UPSC DAILY CURRENT IN HINDI 26-10-2018

सियोल शांति पुरस्कार

SeoulPeace Prize

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग और वैश्विक आर्थिक विकास को बढ़ावा देने, आर्थिक विकास को गति देकर देश के लोगों के जीवन स्‍तर को सुधारने, भ्रष्‍टाचार निरोधक उपायों व सामाजिक एकता के प्रयासों के ज़रिये देश में लोकतंत्र को मज़बूत बनाने के लिये 2018 के सियोल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जाएगा।

  • सियोल शांति पुरस्‍कार समिति ने यह सम्‍मान प्रदान करने के लिये प्रधानमंत्री के नाम का चयन किया है।
  • समिति ने ‘मोदी सिद्धांत’ और एक्‍ट ईस्‍ट पॉलिसी’ के माध्‍यम से दुनिया भर के देशों के साथ एक सक्रिय विदेश नीति के ज़रिये क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के प्रति उनके योगदान को भी स्‍वीकार किया है।
  • यह पुरस्कार प्राप्‍त करने वाले नरेंद्र मोदी 14वें व्‍यक्ति हैं।

पृष्‍ठभूमि

  • सियोल शांति पुरस्‍कार की शुरुआत 1990 में कोरिया गणराज्‍य में 24वें ओलंपिक खेलों के सफल आयोजन के उपलक्ष्‍य में की गई थी। इन खेलों में दुनिया भर के 160 देशों के खिलाडि़यों ने भाग लेते हुए सद्भाव, मित्रता, शांति और आपसी मेल-मिलाप के विश्वव्यापी माहौल का निर्माण किया।
  • यह पुरस्‍कार कोरियाई लोगों की देश और दुनिया में शांति बनाए रखने की इच्‍छा का प्रतीक है।
  • यह पुरस्‍कार मानवता के कल्‍याण और विश्व शांति के प्रयास में योगदान देने वाले व्‍यक्तियों को प्रत्‍येक दो वर्ष में एक बार दिया जाता है।
‘मैं नहीं हम’ पोर्टल और एप

Digital India

  • 24 अक्तूबर, 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में ‘मैं नहीं हम’ पोर्टल और एप लॉन्च किया। ‘मैं नहीं हम’ पोर्टल ‘सेल्फ4सोसाइटी’ की थीम पर काम करेगा।
  • यह पोर्टल आईटी क्षेत्र से जुड़े कारोबारियों और संगठनों को सामाजिक सरोकारों और समाज सेवा से जुड़े उनके प्रयासों को एक साथ लाने के लिये मंच प्रदान करेगा।
  • इसके माध्‍यम से प्रौद्योगिकी का लाभ समाज के कमज़ोर तबके तक पहुँचाने के लिये परस्‍पर सहयोग के प्रयासों में तेज़ी लाई जा सकेगी।
  • पोर्टल के ज़रिए समाज की बेहतरी के लिये काम करने के इच्‍छुक लोगों की व्‍यापक सहभागिता को भी बढ़ावा दिया जा सकेगा।
PBW-343 नामक गेहूँ की किस्म

PBW 343

पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू) ने PBW-343 नामक गेहूँ की किस्म को एक नए रूप में लॉन्च किया है, जिसमें दो जोड़ी पत्ते और पीला जंग (rust, यह पौधों में होने वाली एक फंगल बीमारी है जिसके परिणामस्वरूप पौधों में लाल या भूरे रंग के चकते हो जाते हैं), प्रतिरोधीजीन – Lr37/Yr17 and Lr76/Yr70 शामिल हैं। गेहूँ की इस नई किस्म को PBW-343 Unnat नाम दिया गया है।

  • PBW-343 को तैयार करने की इस पूरी प्रक्रिया को मार्कर-समर्थित चयन (marker-assisted selection) नामक बायोटेक्नोलॉजी आधारित पौधा प्रजनन (plant breeding) तकनीक द्वारा संपन्न किया गया है। यह गेहूँ अपनी तरह की पहली ऐसी विकसित किस्म है।
  • PBW-343, अंतर्राष्ट्रीय मक्का और गेहूँ सुधार केंद्र या मेक्सिको में CIMMYT  में उत्पादित गेहूँ की ‘वेरी’ लाइनों पर आधारित है, नब्बे के दशक के मध्य से पिछले दशक तक यह प्रजाति भारतीय किसानों के बीच लोकप्रिय थी। लेकिन वर्ष 2007 में बड़े स्तर पर फसल को नुकसान पहुँचने के कारण किसानों का रुझान इस ओर कम हो गया।
  • लेकिन, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा 2011-12 और 2013-14 में क्रमशः विकसित HD-2967 और  HD-3086  के लॉन्च होने के बाद PBW-343 फिर से चर्चा का विषय बन गया है।
  • HD-2967 किस्म का इस्तेमाल करने से किसान प्रति एकड़ 21 क्विंटल गेहूँ का उत्पादन कर सकता है, लेकिन इसके साथ समस्या यह है कि यह पीले और भूरे रंग के धब्बों/चकतों के लिये अतिसंवेदनशील है। इसी प्रकार HD-3086 भी  ब्राउन rust के मामले में कमज़ोर साबित होता है, लेकिन यह अभी भी उपज के मामले में किसानों को सर्वोत्तम परिणाम दे रहा है। इस क्रम में PBW-343 Unnat के सफल होने की संभावनाएँ काफी है।
  • ‘उन्नत’ प्रारंभिक गेहूँ की एक किस्म है, जो एचडी -2967 की तरह अक्तूबर के चौथे सप्ताह से नवंबर के चौथे सप्ताह में 155 दिनों की परिपक्वता अवधि के साथ बोई जा सकती है। परीक्षण के अनुसार उन्नत की औसत उपज प्रति एकड़ 23.2 क्विंटल होने का अनुमान है।
अंडर-16 स्नूकर वर्ल्ड चैंपियनशिप

Snooker World Champions

30 सितंबर से 6 अक्तूबर, 2018 तक रूस के सेंटपीटर्सबर्ग में अंडर-16 स्नूकर वर्ल्ड चैंपियनशिप का आयोजन किया गया।

  • महिला वर्ग में भारत की कीर्थना पांडियन और पुरुष वर्ग में बेल्जियम के बेन मार्टेंस ने अंडर-16 स्नूकर वर्ल्ड चैंपियनशिप का ख़िताब जीता।
  • भारत की कीर्थना पांडियन के लिये यह पहला अंतर्राष्ट्रीय खिताब है। कीर्थना ने फाइनल में बेलारूस की अल्बिना लेस्चुक को 3-1 से हराकर यह खिताब जीता।
  • बेन ने फाइनल मुकाबले में आयरलैंड के आरोन हिल को 4-3 से हराकर यह खिताब जीता।

 

सतत् विकास लक्ष्यों की निगरानी हेतु समिति के गठन को मंज़ूरी

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 2: शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
(खंड- 13 : स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय)
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: प्रौधौगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड- 02 : समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय)

goals

चर्चा में क्यों?

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सतत् विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals- SDGs) की निगरानी के लिये राष्ट्रीय संकेतक ढाँचे (National Indicator Framework- NIF) की समय-समय पर समीक्षा और उसमें सुधार के लिये एक उच्चस्तरीय प्राकलन समिति के गठन को मंज़ूरी दे दी है।

समिति का प्रारूप एवं कार्य

  • उच्चस्तरीय समिति की अध्यक्षता भारत के मुख्य सांख्यिकीविद् तथा सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation- MoSPI) के सचिव करेंगे।
  • समिति में आँकड़ा स्रोत मंत्रालयों और नीति आयोग के सचिव सदस्य के रूप में होंगे। इसके अलावा अन्य संबद्ध मंत्रालयों के सचिव विशेष रूप से आमंत्रित होंगे।
  • इसका कार्य समय-समय पर संकेतकों में सुधार सहित राष्ट्रीय संकेतक ढाँचे की समीक्षा करना होगा।

लक्ष्य

  • विकास संबंधी चुनौतियों का सामना करने के लिये वर्तमान राष्ट्रीय कार्यक्रमों और रणनीतिक कार्य योजनाओं में मुख्य रूप से सतत विकास लक्ष्यों के उपाय करना।
  • NIF के सांख्यिकीय संकेतक राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर SDG की निगरानी की रीढ़ होंगे और विभिन्न लक्ष्यों को हासिल करने की नीतियों के परिणामों का वैज्ञानिक तरीके से मूल्यांकन करेंगे।
  • सांख्यिकी संकेतक के आधार पर MoSPI SDG के कार्यान्वयन पर राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। यह रिपोर्ट प्रगति के आकलन को सरल बनाने, चुनौतियों की पहचान करने और राष्ट्रीय स्तर पर आगे कार्य करने के लिये सिफारिशें देगी।
  • आँकड़ा स्रोत मंत्रालय/विभाग आवश्यक अंतरालों पर इन संकेतकों के बारे में और SDG के राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय प्रतिवेदन के लिये MoSPI को नियमित और अलग-अलग जानकारी प्रदान करेगा।
  • सतत् विकास लक्ष्यों की त्वरित और प्रभावी निगरानी के लिये अत्याधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा।

प्रभाव

  • SDG में विकास के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण संबंधी आयामों को समाहित किया गया है। इसका उद्देश्य ‘सबका साथ सबका विकास’ की मूल भावना के साथ बदलते विश्व में गरीबी का उन्मूलन और समृद्धि को बढ़ावा देना है।
  • 17 लक्ष्यों और 169 उद्देश्यों के साथ SDG निरंतर, समग्र और समान आर्थिक विकास को बढ़ावा देने, सभी के लिये अधिक अवसर सृजित करने, असमानता कम करने, रहन-सहन के मूलभूत स्तर में सुधार, समान सामाजिक विकास को बढ़ावा और समावेशन, प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी प्रणाली के समेकित और निरंतर प्रबंधन को बढ़ावा देना चाहता है।
  • NIF राष्ट्रीय स्तर पर SDG की प्रकृति के बारे में परिणाम आधारित निगरानी और जानकारी देने में मदद करेगा।

पृष्ठभूमि

  • न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पर वर्ष 2000 में हुई सहस्‍त्राब्‍दी शिखर बैठक में विकास संबंधी आठ उद्देश्यों को स्वीकार किया गया, जिन्हें सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य (Millennium Development Goals- MDGs) के नाम से जाना जाता है। इसने वर्ष 2000 से वर्ष 2015 के बीच देशों के लिये उनकी राष्ट्रीय विकास रणनीतियों का अनुसरण करने का खाका तैयार किया।
  • MDG के आठ लक्ष्य हैं और इसमें विकास के विभिन्न मुद्दों को रखा गया है।
  • MDG के उद्देश्यों को विभिन्न देशों में असमान रूप से हासिल कर लिया गया और यह आवश्यकता महसूस की गई कि इसकी उपयोगिता का आकलन करने और 2015 के बाद विश्व में विकास सहयोग के मार्गदर्शन के लिये संभावित उत्तराधिकारी का पता लगाने हेतु नए सिरे से विचार-विमर्श किया जाए।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने 70वें अधिवेशन में अगले 15 वर्षों के लिये सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों पर विचार किया और उसे स्वीकृत किया। 01 जनवरी, 2016 से 17 सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य अस्तित्व में आए।

आगे की राह

  • हालाँकि SDG को लागू करने के लिये कानूनी रूप से कोई बाध्यता नहीं है, लेकिन अगले 15 वर्षों के दौरान इसमें अंतर्राष्ट्रीय दायित्व और देशों की घरेलू व्यय प्राथमिकताओं में बदलाव लाने की संभावनाएँ हैं।
  • उम्मीद है कि देश इसका स्वामित्व लेंगे और इन उद्देश्यों को हासिल करने हेतु  राष्ट्रीय ढाँचा स्थापित करेंगे।
  • इसका कार्यान्वयन और सफलता देशों की अपनी निरंतर विकास नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों पर निर्भर करेगी।
  • देश लक्ष्यों और उद्देश्यों के कार्यान्वयन में हुई प्रगति के संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर आगे कार्य करने और समीक्षा करने के लिये ज़िम्मेदार होंगे।
  • SDG के अंतर्गत प्रगति की निगरानी के लिये राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने के लिये गुणवत्ता, पहुँच और समय पर आँकड़ों की ज़रूरत होगी।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय संकेतक ढाँचे के कार्यान्वयन पर कोई प्रत्यक्ष वित्तीय प्रभाव नहीं पड़ेगा। तथापि संबद्ध मंत्रालयों को SDG संकेतकों की निगरानी कि प्रक्रिया को सरल बनाने के लिये उनकी सांख्यिकी प्रणालियों को फिर से संगठित और मज़बूत बनाना होगा। उम्मीद है कि SDG लोगों के जीवन में बदलाव लाएगा और SDG के कार्यान्वयन की प्रगति की निगरानी से पूरे देश को लाभ मिलेगा।

 

दिवाली के पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र -3 : प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड- 14 : संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।)

Diwali

चर्चा में क्यों?

हाल ही सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली के दौरान उपयोग किये जाने वाले पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पटाखे से जुड़े उद्योगों के अधिकारों तथा जनता के स्वास्थ्य के मध्य सामंजस्य बैठाने का प्रयत्न किया है।

निर्णय से जुड़े प्रमुख बिंदु

  • पटाखे जलाने हेतु सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय-सीमा तय की है जो कि इस प्रकार है-
    ♦ दिवाली के दिन 8 PM से 10 PM।
    ♦ क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या पर 11:55 PM से 12:30 AM।
  • पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) द्वारा पटाखों में लिथियम, आर्सेनिक, लेड और पारा जैसे प्रतिबंधित रसायनों की उपस्थिति का परीक्षण किया जाएगा।
  • PESO यह सुनिश्चित करेगा कि बाज़ार में केवल ऐसे पटाखे ही उपलब्ध हों जिनसे उत्पन्न शोर का डेसिबल निर्धारित डेसिबल से ज़्यादा न हो।
क्यों होता है पटाखों के जलने से प्रदूषण?

  • पटाखों के जलने पर उनमें उपस्थित मैग्नीशियम और एल्युमीनियम जैसे रासायनिक लवणों के कारण चमक उत्पन्न होती है, जबकि इसमें ईंधन के रूप में गन पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है, जिसका निर्माण चारकोल और सल्फर से किया जाता है।
  • जब पटाखों को जलाया जाता है तो वे सभी लवण जो रंग उत्पन करते हैं, सीधे पीएम 2.5 और पीएम 10 में बदल जाते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, गन पाउडर में जो सल्फर मौजूद होता है वह सल्फर-डाइऑक्साइड में बदल जाता है जो कि एक विषाक्त गैस है।
  • आश्चर्यजनक है कि वर्ष 2017 में पटाखों के अधिक उपयोग के बावजूद भी दिवाली के दिन पिछले वर्ष की तुलना में प्रदूषण का स्तर कम रहा।
  • इसका कारण यह है कि शीत प्रदूषण का स्तर कई अन्य कारकों (जैसे- गंगा के मैदानी क्षेत्रों में धान की फसल में लगने वाली आग, जलावन के लिये डीज़ल का उपयोग करना और ठंडा मौसम जो प्रदूषकों के फैलाव में अवरोध उत्पन्न करता है) से भी प्रभावित होता है। ध्यातव्य है कि ये कारक साल-दर-साल परिवर्तित होते रहते हैं।
  • पटाखों में बेरियम साल्ट के प्रयोग पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।
  • कम उत्सर्जन वाले पटाखों (ग्रीन क्रैकर्स) के प्रयोग पर भी जोर दिया गया है जो PM को 30-35% तक कम कर देगा तथा नाइट्रस ऑक्साइड तथा सल्फर डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में काफी कमी लाएगा।
  • ऑनलाइन इ-कॉमर्स की वेबसाइट के द्वारा पटाखों की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।

पृष्ठभूमि

  • 9 अक्तूबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली के पहले दिल्ली एनसीआर इलाके में पटाखों की बिक्री को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित कर दिया था।
  • कोर्ट ने यह हवाला दिया था कि संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) आम जनता तथा पटाखा निर्माताओं दोनों के लिये लागू होता है। इसलिये पटाखे के देशव्यापी प्रतिबंध पर विचार करते हुए संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।

ग्रीन क्रैकर्स

  • ग्रीन क्रैकर्स ऐसे पटाखे हैं जिन्हें फोड़ने के पश्चात् हानिकारक रसायनों तथा गैसों का उत्सर्जन नहीं होता है। ऐसे पटाखों में हानिकारक संघटकों का प्रयोग नहीं किया जाता है जो वायु प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं।
  • सेंट्रल इलेक्ट्रोकेमिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CECRI), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी, नेशनल बॉटनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट और नेशनल केमिकल लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने कुछ ‘ग्रीन क्रैकर्स’ पटाखे, जैसे- सेफ वॉटर रिलीज़र (SWAS), सेफ थर्माइट क्रैकर (STAR) तथा सेफ मिनिमल एल्युमीनियम (SAFAL) विकसित किये हैं।

निष्कर्ष

इस प्रतिबंध का प्रभावी या अप्रभावी सिद्ध होना आगे का विषय है। परंतु पिछले साल लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद भी प्रदूषण का उच्च स्तर यह दर्शाता है कि प्रदूषण के अन्य स्रोत जैसे- वाहनों से होने वाले उत्सर्जन, उद्योगों से निकलने वाली दूषित गैसें तथा अन्य कारकों को सरकार द्वारा नज़रंदाज़ किया गया है। अतः केवल पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाकर प्रदूषण के स्तर में वांछित कमी की इच्छा करना प्रासंगिक प्रतीत नहीं होता है। यह आवश्यक है कि सरकार वर्ष भर अन्य स्रोतों के माध्यम से होने वाले प्रदूषण पर नियंत्रण करने हेतु भी इसी प्रकार के ठोस कदम उठाए।

 

बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम, 1988

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3 : प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
(खंड- 01 : भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।)
(खंड- 18 : संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।)

PBPT

संदर्भ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्‍यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम (Benami Property Transactions Act – PBPT), 1988 के तहत निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) के गठन और अपीलीय न्‍यायाधिकरण (Appellate Tribunal) की स्‍थापना को स्‍वीकृति दे दी है।

मुख्‍य बिंदु

I. पीबीपीटी अधिनियम के तहत तीन अतिरिक्‍त खंडपीठों के साथ निर्णायक प्राधिकरण का गठन और अपीलीय न्‍यायाधिकरण की स्‍थापना की जाएगी।

II. निर्णायक प्राधिकरण की खंडपीठों और अपीलीय न्‍यायाधिकरण को अधिकारीगण एवं कर्मचारीगण उपलब्‍ध कराए जाएंगे। आयकर विभाग/केंद्रीय प्रत्‍यक्ष कर बोर्ड (Central Board of Direct Taxes – CBDT) में समान स्‍तर/रैंक वाले वर्तमान पदों का उपयोग अन्‍यत्र करके यह काम पूरा किया जाएगा।

III. निर्णायक प्राधिकरण और अपीलीय न्‍यायाधिकरण दिल्‍ली के राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र (National Capital Territory of Delhi – NCTD) में ही अवस्‍थित होंगे।

IV. निर्णायक प्राधिकरण की खंडपीठ कोलकाता, मुंबई और चेन्‍नई में अवस्थित हो सकती है। प्रस्‍तावित निर्णायक प्राधिकरण के अध्‍यक्ष के साथ सलाह-मशवि‍रा करने के बाद ही इस बारे में आवश्‍यक अधिसूचना जारी की जाएगी।

लाभ

  • उपर्युक्‍त मंजूरी मिल जाने से निर्णायक प्राधिकरण को सौंपे गए मामलों का कारगर एवं बेहतर निपटान संभव होगा और इसके साथ ही निर्णायक प्राधिकरण के ऑर्डर के खिलाफ अपीलीय न्‍यायाधिकरण में की जाने वाली अपील का भी त्‍वरित निपटान संभव हो पाएगा।
  • निर्णायक प्राधिकरण के गठन से PBPT अधिनियम के तहत की जाने वाली प्रशासनिक कार्रवाई की प्रथम चरण की समीक्षा करने में मदद मिलेगी।
  • प्रस्‍तावित अपीलीय न्‍यायाधिकरण की स्‍थापना से PBPT अधिनियम के तहत निर्णायक प्राधिकरण द्वारा जारी किये जाने वाले ऑर्डर के खिलाफ अपील करने की समुचित व्‍यवस्‍था संभव हो पाएगी।

बेनामी लेन-देन (निषेध) अधिनियम, 1988

बेनामी लेन-देन (निषेध) संशोधन विधेयक, 2015 का उद्देश्य बेनामी लेन-देन (निषेध) अधिनियम, 1988 में संशोधन करना है। इस नए संशोधित कानून से बेनामी संपत्ति को ज़ब्त करने और मुकदमा चलाने का अधिकार प्राप्त हुआ। इस प्रकार प्रमुख राजस्व को विशेष रूप से रियल एस्टेट की बेनामी संपत्ति में काले धन के रूप में लगाए जाने का रास्ता अवरुद्ध होगा।

  • विधेयक में इसके लिये दायरे का विस्तार किया गया है, जिसमें संदिग्ध नामों के तहत खरीदी गई संपत्तियों को भी शामिल किया गया है और ऐसी स्थितियों को भी जोड़ा गया है जिसमें मालिक अपने मालिकाना हक से अंजान होता है। ऐसे सौदों को अंजाम देने वालों की धरपकड़ भी की जाएगी।
  • यदि संपत्ति पत्नी, बच्चे या परिवार के किसी निकट सदस्य के नाम पर है तो वह बेनामी संपत्ति की श्रेणी में नहीं आएगी। लेकिन यदि किसी तीसरे पक्ष के नाम पर दर्ज है, तब उस स्थिति में ऐसी संपत्ति को ज़ब्त किया जा सकता है।
  • संशोधित विधेयक सरकार को यह अधिकार देता है कि वह बेनामी संपत्तियों को ज़ब्त कर सकती है।
  • इसमें सरकार को वैधानिक और प्रशासनिक शक्तियाँ दी गई हैं, जिससे वह बेनामी कानून लागू होने की राह में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों से पार पाने में सक्षम होगी।
  • आय घोषणा योजना के तहत भी कोई व्यक्ति अपनी बेनामी संपत्ति की घोषणा कर सकता है और उसे बेनामी अधिनियम के प्रावधानों से राहत दी जाएगी।
  • इस विधेयक का उद्देश्य एक व्यापक समावेशी ढाँचा तैयार करना है, जिसमें बेनामी संपत्तियों के बेहतर नियमन हेतु विशेष सुनवाई प्राधिकरण का गठन किया जाएगा।
  • अधिनियम के प्रावधानों के तहत एक उचित प्राधिकरण का गठन किया जाएगा। इस विधेयक में चार स्तरीय नियामकीय ढाँचे के गठन का प्रस्ताव है, जिसमें एक पहल अधिकारी, एक स्वीकृति प्राधिकरण, एक प्रशासक और सुनवाई प्राधिकरण होगा।
  • विधेयक में नियमों का उल्लंघन करने की स्थिति में सख्त सज़ा का प्रावधान किया गया है। इसमें बेनामी संपत्ति खरीदने की स्थिति में सात साल की सज़ा हो सकती है। साथ ही एजेंसियों को गलत सूचनाएँ देने के कारण भी पाँच साल जेल में काटने पड़ सकते हैं।
  • संशोधन में एक अपीलीय पंचाट के गठन का भी प्रावधान है, जो अपील की सुनवाई के लिये एक स्वतंत्र निकाय के रूप में काम करे और मामले के उच्च न्यायालय में जाने से पहले ही यहाँ उसकी सुनवाई हो सके।