमाम मसलों को हमने उन तीन केंद्र शासित क्षेत्रों (चंडीगढ़, पुडुचेरी और दादर-नागर हवेली) में परखने की कोशिश की, जहां पिछले कुछ वर्षों में बतौर पायलट प्रोजेक्ट इसको शुरू किया गया है। हमने 6,000 से अधिक परिवारों पर तीन दौर के सर्वेक्षण किए। इसका जो पहला नतीजा निकला, वह यह है कि डीबीटी का क्रियान्वयन बदलते समय के साथ बेशक सुधरा है, लेकिन लागू होने के 18 महीने बाद भी चुनौती बनी हुई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 99 प्रतिशत से अधिक लाभार्थियों को सफलतापूर्वक पैसे ट्रांसफर किए गए, मगर सर्वे के दौरान 20 प्रतिशत परिवारों ने तय समय पर डीबीटी मिलने से इनकार किया। इसकी वजह यह थी कि पैसे उन बैंक खातों में नहीं आ रहे थे, जो वे लगातार इस्तेमाल कर रहे थे। पासबुक भी अपडेट नहीं हो रही थी। इसी कारण, डीबीटी में ‘लीकेज’ के भले ही कोई सुबूत हमें नहीं मिले, मगर कुछ हद तक लोगों को इसका लाभ लेने में मुश्किलें आ रही थीं।

दूसरा नतीजा यह है कि लाभार्थियों के लिए इसकी लागत अलग-अलग थी। जो एटीएम का इस्तेमाल कर रहे थे, उनका पीडीएस के मुकाबले नकद पाने और बाजार जाकर अनाज खरीदने में समय और धन कम खर्च हो रहा था, जबकि जो लाभार्थी पैसे निकालने के लिए बैंक में जाते थे, उन्हें ज्यादा समय और पैसे खर्च करने पड़ रहे थे। हालांकि लाभार्थियों ने पीडीएस की समान मात्रा में अनाज खरीदने के लिए डीबीटी राशि से अधिक पैसे खर्च किए; मगर उन्होंने बेहतर गुणवत्ता वाला अनाज खरीदा।
आखिरी निष्कर्ष यह है कि वक्त बीतने के साथ-साथ लाभार्थियों ने पीडीएस के मुकाबले डीबीटी को पसंद करना शुरू किया। पहले दौर का सर्वे इस योजना के शुरू होने के छह महीने में किया गया था। इसमें दो-तिहाई लाभार्थियों ने डीबीटी की जगह पीडीएस को पसंद किया। मगर तीसरे दौर के सर्वे में (18 महीने बाद) यह आंकड़ा उलट गया और दो-तिहाई डीबीटी को पसंद करने लगे। इसका मुख्य कारण था, पसंद का विकल्प मिलना, लचीलापन, और बेहतर गुणवत्ता के अनाज। हालांकि, पीडीएस को पसंद करने वालों ने यह भी बताया कि उन्हें कम कीमत में अधिक अनाज मिल रहा है।

ये नतीजे बताते हैं कि पीडीएस में डीबीटी इतना जटिल नीतिगत सवाल क्यों है? समय के साथ, जैसे-जैसे डीबीटी का संचालन बेहतर होने लगा, वैसे-वैसे लाभार्थी इसकी तरफ आकर्षित हो रहे थे। मगर शुरुआती तौर पर लोगों ने इसका विरोध किया था, इसीलिए जबरन सरकारी आदेश से इसे लागू करना अनैतिक और राजनीतिक रूप से नुकसानदेह होगा। इसके अलावा, दोनों विकल्पों का अनुभव होने के बाद भी लाभार्थियों में काफी अंतर है, जो डीबीटी के तमाम साझेदारों के बीच असहमतियां बना सकता हैं। ऐसे में, सवाल यह है कि हमें कैसे आगे बढ़ना चाहिए?

हमारी एक साधारण, मगर असरदार सलाह है। हमारे नीति-निर्माता पीडीएस और डीबीटी में से खुद किसी एक को न चुनें, बल्कि यह अधिकार लाभार्थियों को दे दें। यह संभव भी है, क्योंकि अब पीडीएस में ई-पीओएस यानी स्वाइप मशीनें लगाई जा रही हैं। लाभार्थियों की पसंद को इन मशीनों में दर्ज किया जा सकता है और डीबीटी या अनाज का वितरण उसी पसंद के अनुसार हर महीने हो सकता है। पैसे घर की महिला सदस्य के खाते में जमा किए जा सकते हैं, ताकि इसके उपयोग में उसकी पर्याप्त भागीदारी रहे।

पसंद-आधारित यह विकल्प इस सच को जाहिर करता है कि विभिन्न इलाकों में रहने वाले लोगों की जरूरतें अलग-अलग होती हैं, और वे अपने विकल्प का विस्तार करके लाभ का दायरा बढ़ा सकते हैं। यह उन सियासी और नैतिक चुनौतियों को भी कम कर सकता है, जो इस सुधार की राह मेंं कायम हैं। और फिर, डीबीटी की उपलब्धता मौजूदा पीडीएस को सुधारने में भी मदद कर सकती है, क्योंकि लाभार्थियों का भरोसा बनाए रखने के लिए पीडीएस को लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। इसके अलावा, अन्य अनाजों या उत्पादों को स्टॉक करने की अनुमति देकर पीडीएस डीलर की आर्थिक सेहत भी सुधारी जा सकती है, ताकि उनके लिए कमाई का एकमात्र जरिया पीडीएस न रहे।

बहरहाल, अनाज के उपभोग और पोषण पर इस पसंद-आधारित नई व्यवस्था के प्रभाव को मापने के लिए इसके लाभार्थियों का सावधानी से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। फिलहाल हम यह काम महाराष्ट्र सरकार के साथ मिलकर मुंबई में पायलट परियोजना के तौर पर कर रहे हैं। इसे दूसरे राज्यों में भी शुरू किया जा सकता है। हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि हम अधिक विकल्पों के साथ वंचित तबकों को सशक्त बनाएं और समाज के सबसे कमजोर सदस्यों की भी रक्षा करें। पसंद-आधारित यह विकल्प ऐसा करने में सक्षम है। (साथ में पॉल नीहौस और संदीप सुखटणकर)

 

विकास का बदला पहलू

(राजीव सिंह)
(आभार सहित राष्ट्रीय सहारा )

असली भारत गांवों में ही बसता है जिसमें देश की करीब 70 फीसद आबादी रहती है। पिछले कुछ वर्षो से देश में शहरीकरण बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। रोजी-रोटी के बेहतर अवसरों की वजह से ग्रामीण शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। लेकिन इस रुख में अब बदलाव आ रहा है। सरकार की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी उज्ज्वला, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत और सौभाग्य जैसी योजनाएं ग्रामीणों के लिए उत्प्रेरक का काम कर रही हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय में अच्छा इजाफा हो रहा है। बुनियादी सुविधाएं बढ़ने से विकास की धारा शहरों से होते हुए अब गांवों की ओर रुख कर रही है। शहरीकरण की चमक बढ़ने के बावजूद वर्ष तक 2050 देश की ग्रामीण क्षेत्र की आबादी 50 फीसद के स्तर पर बनी रहेगी।

दरअसल, भारत उन चुनिंदा देशों में शुमार है जहां ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में भारी अंतर है। शहरी क्षेत्र देश के प्रगतिशील और विकासशील समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इस क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में 55 फीसद का योगदान है जबकि ग्रामीण क्षेत्र पिछड़े और आदिवासी समाज को दर्शाता है जो गरीबी में जीवनयापन कर रही है। देश की यह दोहरी अर्थव्यवस्था समग्र विकास और इसके पांच खरब डालर के बनने की राह बड़ी बाधा साबित हो रही है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र के विकास में तेजी लाकर गांव और शहर के बीच की खाई को जल्द से जल्द पाटने की जरूरत है। इसके बिना भारत के विकसित देश बनने का सपना पूरा नहीं हो पाएगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि ग्रामीण क्षेत्र का भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि रोजी-रोटी का सबसे बड़ा जरिया है। वर्ष 2011 की कृषि जनगणना के अनुसार 61 फीसद से ज्यादा की ग्रामीण आबादी खेतीबाड़ी पर निर्भर है जो कारखाना क्षेत्र में कार्यरत 4.1 फीसद आबादी की तुलना में कई गुना ज्यादा है। अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान घटकर 14 फीसद पर आ गया जो वर्ष 1951 में 51 फीसद था। इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल कृषि क्षेत्र रोजगार तो बड़ी आबादी को दे रहा है लेकिन इसकी उत्पादकता काफी कम है। राष्ट्रीय आय में ग्रामीणों का योगदान बढ़ाने के लिए नई प्रौद्योगिकी के जरिए कृषि से जुड़ी सुविधाएं बढ़ाने की सख्त जरूरत है। इसके अलावा, साक्षरता दर में सुधार और कृषि व अन्य क्षेत्रों के श्रमिकों की आय के बीच संतुलन बनाने की दरकार है।

हकीकत यह है कि खेतिहर मजदूर की तुलना में शहरी श्रमिक की औसत आय तीन गुनी ज्यादा है। इस विभेद को दूर करने के लिए सरकार कौशल विकास अभियान चला रही है, लेकिन मौजूदा रफ्तार को देखते हुए यह विभेद दूर हो पाएगा इसके कम ही आसार हैं। इसके लिए सरकार को और कारगर उपाय करने होंगे। हालांकि पिछले कुछ वर्षो में ग्रामीण क्षेत्र को गरीबी से उबारने के लिए कई आकर्षक योजनाएं शुरू की गई हैं। इसके तहत कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है। मृदा स्वास्य कार्ड और फसल बीमा योजनाओं के अच्छे परिणाम दिख रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के समग्र विकास के लिए शुरू की गई समग्र शिक्षा एवं साक्षर भारत जैसी योजनाएं आगे चलकर देश के विकास में मील का पत्थर साबित होंगी। इससे ग्रामीण साक्षरता में भारी सुधार आने की उम्मीद है।

यह सर्वविदित है कि ग्रामीणों की आय का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार की बीमारियों का इलाज कराने में ही खर्च हो जाता है। ‘‘स्वच्छ भारत मिशन’ जैसी योजनाओं के साथ ग्रामीण इलाकों में स्वास्य क्षेत्र में सुधार लाने की कोशिश की जा रही है। देश में कुपोषण और डायरिया की वजह से हर साल लगभग तीन लाख बच्चों की मौत होती है। इस माह 25 सितम्बर से शुरू हुई ‘‘आयुष्मान योजना’ में पांच लाख रुपये का स्वास्य बीमा कवर मिलने से 50 करोड़ लोग स्वास्य सुरक्षा के दायरे में आ जाएंगे। यह योजना मोदी सरकार के लिए मनरेगा साबित हो सकती है, जिससे ग्रामीणों की सेहत और समृद्धि में सुधार आएगा।

लोक सभा के आसन्न चुनावों को देखते हुए सरकार दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना, कौशल भारत जैसी योजनाओं को बढ़ावा दे रही है। देश के विकास के लिए ग्रामीण युवाओं के कौशल विकास, लघु एवं कुटीर उद्योगों नए कारोबार के नए विचारों को प्रोत्साहन अच्छी पहल साबित होगी। सरकार के आर्थिक सुधारों की बात करें तो इनके सकारात्मक परिणाम स्पष्ट रूप से दिखने लगे हैं। पिछले चार वित्तीय वर्षो में देश की औसत प्रति व्यक्ति आय तेजी से बढ़ी है। हालांकि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय के बीच अब भी बड़ा अंतर बना हुआ है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2015-16 के आधार पर वर्ष 2022-23 तक ग्रामीण आय को दोगुनी करना है। फिलहाल, प्रौद्योगिकी के जरिए कृषि पैदावार बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

नई प्रौद्योगिकी से श्रम, मजदूरी और लागत घटाने में मदद मिल रही है। जाहिर है कृषि उत्पादन की तुलना में किसानों की आय ऊंची दर से बढ़ेगी। उपज के वाजिब दाम, फसलों का कुशल प्रबंधन और जिंसों के उचित भंडारण जैसे उपायों के जरिए किसानों की आय में एक तिहाई वृद्धि दर्ज की जा सकती है। इसके लिए कृषि बाजार और भूमि के अनुबंध की प्रक्रिया में बड़े बदलाव की जरूरत है। हालांकि सरकार ने ऑनलाइन राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) की व्यवस्था शुरू की है। किसी व्यापारी को देश के दूरदराज इलाके से फसल खरीदने की सुविधा मिलने से किसानों को बेहतर दाम मिलने लगे हैं। इसी का नतीजा है कि बिहार के दरभंगा के किसान को अपने मखाने बेचने के लिए दिल्ली अथवा हैदराबाद नहीं जाना पड़ता। ऑनलाइन दर्ज होने पर अब व्यापारी उससे खुद ही संपर्क करने लगे हैं।

यह सुविधा मिलने से किसान को एक और बड़ा फायदा यह मिला है कि अब वह अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर नहीं है। दूरदराज के खेतों के सड़कों से जुड़ने से कृषि उपज की त्वरित आपूत्तर्ि का विकल्प मिल गया है। नतीजतन वॉलमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब किसान के खेतों पर पहुंच कर उनके उत्पादों को खरीद रही हैं। पर अभी ऐसा नहीं कह सकते कि सब कुछ अच्छा हो गया है। सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर काफी ऊंची बनी हुई है।

गरीबी और कर्ज न चुका पाने के कारण किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। कृषि आय का मुख्य स्रेत होने के बावजूद जरूरत के मुताबिक उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। खेतीबाड़ी के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी और पर्याप्त पूंजी नहीं मिल पा रही है। इस क्षेत्र में निजी निवेश आकर्षित करने के लिए उदारीकरण की जरूरत है। यदि सरकार यह करती है तो गांवों की गरीबी निश्चित तौर पर दूर हो सकती है।