UPSC DAILY CURRENT IN HINDI 09-10-2018

मृदा में नमी का पूर्वानुमान पहली बार

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड-05 : प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।)

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चर्चा में क्यों

हाल ही में आईआईटी गांधीनगर तथा भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने सात और तीस दिनों के अंतराल पर देशव्यापी ‘मृदा नमी पूर्वानुमान’ की सुविधा पहली बार पेश की है। इस संयुक्त सहयोग में मृदा के अंदर नमी की मात्रा का पूर्वानुमान लगाने के लिये भूमि सतह मॉडल का उपयोग किया गया है।

  • यह उत्पाद, जिसे ‘प्रायोगिक पूर्वानुमान भूमि सतह उत्पाद’ कहा जाता है, IMD की वेबसाइट पर उपलब्ध है तथा इसे हाइड्रोलॉजिकल मॉडल का उपयोग करके विकसित किया गया है जो अन्य मानकों के बीच मृदा, वनस्पति, भूमि उपयोग और भूमि आवरण को ध्यान में रखता है।
  • भारत अपने हाई-रिज़ोलूशन मृदा डेटाबेस पर काम कर रहा है जो मृदा के मानकों के लिये आवश्यक है। हालाँकि, यह डेटाबेस वर्तमान में पूरे देश के लिये उपलब्ध नहीं है।

भूमि सतह मॉडल

  • इसमें भूमि सतह और वायुमंडल के बीच पारस्परिक एवं जटिल क्रियाएँ (बायोफिजिकल, हाइड्रोलॉजिकल, और बायोजियोकेमिकल) शामिल हैं।
  • इसका अंतिम लक्ष्य क्षेत्रीय मौसम, जलवायु तथा जल विज्ञान पर भूमि सतह प्रक्रियाओं के प्रभावों की भविष्यवाणी में सुधार लाने के लिये इस तरह के ज्ञान को एकीकृत करना है।

इस प्रथा की महत्ता

  • मृदा की नमी कृषि के लिये महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि यह सीधे फसल की वृद्धि तथा क्षेत्र विशेष के लिये आवश्यक सिंचाई की मात्रा को प्रभावित करती है।
  • उचित समय पर मृदा की नमी का पूर्वानुमान कृषि में बेहतर योजना के लिये बीज के किस्मों के संदर्भ में लक्ष्य तक पहुँचने में मदद करेगा।
  • रबी की फसल के लिये मृदा की नमी का पूर्वानुमान महत्त्वपूर्ण हो जाता है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, रबी फसलों के तहत बोया जाने वाला कुल क्षेत्रफल 625 लाख हेक्टेयर है जिसमें गेहूँ की खेती 300 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल पर होती है।
  • अनिवार्य रूप से मृदा की नमी हमें देश के विभिन्न हिस्सों में फसल की वृद्धि के लिये आवश्यक घटकों के बारे में अधिक जानकारी देती है।

 

WEF ने पेश की ‘फ्यूचर ऑफ वर्क इन इंडिया’ रिपोर्ट

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र–3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड-1 : भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।)

ORF

चर्चा में क्यों

हाल ही में विश्व आर्थिक मंच ने ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के सहयोग से ‘फ्यूचर ऑफ वर्क इन इंडिया’ रिपोर्ट पेश की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में काम की अनिश्चितता है लेकिन भारत में भरपूर अवसर हैं।

प्रमुख बिंदु

  • यह रिपोर्ट भारत में रोज़गार सृजन, कार्यस्थल, रोज़गार के रुझानों और संबंधों तथा काम की प्रकृति को लेकर परिवर्तनीय प्रौद्योगिकी के प्रभाव पर प्रकाश डालती है।
  • इसके अलावा, इस रिपोर्ट में पाया गया कि भारत में कंपनियाँ भविष्य को लेकर आशावादी हैं और नई प्रौद्योगिकियों तथा डिजिटलीकरण द्वारा प्रस्तुत की गई उन संभावनाओं के लिये खुली हैं जो नवाचार को प्रोत्साहित करने और नई तकनीक को अपनाने तथा विकास एवं प्रगति में तेज़ी लाने वाली हों।
  • रिपोर्ट में पाया गया है कि भारत में उच्चतम संवृद्धि वाली कंपनियाँ पुरुषों को भर्ती करना पसंद करती हैं। इस प्रकार प्रौद्योगिकी पर आधारित यह रोज़गार की वृद्धि महिलाओं से अधिक पुरुषों को लाभ देती है जो लैंगिक समानता तथा महिला सशक्तीकरण की दिशा में भारत के अभियान पर चिंता करने का बड़ा कारण बनती है।

उल्लेखनीय बिंदु

  • कंपनियाँ रोज़गार सृजन की उम्मीद करती हैं: इस व्यापक चिंता के विपरीत कि मशीनें और तकनीक मानव श्रमिकों को विस्थापित कर रही हैं, कंपनियाँ पिछले पाँच सालों से लगातार अतिरिक्त श्रमिकों को भर्ती कर रही हैं और वे उम्मीद करती हैं कि यह प्रवृत्ति जारी रहेगी। यदि सावधानी पूर्वक प्रबंधन किया जाए तो भारत में ये तकनीकी बाधाएँ वास्तव में काम करने योग्य आबादी के लिये पर्याप्त लाभकारी रोज़गार के अवसरों का निर्माण कर सकती हैं।
  • कंपनियाँ वस्तु अंतरजाल (IoT) और बिग डेटा की क्षमता को पहचानती हैं: कंपनियों ने सूचित किया कि आईओटी के कई पहलू उनकी कंपनियों में मौजूद हैं या वे अगले पाँच वर्षों में इसके पहलुओं को पेश करने की योजना बना रही हैं। इसी प्रकार, बिग डेटा के उपयोग की प्रवृत्ति बढ़ी है।
  • कंपनियाँ रोज़गार दे रही हैं, लेकिन महिलाओं को नहीं: भारतीय श्रम बाज़ार में महिलाओं का समावेशीकरण सामाजिक तथा आर्थिक दोनों तरह से अनिवार्य है। IMF के अनुमान के मुताबिक यदि भारत के कर्मचारियों में पुरुषों व महिलाओं की बराबर साझेदारी होती तो भारत की अमीरी 27% से जाती।
  • रिपोर्ट में शामिल अन्य उल्लेखनीय बिंदु
    ♦ बढ़ती हुई संविदाकरण
    ♦ मज़दूरों के बचाव, सुरक्षा और लाभ पर दोबारा सोचने की जरूरत
    ♦ स्वतंत्र भविष्य

आगे की राह

आर्थिक संवृद्धि ज़रूरी है लेकिन रोज़गार सृजन के लिये यह पर्याप्त शर्त नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत को वर्तमान रोज़गार दर बनाए रखने के लिये सालाना 84 लाख से अधिक रोज़गार का सृजन करना होगा। महिलाओं, युवाओं और अन्य हाशिये वाले समुदायों, जो पहले अर्थव्यवस्था में समान रूप से भाग लेने में असमर्थ थे, को बराबर अवसर प्रदान करने के लिये यह उचित समय है।

 

क्या होता है व्यापार घाटा

(जागरण पाठशाला)

(हरिकिशन शर्मा)

आयात और निर्यात के अंतर को व्यापार संतुलन कहते हैं। जब कोई देश निर्यात की तुलना में आयात अधिक करता है तो उसे ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) कहते हैं। इसका मतलब यह है कि वह देश अपने यहां ग्राहकों की जरूरत को पूरा करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं का पर्याप्त उत्पादन नहीं कर पा रहा है, इसलिए उसे दूसरे देशों से इनका आयात करना पड़ रहा है। इसके उलट जब कोई देश आयात की तुलना में निर्यात अधिक करता है तो उसे ट्रेड सरप्लस कहते हैं।

वित्त वर्ष 2017-18 में भारत ने लगभग 238 देशों और शासनाधिकृत क्षेत्रों के साथ कुल 769 अरब डॉलर का व्यापार (303 अरब डॉलर निर्यात और 465 अरब डॉलर आयात) किया। इस तरह इस अवधि में भारत का व्यापार घाटा 162 अरब डॉलर रहा। इनमें से 130 देशों के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस था जबकि करीब 88 देशों के साथ ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) रहा। भारत का सर्वाधिक व्यापार घाटा पड़ोसी देश चीन के साथ 63 अरब डॉलर है। इसका मतलब यह है कि चीन के साथ व्यापार भारत के हित में कम तथा इस पड़ोसी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अधिक फायदेमंद है। चीन की तरह स्विट्जरलैंड, सऊदी अरब, इराक, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, ईरान, नाइजीरिया, कतर, रूस, जापान और जर्मनी जैसे देशों के साथ भी भारत का व्यापार घाटा अधिक है।

अगर हम ट्रेड सरप्लस की बात करें तो अमेरिका के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस सर्वाधिक (21 अरब डॉलर) है। इसका अर्थ है कि हमारा देश अमेरिका से आयात कम और वहां के लिए निर्यात ज्यादा करता है। इस तरह अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार संतुलन का झुकाव भारत की ओर है। सरल शब्दों में कहें तो अमेरिका से व्यापार भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुकूल है। बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल, हांगकांग, नीदरलैंड, पाकिस्तान, वियतनाम और श्रीलंका जैसे देशों के साथ भी भारत का ट्रेड सरप्लस है।

अर्थशास्त्रियों का मत है कि अगर किसी देश का व्यापार घाटा लगातार कई साल तक कायम रहता है तो उस देश की आर्थिक स्थिति खासकर रोजगार सृजन, विकास दर और मुद्रा के मूल्य पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा। चालू खाते के घाटे पर भी व्यापार घाटे का नकारात्मक असर पड़ता है। असल में चालू खाते में एक बड़ा हिस्सा व्यापार संतुलन का होता है। व्यापार घाटा बढ़ता है तो चालू खाते का घाटा भी बढ़ जाता है।

दरअसल चालू खाते का घाटा विदेशी मुद्रा के देश में आने और बाहर जाने के अंतर को दर्शाता है। निर्यात के जरिये विदेशी मुद्रा अर्जित होती है जबकि आयात से देश की मुद्रा बाहर जाती है। यही वजह है कि सरकार ने हाल में कई वस्तुओं पर आयात शुल्क की दर बढ़ाकर गैर जरूरी वस्तुओं के आयात को कम करने का प्रयास किया है। वैसे अमेरिका का व्यापार घाटा दुनिया में सर्वाधिक है और उसने इस मत को कुछ हद तक गलत साबित किया है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और डॉलर पूरी दुनिया में रिजर्व करेंसी के रूप में रखी जाती है।
भारत का ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) इस साल जुलाई में पांच साल के उच्चतम स्तर (19 अरब डॉलर) पर पहुंच गया है। यह सिर्फ एक महीने का आंकड़ा है और माना जा रहा है कि पूरे वित्त वर्ष के लिए यह पिछले साल के मुकाबले काफी अधिक होगा। व्यापार घाटे का सीधा असर देश की आर्थिक स्थिति खासकर चालू खाता घाटा, रोजगार सृजन, विकास दर और मुद्रा के मूल्य पर पड़ता है।