UPSC DAILY CURRENT IN HINDI 10-10-2018

बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़

(अभिषेक कुमार सिंह)
(साभार दैनिक जागरण )

हम जिस दवा या वैक्सीन पर सरकार और चिकित्सा तंत्र के दावों के बल पर भरोसा करें और कभी वह अचानक टूट जाए तो यह एक बेहद गंभीर मामला बन जाता है। अफसोस है कि पोलियो के टीके (वैक्सीन) के मामले में कुछ ऐसे ही हालात इधर देश में बने हैं। बताया जा रहा है कि सरकार समय-समय पोलियो टीकाकरण का कार्यक्रम चलाकर देश के लाखों-करोड़ों बच्चों को जिस पोलियो वैक्सीन की दो-दो बूंदें पिलाती रही है, उस वैक्सीन में ही टाइप-2 पोलियो वायरस मौजूद था और दावा है कि यह वायरस वैक्सीन के जरिये उत्तर प्रदेश में ही करीब आठ लाख बच्चों में पहुंच गया है।

उल्लेखनीय है कि हमारा देश 2014 में पोलियो को जड़ से मिटाने का दावा कर चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस दावे पर मुहर लगा चुका है और ऐसे दावों के आधार पर 25 अप्रैल, 2016 को पोलियो के टाइप-2 के पूरी दुनिया से ही खात्मे का एलान कर चुका है। लेकिन अब इसका देश में लौटना पोलियो टीकाकरण अभियान पर हुए करोड़ों-अरबों रुपये के खर्च और हजारों लोगों की मेहनत पर पानी फेर रहा है। इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि देश को नए सिरे से पोलियो के खिलाफ जुटना पड़ेगा।

पोलियो उन्मूलन का व्यापक अभियान चलाना आसान नहीं होगा, क्योंकि पहले से ही कुछ बातों को लेकर संदिग्ध रहे पोलियो टीकाकरण कार्यक्रम में भरोसा जगाना और आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना काफी चुनौतीपूर्ण होगा। साथ ही यह सवाल भी जवाब मांगेगा कि क्या अपने सतत मुनाफे के लिए फार्मा (दवा) कंपनियां ही ऐसी गलतियों की गुंजाइश छोड़ती हैं ताकि उनका कारोबार चलता रहे। यानी उन्हें फिक्र लोगों की सेहत के बजाय अपने धंधे-पानी की होती है। ऐसे में मुमकिन है कि इन गलतियों के पीछे एक आशंका अभियान में लगे लोगों को अपने साथ मिलाने की साजिश की गई हो, जिसकी ताजा प्रकरण में जांच जरूरी हो गई है। यह पूछा जाना आवश्यक हो गया है कि आखिर ऐसा क्यों और किन हालात में हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

पोलियो के संपूर्ण उन्मूलन की घोषणा का आधार 13 जनवरी, 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में 18 महीने की बच्ची का मामला बना था, जिसके बारे में कहा गया कि वही देश में पोलियो की आखिरी मरीज थी। इसके बाद तीन साल यानी 2014 तक देश में पोलियो का एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया। तीन साल की इस अवधि को एक मानक मानते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो-मुक्त देश का दर्जा प्रदान कर दिया। यह एक बड़ी उपलब्धि थी, इसकी सराहना भी हुई, लेकिन इसके बाद बीते 4 सालों में तस्वीर बहुत कुछ बदल गई है। बिहार में पोलियो ड्रॉप पिलाने के बाद कथित तौर पर इसी साल एक बच्चे की मौत का मामला सामने आ चुका है। यूपी में मीरजापुर के एक अन्य 19 महीने के बच्चे में भी इसी साल सितंबर में पोलियो का यह वायरस मिला है, जबकि उसे पिछले साल (2017) अगस्त में पोलियो वैक्सीन दी गई थी। इस वायरस की वापसी के कई पहलू हैं जो पोलियो की कमजोर कड़ियों का खुलासा करते हैं। जैसे एक कमजोर कड़ी केंद्रीय एजेंसियां हैं, जो वैक्सीन की यह जांच करती हैं कि कहीं उनमें पोलियो का कोई वायरस तो मौजूद नहीं है।

पता चला है कि ये एजेंसियां पोलियो के टाइप-1 और टाइप-3 वायरस की जांच कर रही थीं। वहां टाइप-2 वायरस की जांच यह मानकर नहीं की जा रही थी कि इस वायरस का खात्मा दुनिया से हो चुका है। यह एक गंभीर खामी है।

दूसरी गंभीर खामी वैक्सीन बनाने वाली दवा कंपनी की लापरवाही के रूप में सामने आई है जिससे साजिश और मिलीभगत की आशंका भी पैदा होती है। उल्लेखनीय है कि हाल में ही सरकार के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम को वैक्सीन सप्लाई करने वाली गाजियाबाद की दवा कंपनी में पोलियो का वायरस टाइप-2 मिलने के बाद स्वास्थ्य मंत्रलय ने यूपी में इसे पीने वाले बच्चों का पता लगाने के आदेश दिए हैं। इस कंपनी की दवा पूरे देश में सप्लाई की गई थी, लेकिन जिस बैच में वायरस मिला, उसे महाराष्ट्र समेत चार राज्यों में भेजा गया था, वहां से भी सप्लाई वापस मंगाई जा रही है। साथ ही इस दवा कंपनी के प्रबंध निदेशक को लापरवाही के आरोप में 29 सितंबर 2014 को गिरफ्तार किया गया है। ये सारी कार्रवाइयां महज लापरवाही के आरोप में की गई हों, ऐसा नहीं लगता। इनसे साफ है कि सरकार को भी इसमें किसी भारी गड़बड़ी और मिलीभगत के संकेत मिल रहे हैं।

गाजियाबाद की जिस दवा कंपनी के प्रबंध निदेशक की गिरफ्तारी हुई है, केंद्रीय दवा नियामक के मुताबिक वह कंपनी सरकार के टीकाकरण कार्यक्रमों के लिए ही पोलियो की दवाई की आपूर्ति करती थी। अगले आदेश तक भारतीय दवा महानियंत्रक ने इस कंपनी में इन दवाओं का निर्माण, बिक्री और वितरण रोक देने को कहा है। स्वास्थ्य मंत्रलय की जांच रिपोर्ट में यूपी के जिन कुछ बच्चों के मल के नमूनों में पोलियो के बेहत खतरनाक टाइप-2 वायरस की मौजूदगी की पुष्टि हुई है, उन बच्चों को गाजियाबाद की दवा कंपनी का पोलियो ड्रॉप पिलाया गया था।

यहां जो अहम सवाल पैदा होता है, वह यह है कि कहीं ये घटनाएं कुछ बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के इशारे पर खामी छोड़ने और लापरवाही बरतने की वजह से तो नहीं हुई हैं। असल में ऐसे कुछ मामले अतीत में सामने आ चुके हैं, जब कुछ बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने वायरसों को हौवा बनाने और दवाओं का कृत्रिम अकाल पैदा करने की कोशिश की। यह ध्यान रखना होगा कि संक्रामक बीमारियों के मामले में चिकित्सा बाजार ऐसी ही आपात स्थितियों का इंतजार करता है ताकि उनका टीका और दवा बनाकर बाजार में लाने पर दवा कंपनियां सैकड़ों-हजारों गुना मुनाफा कमा सकें।

यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि पोलियो की बीमारी स्थाई विकलांगता से लेकर लोगों की मौत का कारण भी बन सकती है। जब तक इसके टीके का विकास नहीं हुआ था, हर साल लाखों लोग, खास तौर से बच्चे इसकी चपेट में आते थे। 1980 के दशक में ही 100 से ज्यादा मुल्कों में इसका वायरस सक्रिय था और इसकी वजह से सालाना साढ़े तीन लाख बच्चे विकलांगता के शिकार बनते थे। भारत में ही हर साल 2 लाख बच्चे इसकी चपेट में आ जाते थे, पर अंतत: सरकारी टीकाकरण अभियान के जरिये इस पर काबू पा लिया गया था।

1995 की शुरुआत में जब सरकार ने पोलियो के खिलाफ एक बड़े कैंपेन की शुरुआत की और विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और कई अन्य संस्थाएं इस चुनौती से पार पाने के लिए एकजुट हुईं तो धीरे-धीरे यह अभियान रंग दिखाने लगा। दो बूंद जिंदगी की-नामक पोलियो टीकाकरण के अभियान का ही नतीजा कहा जाएगा कि एक मुश्किल बीमारी हमारे नियंत्रण में आ गई थी।

हालांकि अभी भी इस मामले में एक पेच शेष रहता है। असल में अभी दुनिया में कुछ देश ऐसे हैं जहां बड़े पैमाने पर पोलियो के मामले हर साल सामने आ जाते हैं। इनमें से दो तो भारत के पड़ोसी मुल्क-पाकिस्तान और अफगानिस्तान हैं। तीसरा देश नाइजीरिया है।

इन तीनों मुल्कों में पोलियो के मामले गाहे-बगाहे सामने आते रहे हैं। लिहाजा खतरा यह है कि किसी भी वक्त यह वायरस अपने देश में पुन: सक्रिय हो सकता है। इस मामले में चीन का उदाहरण सामने है। चीन को वर्ष 2001 में पोलियो मुक्त देश घोषित किया गया था, लेकिन इसके 10 साल बाद 2011 में चीन में पोलियो के नए मामले पकड़ में आए थे। आशंका है कि ऐसा भारत में भी हो सकता है।

इसके अलावा भारत में ही अभी पोलियो वायरस के पूरी तरह खात्मे के पक्के सबूत नहीं हैं। लोगों के शरीर में तो यह अब भी मौजूद बताया जाता है। जरूरी है कि हमारा स्वास्थ्य तंत्र चौकस हो और ऐसे संक्रमणों के प्रति सजग होकर उनसे होने वाली समस्याओं से निपटने की तैयारी रखे।

JIMEX- 2018

JIMEX-2018

  • हाल ही में भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास (JIMEX-18) का तीसरा संस्करण विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश में शुरू हुआ।
  • JIMEX-18 का उद्देश्य अंतःक्रियाशीलता (interoperability) को बढ़ाना, समझ में सुधार लाना और एक-दूसरे की सर्वोत्तम प्रथाओं को आत्मसात करना है।
  • JIMEX का पिछला संस्करण दिसंबर 2013 में चेन्नई में आयोजित किया गया था।
  • जापान भारतीय एवं अमेरिकी नौसेना के बीच मालाबार अभ्यास में भी नियमित रूप से भागीदार रहा है।
  • मालाबार-18 प्रशांत महासागर के गुआम द्वीप पर आयोजित किया गया था।
इंडिया स्किल्स 2018

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  • विभिन्न कौशलों में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा की पहचान करने, उसे बढ़ावा देने तथा पुरस्कृत करने के लिये कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रव्यापी प्रतियोगिता का दूसरा संस्करण हाल ही में संपन्न हुआ।
  • इंडिया स्किल्स देश की सबसे बड़ी स्किल प्रतियोगिता है।
  • कई दिव्यांगों ने भी प्रतियोगिता में भाग लिया और विजयी प्रतिभागी चीन में आयोजित होने वाली विश्व स्तरीय एबिलम्पिक्स में भाग लेंगे। एबिलम्पिक्स (क्षमताओं का ओलंपिक) पेशेवर कौशल प्रतियोगिता होती है जिसे विशेष रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के लिये डिज़ाइन किया गया है ताकि वे दुनिया के सामने अपनी अद्वितीय प्रतिभाओं को प्रदर्शित कर सकें।
  • 2019 में रूस के कज़ान में 45वें वर्ल्ड स्किल्स कंपटीशन में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिये भेजे जाने से पहले विभिन्न ट्रेड की प्रतियोगिता के कुछ विजेताओं को और उन्नत प्रशिक्षण दिया जाएगा।
अंडमान और निकोबार कमांड

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  • हाल ही में अंडमान और निकोबार कमांड ने अपना 18वाँ स्थापना दिवस मनाया है।
  • यह देश का एकमात्र संयुक्त त्रि-सेवा संचालन कमांड है।
  • संयुक्त त्रि-सेवा संचालन कमांड की स्थापना 2001 में अंडमान और निकोबार क्षेत्र में भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा के उद्देश्य से की गई थी।
  • यह कमांड भारत के एक्ट ईस्ट नीति के हिस्से के रूप में पड़ोसी देशों के साथ नियमित अभ्यास करता रहा है।

 

अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार – 2018

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3 : प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
(खंड-11 : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव।)

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चर्चा में क्यों?

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में सराहनीय योगदान के लिये इस साल अमेरिका के दो अर्थशास्त्रियों को नोबेल पुरस्कार के लिये चुना गया है।

प्रमुख बिंदु

  • रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ इकोनॉमिक्स ने इस पुरस्कार के लिये विलियम  नॉर्डहॉस और पॉल रोमर के नाम का एलान किया है। इन दोनों अर्थशास्त्रियों को यह सम्मान जलवायु परिवर्तन और अर्थशास्त्र के लिये तकनीकी नवाचार की खोज हेतु दिया गया है।
  • येल अर्थशास्त्री विलियम डी. नॉर्डहॉस ने जलवायु परिवर्तन की समस्या को दूर करने के लिये कार्बन उत्सर्जन पर कर लगाने हेतु सरकारों को मनाने के लिये चार दशकों से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • 77 वर्षीय नॉर्डहॉस, 1970 के दशक से पर्यावरण अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अग्रणी रहे हैं और जलवायु परिवर्तन के पूर्वानुमान के लिये आर्थिक विश्लेषण लागू करने में उनके काम को मान्यता मिली है।
  • उल्लेखनीय है कि अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से पहले शांति, मेडिसिन, भौतिकी और रसायन शास्त्र के लिये नोबेल पुरस्कार का एलान किया जा चुका है।
  • इसमें यजीदी कार्यकर्त्ता नादिया मुराद को 2018 के नोबेल शांति पुरस्कार और मेडिसिन के लिये संयुक्त रूप से जेम्स पी. एलिसन और तासुकू होंजो को चुना गया।
  • वहीं भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिये अमेरिका के आर्थर अश्किन, फ्राँस के जेरार्ड मोउरो और कनाडा की डोना स्ट्रिकलैंड के नाम की घोषणा की जा चुकी है।
  • इसके अलावा, रसायन शास्त्र के लिये फ्राँसेस एच. एरनॉल्ड, जॉर्ज पी. स्मिथ और सर ग्रेग्रॉरी पी. विंटर को नोबेल पुरस्कार के लिये चुना गया है।

नहीं दिया जाएगा साहित्य का नोबेल पुरस्कार

  • उल्लेखनीय है कि साहित्य के नोबेल पुरस्कार को इस साल स्थगित कर दिया गया है।
  • पुरस्कार के 117 साल के इतिहास में इसे दूसरी बार रोका गया है। इससे पहले इसे 1943 में द्वितीय विश्वयुद्ध को लेकर स्थगित किया गया था।
  • नोबेल पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्था एक सेक्स स्कैंडल में फँस गई है। यह अकादमी 1901 से ही साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेताओं का चयन कर रही है।
  • भारत को अभी तक सिर्फ एक बार साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। 1913 में रवींद्रनाथ टैगोर को गीतांजलि के लिये यह पुरस्कार दिया गया था।
  • एकेडमी ने फैसला किया है कि इस साल यह पुरस्कार प्रदान नहीं किया जाएगा, क्योंकि एकेडमी के कुछ सदस्य पुरस्कार प्रदान करने को लेकर चिंतित हैं और वे इसके लिये स्थिति को अनुकूल नहीं बता रहे हैं।
  • पिछले साल नवंबर में 18 महिलाओं ने ‘मी टू’ अभियान के जरिये अरनॉल्ट पर यौन हमला व उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। हालाँकि अरनॉल्ट ने सभी आरोपों से इनकार किया है।

भारत-रूस शिखर सम्मेलन 2018

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 : शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध। 
(खंड-18 : द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह एवं भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।)

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संदर्भ

हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत-रूस शिखर सम्मेलन 2018 के लिये भारत का दौरा किया। गौरतलब है कि यह 19वाँ भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन था।

भारत और रूस के बीच सामरिक साझेदारी के लिये भारत के प्रधानमंत्री और रूस के राष्ट्रपति के बीच यह वार्षिक शिखर सम्मेलन उच्चतम संस्थागत वार्ता तंत्र है।

भारत-रूस संबंध

  • भारत तथा रूस के राजनयिक संबंध 70 वर्षों से भी अधिक पुराने हैं।
  • 1950 के दशक से ही यूएसएसआर के साथ भारत का मैत्रीपूर्ण संबंध रहा है तथा 1971 के भारत-सोवियत मैत्री संधि द्वारा संबंधों को और अधिक मज़बूत किया गया।
  • दोनों देश विशेष संबंधों के साथ तब जुड़े जब अक्टूबर, 2000 में भारत-रूस सामरिक साझेदारी की घोषणा पर हस्ताक्षर किये गए।
  • दिसंबर 2010 में सामरिक साझेदारी को विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्‍त सामरिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ा दिया गया।
  • सोवियत काल के बाद भारत-रूस संबंधों ने राजनीतिक, सुरक्षा, व्यापार और अर्थव्यवस्था, रक्षा, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी एवं संस्कृति सहित द्विपक्षीय संबंधों के लगभग सभी क्षेत्रों में सहयोग के उन्नत स्तर के साथ गुणात्मक रूप से नया चरित्र हासिल किया है।

शिखर सम्मेलन के दौरान प्रमुख समझौते

  • रूस के राष्ट्रपति राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे के दौरान विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए। ये समझौते रूस तथा भारत के बीच होने वाले सहयोग को और अधिक मज़बूती प्रदान करेंगे।
  • भारत ने S-400 ट्रायम्फ मिसाइल रक्षा प्रणाली की आपूर्ति के लिये रूस के साथ 5.43 बिलियन डॉलर का सौदा किया है।

 S-400 ट्रायम्फ मिसाइल 400 किमी की दूरी तक शत्रु-विमान, गुप्त लड़ाकू-विमान, मिसाइलों और ड्रोन को नष्ट कर सकता है।
♦ S-400 रडार एक साथ सैकड़ों लक्ष्यों को ट्रैक कर सकते हैं।

  • भारत और रूस ने आपसी निवेश को 15 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान में यह द्विपक्षीय व्यापार 10 बिलियन डॉलर से भी कम है।
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और फेडेरल स्पेस एजेंसी ऑफ रूस (ROSCOSMOS) ने भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन परियोजना ‘गगनयान’ पर सहयोग के लिये ‘समझौता ज्ञापन’ पर हस्ताक्षर किये।
  • भारतीय और रूसी रेलवे के बीच सहयोग के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए जिसके द्वारा रूसी रेलवे कंपनी आधुनिक रेल मार्ग बनाने में भारत की मदद करेगी।
  • परमाणु क्षेत्र में सहयोग की प्राथमिकता और कार्यान्वयन के लिये कार्य योजना पर हस्ताक्षर किये गए तथा इस समझौते के तहत रूस अगले 20 वर्षों में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की 12 इकाइयों का निर्माण करेगा।
  • अन्य समझौतों में छोटे उद्योग, उर्वरक और विदेशी मंत्रालयों के बीच परामर्श से संबंधित ‘समझौता ज्ञापन’ शामिल हैं।

आगे की राह

  • इस दौरे का मुख्य आकर्षण S-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली का सौदा था। काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सेंक्शन एक्ट (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act-CAATSA) के तहत भारत पर प्रतिबंधों की चेतावनी के बावजूद भारत इस सौदे के साथ आगे बढ़ा।
  • यह ऐसा कानून है जो रूस, ईरान और उत्तरी कोरिया के साथ प्रमुख रूप से व्यापार संबंध रखने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाता है।
  • इस समझौते पर भारत द्वारा हस्ताक्षर करना ‘सामरिक स्वायत्तता’ की तरफ इशारा करता है, जिसका अर्थ यह है कि भारत की सुरक्षा तथा विदेशी नीति के हितों को किसी तीसरे देश द्वारा निर्देशित नहीं किया जा सकता है।
  • शिखर सम्मेलन के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में किये गए हस्ताक्षर, जैसे- परमाणु, रेलवे और अंतरिक्ष, रूस के लिये भारत के महत्त्व को दर्शाते हैं।
  • तथ्य यह भी दर्शाते हैं कि बदलते समय के साथ भारत रक्षा सहयोग से आगे बढ़कर रूस के साथ संबंधों को सुदृढ़ करने के बारे में सोच रहा है।