UPSC DAILY CURRENT IN HINDI 15-10-2018

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राष्ट्रीय मनव अधिकार आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना वर्ष 1995 में मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1990 के तहत की गई थी।
  2. आयोग किसी पीड़ित अथवा उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर स्वयं सुनवाई एवं कार्यवाही कर सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2
Hide Answer –

उत्तर : (b)
व्याख्या :

  • राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर नई दिल्ली में रजत जयंती समारोह का आयोजन किया जा रहा है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना वर्ष 1993 में मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत की गई थी। यह मानव अधिकारों के संरक्षण के क्षेत्र में भारत की सर्वोच्च संस्था है जो भारतीय संविधान एवं अंतर्राष्ट्रीय संधियों के आधार पर व्यक्ति के जीवन, उसकी स्वतंत्रता, समानता, गरिमा जैसे अधिकारों के सरंक्षण एवं जन जागरुकता फैलाने का कार्य करती है। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • आयोग किसी पीड़ित अथवा उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर स्वयं सुनवाई एवं कार्यवाही कर सकता है। इसके अलावा, आयोग न्यायालय की स्वीकृति से न्यायालय के समक्ष लंबित मानवाधिकारों उल्लंघन एवं मानवता के प्रति हिंसा संबंधी किसी मामले में हस्तक्षेप कर सकता है। आयोग संबंधित अधिकारियों को पूर्व सूचित करके किसी भी कारागार का निरीक्षण कर सकता है। अतः कथन 2 सही है।
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ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2018 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  • रिपोर्ट के अनुसार, भारत को इस सूचकांक में 119 देशों में से 103वाँ स्थान दिया गया है।
  • पिछले दो दशकों में सुधार के साथ वैश्विक तौर पर भुखमरी का स्तर ‘निम्न’ श्रेणी में आता है।
  • भारत ने तुलनात्मक रूप से संदर्भ वर्षों में तीन संकेतकों में सुधार किया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1 और 2
B) केवल 1 और 3
C) केवल 2 और 3
D) 1, 2 और 3
Hide Answer –

उत्तर : (b)
व्याख्या :

  • हाल ही में जारी किये गए ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2018 के अनुसार, भारत को इस सूचकांक में 119 देशों में से 103वाँ स्थान दिया गया है तथा देश में भुखमरी के स्तर को ‘गंभीर’ श्रेणी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष भारत की रैंकिंग में तीन स्थान की गिरावट आई है। अतः कथन 1 सही है।
  • पिछले दो दशकों में सुधार के बावजूद वैश्विक तौर पर अभी भी भुखमरी का स्तर ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है। यह सूचकांक इस बात का अनुमान व्यक्त करता है कि प्रगति की वर्तमान दर पर विश्व के 50 देश वर्ष 2030 तक भुखमरी की ‘निम्न’ श्रेणी तक पहुँचने में असफल रहेंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्य 2 को खतरे में डालता है, जिसका उद्देश्य 2030 तक भुखमरी को समाप्त करना है। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • भारत ने तुलनात्मक रूप से संदर्भ वर्षों में तीन संकेतकों में सुधार किया है। जनसंख्या में अल्पपोषित लोगों का प्रतिशत वर्ष 2000 के 18.2% से घटकर वर्ष 2018 में 14.8% हो गया है। इसी अवधि में बाल मृत्यु दर 9.2% से घटकर लगभग आधी अर्थात् 4.3% हो गई है, जबकि बच्चों में बौनापन 54.2% से घटकर 38.4% हो गया। अतः कथन 3 सही है।
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चतुर्थ औद्योगिक क्रांति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. चौथी औद्योगिक क्रांति में आइटी व विनिर्माण सेक्टर को मिलाकर कार्य किया जाएगा।
  2. यह मुख्यत: इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), बाधा रहित इंटरनेट कनेक्टिविटी, तीव्र गति वाली संचार तकनीकियों और 3डी प्रिंटिंग जैसे अनुप्रयोगों पर आधारित है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2
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उत्तर : (c)
व्याख्या :

  • चौथी औद्योगिक क्रांति में आइटी व विनिर्माण सेक्टर को मिलाकर कार्य किया जाएगा। अमेरिका और जर्मनी ने 2010 के बाद इस पर कार्य शुरू किया। ‘उद्योग 4.0’ विश्व आर्थिक फोरम की 2016 में आयोजित वार्षिक बैठक की थीम थी, जिसके बाद चतुर्थ औद्योगिक क्रांति का विचार तेज़ी से प्रसिद्ध होता गया। अतः कथन 1 सही है।
  • उद्योग 4.0’ विश्व भर में एक शक्ति के रूप में उभर कर सामने आया है और इसे अगली औद्योगिक क्रांति कहा जा रहा है। यह मुख्यत: इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), बाधा रहित इंटरनेट कनेक्टिविटी, तीव्र गति वाली संचार तकनीकियों और 3डी प्रिंटिंग जैसे अनुप्रयोगों पर आधारित है, जिसके अंतर्गत अधिक डिजिटलीकरण तथा उत्पादों, वैल्यू चेन, व्यापार मॉडल को एक-दूसरे से अधिकाधिक जोड़ने की परिकल्पना की गई है। अतः कथन 2 सही है।
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हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा संगठन श्रेष्ठ कार्यप्रणाली पुरस्कार निम्नलिखित में से किसे प्रदान किया गया?

A) सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय
B) इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन
C) कर्मचारी राज्य बीमा निगम
D) भारतीय जीवन बीमा निगम
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उत्तर : (c)
व्याख्या :

  • हाल ही में कर्मचारी राज्य बीमा निगम (Employees’ State Insurance Corporation – ESIC) ने मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिये क्षेत्रीय सामाजिक सुरक्षा फोरम में कवरेज विस्तार के प्रशासनिक समाधान के लिये आईएसएसए (International Social Security Association-ISSA) श्रेष्ठ कार्यप्रणाली पुरस्कार जीत लिया है। यह पुरस्कार ESIC द्वारा कवरेज विस्तार – स्प्री (Scheme for Promoting Registration of Employers and Employees- SPREE), नए क्रियान्वित क्षेत्रों में 24 महीनों के लिये अंशदान दर में कमी तथा ESIC अधिनियम के अंतर्गत कवरेज के लिये वेतन सीमा बढ़ाने आदि हेतु उठाए गए कदमों को मान्यता देता है।
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हाल ही में चर्चा में रहे ‘मेडवाच’  के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  • स्वदेश निर्मित इस एप को अत्यंत कम लागत पर आईआईटी कानपुर द्वारा विकसित किया गया है।
  • ‘मेडवाच’ से वायुसेना के जवानों और देश के सभी नागरिकों को स्वास्थ्य के बारे में सही-सही एवं वैज्ञानिक तथा विश्वस्त विवरण उपलब्ध होगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2
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उत्तर : (b)
व्याख्या :

  • हाल ही में भारतीय वायुसेना ने अपनी 86वीं वर्षगाँठ पर ‘डिजिटल इंडिया, आयुष्मान भारत और‍मिशन इंद्रधनुष’ के संबंध में ‘मेडवाच’ नामक एक मोबाइल हेल्थ एप की शुरुआत की है। स्वदेश निर्मित इस एप को बहुत कम लागत पर सूचना प्रौद्योगिकी निदेशालय द्वारा विकसित किया गया है। ‘मेडवाच’ तीनों सशस्त्र सेनाओं में सबसे पहला मोबाइल हेल्थ एप है। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • ‘मेडवाच’ से वायुसेना के जवानों और देश के सभी नागरिकों को स्वास्थ्य के बारे में सही-सही एवं वैज्ञानिक तथा विश्वस्त विवरण उपलब्ध होगा। इसमें मूलभूत प्राथमिक उपचार, स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे तथा पोषक आहार पर आधारित विवरण, समयानुसार स्वास्थ्य समीक्षा, रोग प्रतिरक्षण और स्वास्थ्य रिकॉर्ड कार्ड, बीएमआई कैलकुलेटर, हेल्पलाइन नंबरों और वेब लिंकों जैसे उपयोगी माध्यम शामिल हैं। अतः कथन 2 सही है।

 

जीन अनुक्रमित करने हेतु प्रमुख मिशन

gene-indexed

  • 50,000 भारतीयों सहित 100k एशियाई लोगों के पूरे जीनोमों को अनुक्रमित करने के लिये भारतीय वैज्ञानिकों और कंपनियों का एक समूह 100k जीनोम एशिया परियोजना में शामिल है, जिसे नान्यांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (NTU) द्वारा संचालित किया जा रहा है
  • यूनाइटेड किंगडम, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया की परियोजनाओं के समान भारत इसका उपयोग स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के साथ-साथ व्यक्ति-विशेष आधारित दवाओं का निर्माण करने की वैश्विक प्रवृत्ति की बराबरी के लिये जीनोमों को अनुक्रमित करने की योजना बना रहा है।
  • यह विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (STIAC) की पहली बैठक में लिये गए महत्त्वपूर्ण निर्णयों में से एक था।
  • यह परिषद परियोजनाओं और मिशनों पर काम करने के लिये कई मंत्रालयों के बीच एक समन्वयक के रूप में कार्य करती है और महीने में एक बार बैठक निर्धारित की गई है।
  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और जैव प्रौद्योगिकी विभाग इस परियोजना के साथ निकटता से जुड़े होंगे।
  • इस योजना के लक्ष्यों में जीनोम को अनुक्रमित करना और मानव स्वास्थ्य तथा बीमारी को एक शोध पहल के रूप में जोड़ना एवं इस प्रक्रिया को बड़े पैमाने पर सुनिश्चित करना शामिल है, ताकि इसका सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सके।
UNHRC चुनाव में भारत की जीत

UNHRC

  • हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष मानवाधिकार निकाय के लिये भारत को चुना गया है।
  • गौरतलब है कि इस निकाय के लिये भारत का कार्यकाल तीन वर्षों का होगा, जो 1 जनवरी, 2019 से प्रारंभ होगा।
  • सभी उम्मीदवारों के बीच सबसे अधिक मतों के साथ भारत को एशिया-प्रशांत श्रेणी में 188 मत मिले हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र की 193 सदस्यीय महासभा ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के नए सदस्यों के लिये चुनाव किया। 18 नए सदस्य गुप्त मतदान के द्वारा पूर्ण बहुमत से चुने गए।
  • परिषद में चुने जाने के लिये किसी भी देश को कम-से-कम 97 मतों की आवश्यकता होती है।
  • एशिया-प्रशांत श्रेणी में भारत को 188 मत, फिजी को 187 मत, बांग्लादेश को 178 मत, बहरीन और फिलीपींस प्रत्येक को 165 मत प्राप्त हुए।
  • भारत इससे पहले भी 2011-2014 तथा 2014-2017 की अवधि‍के लिये जिनेवा स्थित मानवाधिकार परिषद हेतु चुना जा चुका है।
पूर्ण-जैविक सिक्किम को UN-समर्थित पुरस्कार

full-biological

  • हाल ही में देश के पहले पूर्ण जैविक राज्य सिक्किम ने संयुक्त राष्ट्र समर्थित पुरस्कार में शीर्ष पुरस्कार जीत लिया है।
  • आयोजकों के अनुसार, इन नीतियों ने 66,000 से अधिक किसानों को सहायता पहुँचाई है, पर्यटन को बढ़ावा दिया है और अन्य देशों के लिये एक उदाहरण स्थापित किया है।
  • अन्य सह-आयोजक वर्ल्ड फ्यूचर काउंसिल के मुताबिक, 2014 से 2017 के बीच सिक्किम में पर्यटकों की संख्या 50 फीसदी बढ़ी है।
  • तिब्बत की सीमा से लगे इस छोटे हिमालयी राज्य ने रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों को टिकाऊ विकल्पों से प्रतिस्थापित कर दिया। इसके बाद 2016 में इसे पूर्ण जैविक राज्य घोषित कर दिया गया था।
  • इस प्रकार, सिक्किम एक उत्कृष्ट उदाहरण स्थापित करता है। दुनिया भर के देशों तथा अन्य भारतीय राज्यों को सिक्किम से कृषि-पारिस्थितिकी के बारे में सीखने की ज़रूरत है।

 

मसौदा राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति 2018

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3 : प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन। 
(खंड-01 : भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

NPE-2018

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति 2018 (National Electronics Policy or NPE-2018) का मसौदा जारी किया। उल्लेखनीय है कि पहली राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति 2012 में जारी की गई थी, इसने देश में विनिर्माण इकाइयों की स्थापना करने वाली कंपनियों को प्रोत्साहन प्रदान किया था।

नीति के लक्ष्य

  • वर्ष 2025 तक इलेक्ट्रॉनिक्स के घरेलू विनिर्माण क्षेत्र में $ 400 बिलियन का कारोबार करने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डिज़ाइन और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में व्यवसाय को सुगम बनाना और इलेक्ट्रॉनिक्स के सभी उप-क्षेत्रों में उद्योग आधारित अनुसंधान और विकास एवं नवाचार को प्रोत्साहित करना।
  • वर्ष 2025 तक 190 बिलियन डॉलर मूल्य के एक बिलियन मोबाइल हैंडसेट का उत्पादन करना, इसमें 110 बिलियन डॉलर मूल्य के 600 मिलियन मोबाइल हैंडसेट का निर्यात करना भी शामिल है।
  • उभरते प्रौद्योगिकी क्षेत्रों जैसे- 5 जी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग और रक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, स्मार्ट सिटीज़ एवं स्वचालन आदि में उनके अनुप्रयोगों को भी बढ़ावा देना।

नीति के प्रमुख प्रावधान

  • मसौदा नीति के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय देश में इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर विनिर्माण उद्योग के विस्तार को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिये संबंधित मंत्रालयों/विभागों के साथ समन्वय स्थापित करेगा।
  • इस मसौदा नीति में किसी नई इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण इकाई की स्थापना या मौजूदा इकाई के विस्तार हेतु प्रस्तावित कुछ उपायों में विश्व व्यापार संगठन के सूचना प्रौद्योगिकी समझौते (Information Technology Agreement-1 or ITA-1) के तहत कवर किये गए इलेक्ट्रॉनिक सामानों के निर्माण और आयकर अधिनियम की धारा 35AD के तहत निवेश संबंधी कटौती सहित उचित प्रत्यक्ष कर लाभों के प्रावधान शामिल हैं।
  • यह नीति मौज़ूदा इकाइयों के विस्तार और नई इकाइयों की स्थापना के लिये संशोधित विशेष प्रोत्साहन पैकेज योजना (Modified Special Incentive Package Scheme- M-SIPS) को ऐसी योजनाओं के माध्यम से हटाने का प्रावधान करती है जिन्हें लागू करना आसान है, जैसे- सब्सिडी तथा क्रेडिट डिफ़ॉल्ट गारंटी आदि।

 

कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र -2 : शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
(खंड-13 : स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।)
(खंड-14 : गरीबी एवं भूख से सबंधित विषय)

संदर्भ

अप्रैल 2014 में कंपनी अधिनियम, 2013 में संशोधन के बाद भारत कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी अनिवार्य बनाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। अब कॉर्पोरेट व्यवसाय शिक्षा, गरीबी, लिंग समानता, और भूख जैसे क्षेत्रों में अपने मुनाफे का निवेश कर सकते हैं। हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी, विधि तथा न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आईटी उद्योग के प्रमुखों से कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने के लिये मुलाकात की। आईटी उद्योग के 50 से अधिक प्रतिनिधियों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। सामाज की बेहतरी और विकास के लिये आईटी उद्योग की व्यापक भागीदारी पर केंद्रित उद्योग के प्रमुखों के साथ व्यापक विचार विमर्श किया गया। आईटी क्षेत्र के प्रमुखों ने ‘मी टू वी’ और ‘सेल्फ टू सोसाइटी’ नामक आंदोलन में शामिल होने और सक्रिय रूप से भाग लेने पर सहमति व्यक्त की।

पृष्ठभूमि

  • भारत में, कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी की अवधारणा कई चरणों में विकसित हुई है।
  • 19वीं शताब्दी में टाटा, बिड़ला, गोदरेज और अन्य व्यावसायिक घरानों ने सामाजिक गतिविधियों के प्रति झुकाव प्रदर्शित किया था और वे अब भी बड़े पैमाने पर इस ओर अग्रसर हैं।
  • 1960-80 के बीच जब भारतीय कंपनियाँ उच्च कर, लाइसेंसिंग और प्रतिबंधों का सामना कर रही थीं, तो निजी कंपनियाँ कॉर्पोरेट कदाचार में शामिल हो गईं। यही वह समय था जब कॉर्पोरेट गवर्नेंस, श्रम और पर्यावरण के मुद्दों पर कानून लागू किये गए थे। इसी समय CSR को भी लागू करने का प्रयास किया गया था।
  • 1980 के बाद जब लाइसेंसिंग को कुछ हद तक कम कर दिया गया, तो कंपनियाँ कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी के रूप में सामाजिक गतिविधियों में योगदान करने के लिये तैयार हो गईं।
  • कंपनी अधिनियम, 1956 में CSR के लिये स्पष्ट प्रावधान था लेकिन नए कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 (1) के दायरे में आने वाली कंपनियों के लिये CSR अनिवार्य बनाया गया है।

क्या है कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी?

  • कंपनियों का सामाजिक दायित्व, जिसे अंग्रेज़ी में कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसिब्लिटी (Corporate Social Responsibility) यानी CSR कहते हैं, केंद्र सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के अधीन आता है। इस संबंध में नियम कॉर्पोरेट मंत्रालय ही बनाता है।
  •  राज्य सरकारें उन नियमों के तहत अपने राज्य के लोगों के सामाजिक लाभ के लिये इन कंपनियों से खर्च कराती हैं।
  • सामान्य अर्थों में ‘कार्पोरेट सामाजिक जबावदेही’(CSR) कार्पोरेट घरानों का समाज के प्रति उत्तरदायित्व तथा जबावदेही को दर्शाता है।
  • CSR व्यापारिक और औद्योगिक कंपनियों द्वारा अपनाया गया स्व-नियंत्रण है जिसके अंतर्गत वे ऐसे व्यापारिक मॉडल के अनुसार काम करती हैं जो कानून-सम्मत, नैतिक मानकों एवं अंतर्राष्ट्रीय रीति के अनुकूल हो।
  • इसके अंतर्गत कंपनी द्वारा कुछ ऐसे कार्य किये जाते हैं जो पर्यावरण, आम जनता, उपभोक्ता, कर्मचारी तथा शेयरधारकों पर सकारात्मक प्रभाव डाले।
  • भारत में CSR से संबंधित निश्चित कानूनी प्रावधान किये गए हैं। भारत विश्व का पहला देश है जहाँ कंपनियों को CSR पर निश्चित राशि खर्च करने की बाध्यता है।

किन कंपनियों पर CSR नियम लागू होंगे?

कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135, CSR के संबंध में बात करती है। इसके अनुसार-

♦ प्रत्येक कंपनी जिसकी निवल संपत्ति 500 करोड़ रुपए या अधिक अथवा
♦ कारोबार 1000 करोड़ रुपए या अधिक अथवा
♦ किसी वित्तीय वर्ष में निवल लाभ 5 करोड़ रुपए या अधिक है, वह एक कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व समिति का गठन करेगी।
♦ जिसके बोर्ड में तीन या अधिक निदेशक होंगे और जिसमें कम-से-कम एक स्वतंत्र निदेशक होगा। यह बोर्ड CSR की रचना के संबंध में निर्णय लेगा।
♦ नियम के मुताबिक, CSR के दायरे में आने वाली कंपनियों को अपने तीन साल के औसत वार्षिक शुद्ध लाभ का 2% हिस्सा इस तरह की गतिविधियों पर हर साल खर्च करना अनिवार्य है।
♦ CSR के तहत गरीबी उन्मूलन, कुपोषण से मुक्ति, भुखमरी से मुक्ति, स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण आदि के क्षेत्र में कार्य किये जा सकते हैं।
♦ नियम के मुताबिक, कंपनियों को अपनी CSR नीति बनानी होती है और उस नीति की उन्हें घोषणा भी करनी होती है।
♦ घोषणा में उन्हें पूरे वित्त वर्ष के लिये अपनी योजनाओं, गतिविधियों, कार्यक्रमों और परियोजनाओं का स्पष्ट उल्लेख करना होता है। उन्हें बताना होता है कि वे अपने लाभ की 2% राशि किस क्षेत्र में, किन के बीच और किस तरह खर्च करेंगी।

CSR की गतिविधियाँ 

नियमों में CSR से संबंधित गतिविधियों की सूची दी गई है जो CSR के दायरे में आती हैं। यह सूची नियम की 7वीं अनुसूची में शामिल है। कंपनियों को इन्हीं में से अपने CSR के लिये गतिविधियों का चयन करना होता है।

  • सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना।
  • राष्ट्रीय धरोहर, कला और संस्कृति की सुरक्षा, जिसमें ऐतिहासिक महत्त्व वाली इमारतें, स्थल एवं कला शामिल है।
  • अनाथालय और छात्रावास की स्थापना इसके लिये भवन का निर्माण, उनका रख-रखाव व संचालन।
  •  पारंपरिक कला एवं हस्तशिल्प को बढ़ावा देना और उनका विकास।
  • वृद्धाश्रम की स्थापना, इसके लिये भवन का निर्माण, रख-रखाव व संचालन।
  •  महिलाओं के लिये घर और छात्रावासों की स्थापना।
  • डे केयर केंद्रों की स्थापना, इसके लिये भवन का निर्माण, रख-रखाव व संचालन।
  • ग्रामीण खेलों, राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त खेलों, ओलंपिक खेलों और पैरालंपिक खेलों को बढ़ावा देने के लिये प्रशिक्षण मुहैया कराना।
  • शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिये कार्य।
  • केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में स्थित प्रौद्योगिकी इनक्यूबेटरों के लिये फंड मुहैया कराना।
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
  •  वनस्पतियों व जीवों का संरक्षण, पशु कल्याण और कृषि वानिकी का संरक्षण।
  • पारिस्थितिक संतुलन को सुनिश्चित करना।
  • ग्रामीण विकास परियोजनाएँ।
  • असामानता का दंश झेल रहे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों के लिये काम करना।
  • युद्ध में मारे गए शहीदों की विधवाओं, सशस्त्र बलों के जवानों और उनके आश्रितों के लाभ से जुड़े कार्य।
  • स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को बढ़ावा।
  •  आजीविका वृद्धि संबंधी परियोजनाएँ।

CSR की ज़रूरत क्यों?

  • यह एक हकीकत है कि भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग विपन्न है। उसके लिये बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, पेयजल, स्वच्छता एवं साफ-सफाई आवास इत्यादि सुविधाएँ सुनिश्चित किये जाने की तत्काल ज़रूरत है।
  • हालाँकि केंद्र और राज्य सरकारों ने इसके लिये पहल करते हुए अनेक योजनाएँ एवं कार्यक्रम शुरू किये हैं जिनमें सफलता भी प्राप्त हुई है। फिर भी वंचित वर्ग के करोड़ों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की ज़रूरत है।
  • समाज कल्याण तथा सामाजिक न्याय की मंशा के बावजूद केंद्र तथा राज्य सरकारों के सामने इस कार्य को करने के लिये वित्तीय संसाधनों का अभाव एक बड़ी समस्या है।
  • उपलब्ध आँकड़ों के मुताबिक, CSR कानून मौद्रिक योगदान में सालाना 600 मिलियन डॉलर से 2 बिलियन डॉलर तक वृद्धि करने में मदद करेगा।
  • इससे कॉर्पोरेट उपक्रमों को आम जनता के लिये सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय गतिविधियों की ज़िम्मेदारी लेने में अधिक मदद मिलेगी।
  • विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों द्वारा संकलित आँकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2016 की तुलना में CSR गतिविधियों पर खर्च की गई कुल राशि वर्ष 2017 में 20 प्रतिशत बढ़ गई है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक-निजी भागीदारी से करोड़ों वंचित लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना संभव है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसा कोई तालमेल बनाना खासा मुश्किल है और उसकी राह में कुछ अवरोध भी होंगे।
  • हालाँकि इसके लिये पूरी प्रक्रिया की उचित ढ़ंग से निगरानी भी करनी होगी। केवल उठाए गए कदमों से काम नहीं चलने वाला।

कानून का प्रभाव 

  • कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्वों और निरंतरता पर सार्वजनिक उपक्रम विभाग के दिशा-निर्देशों में समावेशी विकास, पिछड़े क्षेत्रों का विकास, समाज के कमज़ोर और पिछड़े वर्गों की उन्नति, महिलाओं के सशक्तीकरण, पर्यावरणीय निरंतरता और पर्यावरण अनुकूल और ऊर्जा बचाने वाली तकनीक और निरंतरता विकास के सभी विस्तृत पहलू सम्मिलित हैं।
  • डीपीई दिशा-निर्देशों के द्वारा सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के प्रबंधन द्वारा सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी के तहत व्यवसाय करने, जिससे कि निरंतर विकास को बल मिले, संबंधी सुधार देखे गए हैं।
  • कानून के अधिनियमन के बाद निजी क्षेत्र का संयुक्त धर्मार्थ व्यय 2013 में 33.67 अरब रुपए से बढ़कर 250 अरब रुपए हो गया है।
  • कंपनियों को अब अपने कानूनी दायित्वों को पूरा करने के लिये आवश्यक संसाधनों, समय-सारिणी और रणनीतियों के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा।

CSR में भाग लेने वाली अग्रणी कंपनियाँ

1. टाटा पावर- टाटा पावर कंपनी कॉर्पोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी निभाने में सक्रिय रूप से शामिल है। 2012 में इसने भारत सरकार के साथ आगा खान ग्रामीण सहायता कार्यक्रम तथा कोस्टल गुजरात प्राइवेट लिमिटेड (CGPL) ने एक समुदाय आधारित टिकाऊ आजीविका कार्यक्रम शुरू किया। सागरबंधु नामक इस पहल को मांडवी तालुका में मोधवा और त्रिगाड़ी के गाँवों में केंद्रित किया गया था। यह कार्यक्रम मछुआरों को वैकल्पिक रोज़गार प्रदान करने के लिये चलाया गया था।

2. कॉग्निजेंट- कॉग्निज़ेंट फाउंडेशन ‘2005 में भारतीय कंपनी अधिनियम के तहत “चैरिटेबल कंपनी” के रूप में पंजीकृत है, कॉग्निजेंट फाउंडेशन ने भारतीय समाज के वंचित वर्ग की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच हासिल करने में मदद की है। इसने देश भर में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में वित्तीय तथा तकनीकी सहायता द्वारा शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत की है।

3. इंफोसिस- एक अग्रणी सॉफ्टवेयर कंपनी के रूप में इंफोसिस कंप्यूटर की शिक्षा प्रदान कर रही है। कंपनी ने वंचित बच्चों के लिये विशेष कार्यक्रम चलाए हैं जिसके माध्यम से कंपनी उन्हें विभिन्न कौशल सिखाती है। कंपनी ज़रूरतमंदों को कैरम, शतरंज बोर्ड, चॉकलेट इत्यादि भी दान करती है। कंपनी की सीएसआर गतिविधियों में रक्तदान शिविर, नेत्र दान शिविर, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक पुनर्वास के क्षेत्रों में काम करना शामिल है।

4. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS)- टीसीएस भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी है। इसने सामुदायिक विकास कार्य शुरू करने के लिये एशियाई सीएसआर पुरस्कार जीता है। कंपनी ने नैतिक मूल्यों को शामिल करते हुए निरंतर प्रतिबद्धता के साथ विभिन्न कार्यक्रमों को लागू करने में ईमानदारी और समर्पण की भावना दिखाई है। कंपनी का अधिकांश ध्यान शिक्षा क्षेत्र पर है। कंपनी साक्षरता कार्यक्रम पर भी काम कर रही है जो वयस्कों को शिक्षण-प्रशिक्षण के लिये कंप्यूटर आधारित साक्षरता मॉडल तैयार करती है और इसे वयस्क साक्षरता कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है।

5. एमआरएफ- इसके सीएसआर फोकस क्षेत्र स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा केंद्र हैं। समाज के कमज़ोर वर्ग के बच्चों के लिये कंपनी अपना कोचिंग सेंटर है और साथ ही करियर मार्गदर्शन सेमिनार संचालित करती है। यह स्थानीय सरकारी स्कूलों के छात्रों को अकादमिक छात्रवृत्ति पुरस्कार भी प्रदान करती है। इसके द्वारा मुख्य रूप से महिला सशक्तीकरण और सामाजिक जागरूकता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

6. तेल और प्राकृतिक गैस लिमिटेड (ONGC)- ओएनजीसी सीएसआर प्रथाओं में सक्रिय रूप से भाग लेती है। कंपनी को नई कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी का अभ्यास और शुरू करने के लिये ‘गोल्डन जुबली अवार्ड’ भी मिला है। कंपनी जल प्रबंधन की दिशा में काम कर रही है। वर्ष 2005 में राजस्थान के उत्तर-पश्चिम में ओएनजीसी द्वारा ‘परियोजना सरस्वती’ लॉन्च की गई थी। इस परियोजना का मूल उद्देश्य ताजा जल और गहरे भूजल संसाधनों का पता लगाना था। कंपनी ने देहरादून, आंध्र प्रदेश और उत्तर-पूर्वी राज्यों में शैक्षिक गतिविधियों का भी आयोजन किया है।

भारत में सीएसआर पहल की चुनौतियाँ

1. सामुदायिक भागीदारी- सीएसआर गतिविधियों में सामुदायिक भागीदारी की कमी है क्योंकि यह देखा गया है कि जब भी किसी कंपनी या संगठन द्वारा पहल की जाती है, तो लाभ प्राप्त करने वाले समुदाय कम रुचि दिखाते हैं। यह इस तथ्य के कारण है कि सीएसआर के बारे में जागरूकता या ज्ञान बहुत कम या न के बराबर है।

2. स्व लाभ- आमतौर पर भारत में कॉर्पोरेट सेक्टर सरकार द्वारा लगाए गए करों को बचाने के लिये इनको CSR के रूप में खर्च करता है| क्योंकि यह देखा गया है कि सीएसआर गतिविधि के लिये कॉर्पोरेट द्वारा दिया गया धन कर मुक्त के रूप में वर्गीकृत किया जाता है और इसलिये कई कॉर्पोरेट इस आधार पर काम करते हैं।

3. क्षमता निर्माण- प्रभावी सीएसआर तकनीक विकसित करने के लिये कई कंपनियों के पास कुशल मैनपावर और तकनीकी जानकारी नहीं है। प्रभावी सीएसआर नीतियों और रणनीतियों को विकसित करने के लिये यह एक आवश्यक तत्त्व है। सीएसआर पर किये गए व्यय सीधे सीएसआर नीतियों से जुड़ा होता है जो कि तैयार की जा रही है।

4. कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी केवल एक अवधारणा नहीं- कॉर्पोरेट क्षेत्र को यह समझना चाहिये कि सीएसआर सिर्फ एक अवधारणा नहीं है कि उसे मोटे तौर पर या अन्य तरीकों से इसका पालन करना और इसमें योगदान देना है, बल्कि इसमें सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक कारकों को शामिल करना चाहिये और कॉर्पोरेट को परोपकारी दृष्टिकोण से इसे देखना होगा।

5. CSR समीक्षा- वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिये तैयार की जाने वाली नीतियों का मूल्यांकन और क्रियान्वयन किया जाना चाहिये। ऐसे संगठन जिसने CSR गतिविधियों में निवेश किया है, उसे समाज या लक्षित वर्ग पर इसके प्रभाव का विश्लेषण करना चाहिये। लेकिन भारत में परिदृश्य अपारदर्शी है। कंपनियाँ केवल व्यक्तिगत लाभ और प्रचार के लिये सीएसआर गतिविधियों पर पैसा खर्च करती हैं। सीएसआर के दीर्घकालिक लाभों को ध्यान में नहीं रखा जाता है।

6. पारदर्शिता का मुद्दा- सीएसआर गतिविधियों पर कितनी राशि खर्च की गई है, यह जाँचने के लिये कोई शासी निकाय नहीं है। इस संबंध में किसी भी प्रकार का विनियमन उपलब्ध नहीं है। यह उन कंपनियों के बीच विश्वास निर्माण की प्रक्रिया को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है जो किसी भी सीएसआर पहल की सफलता की कुंजी है।

7. सीएसआर पहल की ओर संकीर्ण धारणा- आमतौर पर कंपनियों की सीएसआर पहलों के प्रति गैर-सरकारी संगठनों और सरकारी एजेंसियों का एक संकीर्ण दृष्टिकोण होता है। नतीजतन, कॉर्पोरेट के लिये तय करना मुश्किल होता है कि उन्हें मध्यम और लंबी अवधि में ऐसी गतिविधियों में भाग लेना चाहिये या नहीं।

आगे की राह 

  • CSR पहल को और अधिक प्रभावी बनाने के लिये आम जनता के बीच CSR के बारे में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। इस क्षेत्र में कॉर्पोरेट घरानों द्वारा किये गए सराहनीय कार्यों को उजागर करने के लिये मीडिया सहित विभिन्न हितधारकों द्वारा इस बारे में जागरूकता फ़ैलाने का काम किया जाना चाहिये।
  • कंपनियाँ समाज की विभिन्न समस्याओं को उठा सकती हैं और CSR के तहत उस पर काम कर सकती हैं।
  • यदि कर्मचारियों से सहयोग और योगदान नहीं मिल पा रहा है तो कंपनियों को अकेले CSR गतिविधियों पर काम नहीं करना चाहिये और न ही वे कर सकते हैं।
  • CSR गतिविधियों के बढ़ाने में योगदान देने हेतु शेयरधारकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
  • इस क्षेत्र में ज्ञान और जागरूकता फैलाने के लिये कंपनियों द्वारा सम्मेलन, सेमिनार, कार्यशालाएँ तथा प्रशिक्षण सत्र आयोजित किये जाने चाहिये।
  • विभिन्न कंपनियों द्वारा तैयार की गई मौजूदा नीतियों की समीक्षा करना भी महत्त्वपूर्ण है और कार्यान्वयन भी इस तरह से किया जाना चाहिये ताकि वांछित परिणाम प्राप्त किया जा सके।
  • एक सामाजिक उद्देश्य के साथ नए नागरिक समाज संगठनों को CSR के विकास में भागीदार बनाया जाना चाहिये। ऐसे संगठन मुख्य रूप से धनदाता की बजाय कॉर्पोरेट पर निर्भर होंगे और विशेष मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जैसे-स्वच्छता, स्वच्छ जल, बाल एवं मातृत्व स्वास्थ्य आदि।

निष्कर्ष 

कंपनियों द्वारा सामाजिक विकास के क्षेत्र में किये जाने वाले योगदान के प्रति समाज की उम्मीदें बढ़ रही हैं। इसलिये कंपनियों को समाज में अपनी बेहतर छवि बनाने के लिये सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करना आवश्यक है। हालाँकि कंपनियाँ सतत् विकास के लिये गंभीर प्रयास कर रही हैं। ऐसे लोग भी हैं जो दावा करते हैं कि CSR कुछ अनुचित उद्देश्यों की पूर्ति करती है जबकि अन्य इसे मिथक मानते हैं। भारत में CSR एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहा है क्योंकि यहाँ पहले से ही सक्षम संगठनों और नियामक निकायों की एक बड़ी संख्या मौजूद है। इन संस्थानों ने पहले से ही अपनी गति तेज़ कर ली है और CSR का व्यापक स्तर पर अभ्यास करने के साथ ही बिना जोखिम उठाए व्यावसायिक विकास द्वारा असमानताओं को कम करने में सफलता सुनिश्चित करने हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ज़रूरत है CSR गतिविधियों पर खर्च होने वाली प्रस्तावित राशि सरकार द्वारा तय करने की। इस गतिविधि के एक हिस्से के रूप में विभिन्न कंपनियों द्वारा सामाजिक और पर्यावरणीय विकास कार्यक्रमों को इसमें शामिल किया जाना चाहिये।