UPSC IAS के लिए साप्ताहिक लेख 23-09-2018

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गाँव की वास्तविक समस्या

एक आर्थिक सर्वेक्षण, जिसमें नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एण्ड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) भी शामिल है, से पता चलता है कि हमारे देश में ग्रामीणों की औसत आय में कृषि और पशुपालन का योगदान मात्र 23 प्रतिशत है। यहाँ तक कि उन ग्रामीण घरों में जहाँ कम से कम एक व्यक्ति कृषि-कर्म में रत है, और जिसका वार्षिक उत्पादन 5,000 रुपये है, वहाँ भी औसत आय का 43 प्रतिशत जरिया कृषि और पशुपालन ही है। इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि ग्रामीण भारत को केवल कृषि से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। हमारी दो-तिहाई जनसंख्या गाँवों में रहती है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान केवल 17 प्रतिशत ही है। सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण इलाकों में से केवल 47.6 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर करते हैं, और उनकी आय का 43.1 प्रतिशत खेतों से आता है।

ग्रामीण क्षेत्रों की मुख्य समस्या, प्राप्ति और रोजगार की दृष्टि से कृषि पर बहुत अधिक निर्भर रहना है। वहाँ कुछ ऐसे निर्माण संयंत्रों की आवश्यकता है, जो कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण करके उनका सही मूल्य दिलवा सकें।

सातवें और आठवें दशक में हुए चीन के औद्योगीकीकरण का उद्देश्य टाऊनशिप और ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा देना था। वहाँ गाँव-गाँव में छोटे-छोटे उद्योग चल रहे हैं।

इस अनुभव का भारत में भी अनुसरण किया जा सकता है। इसे विस्तृत करते हुए सॉफ्टवेयर और व्यापार में आऊटसोर्सिंग की सेवाओं तक ले जाया जा सकता है। तमिलनाडु और गुजरात के कुछ गाँव सफलता की कहानी कहते हैं। परन्तु इनकी संख्या बहुत कम है।

ग्रामीण उद्यमिता के विकास के लिए बिजली की अबाध्य सुविधा, सुरक्षित सड़कें, इंटरनेट संपर्क और शिक्षा के स्तर को ठीक करने की जरूरत है। अभी तक गैर कृषि कर्म के रूप में ईंट भट्टों, पत्थर-खदानों, खेतों में मरम्मत, निर्माण आदि में ग्रामीण लोग काम करते हैं। परन्तु सुविधाएं बढ़ने के साथ उन्हें आय के कई स्रोत मिल जाएंगे।

खेती के अलावा अन्य रोजगारों के उत्पन्न होने से अंततः खेती करने वालों को ही लाभ होगा। अन्य रोजगार मिलने से कुछ लोग कृषि-कर्म को छोड़ देंगे। लेकिन कृषि में वास्तविक रूचि रखन वाले लोग, इसमें निवेश बढ़ाकर उत्पादकता में वृद्धि कर सकेंगे।

अगर ऐसा हो सके, तो कृषि का काम मजबूरी का पेशा नहीं रह जाएगा। इसके बाद ही कृषि, विशेषज्ञता आधारित होकर लाभ का व्यवसाय बन पाएगी। यही भारतीय कृषि के पुनरुत्थान की दिशा है।

 

जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरुकता लाना जरूरी है

जलवायु परिवर्तन में ऐसी शक्ति है, जो जन-जीवन को तहस-नहस भी कर सकती है, और संवार भी सकती है। इसके प्रभावों के बारे में समय-समय पर तमाम भविष्यवाणियां की जाती रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के धारणीय लक्ष्यों से संबंधित 2018 की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि भूख और विस्थापन का एक बहुत बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2030 से 2050 के बीच बढ़ने वाली मृत्यु की संख्या का कारण जलवायु परिवर्तन से जन्मा कुपोषण, मलेरिया, डायरिया और बढ़ती गर्मी होगा।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसका दुष्प्रभाव भारत समेत अनेक विकासशील देशों पर ही अधिक होगा। विश्व बैंक का अनुमान है कि अगले तीस वर्षों में जलवायु परिवर्तन से भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 2.8 प्रतिशत की कमी आएगी, और यह देश की लगभग आधी जनता के जीवन-स्तर के हृास का कारण बनेगा। इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न स्वाभाविक ही उठ खड़ा होता है कि क्या जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना रखने वाली जनता को इसके दुष्प्रभावों का ज्ञान भी है? क्या उन्हें पता है कि यह परिवर्तन उनके स्वास्थ्य, जीविका, उनके परिवार और समुदाय के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करने वाला है?

प्रयास

जलवायु परिवर्तन के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए समय-समय पर अनेक प्रयास किए गए हैं। 1991 में उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्कूली शिक्षा में इससे जुड़ा पाठ्यक्रम रखा है। 2003 में इस दिशा-निर्देश को दोहराया गया, जिसके परिणामस्वरूप अनेक कार्पोरेट संस्थानों, शोध एवं शिक्षण संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों आदि ने लोगों के अंदर जलवायु परिवर्तन के प्रति समझ विकसित करने का बीड़ा उठाया है। इन सबके बावजूद जिस गति से इस पर काम होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। सरकारी प्रयासों में गरीबी उन्मूलन, स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं मानवाधिकारों को प्रमुखता दी जा रही है। जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रयासों के अभाव का ही परिणाम केरल की बाढ़ के रूप में सामने आया है।

क्या किया जा सकता है ?

फिलहाल 2013 के कंपनी एक्ट की सातवीं अनुसूची में जलवायु परिवर्तन को विशेष स्थान नहीं दिया गया है। अगर इसे कार्पोरेट सामाजिक दायित्व (सी एस आर) में एक विशेष अध्याय की तरह जोड़ दिया जाए, तो विभिन्न संगठन भी अपने क्रियाकलाप में इसे वैसा ही महत्व देगें और जागरूकता भी फैलाएंगे। इस क्षेत्र में निवेश भी बढ़ेगा। राष्ट्रीय सी एस आर डाटा पोर्टल रिपोर्ट बताती है कि कार्पोरेट जगत ने पर्यावरण, पशु-कल्याण एवं संसाधनों के संरक्षण पर 2014-15 में 801 करोड़ एवं 2015-16 में 912 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसका अर्थ यह है कि ऐसे समूह पर्यावरण से जुड़े विषयों पर निवेश करने को इच्छुक हैं।

फिल्म एक लोकप्रिय माध्यम है, जिसके द्वारा सभी वर्ग के लोगों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और उसके शमन व अनुकूलन के बारे में अवगत कराया जा सकता है। साहित्य और गेमिंग के जरिए भी इस विषय पर ज्ञान दिया जा सकता है। देश में जलवायु परिवर्तन के कारण प्रतिवर्ष आने वाली प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए ग्रामीण और शहरी जनता कोइसके प्रभावों से जूझकर जीवन को जल्द से जल्द सामान्य स्थिति में लौटा लाने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

 

पुलिस की भूमिका बदली जाए

1960 में भारत और अमेरिका दोनों ही देश कानून-व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति से परेशान थे, और इससे निपटने का प्रयत्न कर रहे थे। दोनों ही देशों ने अलग-अलग रास्ते अपनाए, और अलग-अलग परिणाम भी पाए।

भारत में पुलिस-व्यवस्था की शुरूआत अंग्रेजों ने की थी। जाहिर सी बात है कि अपने दमनकारी शासन की रक्षा के लिए उन्हें सैन्यवादी और कड़क पुलिस चाहिए थी, और उन्होंने वैसा ही किया।

पुलिस व्यवस्था के जनक कहे जाने वाले रॉबर्ट पील ने 1829 में लंदन मेट्रोपोलिटन पुलिस की स्थापना की। पुलिस की शुरूआत के साथ ही उनका विचार था कि यह ‘नागरिकों को यूनिफार्म’ पहना देने जैसी भूमिका निभाए। उन्होंने नवनिर्मित पुलिस-बल से लोगों के बीच घुल-मिलकर काम करने और अपराध से सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की। उनके इस सिद्धान्त ने लोगों को भी अपराध रोकने में भागीदार बना दिया। यह विचार बहत ही सफल रहा।

20वीं शताब्दी में ऑटोमोबाइल और दूरसंचार के विकास के साथ ही पुलिस की भूमिका अपराध से लड़ने वाले व्यावसायिकों की हो गई और यह पूरी व्यवस्था गश्त, सेवा में तत्पर रहने और अपराध की जाँच-पड़ताल में प्रतिक्रियाशीलता पर केन्द्रित हो गई। इन सबके बीच नागरिकों की भूमिका कम होती गई। वे अपराध को रोकने वाले के स्थान पर सहायता मांगने वाले बन गए। गश्त के लिए मोटर वाहन के बढ़े प्रयोग ने पुलिस को लोगों से दूर कर दिया।अब पुलिस किसी आपराधिक स्थल पर ही लोगों से रूबरू होने लगी। आम जनता का उसके प्रति और उसका आम जनता के प्रति भाव बदल गया।

जब 1960 में अमेरिका और भारत दोनों में ही कानून-व्यवस्था की स्थिति गड़बड़ाई, तब अमेरिका में पुलिस की व्यावसायिक अपराध नियंत्रक वाली भूमिका पर सवाल उठाए जाने लगे। वाहन से पुलिस की गश्त की व्यर्थता को देखते हुए धीरे-धीरे पैदल ही गश्त लगाने वाली प्रथा को बढ़ाया गया। 1994 में अमेरिका ने एक कानून बनाकर एक लाख गश्त लगाने वाले पुलिसकर्मियों की भर्ती की। वहाँ की जनता के लिए पुलिस अब अपराध की दशा में ही सक्रिय होने के स्थान पर एक ऐसे पड़ोसी का किरदार निभाने लगी, जो मुसीबत में सदा साथ खड़ा रहता है। इस प्रकार अमेरिका ने धीरे-धीरे हिंसक वारदातों पर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित कर लिया।

भारत में, ब्रिटिश पुलिस मॉडल में सुधार के लिए 1970 में एक योजना बनाई गई थी। परन्तु इसमें पुलिस की भूमिका को बदलने के स्थान पर केवल उसके आधुनिकीकरण पर ध्यान दिया गया। अमेरिका के सुधारों के विपरीत भारतीय पुलिस अब भी गश्त, सेवा में तत्पर और अपराध की जाँच-पड़ताल की प्रतिक्रियाशीलता पर टिकी रही। पुलिस की इस सुरक्षात्मक पहुँच के बजाय प्रतिक्रियावादी पहुँच ने अपराधों में वृद्धि की। इसके परिणामस्वरूप ही भारत में निजी सुरक्षा एजेंसियों और गेटेड सोसायटी की मांग बढ़ने लगी।

आज भारत में भी अमेरिका की तर्ज पर समुदाय-उन्मुख और अपराध से निपटने को तैयार पुलिस रणनीति की आवश्यकता है। इसे अपराध मानचित्रण एवं अपराध के प्रचलन के विश्लेषण पर आधारित किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर ही व्यावसायिक अपराधियों एवं मानसिक विकृति में अपराधी बने लोगों से निपटा जा सकेगा। यही वह समय है, जब पुलिस बल में 86 प्रतिशत स्थान रखने वाले हवलदारों की भूमिका को समस्या के समाधानकर्ता की तरह परिवर्तित किया जाएगा। देश में 10-24 आयु वर्ग के लगभग 35 करोड़ युवा हैं। सक्रिय और परस्पर संबंद्ध, सामुदायिक समाधान की ओर उन्मुख पुलिस के लिए ये युवा एक सहयोगी की भूमिका निभा सकते हैं।

 

शहरी गरीब एवं मलिन बस्तियों की समस्या

भारत में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। परन्तु इसके लिए पर्याप्त रूप से नीतियाँ नहीं बनाई गई हैं। प्रतिदिन हजारों लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं। इनमें से अधिकतर शहरों की मलिन बस्तियों में रहते हैं। ये साल दर साल रहते चले जाते हैं, परन्तु अपने लिए घर नहीं जुटा पाते। अध्ययनों से पता चलता है कि गरीब एवं मलिन बस्तियों में रहने वाले लोग कर्ज और सामाजिक-आर्थिक ठहराव के दुष्चक्र में फंसे रहते हैं। इस प्रकार इनके जीवन स्तर में कभी सुधार नहीं हो पाता।

क्या किया जाना चाहिए ?

  • सबसे पहले तो अस्थायी गरीब बस्तियों में रहने वालों का सही आंकड़ा ज्ञात किया जाना चाहिए। इन बस्तियों की परिभाषा ही तरल है, जो बहुतों को गिनती में नहीं लेती। 2011 की जनगणना, गरीब बस्तियों में रहने वालों की संख्या 5 करोड़ दिखाती है। यह यू एन-हेबीटेट 2014 में दिए गए 1.04 करोड़ के आँकड़े से बहुत भिन्न है।
  • गरीब बस्तियों के लिए बनाई गई नीतियाँ, भवन निर्माण, पुर्नस्थापन या इन बस्तियों के आसपास बहुमंजिली इमारतों के विकास से जुड़ी होती हैं। इन नीतियों का बस्तियों में रहने वाले लोगों के आर्थिक-सामाजिक असंतोष से कोई लेना-देना नहीं होता। बैंगलूरू में लाई गई दो योजनाओं से इस बात का खुलासा हुआ। नीदरलैण्ड, अमेरिका और एक स्थानीय एनजीओ ने इन बस्तियों का सर्वेक्षाण करने के बाद बताया कि इनमें रहने वाले 70 प्रतिशत परिवार ऋण के भार से दबे हुए हैं। ये लोग ब्याज की भारी दर पर रुपये उधार लेते हैं, और उसे चुकाते-चुकाते बिजली और पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की भी पूर्ति नहीं कर पाते।
  • अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय ने अपने सर्वेक्षण में बताया कि इन बस्तियों में रहने वाले दस में से सात परिवार चार पीढ़ियों से यहीं रहते चले आ रहे हैं। यहाँ से निकलकर भी वे इससे अधिक मलिन बस्ती में रहने को मजबूर हुए। शहरों के दूसरे क्षेत्रों में होने वाले विकास कार्यों की अपेक्षा इन बस्तियों के लिए बहुत कम काम किया जा रहा है।
  • शिक्षा में सुधार के लगातार सरकारी प्रयासों के बावजूद शहरी गरीब बस्तियों के जीवन-स्तर में सुधार न होना दुखदायी है। इसका सीधा संबंध नए रोजगारों में आए परिवर्तन से लगाया जा सकता है। वर्तमान स्थितियों में स्नातक या तकनीकी प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले युवाओं को कम वेतन वाली नौकरियां ही मिल पाती हैं। अतः इन बस्तियों में रहने वाले युवाओं की आय अन्य युवाओं की तुलना में कम होती है।

गरीब और मलिन बस्तयों के लिए निचले स्तर पर सर्वेक्षण करके यथानुरूप नीतियाँ बनाने की आवश्यकता है। इस प्रकार की बस्तियों में राजनीतिक संरक्षण ने पक्के घर, स्वच्छ जल, नियमित विद्युत आपूर्ति जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा दी हैं। इसके साथ ही अगर इन बस्तियों के रहवासियों को आर्थिक अवसर और पर्याप्त रोजगार मिल सके, तो कहना ही क्या? अतः इन बस्तियों के लिए अपनाई गई आवासीय योजनाओं से बहुत थोड़ा कल्याण हो सकेगा। आमूलचूल परिवर्तन के लिए समग्र विकास की ओर ध्यान देना होगा।

 

राज्य वित्त आयोगों को क्षमतावान बनाया जाए

राज्य वित्त आयोग एक ऐसी संस्था है, जिसका गठन संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य राज्य और उससे निचले स्तर के प्रशासन के वित्तीय संबंधों को युक्तिसंगत बनाना था। इसका मुख्य कार्य जनता को पहुँचने वाली जन-सेवाओं में आने वाले वित्तीय क्षैतिज असंतुलन को दूर करना रहा है। परन्तु केन्द्र, राज्यों एवं अन्य व्यावसायिक संस्थाओं में इसके प्रति उदासीनता देखने को मिलती है।

संविधान के अनुच्छेद 243 (आई) के अनुसार संवैधानिक संशोधन के एक वर्ष के अंदर ही राज्यपाल को वित्त आयोग की स्थापना कर देनी चाहिए थी। इसके बाद हर पाँच साल पर इसके पुनर्गठन की व्यवस्था रखी गई है। परन्तु राज्यों ने इसके गठन में नियमितता नहीं दिखाई है। केरल, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर बाकी राज्यों को जहाँ पाँचवे वित्त आयोग की रिपोर्ट जमा करनी चाहिए; वे तीसरे पर ही अटके हुए हैं। इस मामले से कुछ प्रश्न उठ खड़े होते हैं कि क्या संविधान के प्रति निष्ठा दिखाना अपनी सुविधा पर निर्भर करता है? या जिस प्रकार की नियमितता, गंभीरता और अंगीकरण केन्द्रीय वित्त आयोग को लेकर है, वैसा राज्य वित्त आयोगों के लिए क्यों नहीं है?

  • कुछ कारणों से तीसरे केन्द्रीय वित्त आयोग के गठन से ही आयोग ने योजना और निवेश आवंटन से स्वयं को दूर रखा। सामान्य रूप से राज्य वित्त आयोग ऐसा नहीं कर सका। योजना आयोग की समाप्ति के बाद हांलाकि कुछ ने केन्द्रीय वित्त आयोग का पथ चुना है। अब 15वें वित्त आयोग को अपने निर्णय के क्षेत्र का दायरा बढ़ाना पड़ा है।
  • नेताओं और नीति-निर्माताओं के मन से इस भ्रम को दूर करने की आवश्यकता है कि केन्द्रीय वित्त आयोग की तुलना में राज्य वित्त आयोग का संवैधानिक दर्जा नीचा है। राज्य वित्त आयोग का गठन भी केन्द्रीय वित्त आयोग के मॉडल पर ही किया गया है। जिस प्रकार से केन्द्रीय वित्त आयोग का काम केन्द्र-राज्य के बीच के ऊध्र्व और क्षैतिज वित्तीय असंतुलन को दूर करना है, उसी प्रकार राज्य वित्त आयोग को राज्य व निचली प्रशासनिक संस्थाओं के बीच करना है।
  • राज्य वित्त आयोग के क्षैतिज असंतुलनों को दूर करने के प्रयासों को संज्ञान में नहीं लिया जाता है। जबकि लगभग 5 लाख स्थानीय सरकारों के माध्यम से शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने का भार राज्य वित्त आयोग ही पूरा करता है। इस प्रकार राज्य वित्त आयोग एक ऐसी संस्थागत एजेंसी है, जो सहभागी संघवाद के उत्तम मार्ग पर चलती है। इसके माध्यम से प्रत्येक नागरिक को सार्वजनिक सुविधाओं का न्यूनतम लाभ सुनिश्चित किया जाता है।
  • अनुच्छेद 280(3) में संशोधन करके दो खंड और जोड़े गए हैं। इनका उद्देश्य पंचायतों और नगरपालिकाओं के संसाधनों में वृद्धि करना है, जिसकी संस्तुति राज्य वित्त आयोग ने ही की थी। यही उपखंड स्थानीय प्रशासन और राज्य वित्त आयोग के बीच एक संपर्क-सूत्र का काम करते हुए वित्तीय संघवाद की स्थापना करते हैं। जब केन्द्रीय वित्त आयोग राज्यों के बीच वितरण और जब राज्य वित्त आयोग क्षैतिज वितरण में असमानताओं को कम कर सकेंगे, तभी भारतीय महासंघ एक धारणीय एवं समग्र राष्ट्र बन सकेगा।
  • केन्द्रीय वित्त आयोग को राज्यों और केन्द्र के वित्त संबंधी डाटा की कोई समस्या नहीं है। राज्यों और केन्द्र का वित्तीय रिपोर्टिंग तंत्र दुरूस्त है। परन्तु स्थानीय प्रशासन में यह बहुत ही लचर है, जिसका खामियाजा राज्य वित्त आयोग को भुगतना पड़ता है।
  • केन्द्रीय वित्त आयोग से अलग राज्य वित्त आयोग, अनुच्छेद 243(जी) और 243 डब्ल्यू (जो आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए नीति बनाने की बात कहते हैं) एवं 243 जेड डी (जो प्रत्येक राज्य के लिए निचले स्तर पर स्थानिय योजनाओं और पर्यावरण संरक्षण को अनिवार्य बनाता है) की अनदेखी नहीं कर सकते।

यहाँ केन्द्रीय वित्त आयोग पर विकेन्द्रीकृत प्रशासन के निर्धारण में असफल रहने का दोषारोपण भी किया जा सकता है। सच्चाई यह है कि किसी भी केन्द्रीय वित्त आयोग ने राज्य वित्त आयोगों की रिपोर्ट को पढ़ने और उनकी समीक्षा करने की कोशिश ही नहीं की है। भारत के वित्तीय संघवाद में राज्य वित्त आयोगों को एक सही भूमिका निभाने का वातावरण ही नहीं दिया गया। ऐसा किए बिना संवैधानिक संशोधनों के उद्देश्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

 

हाथियों की सुरक्षा के लिए एक सार्थक कदम

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने नीलगिरी के 27 ऐसे रिसॉर्ट बंद करने का आदेश दिया है,जो उस क्षेत्र के हाथियों के आवागमन के रास्ते में आते हैं। न्यायालय का यह प्रयास पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा की दिशा में सराहनीय कहा जा सकता है। हाथियों की संख्या आनुवांशिक रूप से जीवाश्म होती है। वह वनों को पुनर्जीवन प्रदान करती है, जिस पर जंगल के अन्य जीव-जन्तुओं का जीवन निर्भर करता है। अतः हाथियों के विचरण-पथ में छेड़छाड़ न करने का आदेश वन-संरक्षण के लिए अनिवार्य भी था।

हमारे देश में पर्यावरणीय पर्यटन से जुड़े नियम-कानून बहुत कमजोर हैं। इसी का लाभ उठाकर वन्य प्राणियों की शरणस्थलियों का मनमाना उपयोग किया जा रहा है। उनके विचरण-पथ को बाधित किया जा रहा है, जिसके चलते पशु अन्य वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेते हैं, जो मानव के साथ उनके टकराव का कारण बनता है। बहुत सी वन-भूमि को खेतों में परिवर्तित कर दिया गया है। मानव-पशु संघर्ष का परिणाम हाथियों द्वारा प्रतिवर्ष मारे गए लगभग 450 लोगों के रूप में देखा जा सकता है।

गत वर्ष वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने पर्यावरण मंत्रालय के साथ मिलकर ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ के अंतर्गत ऐसे 101 मार्गों की पहचान की थी, जिनमें से 70 प्रतिशत मार्गों का हाथियों द्वारा नियमित उपयोग किया जाता है। इनमें से तीन-चैथाई पथ-दक्षिण, मध्य एवं उत्तर पूर्वी जंगलों में बराबर बंटे हुए हैं। बाकी के पथ उत्तर-पश्चिम बंगाल और बाकी के उत्तर-पश्चिमी भाग में हैं। इनमें से कुछ पथ अत्यंत संकरे हैं। एक अनुमान के अनुसार ब्रह्मगिरी-नीलगिरी पूर्वी घाट में लगभग 6,500 हाथी हैं। इनकी सुरक्षा के लिए इन पथों की संपूर्ण सुरक्षा की जानी चाहिए।

इस क्षेत्र के जिलाधीश की चैंकाने वाली रिपोर्ट यह बताती है कि हाथियों के क्षेत्र में बने 39 रिसॉर्ट का निर्माण वन विभाग की नाक के नीचे किया गया, और वह भी आवश्यक अनुमति लिए बिना। इन सबकी गहन जाँच की आवश्यकता है।

बहरहाल, हाथियों के अस्तित्व से जुड़े दो मुख्य कारकों पर प्राथमिकता से ध्यान दिया जाना चाहिए। (1) हाथियों के 40 प्रतिशत अभ्यारण्य भेद्य हैं, क्योंकि ये किसी संरक्षित उद्यान या अभ्यारण्य का हिस्सा नहीं हैं। (2) इन क्षेत्रों को कोई वैधानिक संरक्षण प्राप्त नहीं है।

पर्यटन की आड़ में वन्य जीवन को होने वाली हानि पर कड़ी नजर रखना और उसे बचाना वन विभाग की मुस्तैदी और कड़े कानूनों की आवश्यकता की मांग करता है।

 

इतिहास विषय से जुड़ी त्रासदी

इतिहास का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। भूतकाल में हुई घटनाओं से सबक लेकर हम अपने वर्तमान और भविष्य को संवारते हैं। यही कारण है कि स्कूली ज्ञान में इसे एक महत्वपूर्ण विषय माना गया है। लेकिन आज तक इस विषय को कभी वह अहमियत नहीं दी गई, जो उसे मिलनी चाहिए थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि इतिहास हमारे युवा वर्ग के दृष्टिकोण को नए साँचे में ढालने में बड़ी भूमिका निभाता है। परन्तु कुछ ऐसे कारण हैं, जो समाज और शिक्षा के क्षेत्र में इतिहास की महत्ता को स्थापित करने में अवरोध पैदा करते हैं।

  • भारत में इतिहास का पाठ्यक्रम और पाठ्य पुस्तकें हमेशा से ही राजनीतिक विवाद का विषय रही हैं। इस मामले में भारत ही अकेला देश नहीं है। लगभग हर देश में इतिहास की प्रस्तुति और उसे स्कूली शिक्षा में पढ़ाए जाने को लेकर विवाद होते रहे हैं। उदाहरण के लिए देखें, तो अमेरिका के लिए हिरोशिमा पर बम गिराना, और ब्रिटेन के लिए स्कूली शिक्षा में गाँधी की चर्चा करना हमेशा ही असुविधाजनक रहा है।

स्कूली पाठ्यपुस्तकों में परोसे गए इतिहास को लेकर विवाद होने का मुख्य कारण उसका सामूहिक स्मृतियों और पहचान को धारण करना है। पाठ्य पुस्तकें तो सरकार की आधिकारिक दस्तावे़ज समझी जाती हैं। इन्हें सरकार की शक्ति के साथ जोड़कर देखा जाता है। साथ ही ये बच्चों के मन-मस्तिष्क पर भी छाप छोड़ जाती हैं। स्कूली स्तर पर प्रस्तुत किए गए अतीत के एक निश्चित संस्करण से बच्चों को एक स्वभाव प्राप्त होता है, जिसे भविष्य में राजनीतिक रूप से संगठित किया जा सकता है।

पाठ्य पुस्तकों में प्रस्तुत सामग्री को दोष देने के समय लोग यह भूल जाते हैं कि वास्तव में यह दोष पाठ्यक्रम बनाने वालों का होता है। इस समस्या से निपटने के लिए सन् 2006 में एनसीईआरटी ने इतिहास के पाठ्यक्रम को इतिहासकारों की एक टीम से तैयार करवाया। यह पाठ्यक्रम और सामग्री इतिहास को एक लंबी कहानी के रूप में न कहकर, बच्चों को हमारे पूर्व जीवन के अनेक पक्षों जैसे किसानों का जीवन, महिलाओं, कला आदि की स्थितियों के बारे में खोजबीन करने की उत्सुकता जागृत करता है। ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में अभिलेख या उत्खनन से प्राप्त सामग्री के चित्र प्रकाशित किए गए हैं।

इतिहास के महत्व को स्थापित न कर पाने का दूसरा बड़ा कारण वे शिक्षक होते हैं, जिन्होंने स्वयं कभी इतिहास नहीं पढ़ा या पढ़ा भी तो कभी उसमें रुचि नहीं ली। अतः पाठ्यक्रम में बदलाव के बावजूद यदि शिक्षण का तरीका बिल्कुल नहीं बदलता, तब वह बच्चों के बीच लोकप्रिय कैसे बनाया जा सकेगा? इतिहास पढ़ने और पढ़ाने के बारे में एक आम धारणा है कि यह राजा-महाराजाओं, युद्धों और तारीखों को याद रखने का दूसरा नाम है। भारतीय इतिहास को प्राचीन, मध्य और आधुनिक भारत में विभाजित कर देना, उसकी जटिलता और प्रचुरता को समाप्त कर देता है। परीक्षा में प्रश्न भी ऐसे पूछे जाते हैं, जिनका उत्तर बड़ी आसानी से गाइड बुक की सहायता से दिया जा सके।

अधिकतर राज्यों में इतिहास अभी भी सामूहिक स्मृति और पहचान का ही परिचायक बना हुआ है। इसमें असम जैसी समस्याओं का कोई समाधान नहीं मिलता। सामाजिक विज्ञान के शिक्षक बच्चों के शरीर, विचारों और भावनाओं के निरंतर अनुशासन के माहौल में काम करते हैं। साथ ही लगभग सभी स्कूलों में प्रतिस्पर्धा के माहौल में बच्चों का विकास किया जाता है। इस माहौल में शिक्षकों को हर रोज बच्चों को केवल रटाने का प्रयास करना होता है। इस प्रतिस्पर्धा में विषय की गहराई में जाने वाली बात अक्सर खो जाती है।

  • वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, शिक्षा के बाजार को विज्ञान से जुड़े विषय ही नियंत्रित कर रहे हैं। इसी से जुड़े विषय अच्छे वेतन वाली नौकरी दिलवाते हैं।अतः इस पृष्ठभूमि में सामाजिक विज्ञान और मानवीय कलाओं से जुड़े विषय कहाँ टिक सकते हैं।

माना कि शिक्षा की इस प्रतिस्पर्धातमक संस्कृति में इतिहास की कोई जगह नहीं है। लेकिन फिर भी देश के राजनीतिक चरित्र को गढ़ने में उसकी भूमिका को कभी नकारा नहीं जा सकता। स्कूलों के बच्चों का इतिहास पढ़ने के लिए किसी वयस्क शिक्षक पर निर्भर होना ही स्कूलों में इतिहास के लिए चुनौती खड़ी कर देता है।